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आखिर क्यों आपराधिक मामले वापस लेने का फैसला अकेले सरकार नहीं कर सकती? जानिए अभियोजन वापसी के ये महत्वपूर्ण बिंदु

LiveLaw News Network
23 Sep 2019 1:15 AM GMT
आखिर क्यों आपराधिक मामले वापस लेने का फैसला अकेले सरकार नहीं कर सकती? जानिए अभियोजन वापसी के ये महत्वपूर्ण बिंदु
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स्पर्श उपाध्याय

अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव तब चर्चा में आये, जब उन्होंने यह कहा की यदि उनकी पार्टी की सरकार उत्तर प्रदेश राज्य में दुबारा सत्ता में आती है (2022 के चुनाव में) तो वो आजम खान (वर्तमान सांसद, रामपुर एवं समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता) के खिलाफ दायर सभी मुक़दमे वापस ले लेंगे। उन्होंने कहा, "यदि समाजवादी पार्टी, उत्तर प्रदेश में सत्ता में वापस आ जाती है, तो सपा के वरिष्ठ नेता और रामपुर के सांसद आज़म खान के खिलाफ दर्ज सभी मुकदमे वापस ले लिए जाएंगे।"

गौरतलब है कि हाल के समय में आजम खान के खिलाफ विभिन्न मामलों में बड़ी संख्या में मुक़दमे दर्ज किये गए हैं और अखिलेश यादव की यह टिपण्णी इसी सम्बन्ध में थी।

हालाँकि यहाँ गौर करने वाली बात यह है कि सिर्फ उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ही नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश के मौजूदा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी मुक़दमे वापस लेने वाले फैसलों के चलते चर्चा में रहे हैं। फिर वो भले ही अपने खिलाफ दर्ज मुक़दमे वापस लेना हो या मुजफ्फरनगर दंगों में अभियुक्तों के खिलाफ मुकदमा वापस लिया जाना हो। मामला किसी भी सरकार का हो, यदि मुक़दमे वापस लिए जाने के फैसले लिए जाते हैं तो सुर्खियां बनती ही हैं।

(हम यहाँ यह साफ़ कर देना चाहते हैं कि राज्य सरकार की तरफ से मुकदमा वापस लिए जाने का फैसला, इस बात की गारंटी नहीं होती की मुकदमा अदालत से वापस ले ही लिया जायेगा. इस महत्वपूर्ण बिंदु को हम आगे लेख में समझेंगे)

हालांकि, सरकारों के लिए मामले वापस लेना नियम नहीं है, लेकिन इसको लेकर कई मिसाले मौजूद हैं। वर्ष 2013 में, समाजवादी पार्टी ने आतंकवाद के विभिन्न मामलों में 19 आरोपियों के खिलाफ मुकदमा वापस ले लिए थे। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने इस फैसले को रद्द कर दिया। हाल ही में, हरियाणा सरकार ने फरवरी, 2016 के जाट आंदोलन के दौरान हिंसा से संबंधित मामलों को वापस लेने के अपने फैसले की घोषणा की थी।

वहीँ दिसंबर 2017 में, उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार ने अपने सरकारी वकील से योगी आदित्यनाथ के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों को वापस लेने के लिए कहा था। इस बहस के बीच, मुख्यमंत्री ने यह घोषणा कर दी थी कि सरकार जल्द ही नेताओं के खिलाफ 20,000 मामलों को वापस लेने के लिए एक विधेयक लाएगी।

इसके अलावा वर्ष 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों से संबंधित 131 मामलों को वापस लेने के सरकार के फैसले पर भी सवाल उठ थे, राज्य सरकार ने पूर्व केंद्रीय मंत्री स्वामी चिन्मयानंद (जिन्हें हाल में कथित बलात्कार के एक और मामले में गिरफ्तार किया गया है) के खिलाफ कथित बलात्कार के एक मामले को वापस लेने का फैसला भी किया था।

हालाँकि क्या वास्तव में सरकारें (या सत्ता में काबिज कोई व्यक्ति विशेष) मुकादमे/मामले/अभियोजन वापस ले सकती हैं? क्या उन्हें संहिता के अंतर्गत ऐसी शक्तियां दी गयी हैं? आज इस लेख में हम इसी पर चर्चा करेंगे।

आखिर क्यूँ लिए जाते हैं आपराधिक मामले वापस?

