जानिए क्या होते हैं सिविल प्रकृति के वाद

जानिए क्या होते हैं सिविल प्रकृति के वाद

हम यह जानते हैं कि जहाँ भी और जब भी हमारे अधिकारों का हनन होता है, तो कानून के अंतर्गत उसके सम्बन्ध में हमे उपचार/उपाय भी उपलब्ध कराये गए हैं। हालाँकि हमे उन उपचारों को प्राप्त करने के लिए किस फोरम में जाना है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि हमारे किस प्रकार के अधिकार का हनन हुआ है। मौजूदा लेख में हम 'सिविल प्रकृति' के उन मामलों के बारे में बात करेंगे जिनका विचारण सिविल अदालतों द्वारा किया जा सकता है।

सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा 9 में यह प्रावधान है कि दीवानी अदालतों के पास सभी सिविल स्वभाव/प्रकृति के मामलों के विचारण का अधिकार होगा, हालाँकि इनमे वह मामले शामिल नहीं होंगे जिन मामलों का सिविल अदालत द्वारा संज्ञान लिया जाना स्पष्ट या निहित रूप से वर्जित किया गया है।

सिविल प्रकृति के सूट क्या हैं, यह संहिता की धारा 9 के स्पष्टीकरण I और II के द्वारा समझाया गया है। स्पष्टीकरण I के अनुसार, वह वाद जिसमें संपत्ति-सम्बन्धी या पद-सम्बन्धी अधिकार प्रतिवादित है, इस बात के होते हुए भी कि ऐसा अधिकार धार्मिक कृत्यों या कर्मों सम्बन्धी प्रश्नों के विनिश्चय या पूर्ण रूप से अवलंबित है, सिविल प्रकृति का वाद है। वहीँ स्पष्टीकरण II यह कहता है कि इस धारा के प्रयोजनों के लिए, यह बात तात्विक नहीं है कि स्पष्टीकरण I में निर्दिष्ट पद के लिए कोई फीस है या नहीं अथवा ऐसा पद किसी विशिष्ट स्थान से जुड़ा है या नहीं।

इसलिए, धारा 9 के स्पष्टीकरण I से यह स्पष्ट है कि संपत्ति या कार्यालय सम्बंधित अधिकार पर यह तथ्य कोई फर्क नहीं डालेगा कि यह पूरी तरह से धार्मिक संस्कार या समारोह के रूप में प्रश्नों के निर्णय पर निर्भर करता है। स्पष्टीकरण II इसे और भी विस्तृत करता है और कहता है कि यहां तक कि उन कार्यालयों को भी इसमें संलग्न किया जायेगा, जिनके लिए कोई शुल्क सम्मिलित नहीं है। इसलिए, यह शुरू से ही कल्पना की गई थी कि एक सूट, जिसमें संपत्ति या कार्यालय का अधिकार शामिल है, दीवानी प्रकृति का एक सूट होगा।

उगमसिंह और मिश्रीमल बनाम केसरीमल एवं अन्य, 1971 (2) एससीआर 836 के मामले में यह आयोजित किया गया था कि पूजा करने का अधिकार, एक सिविल अधिकार है जो एक सिविल सूट का विषय हो सकता है। न्यायालय ने देखा था, "यह स्पष्ट है कि पूजा करने का अधिकार, एक नागरिक अधिकार है, जिसके साथ हस्तक्षेप एक नागरिक प्रकृति का विवाद होगा।"

श्री सिन्हा रामानुज जीर एवं अन्य बनाम श्री रंगा रामानुज जीर एवं अन्य (1962) 2 एससीआर 509 के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह देखा था कि प्रथम दृष्टया धार्मिक संस्कारों और समारोहों के सम्बन्ध में सवाल उठाते हुए सूट, दीवानी न्यायालय में बनाए रखने योग्य नहीं होते हैं अर्थता दीवानी अदालतें ऐसे मामलों का विचारण इसलिए नहीं कर सकतीं हैं क्योंकि ऐसे मामले पार्टियों के कानूनी अधिकारों से नहीं निपटते हैं। संहिता की धारा 9 के दोनों स्पष्टीकरण इस बात को स्वीकार भी करते हैं, लेकिन साथ में यह भी कहते हैं कि यदि संपत्ति या किसी कार्यालय पर अधिकार के सम्बन्ध में एक सूट लाया जाता है तो वह दीवानी प्रकृति का एक सूट होगा, इस बात के होते हुए भी कि ऐसा अधिकार, पूरी तरह से धार्मिक संस्कार या समारोह के रूप में एक प्रश्न के निर्णय पर निर्भर हो सकता है।

