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संपत्ति खरीदने का सौदा करने के बाद मालिक रजिस्ट्री नहीं करे तब क्या है खरीददार के अधिकार

Shadab Salim
26 Nov 2021 4:44 AM GMT
संपत्ति खरीदने का सौदा करने के बाद मालिक रजिस्ट्री नहीं करे तब क्या है खरीददार के अधिकार
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स्वयं की संपत्ति खरीदना हर व्यक्ति का सपना होता है। भारत भर में मकान जमीन खरीदने के सैकड़ों सौदे प्रतिदिन किए जाते हैं। अधिकांश तो इन सौदों में किसी प्रकार की समस्या नहीं आती है पर कुछ प्रकरण ऐसे होते हैं जिनमें कुछ समस्याएं हो जाती हैं। ऐसी समस्या होने पर खरीददार सबसे पहले अपने विधिक अधिकारों को तलाशता है। कोई ऐसी प्रक्रिया जानना चाहता है जिससे उसको राहत मिल सके।

अमूमन देखने में आता है कि किन समस्याओं में सबसे बड़ी समस्या है कि विक्रेता अपनी संपत्ति को बेचने का सौदा तो कर देता है परंतु सौदे के बाद संपत्ति की रजिस्ट्री करने में आनाकानी करता है तथा खरीददार को हिले हवाले देता है।

जमीन और मकान से जुड़े हुए सौदे एक बहुत बड़ी धनराशि में होते हैं। यह धनराशि किसी व्यक्ति के सारे जीवन की जमा पूंजी भी हो सकती है। ऐसी परिस्थिति में कानून खरीददारों के अधिकारों की रक्षा की संपूर्ण और सरल व्यवस्था करता है। कानून में ऐसी समस्या से निपटने हेतु संपूर्ण व्यवस्था दी गई है जिसमें सिविल और आपराधिक दोनों प्रकार के मुकदमों के माध्यम से इस समस्या से निपटा जा सकता है।

आपराधिक कानून:-

जब भी किसी व्यक्ति द्वारा अपने मालिकाना हक की संपत्ति को बेचने का सौदा किसी क्रेता के साथ किया जाता है तब प्रतिफल की संपूर्ण राशि अदा कर देने के पश्चात विक्रेता का यह दायित्व बनता है कि वह क्रेता के पक्ष में रजिस्ट्री कर दे। कभी-कभी यह होता है कि विक्रेता द्वारा संपूर्ण धनराशि प्राप्त तो कर ली जाती है पर ऐसी धनराशि को प्राप्त करने के बाद रजिस्ट्री करने से इंकार कर दिया जाता है या फिर क्रेता को झूठे वादे करके फसाया जाता है।

भारतीय दंड संहिता 1860 के अंतर्गत इस परिस्थिति से निपटने हेतु संपूर्ण व्यवस्था दी गई है। अधिनियम की धारा 420 और 406 इस मामले में प्रयोज्य होती है।

धारा 420:-

यह धारा किसी व्यक्ति के साथ छल किए जाने पर लागू होती है। यह प्रसिद्ध धारा है जो छल का प्रतिषेध करती है। इस धारा के अंतर्गत यदि किसी व्यक्ति द्वारा किसी व्यक्ति को छल और कपट के माध्यम से उसकी संपत्ति को हड़पा जाता है तब दंड की व्यवस्था की जाती है। शिकायतकर्ता जो ऐसे अपराध से पीड़ित होता है अपनी शिकायत को लेकर संबंधित क्षेत्र के थाना प्रभारी के पास जा सकता है और एक लिखित ज्ञापन देकर थाना प्रभारी को इस प्रकरण से अवगत करा सकता है।