इसे समझने के लिए हम राजेंदर कुमार जैन बनाम राज्य (1980) 3 SCC 435 में अदालत की टिपण्णी से शुरुआत कर सकते हैं। जस्टिस ओ. चिनप्पा रेड्डी ने इस मामले में यह देखा था कि:-

"अतीत में, हमने यह जाना है कि लोक अभियोजक के लिए सार्वजनिक हित में यह कितना आवश्यक है कि बड़े पैमाने पर आंदोलन, सांप्रदायिक दंगों, क्षेत्रीय विवादों, औद्योगिक संघर्षों, छात्र संघर्षों आदि से उत्पन्न होने वाले मुकदमों को वापस लिया जाए। जहां भी मुद्दों में भावनाओं का समावेश होता है और वातावरण में हिंसा का अधिभार होता है, वहां अक्सर ही शांति को बहाल करने के लिए, हिंसा के अधिभार से माहौल को मुक्त करने के लिए, मुद्दों के शांतिपूर्ण समाधान के लिए और शांति को संरक्षित करने के लिए अक्सर अभियोजन वापस लिया जाना आवश्यक पाया गया है। अभियोजन के उन मामलों को जारी रखना, जहाँ कानून के नाम पर भावनात्मक मुद्दों को शामिल किया जाता है, वह खतरनाक हो सकता है। एक निर्वाचित सरकार, जो लोगों की भावनाओं के प्रति संवेदनशील है, वह सरकार सद्भावना का माहौल स्थापित करने के उद्देश्य से अपराधियों के खिलाफ मुकदमा नहीं चलाने का निर्णय ले सकती है। ऐसे मामलों में, यदि सरकार नहीं तो और कौन यह तय कर सकता है कि अभियोजन को जारी रखना लाभप्रद होगा या नहीं।"

भले ही सरकार को अपने अभियोजकों को यह निर्देश देने का अधिकार है कि किसी मामले को वापस लिया जाना है, लेकिन यह लोक अभियोजक की जिम्मेदारी है कि वह वास्तव में उस मामले को वापस लेने की अदालत से स्वीकृति मांगे या नहीं। हम आगे इस मुद्दे को विस्तार से समझने वाले हैं।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा शंकरनारायणन नायर बनाम पी. वी. बालाकृष्णन और अन्य, [1972] 2 SCR 599, के मामले में कहा गया था कि इस शक्ति के इस्तेमाल में यह आवश्यकता निहित है कि यह न्याय प्रशासन के हित में होनी चाहिए। इसी क्रम में उड़ीसा राज्य बनाम सी. महापात्र, [1977] 1 SCR 385 के मामले में कहा गया था कि इस शक्ति का परम मार्गदर्शक विचार, हमेशा न्याय प्रशासन का हित होना चाहिए।

जैसा कि सुभाष चंदर बनाम राज्य (चंडीगढ़ एडमिनिस्ट्रेशन), (1980) 2 SCC 155 के मामले में अभिनिर्णित किया गया था कि एकबार जब अभियोजन कार्यवाही शुरू हो जाती है, उसके बाद इसे तब तक बंद नहीं किया जा सकता है, जबतक कार्यवाही बंद किये जाने में लोक हित निहित न हो। अर्थता लोकहित के लिए अभियोजन कार्यवाही को बंद (या मुकदमा लिया जाना) किया जा सकता है।