हम इससे दो चीज़ें समझ सकते हैं; (i) एक कार्यालय पर अधिकार के लिए लाया गया एक सूट, एक दीवानी प्रकृति का सूट होगा; और (ii) यह तब भी दीवानी प्रकृति का रहेगा, भले ही उक्त अधिकार पूरी तरह से धार्मिक संस्कार या समारोह के रूप में एक प्रश्न के निर्णय पर निर्भर करता हो।"

दीवानी न्यायालय का अधिकार क्षेत्र

अदालत के अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) से यह तात्पर्य है कि अदालत द्वारा, मामलों का विचारण करने और सुनवाई करने और उचित निर्णय देने के लिए कानून द्वारा किस हद तक शक्तियां प्रदान की गयी हैं। निहित अधिकार क्षेत्र को उस शक्ति के रूप में वर्णित किया जा सकता है, जिसके बिना न्यायालय, न्याय और अच्छे कारण के साथ कार्य करने में असमर्थ होगा। सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 9, 1908 भारत में सिविल न्यायालयों के क्षेत्राधिकार के पहलू से संबंधित है।

गंगा बाई बनाम विजई कुमार AIR 1974 SC 1126 के मामले के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति को दीवानी प्रकृति का एक सूट लाने का एक अंतर्निहित अधिकार है, और जब तक कि एक सूट को कानून द्वारा वर्जित/प्रतिबंधित नहीं किया जाता है, एक व्यक्ति अपनी इच्छा के मुताबिक एक सिविल सूट, दीवानी न्यायालय में विचारण हेतु ला सकता है। यह तर्क कभी नहीं दिया जा सकता है कि एक सूट इसलिए अदालत में नहीं लाया जा सकता है क्यूंकि कानून, मुकदमा/सूट लाने का कोई अधिकार नहीं देता है। एक सूट के दीवानी अद्लात द्वारा विचारण हेतु किसी कानून की स्वीकृति की आवश्यकता नहीं होती है और यह पर्याप्त है कि कोई भी क़ानून, उस विशेष सूट के अदालत द्वारा विचारण को रोकता/वर्जित नहीं करता है।

धारा 9 के अंतर्गत प्रत्येक शब्द और अभिव्यक्ति, नागरिकों के सिविल/दीवानी अधिकार के प्रवर्तन के लिए अधिकार क्षेत्र का उपयोग करने के लिए अदालत पर एक दायित्व डालती है। इस धारा के अंतर्गत यह स्पष्ट है कि कोई भी अदालत, एक दीवानी मामले के विचारण से मना नहीं कर सकती यदि वह मामला इस धारा के अंतर्गत दीवानी न्यायालय द्वारा सुना जा सकता है। इस प्रकार, हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि दीवानी अदालत के समक्ष 2 तत्त्व मौजूद होने पर उस एक दीवानी मामले के विचारण का अधिकार (और जिम्मेदारी) है: -

(1) सूट, सिविल प्रकृति का होना चाहिए।

(2) इस तरह के एक सूट का संज्ञान स्पष्ट रूप से या निहित रूप से वर्जित नहीं किया जाना चाहिए।

क्या होता है सिविल प्रकृति का सूट?

एक सिविल कोर्ट के पास एक सिविल मामले के विचारण का अधिकार-क्षेत्र है यह नहीं, यह तय करने के लिए यह समझना जरुरी है कि वह मामला सिविल प्रकृति का है अथवा नहीं। संहिता में 'सिविल' शब्द को कहीं भी परिभाषित नहीं किया गया है। लेकिन मानक शब्दकोश के अनुसार, यह किसी नागरिक के निजी अधिकारों और उपायों/उपचारों से संबंधित है, जो कि आपराधिक, राजनीतिक आदि से अलग है।