संबंधित क्षेत्र थाना की पुलिस ऐसे व्यक्ति पर जिसके द्वारा छल किया गया है, एक विक्रय अनुबंध किया गया और उस विक्रय अनुबंध के बाद रजिस्ट्री नहीं की गई तब उस व्यक्ति पर धारा 420 के अंतर्गत एफआईआर दर्ज करके मामले की विवेचना करके न्यायालय में प्रस्तुत कर देती है। इस प्रकरण में व्यक्ति को लंबी जेल भी होती है तथा शीघ्र जमानत मिलना भी सरल नहीं होता है।

धारा 406:-

भारतीय दंड संहिता की धारा 406 अमानत में खयानत से संबंधित है। इस धारा के अंतर्गत किसी व्यक्ति के साथ यदि छल के माध्यम से अमानत में खयानत की जाती है तब दंड का प्रावधान किया गया है। विक्रय का सौदा करना और उसके बाद रजिस्ट्री नहीं करना एक प्रकार से अमानत में खयानत है और ऐसी अमानत में खयानत छल के माध्यम से की जाती है।

इसलिए ऐसे प्रकरण में भारतीय दंड संहिता की धारा 406 भी प्रयोज्य होती है। जब कभी इस प्रकार का प्रकरण लेकर संबंधित पुलिस थाने पर जाया जाता है तब पुलिस द्वारा एफआईआर दर्ज करते समय धारा 420 के साथ धारा 406 का भी समावेश किया जाता है तथा विवेचन में यह स्पष्ट किया जाता है कि व्यक्ति के साथ छल भी हुआ है और छल के साथ अमानत में खयानत भी हुई है।

यह संज्ञेय अपराध है तथा इस अपराध में भी शीघ्र जमानत सरल नहीं होती है। दोषी पाए जाने पर व्यक्ति को एक लंबे समय का कारावास हो सकता है। इस धारा के अंतर्गत 3 वर्ष के दंड के कारावास का प्रावधान किया गया है परंतु धारा 420 के अंतर्गत 7 वर्ष तक के कारावास के दंड का उल्लेख मिलता है।

इस प्रकार की घटना होने के बाद पीड़ित पक्षकार को सर्वप्रथम आपराधिक कानून का सहारा लेना चाहिए तथा अपने साथ होने वाली आपराधिक घटना की जानकारी संबंधित पुलिस थाना क्षेत्र को देनी चाहिए तथा एक भारसाधक पुलिस अधिकारी को इस बात का संज्ञान देना चाहिए।

पुलिस सुनवाई नहीं करे तब:-

यदि पुलिस द्वारा इस प्रकरण में एफआईआर दर्ज नहीं की जाती है और आरोपी पर मुकदमा संस्थित नहीं किया जाता है तब पीड़ित पक्षकार न्यायालय में भी अपनी शिकायत प्रस्तुत कर सकता है तथा धारा 156(3) के अंतर्गत एक निजी परिवाद के माध्यम से मजिस्ट्रेट द्वारा पुलिस को प्रकरण दर्ज करने हेतु आदेशित करवा सकता है।

पर ऐसा परिवाद जिला पुलिस अधीक्षक को मामले से अवगत कराने के पश्चात ही करना चाहिए। यदि मजिस्ट्रेट इस प्रकार का प्रकरण दर्ज करने का आदेश कर देता है तब पुलिस को प्रकरण दर्ज करना होता है और प्रकरण दर्ज करने के बाद विवेचना प्रस्तुत करनी होती है तथा आरोपी को गिरफ्तार कर न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करना होता है।

सिविल उपचार:-

जैसा की विदित है यह आर्थिक प्रकार का अपराध तो है ही साथ ही इस अपराध में सिविल रूप भी हैं जिस कारण इसमें सिविल उपचार की भी व्यवस्था है।

सिविल उपचार का अर्थ यह होता है कि किसी व्यक्ति के साथ यदि कोई नुकसानी हुई है, उसके किसी अधिकार को खंडित किया गया है तब उस व्यक्ति को क्षतिपूर्ति दिलवाई जाती है तथा उसे उस स्थिति में लाया जाता है जिस स्थिति में व्यक्ति पूर्व में था।