यह भी सत्य है कि कानून और व्यवस्था का प्रसार, लोक न्याय का एक पहलू है। लोक नीति के आधार पर अभियोजन वापस लिए जाने के लिए कहा जा सकता है। एक अभियोजन, जो बाद में झूठा या अस्पष्ट पाया जा सकता है, उसे आगे बढ़ने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। यह आधार एक बड़े कैनवास को कवर करता है। धारा 321 (जिसे हम आगे समझने वाले हैं) के तहत अभियोजन से वापसी के लिए एक शर्त के रूप में अदालत की सहमति की आवश्यकता, उस शक्ति के अभ्यास पर एक चेक के रूप में लगाई गयी है। अदालत द्वारा सहमति तभी दी जाएगी, जब इस तरह की अभियोजन वापसी से बड़े अर्थों में सार्वजनिक न्याय को बढ़ावा दिया जा सके।

दरअसल धारा 321, दंड प्रक्रिया संहिता के तहत विवेक का उपयोग, न्यायालय द्वारा सावधानीपूर्वक किया जाना चाहिए ताकि सभी संबंधित तथ्यों के संबंध में उचित कार्यवाही हो सके। प्रत्येक अपराध समाज के खिलाफ एक अपराध है और अगर आरोपी ने अपराध किया है, तो समाज यह मांग करता है कि उसे दंडित किया जाना चाहिए। अपराध करने वाले को दंडित करना, कानून और व्यवस्था के रखरखाव और समाज में शांति के लिए एक आवश्यक है। इसलिए, अभियोजन वापस लेने की अनुमति केवल तभी दी जाएगी, जब ऐसा करने के वैध कारण दिए गए हों।

धारा 321, दंड प्रक्रिया संहिता क्या कहती है?

आइये सबसे पहले हम इस धरा को पढ़ लेते हैं, फिर आगे हम इसके बारे में चर्चा जारी रखेंगे

धारा 321 - किसी मामले का भारसाधक कोई लोक अभियोजक या सहायक लोक अभियोजक, निर्णय सुनाये जाने से पूर्व किसी समय किसी व्यक्ति के अभियोजन को या तो साधारणतः या उन अपराधों में से किसी एक या अधिक के बारे में, जिनके लिए उस व्यक्ति का विचरण किया जा रहा है, न्यायालय की सम्मति से वापस ले सकता है और ऐसे वापस लिए जाने पर -

(a) यदि वह आरोप विरचित किये जाने के पहले किया जाता है तो अभियुक्त ऐसे अपराध या अपराधों के बारे में उन्मोचित कर दिया जायेगा

(b) यदि वह आरोप विरचित किये जाने के पश्च्यात या जब इस संहिता द्वारा आरोप अपेक्षित नहीं है, तब किया जाता है तो वह ऐसे अपराध या अपराधों के बारे में दोषमुक्त कर दिया जायेगा

जैसा कि हम जानते हैं कि आपराधिक मामलों को वापस लेने की शक्ति, दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 321 के तहत लोक अभियोजक (public prosecutor) या सहायक लोक अभियोजक (assistant public prosecutor) में निहित है। क़ानून के अनुसार, मामले में फैसला आने से पहले किसी भी स्तर पर, अभियोजक एक या सभी अपराधों के तहत एक मामले में एक या सभी अपराधियों के खिलाफ मुकदमा वापस लेने का फैसला कर सकता है। हालाँकि, यदि चार्जशीट दायर होने से पहले ऐसा कोई आवेदन किया जाता है, तो इसका परिणाम डिस्चार्ज होगा। यदि आरोप पत्र दायर किया जाता है, तो अभियुक्त को दोषमुक्त किया जायेगा।

गौरतलब है कि जहाँ तक बात उत्तर प्रदेश की है, एक संशोधन (उत्तर प्रदेश एक्ट नंबर 18 ऑफ़ 1991) के माध्यम से यह व्यवस्था कर दी गयी है कि, मामलों को वापस लेने के लिए राज्य सरकार की अनुमति अब अनिवार्य है। यानी उत्तर प्रदेश राज्य के मामले में यदि अभियोजन वापस लिया जाना है तो उसके पहले राज्य सरकार की लिखित स्वीकृति आवश्यक है, जिसे अदालत में दाखिल किया जायेगा। हालाँकि यहाँ इस बात पर गौर किया जाना चाहिए कि अंततः एक आपराधिक मुकदमा वापस लिया जा सकेगा कि नहीं, यह अदालत के विवेक पर निर्भर करता है।

