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वयस्क महिला नाबालिग लड़के से शादी करने पर भी सजा से मुक्त क्यों है? सुप्रीम कोर्ट ने की व्याख्या

LiveLaw News Network
27 Nov 2019 5:19 AM GMT
वयस्क महिला नाबालिग लड़के से शादी करने पर भी सजा से मुक्त क्यों है? सुप्रीम कोर्ट ने की व्याख्या
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बाल विवाह निषेध अनिधियम, 2006 की धारा नौ में बाल विवाह करने वाले बालिग पुरुष के लिए सजा का प्रावधान है। इसके तहत "18 वर्ष से अधिक आयु का बालिग पुरुष बाल विवाह का अनुबंध करता है, उसे अधिकतम दो साल तक सश्रम कारावास की सजा, या एक लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकता है या दोनों ही सजा हो सकती है।"

सुप्रीम कोर्ट ने हाल के एक फैसले में व्यवस्था दी है कि 2006 के अधिनियम की धारा 9 में लिखित '18 वर्ष से अधिक आयु का बालिग पुरुष बाल विवाह का 'अनुबंध' करता है' को '18 वर्ष से अधिक आयु का बालिग पुरुष बाल विवाह करता है' के रूप में पढ़ा जाना चाहिए। न्यायालय ने यह भी कहा है कि बालिग महिला से शादी करने वाले 18 से 21 वर्ष की आयु के बालिग पुरुष को धारा 9 के दायरे में नहीं लाया जा सकता है।

पढ़िए सुप्रीम कोर्ट का फैसला 18 से 21 वर्ष के बीच की आयु के पुरुष को वयस्क महिला से विवाह करने पर सज़ा नहीं दी जा सकती

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि यह अधिनियम उन महिलाओं के लिए सजा का कोई प्रावधान नहीं करता जो नाबालिग लड़के से शादी करती है। न्यायालय ने इस संबंध में कानून के उद्देश्य की व्याख्या की है:-

" निस्संदेह यह अधिनियम हमारे समाज के विभिन्न हिस्सों में प्रचलित बाल विवाह की कुप्रथा को समाप्त करने के लिए बनाया गया है। अधिनियम के उद्देश्यों और कारणों में यह उल्लेख किया गया है कि बाल विवाह पर प्रतिबंध नाबालिग लड़के और लड़कियों के स्वास्थ्य, खासकर महिलाओं की स्थिति, में सुधार के इरादे से किया गया है। विशेषत: इसलिए इस कानून को लागू करने का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य विशेष रूप से बालिका वधुओं पर इस प्रथा के प्रतिकूल प्रभाव पर अंकुश लगाना था।"

पीठ ने तब इस बात की भी समीक्षा की कि बालिग महिला यदि नाबालिग बच्चे से शादी करती है तो उसे संबंधित कानून के तहत अपराध क्यों नहीं माना गया है। इसकी जानकारी के लिए न्यायालय ने संसद में विधेयक पेश करते वक्त तत्कालीन मंत्री के बयान का उल्लेख किया। इसने यह भी कहा कि इस अधिनियम में उल्लेखित 'चाइल्ड' की परिभाषा के तहत एक पुरुष जिसने 21 वर्ष और एक महिला जिसने 18 साल की उम्र पूरी नहीं की है, 'चाइल्ड' कहा जायेगा। न्यायालय ने कहा कि समाज में प्रचलित उन मान्यताओं के आधार पर अधिनियम में महिलाओं की तुलना में पुरुषों के लिए बालिग होने की उम्र ज्यादा रखी गयी है कि किसी लड़के के लिए शिक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता के वांछित स्तर को हासिल करने के लिए 18 वर्ष की आयु अपर्याप्त होती है और इसलिए दुल्हे और दुल्हन के बीच उम्र का फर्क तो होना ही चाहिए।

पीठ ने फिर इस बात की भी व्याख्या की कि इस अधिनियम के तहत बालिग महिला को नाबालिग बच्चे से शादी करने के लिए सजा से क्यों छूट मिली हुई है-


"यद्यपि, बालिग महिला नाबालिग बच्चे से शादी करने पर सजा से इसलिए मुक्त है क्योंकि हमारे समाज में शादी-विवाह के फैसले दुल्हे और दुल्हन के परिजनों द्वारा लिये जाते हैं तथा ऐसे मामले में आमतौर पर महिलाओं की अपनी राय न के बराबर होती है। हम इस बात पर जोर देने को तैयार हैं कि हम अभियोज्यता (कल्पेबिलिटी) के मामले में उपरोक्त विभेद बनाये रखने की वांछनीयता को लेकर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहते हैं। हालांकि, जिस संदर्भ में विधायिका द्वारा इस अंतर को उचित माना गया था, उसे ध्यान में रखा जाना चाहिए।
इस तरह, यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि बाल विवाह करने वाले केवल बालिग पुरुषों को दंडित करने के पीछे की मंशा भविष्य में बनने वाले वैसे दुल्हों को हतोत्हासित करके नाबालिग लड़कियों को बाल विवाह के नकारात्मक परिणामों से बचाना है, जो 18 वर्ष से अधिक की आयु के होने के आधार पर इस तरह की शादियों को ठुकराने की क्षमता रखते हों। "

आदेश की प्रति डाउनलोड करने के लिए यहांं क्लिक करेंं



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