शब्द 'प्रकृति' को किसी व्यक्ति या चीज के मूलभूत गुणों, पहचान या चरित्र के रूप में परिभाषित किया गया है। 'सिविल प्रकृति' की अभिव्यक्ति 'सिविल कार्यवाही' की तुलना में व्यापक है। इस प्रकार, एक सूट एक सिविल प्रकृति का होता है, यदि उसमें मुख्य प्रश्न, नागरिक/सिविल/दीवानी अधिकार और प्रवर्तन के निर्धारण से संबंधित होता है। दूसरे शब्दों में, सिविल मामला क्या है, यह प्रश्न सूट की पार्टियों की स्थिति से सम्बंधित नहीं है बल्कि सूट के विषय-वस्तु से सम्बंधित है, और यही बात यह निर्धारित करती है कि एक सूट, सिविल प्रकृति का है या नहीं – मोस्ट. रेव. P.M.A. मेट्रोपोलिटन एवं अन्य बनाम मोरन मार मार्थोमा एवं अन्य 1995 AIR 2001

यह भी स्पष्ट रूप से तय किया गया कानून है कि यदि बताया गया 'कॉज ऑफ़ एक्शन', सिविल प्रकृति के एक मामले का गठन करता है, तो प्लेंट/वादपत्र को अदालत द्वारा तब तक अस्वीकार नहीं किया जा सकता है, जब तक कि वादपत्र के बयानों के मुताबिक किसी भी कानून के अनुसार मामले का सिविल न्यायालय द्वारा विचारण वर्जित न किया गया हो या वादपत्र को आर्डर 7 नियम 11, सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 में उल्लिखित आधार पर लौटा न दिया गया हो।

इस प्रकार संहिता की धारा 9 और आदेश 7 नियम 11 के प्रावधानों को एक साथ पढने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि दीवानी न्यायालय में मुकदमा बनाए रखने के लिए, वादपत्र में उस कॉज ऑफ़ एक्शन का खुलासा किया जाना चाहिए जो सिविल प्रकृति की कार्रवाई का कारण बनाता हो, जोकि न तो किसी कानून द्वारा वर्जित होना चाहिए और न ही उसका अदालत द्वारा संज्ञान लिया जाना, या तो स्पष्ट रूप से या निहित रूप से वर्जित होना चाहिए।

अभिव्यक्ति 'एक सिविल प्रकृति का सूट', एक नागरिक के निजी अधिकारों और दायित्वों को कवर करता है। एक सूट जिसमें मूल प्रश्न, जाति या धर्म से संबंधित है, एक सिविल प्रकृति का सूट नहीं है। लेकिन अगर किसी मुकदमे में मुख्य प्रश्न, एक सिविल प्रकृति (संपत्ति का अधिकार या किसी कार्यालय का) का हो, भले ही उसमे एक जातिगत प्रश्न या धार्मिक अधिकारों और समारोहों से संबंधित अधिकार जुड़ा हुआ है, तो यह एक सिविल प्रकृति का सूट माना जायेगा और ऐसे मामले में एक सिविल अदालत के अधिकार क्षेत्र को वर्जित/प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता है। अदालत के पास यह अधिकार है कि वह उन सम्बंधित सवालों पर भी फैसला करे, जो प्रमुख प्रश्न (जोकि सिविल प्रकृति का है) के निर्णय के लिए आवश्यक हैं।

सिविल प्रकृति के सूट: उदाहरण

निम्नलिखित सिविल प्रकृति के सूट हैं।

1. संपत्ति के अधिकारों से संबंधित सूट;

2. पूजा के अधिकारों से संबंधित सूट;

3. धार्मिक जुलूस निकालने से संबंधित सूट;

4. 'सिविल रॉंग' के लिए डैमेज की मांग के लिए सूट;

5. अनुबंध के विशिष्ट प्रदर्शन के लिए या अनुबंध के उल्लंघन के लिए क्षति के लिए सूट;

6. विशिष्ट राहत के लिए सूट;

7. वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए सूट;

8. विवाहों के विघटन के लिए अभियोग;

9. किराए के लिए सूट;

10. मताधिकार के अधिकारों के लिए सूट;

11. वंशानुगत कार्यालयों के अधिकारों के लिए सूट;

12. सेवा से और वेतन आदि के लिए गलत बर्खास्तगी के खिलाफ मुकदमा।

निम्नलिखित सिविल प्रकृति के सूट नहीं हैं:

1. मुख्यतः जातिगत प्रश्नों से संबंधित सूट;

2. पूरी तरह से धार्मिक संस्कार या समारोहों में शामिल होने वाले सूट;

3. केवल सम्मान या सम्मान को बनाए रखने के लिए सूट;

4. जाति आदि से निष्कासन के विरुद्ध लाया गया मुकदमा।