इसके अलावा, ऐसे मामलों में जहां मामला केंद्र की कार्यकारी शक्तियों से संबंधित है, या दिल्ली विशेष पुलिस प्रतिष्ठान अधिनियम के तहत आता है, या केंद्र सरकार की संपत्ति को नुकसान से संबंधित है, वहां आपराधिक मामले को वापस लेने के लिए संघ से अनुमति की आवश्यकता होती है। हम इस लेख में मुख्यतः राज्य सरकारों द्वारा लोक अभियोजक के माध्यम से अभियोजन वापस लेने पर चर्चा करेंगे।

हालाँकि हमे किसी भी समय यह नहीं भूलना चाहिए कि आपराधिक मामलों की/अभियोजन वापसी, अदालत द्वारा अपनी सहमति देने के अधीन है। अर्थात भले ही लोक अभियोजक द्वारा अदालत के समक्ष मुकदमा वापस लेने की कार्यवाही शुरू की जाये, परन्तु यदि अदालत इसको लेकर अपनी सहमती नहीं देती है, तो मामले को वापस नहीं लिया जा सकेगा।

किस में निहित है अभियोजन वापस लेने की शक्ति?

व्यक्तियों या संस्थाओं के खिलाफ अभियोजन वापस लेने की शक्ति कानून में निहित है और लोक अभियोजक के माध्यम से राज्य सरकार ऐसा कर सकती है। गौरतलब है कि धारा 321, दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत राज्य सरकार का जिक्र नहीं है (हालाँकि, उत्तर प्रदेश राज्य ने इस धारा में एक संशोधन करके राज्य सरकार का जिक्र किया है), और यह जिम्मेदारी पूर्ण रूप से लोक अभियोजक की होती है कि वह धारा 321 के अंतर्गत निहित शक्तियों का इस्तेमाल करे, हालाँकि इस बात से इंकार नहीं है कि राज्य सरकारें लोक अभियोजक को इस सम्बन्ध में राय देती हैं एवं दे सकती हैं।

इस सम्बन्ध में राज्य सरकार की भूमिका इसलिए भी सामने आती है क्यूंकि किया गया प्रत्येक अपराध, राज्य के खिलाफ किया गया अपराध होता है, इसलिए राज्य के ऊपर किसी अपराधी के खिलाफ मुकदमा चलाने/शुरू करने और सजा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी होती है।

इसी सिद्धांत की एक और कड़ी यह है की राज्य के पास जनहित में मामलों को वापस लेने की शक्ति होनी चाहिए। और इसी आवश्यकता को महसूस करते हुए राज्य सरकारों को लोक अभियोजक के माध्यम से दंड प्रक्रिया संहिता के तहत यह प्रावधान दिया गया है कि वो मुकदमों को वापस ले सकें। हालाँकि इसका मतलब यह बिलकुल नहीं है कि एक लोक अभियोजक को सरकार की कठपुतली के रूप में कार्य करना चाहिए, उसके ऊपर भी इस धारा के अंतर्गत कुछ जिम्मेदारियां हैं जिन्हें आगे हम विस्तार से कुछ निर्णयों के माध्यम से समझेंगे।

लोक अभियोजक या सहायक लोक अभियोजक किस प्रकार करेगा शक्ति का इस्तेमाल?

