Transfer Of Property में पार्टली परफॉर्मेंस के लिए क्या प्रावधान हैं?
Shadab Salim
27 Jan 2025 5:59 AM

संपत्ति अंतरण अधिनियम 1882 की धारा 53 (क) भागिक पालन के संबंध में उल्लेख कर रहे हैं यह धारा संपत्ति अंतरण अधिनियम में सन 1929 में जोड़ी गई है तथा इस अधिनियम के महत्वपूर्ण कारणों में से एक धारा है। भागिक पालन धारा 53 (क) का उद्देश्य किसी ऐसे अन्तरिती के हितों को संरक्षण प्रदान करना है जिसने किसी संव्यवहार में सद्भावनापूर्वक हिस्सा लिया हो, पर अन्तरणकर्ता ने सामान्य व्यवस्था के किसी तकनीकी तत्व का बहाना लेकर उसे परेशान करने या सम्पत्ति न देने की योजना बना रखी हो।
धारा 53 क के गर्भ में स्थित सिद्धान्त का विकास साम्या कोर्ट द्वारा किया गया है और इसका उद्भव इंग्लैण्ड के स्टेट्यूट ऑफ फ्राड से हुआ है। इस विधान में यह व्यवस्था की गयी थी कि भूमि जैसी सम्पत्ति का अन्तरण केवल तब मान्य होगा जब अन्तरण लिखित एवं अनुप्रमाणित दस्तावेज द्वारा किया गया हो। इस आलेख के अंतर्गत इस धारा से संबंधित प्रावधानों पर सार्वजनिक टिप्पणी प्रस्तुत की जा रही है इससे पूर्व के आलेख में कपटपूर्ण अंतरण के संबंध में उल्लेख किया गया था जो कि धारा 53 से संबंधित है।
मैडिसन बनाम एल्डरसन के केस में यह निर्णय हुआ कि किसी विधान को कपट के लिए हथियार के रूप में प्रयोग में नहीं लाया जा सकेगा। यह भागिक पालन के सम्बन्ध में पहला महत्वपूर्ण निर्णय था। वस्तुतः भागिक पालन के सिद्धान्त का वर्तमान स्वरूप सर्वप्रथम चॅम्प्रोनियर बनाम लॅम्बट के मामले में निर्धारित हुआ।
इस केस में साम्या कोर्ट ने यह मत व्यक्त किया कि भागिक पालन के सिद्धान्त का वास्तविक आधार यह है कि यदि किसी व्यक्ति ने किसी दूसरे व्यक्ति के साथ कोई करार किया है और इसके आधार पर उसने दूसरे व्यक्ति को कोई कार्य करने की अनुमति प्रदान की है तो यह माना जाएगा कि उसने स्वयं अपने विरुद्ध एक साम्या का सृजन कर दिया है जिससे उसे इस बात की अनुमति नहीं होगी कि वह विधिक प्रक्रिया की अपूर्णता का बहाना बनाकर उस करार का विरोध कर सके जिसका वह स्वयं एक पक्षकार था।
यह धारा इस देश में भागिक पालन के इंग्लिश विधि के सिद्धान्त को केवल आंशिक रूप में ग्रहण करती है। इस धारा में इंग्लिश विधि द्वारा उल्लिखित इस सिद्धान्त का भारत में प्रयोग नहीं होता है। यह एक ऐसे अनभिज्ञ अन्तरितो को संरक्षण प्रदान करती है जिसने सम्पत्ति का कब्जा तो ले लिया हो, पर वह दस्तावेज जिसके आधार पर कब्जा लिया गया है, प्रभावी बनाने योग्य नहीं है या जिसे पंजीकरण के अभाव में सिद्ध नहीं किया जा सकता और अन्तरिती ने सम्पत्ति के संवर्धन में धन व्यय किया हो।
इस सिद्धान्त का उद्देश्य सम्पत्ति अन्तरण अधिनियम तथा पंजीकरण अधिनियम के उपबन्धों को लचीला बनाकर उन्हें अधिक प्रभावशाली बनाना है और साथ ही अन्तरितों के हितों को संरक्षण भी प्रदान करना है।"
धारा 53 (क) कब्जा धारक अन्तरितों के पक्ष में हित का अन्तरण नहीं करती है। यह केवल अन्तरक पर संविधिक वर्जना अधिरोपित करती है।
भागिक पालन का सिद्धान्त प्रारम्भ में इस अधिनियम में सम्मिलित नहीं किया गया था। सन् 1929 के संशोधन अधिनियम द्वारा इसे इस अधिनियम में समाविष्ट किया गया, पर 1929 से पहले भी भागिक पालन के सिद्धान्त को इस देश में महत्व दिया था। भागिक पालन के सिद्धान्त को इस अधिनियम में सम्मिलित किये जाने के पूर्व से ही इसकी व्याख्या को लेकर दो अलग-अलग विचार धाराएं पैदा हो गयी थीं।
पहली विचारधारा के अनुसार भागिक पालन का सिद्धान्त इस देश में लागू नहीं होगा, क्योंकि इससे सम्पत्ति अन्तरण अधिनियम की धारा 54 प्रभावित होती थी। इसके साथ ही साथ इसी अधिनियम की धारा 59 तथा 107 भी प्रभावित हो रही थी। दूसरी विचारधारा के अनुसार यह सिद्धान्त इस देश में लागू होगा भले ही इससे कुछ धाराओं पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा हो।
इस विरोधाभाष को सर्वप्रथम प्रिवी कौंसिल के समक्ष मोहम्मद मूसा बनाम अधोर कुमार गांगुली के केस में रखा गया। इस मामले में प्रिवी कॉसिल ने अभिनित किया कि यह सिद्धान्त भारत में लागू होगा, पर कालान्तर में आरिफ बनाम यदुनाथ के केस में प्रिवी कौंसिल ने यह मत व्यक्त किया कि भागिक पालन का सिद्धान्त इस देश में लागू नहीं होगा।
इस मत को पुनः अभिव्यक्ति हुई मिया पीर बक्श बनाम सरदार मोहम्मद ताहिर के केस में यह दोनों ही निर्णय सम्पत्ति अन्तरण अधिनियम में सन् 1929 के संशोधन के बाद दिये गये थे किन्तु संशोधन के पूर्व के विधि के आधार पर संशोधन के फलस्वरूप प्रिवी कौंसिल द्वारा व्यक्त दो भिन्न मतों के कारण उत्पन्न संकट की स्थिति समाप्त हो गयी है और संशोधन द्वारा मोहम्मद मूसा बनाम अघोर कुमार गांगुली के केस में व्यक्त मत को मान्यता दी गयी।