जब कभी किसी व्यक्ति द्वारा विक्रय का सौदा किया जाता है तब एक विक्रय अनुबंध लेख लिखा जाता है। यह विक्रय अनुबंध लेख भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 में दिए गए सिद्धांतों के अधीन लिखा जाता ह इस लेख के लिखने के बाद यदि संपत्ति को बेचने वाला संपत्ति की रजिस्ट्री करने से इंकार कर देता है तब संपत्ति को खरीदने वाला व्यक्ति अपनी दी गई धनराशि को पुनः प्राप्त करने का या फिर उस संविदा को पालन करवाने का अधिकार रखता है।

यदि विक्रय का करार कर लिया गया है और ऐसे करार के बाद पीड़ित पक्षकार ने विक्रय के करार में उल्लेखित की गई धनराशि को विक्रेता को अदा कर दिया है और विक्रेता द्वारा ऐसी राशि को प्राप्त करने के बाद भी क्रेता को संपत्ति का कब्जा नहीं दिया है या फिर संपत्ति की रजिस्ट्री नहीं की जा रही है तब क्रेता का अधिकार पैदा हो जाता है कि वह संपत्ति पर कब्जा भी प्राप्त करें तथा उसकी रजिस्ट्री भी करवाएं या फिर वह अपनी धनराशि यदि चाहे तो विक्रेता से प्राप्त करने का अधिकारी भी होता है।

विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम (धारा 10):-

विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम (Specific Relief Act) की धारा 10 किसी भी संविदा के पालन करवाए जाने के संबंध में उपबंध करती है। इस धारा के अंतर्गत पीड़ित पक्षकार न्यायालय के समक्ष उपस्थित होकर अपनी संविदा को पालन करवाए जाने हेतु निवेदन कर सकता है। इस धारा के अंतर्गत न्यायालय को संविदा का पालन करवाना ही होता है तथा उसे किसी प्रकार का विवेकाधिकार प्राप्त नहीं है।

यदि मामले में न्यायालय संतुष्टि साक्ष्य प्रस्तुत किए गए हैं तथा अभिलेख पर वे सभी साक्ष्य उपलब्ध हैं जिससे यह साबित होता है कि दोनों पक्षकारों के मध्य संविदा की गई थी और ऐसी संविदा का पालन किया जाना चाहिए तब न्यायालय धारा 10 के अंतर्गत संविदा का पालन करवा देता है। यह अधिक विषाद प्रक्रिया नहीं है।

सरलतापूर्वक इस धारा के अंतर्गत मुकदमा संस्थित किया जा सकता है। इसमें अधिक धनराशि भी खर्च नहीं होती है और जो धनराशि खर्च भी होती है पीड़ित पक्षकार को दिलवाई जाती है तथा उसकी संपूर्ण क्षतिपूर्ति की जाती है।

कभी-कभी परिस्थिति यह होती है कि पक्षकार द्वारा जब इस धारा के अंतर्गत न्याय मांगा जाता है तब न्यायालय को यह देखना होता है कि विक्रय का अनुबंध जिस व्यक्ति द्वारा किया गया है क्या उस व्यक्ति को संपत्ति बेचने का अधिकार था।

यदि उस व्यक्ति को संपत्ति बेचने का अधिकार था वह संपत्ति उसी के कब्जे में है तब न्यायालय ऐसे व्यक्ति से संविदा का पालन करने हेतु आदेश देती है परंतु यदि किसी व्यक्ति द्वारा छल पूर्वक कोई संपत्ति बेच दी गई है जो संपत्ति उस व्यक्ति की थी ही नहीं और उसे बेच दिया गया इस परिस्थिति में न्यायालय संविदा का पालन नहीं करवाता है अपितु पीड़ित पक्षकार को क्षतिपूर्ति दिलवा देता है।