आइये अब समझते हैं इस सबसे महत्वपूर्ण मुद्दे को। सबसे पहले तो यह समझ लेना आवश्यक है कि केवल वही लोक या सहायक लोक अभियोजक, अभियोजन वापस लेने की अर्जी अदालत में दे सकता है, जिसके जिम्मे वह मामला है और जो मामले में अभियोजन को संचालित कर रहा हो। दूसरी बात यह कि, अभियोजन का वापस लिया जाना लोक अभियोजक का कार्यकारी (एग्जीक्यूटिव) फंक्शन होता है और इस जिम्मेदारी का निर्वहन उसे अदालत के प्रति जिम्मेदारी सेएवं अदालत के ऑफिसर के रूप में करना होता है, न कि सरकार के कठपुतली के रूप में।

इस बात पर गौर किया जाना चाहिए कि सरकारी अभियोजक पर अभियोजन वापस लेने के सम्बन्ध में वैधानिक रूप से निर्णय लेने की जिम्मेदारी होती है। इस जिम्मेदारी को किसी और को नहीं सौंपा जा सकता है, फिर भले ही लोक अभियोजक अथवा सहायक लोक अभियोजक से प्रशासनिक स्तर में ऊपर किसी व्यक्ति/संस्था का इस सम्बन्ध में उसे निर्देश मिले।

दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत यह शक्ति लोक अभियोजक को दी गयी है, और उसे केवल दंड प्रक्रिया संहिता के संदर्भ में स्वयं का मार्गदर्शन करना है। इसलिए उसे केवल इस बात पर विचार करना चाहिए कि क्या अभियोजन वापस लिए जाने से सार्वजनिक न्याय का व्यापक हित सिद्ध होगा या नहीं।

पंजाब राज्य बनाम सुरजीत सिंह और अन्य (1967 AIR 1214) के मामले में यह अभिनिर्णित किया गया था कि वही लोक या सहायक लोक अभियोजक इस धारा के तहत आपराधिक मामले की वापसी के लिए आवेदन दायर करता सकता है, जो लोक या सहायक लोक अभियोजक, पहले से ही उस विशेष मामले का प्रभारी है, और अभियोजन कार्यवाही संचालित कर रहा हो।

लोक या सहायक लोक अभियोजक की भूमिका इसलिए भी अहम् हो जाती है क्यूंकि उसे अपने विवेक के इस्तेमाल से यह निर्णय लेना होता है कि आखिर किन मामलों में एवं किन चार्जेज को वापस लिया जाना है। वह सरकार का तोता नहीं हो सकता है और वह अपने विवेक के ऊपर किसी अन्य चीज़ को हावी होने नहीं दे सकता है।

इसको और बेहतर ढंग से समझने के लिए हम सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 1980 के निर्णय, राजेंदर कुमार जैन बनाम राज्य (1980) 3 SCC 435 में अदालत की टिपण्णी को देखते हैं। जस्टिस ओ. चिनप्पा रेड्डी ने यह अवलोकन किया था:-

"हम यह जोड़ सकते हैं कि यह लोक अभियोजक का कर्तव्य होगा कि वह न्यायालय को सूचित करे और यह न्यायालय का कर्तव्य होगा कि वह उन कारणों से खुद को अवगत कराए जो लोक अभियोजक को अभियोजन से पीछे हटने (आपराधिक मामले वापस लेने) के लिए प्रेरित करते हैं। न्यायालय के पास आपराधिक न्याय के प्रशासन में एक जिम्मेदारी और हिस्सेदारी है, और इसलिए लोक अभियोजक, न्यायालय के 'न्याय मंत्री' हैं। दोनों का कर्तव्य है कि इस धारा के प्रावधानों का सहारा लेकर एग्जीक्यूटिव द्वारा संभावित दुरुपयोग को रोका जाए या दुरुपयोग के खिलाफ आपराधिक न्याय के प्रशासन की रक्षा की जाए। न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए यह आवश्यक है कि एक बार मामला न्यायालय में आ जाने के बाद, न्यायालय और उसके अधिकारियों को अकेले ही उस मामले पर अपना नियंत्रण रखना चाहिए और यह तय करना चाहिए कि प्रत्येक मामले में क्या किया जाना है।"

इस बात से यह साफ़ होता है कि राज्य सरकार का आपराधिक मामलों की वापसी में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए, हाँ वह जरुर अपने अधिकारी (लोक अभियोजक या सहायक लोक अभियोजक) को राय दे सकती है, पर उसके विवेक पर हावी नहीं हो सकती है। अभियोजन वापस लेने का विवेक, लोक या सहायक लोक अभियोजक के पास है और किसी के पास नहीं, और इसलिए, वह उस विवेक का आत्मसमर्पण किसी और संस्था या शक्ति के समक्ष नहीं कर सकता है।

वर्ष 2014 के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय, बैरम मुरलीधर बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (SLP (Crl.) 1487 ऑफ़ 2012) में जस्टिस दीपक मिश्र एवं जस्टिस पिनाकी चन्द्र घोष की पीठ ने लोक अभियोजक एवं सरकार के बीच, अभियोजन वापस लिए जाने को लेकर, आपसी सम्बन्ध के बारे में चर्चा करते हुए कहा था:-

"लोक अभियोजक राज्य सरकार की ओर से डाकघर (पोस्ट-ऑफिस) की तरह कार्य नहीं कर सकता है। उसे सद्भावना से कार्य करने, रिकॉर्ड पर सामग्रियों का उपयोग/अवलोकन करने और इस विषय में एक स्वतंत्र राय बनाने की आवश्यकता है, कि अभियोजन वापस लेने से क्या वास्तव में बड़े पैमाने पर जनता के हितों का संरक्षण होगा। इस संबंध में लोक अभियोजक पर सरकार का एक आदेश बाध्यकारी नहीं है। वह संहिता के तहत अपने वैध दायित्वों से वंचित नहीं रह सकता है। उसे न्यायालय के साथ-साथ सामूहिक रूप से अपने कर्तव्य को लगातार याद रखना आवश्यक है।"

वहीँ पिछले साल अब्दुल वहाब बनाम केरल राज्य एवं अन्य (CRIMINAL APPEAL NO. 1047 OF 2018) के निर्णय में जस्टिस दीपक मिश्र एवं जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूड की पीठ ने यह दोहराया था कि, लोक अभियोजक को सरकार के निर्देशों द्वारा पूरी तरह से निर्देशित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसे न्यायालय की सहायता के लिए कार्य करना चाहिए, और न्यायालय का यह कर्तव्य है कि वह पूर्व में दिए गए निर्णयों को देखें और उचित आदेश पारित करें।

अब तक यह बात हम समझ चुके हैं कि यदि सरकार को किसी मामले में ऐसा लगता है कि उस मामले को वापस लेने में लोक हित निहित है, तो उसे इस सम्बन्ध में अपने अभियोजन अधिकारी को सलाह देनी चाहिए और चूँकि वह अधिकारी ही सही मायनों में उस मामले में कानून एवं तथ्यों को बेहतर ढंग से समझता है इसलिए उस मामले को वापस लिया जाना है या नहीं, इसका निर्णय एग्जीक्यूटिव पक्ष से वही लेगा, वहीँ न्यायपालिका की ओर से यह निर्णय अदालत द्वारा लिया जायेगा कि क्या वाकई में मामले को वापस लिए जाने की अनुमति दी जानी चाहिए।

इसी क्रम में श्रीलेखा विद्यार्थी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1991) 1 SCC 212 के मामले में जस्टिस जगदीश सरन वर्मा ने यह अवलोकन किया:-

"इसमें कोई संदेह नहीं है कि लोक अभियोजक को दी गयी यह जिम्मेदारी, एक सार्वजनिक उद्देश्य से संबंधित है, जो उसे न्याय के प्रशासन के हित में कार्य करने का दायित्व सौंपती है। लोक अभियोजकों के मामले में, दंड प्रक्रिया संहिता में वैधानिक प्रावधानों में दी गयी 'सार्वजनिक तत्व' की अतिरिक्त जिम्मेदारी, निस्संदेह, लोक अभियोजकों को एक सार्वजनिक कार्यालय के धारक की विशेषता के साथ स्थापित करती है, जिसके सम्बन्ध में यह दावा नहीं किया जा सकता है कि एक लोक अभियोजक और उसके क्लाइंट के बीच का सम्बन्ध एक पेशेवर वकील एवं क्लाइंट के जैसा है, जिसमें कोई सार्वजनिक तत्व संलग्न नहीं है।"