विक्रय अनुबंध लेख का रजिस्ट्रेशन:-

इस प्रकार के संपत्ति विक्रय करने के सौदों में सर्वप्रथम आवश्यक विक्रय अनुबंध लेख होता है। जब कभी भी संपत्ति को क्रय किया जाता है तब विक्रय अनुबंध लेख अवश्य किया जाना चाहिए तथा इस लेख का रजिस्ट्रेशन भी किया जाना चाहिए।

आमतौर पर देखा जाता है कि जब पक्षकार द्वारा किसी संपत्ति को खरीदने का सौदा किया जाता है तब किसी सादे कागज पर लिख लिया जाता है या किसी स्टांप पर लिख कर नोटरी करवा ली जाती है जबकि यह प्रक्रिया ठीक नहीं है क्योंकि रजिस्ट्रेशन एक्ट की धारा-79 इस प्रकार के विक्रय अनुबंध लेख को रजिस्ट्रेशन करवाने हेतु निर्देशित करती है और इस ही अधिनियम की धारा 49 ऐसे किसी भी दस्तावेज को साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं करने का उल्लेख करती है जिसका रजिस्ट्रेशन नहीं किया गया है।

पर इस धारा के अंतर्गत एक परंतुक है जिसके अनुसार विक्रय अनुबंध लेख के मामले में रजिस्ट्रेशन नहीं होने के बाद भी न्यायालय द्वारा हस्तक्षेप किया जाता है और ऐसी संविदा का पालन करवाया जा सकता है।

भारत के उच्चतम न्यायालय के द्वारा अनेक निर्णय में भी यह स्पष्ट किया गया है कि यदि ₹1000 के स्टांप पर किसी संपत्ति को खरीदने का सौदा किया जाता है और ऐसे सौदे पर किसी नोटरी वकील से तस्दीक करवाई जाती है तब भी न्यायालय स्पेसिफिक रिलीफ एक्ट की धारा 10 के अंतर्गत संविदा का पालन करवा सकती है।

परंतु एक खरीददार का सर्वोत्तम हित यही है कि उसके द्वारा इस प्रकार के विक्रय अनुबंध लेख को भी रजिस्टर्ड करवा लिया जाए। आजकल रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया बहुत सरल है। ऑनलाइन माध्यम से इस प्रकार के विक्रय अनुबंध लेख को थोड़े स्टांप शुल्क के साथ रजिस्टर्ड कराया जा सकता है। ऐसा रजिस्ट्रेशन एक दिवस में ही हो जाता है, दोनों पक्षकार को सब रजिस्टार ऑफिस में उपस्थित होना होता है।

संपत्ति खरीदते समय खरीदार को इस बात का ध्यान रखना की ऐसे विक्रय अनुबंध लेख को जहां तक संभव हो रजिस्टर्ड करवा ले या फिर एक उचित धनराशि के स्टांप पर जो ₹1000 से अधिक का हो लिखकर नोटरीराइज़ करवा ले और जो प्रतिफल की राशि अदा की गई है उसे बैंक के माध्यम से भुगतान करें नगद भुगतान करने से बचें।

यह दोनों हैं सिविल और डांडिक प्रावधान इस प्रकार के सौदों के मामले में लागू होते हैं तथा एक खरीददार के अधिकारों को सुरक्षित करते हैं। स्पेसिफिक रिलीफ एक्ट की धारा 10 के अंतर्गत केवल खरीददार ही संविदा के पालन के लिए आवेदन नहीं कर सकता अपितु कोई विक्रेता भी इस प्रकार की संविदा के पालन हेतु न्यायालय में इस धारा के अंतर्गत आवेदन कर सकता है। जैसे कि यदि किसी व्यक्ति द्वारा विक्रय का सौदा कर लिया गया है और प्रतिफल की संपूर्ण राशि नहीं अदा की गई है तब विक्रेता भी इस धारा के अंतर्गत मुकदमा ला सकता है।

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