अदालत की भूमिका है अहम्

इसी क्रम में राहुल अग्रवाल बनाम राकेश जैन एवं अन्य (2005) 2 SCC 377 के मामले में जस्टिस के. जी. बालाकृष्णन एवं बी. एन. श्रीकृष्णा की टिपण्णी बेहद महत्वपूर्ण है:-

"भले ही सरकार अभियोजन पक्ष को आपराधिक मामला वापस लेने के लिए लोक अभियोजक एवं सहायक लोक अभियोजक को निर्देश देती है, और उस प्रभाव के लिए एक आवेदन दायर किया जाता है, लेकिन अदालत को सभी प्रासंगिक परिस्थितियों पर विचार करना चाहिए और यह पता लगाना चाहिए कि अभियोजन की वापसी न्याय के कारण को आगे बढ़ाएगी या नहीं। यदि मामले में यह सम्भावना है कि अभियुक्त को बरी किया जायेगा, और मामले का अदालत में चलते रहना केवल अभियुक्तों को गंभीर रूप से परेशान करना होगा, तो अदालत अभियोजन वापस लेने की अनुमति दे सकती है। यदि अभियोजन वापस लिया जाना विवाद को खत्म करने और पक्षों के बीच सद्भाव लाने की एक संभावना है और यदि ऐसा करना न्याय के सर्वोत्तम हित में होगा, तो अदालत अभियोजन वापस लेने की अनुमति दे सकती है।"

यद्यपि यह धारा उस आधार के बारे में कोई संकेत नहीं देती है, जिस आधार पर लोक अभियोजक अभियोजन वापस लिए जाने पर विचार करने के लिए आवेदन कर सकता है, जिस पर न्यायालय को अपनी सहमति देनी है, लेकिन यह जरुर है कि अदालत को स्वयं को इस बात को लेकर संतुष्ट कराना चाहिए कि लोक अभियोजक के कार्यकारी फंक्शन का अनुचित तरीके से अभ्यास नहीं किया गया है और यह अनुचित कारणों या उद्देश्यों के लिए न्याय के सामान्य प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने का प्रयास नहीं है

दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने सुभाष चंदर बनाम राज्य के मामले में यह माना कि न्यायालय को अपनी सहमति देने हेतु 2 प्रासंगिक सवालों से खुदको संतुष्ट करना चाहिए: (1) क्या लोक अभियोजक के विचार सार्थक हैं और (2) कि क्या लोक अभियोजक द्वारा वास्तविक निर्णय लिया गया था या उसने केवल दूसरों द्वारा निर्धारित आदेशों का पालन किया था।

न्यायालय की जिम्मेदारियों के बारे में अवलोकन करते हुए मेसर्स वी. एल. एस. फाइनेंस लिमिटेड बनाम एस. पी. गुप्ता एवं अन्य (क्रिमिनल अपील नंबर 99 ऑफ़ 2016) के मामले में जस्टिस दीपक मिश्रा एवं जस्टिस एन. वी. रमना की पीठ ने यह देखा:-

"जब सरकारी वकील अभियोजन से पीछे हटने के लिए सहमति मांगते हैं, तो अदालत की एक भूमिका होती है। उस स्तर पर, न्यायालय को यह देखने की आवश्यकता है कि क्या लोक अभियोजक द्वारा स्वतंत्र चित्त से वह अर्जी दी गई है और क्या अन्य अवयव ऐसी सहमति प्रदान करने के लिए संतुष्ट हो रहे हैं। लोक अभियोजक द्वारा दिए जा रहे आवेदन (अभियोजन वापस लेने हेतु) से पहले, अदालत की कोई भूमिका नहीं होती है। यदि लोक अभियोजक आवेदन वापस लेने का इरादा रखता है,तो वह ऐसा करने का हकदार है।"

गौरतलब है कि धारा 321 के अंतर्गत अदालत की भूमिका मार्गदर्शक की होती है, उसे यह देखने की आवश्यकता होती है कि क्या लोक अभियोजक ने स्वतंत्रता पूर्वक अपने दिमाग का इस्तेमाल किया है। सहमती/स्वीकृति के आवेदन पर अदालत को अपने चित्त का इस्तेमाल करते हुए न्यायिक निर्णय लेना चाहिए कि क्या अभियोजन वापस लिए जाने की अनुमति/सहमती दी जानी चाहिए अथवा नहीं [वी. कृष्णासामी बनाम एस. के. मनोहरन 1997 Cri. LJ 654 (Mad)]

अदालत अपनी सहमती देते हुए केवल और केवल न्यायिक सिद्धांतों को ध्यान में रखेगी और यह भी देखेगी कि लोक अभियोजक अपने चित्त का इस्तेमाल स्वतंत्रता पूर्वक कर रहा है अथवा नहीं [पुरषोत्तम विजय बनाम राज्य 1982 Cri. LJ 243, 251 (MP)]। इसके साथ ही लोक अभियोजक द्वारा अभियोजन वापसी के साथ जो सामग्री अदालत के सामने राखी जाएगी उसी के आधार पर अदालत को न्यायिक निर्णय लेना होगा [पिजूश बनाम रमेश 1982 Cri. LJ 452, 456 (Gau)]

निष्कर्ष: अभियोजन वापसी संक्षेप में

सरकार एवं सत्ता में काबिज लोगों द्वारा दिए जाने वाले बयानों में हम अक्सर सुनते हैं कि उनका इरादा अदालत से मुक़दमे वापस लेने का होता है। इस पूरे लेख में हमने इसी बात को समझा कि आखिर कैसे इस पूरी प्रक्रिया में राज्य सरकारों की भूमिका बेहद कम होती है एवं लोक अभियोजक एवं अदालतों की भूमिका कितनी अधिक।

हमने यह समझा कि लोक अभियोजक, सरकार की ओर से अभियोजान कार्यवाही संचालित करने के बावजूद किस प्रकार से स्वतन्त्र है और उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह बिना भयभीत हुए अपने कार्यों का निर्वहन न्याय एवं प्रशासन के हित में करे।

यह विडम्बना ही है कि सरकारें स्वयं को इतना शक्तिशाली समझती है कि वो किसी भी स्थिति में अदालत से मुक़दमे वापस ले सकती हैं, जबकि दंड संहिता में उन्हें इस प्रकार की कोई शक्ति नहीं दी गयी है (जरुर वे इस सम्बन्ध में एक प्रारंभिक निर्णय ले सकती हैं, लेकिन अंतिम नहीं), और अंतिम रूप से यह शक्ति केवल लोक अभियोजक को है कि वह अदालत में इस सम्बन्ध में अर्जी दे, अर्थात अभियोजन वापसी के लिए अदालत में आवेदन करना है अथवा नहीं, इस बात का अंतिम निर्णय केवल और केवल एक लोक अभियोजक का हो सकता है।

अब्दुल करीम बनाम कर्नाटक राज्य [(2000) 8 SCC 710] के मामले में राज्य सरकार ने कुछ कुख्यात अपराधियों के खिलाफ मामले वापस लेने हेतु लोक अभियोजक के माध्यम से अर्जी दी थी, तो सुप्रीम कोर्ट ने इस पर राज्य सरकार को जमकर फटकार लगाते हुए कहा कि आम जनता का यह अधिकार है कि यदि राज्य सरकार के समर्थन से अदालत में अनुचित कारणों से मुकदमों की वापसी होती है, तो उसे रोका जा सके।

इसी के साथ हम इस लेख को विराम देते हैं, उम्मीद है आपको इस लेख से अभियोजन वापसी के विषय में वृहद् जानकारी मिली होगी और आप इस बात को भी समझ सके होंगे कि अभियोजन वापस लिए जाने में लोक अभियोजक एवं अदालत की जिम्मेदारी कितनी अधिक होती है और राज्य सरकारें अनुचित कारणों के चलते अभियोजन वापस नहीं ले सकती हैं।

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