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सम्पत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 भाग 3: सूचना क्या होती है और कितने प्रकार की होती है

Shadab Salim
27 July 2021 2:15 PM GMT
सम्पत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 भाग 3: सूचना क्या होती है और कितने प्रकार की होती है
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संपत्ति अंतरण अधिनियम 1882 भारत में अधिनियमित सिविल विधियों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इस सीरीज के अंतर्गत लेखक द्वारा संपत्ति अंतरण अधिनियम के महत्वपूर्ण प्रावधानों पर आलेख लिखे जा रहे हैं इस श्रंखला में इस आलेख के अंतर्गत इस अधिनियम की धारा 3 जोकि इस अधिनियम में उपयोग किए गए महत्वपूर्ण शब्दों की परिभाषाएं तथा स्पष्टीकरण प्रस्तुत करती है का वर्णन किया जा रहा है।

इससे पूर्व के आलेख में इस ही धारा से संबंधित स्थावर संपत्ति शब्द पर विस्तारपूर्वक टीका टिप्पणी की गई थी। इस आलेख के अंतर्गत संपत्ति अंतरण अधिनियम की धारा 3 में उल्लेखित किए गए सूचना के प्रकारों पर प्रकाश डाला जा रहा है तथा इससे संबंधित कानून को विस्तारपूर्वक टीका सहित तथा महत्वपूर्ण न्याय निर्णय सहित प्रस्तुत किया जा रहा है।

यह आलेख सूचना के प्रकारों का गहनता से अध्ययन प्रस्तुत कर रहा है तथा सूचना के प्रकारों में सभी महत्वपूर्ण प्रकारों पर एक व्यवस्थित टीका है। प्रकारों के खंड तथा उनके उपखंड भी इस आलेख के अंतर्गत प्रस्तुत किए गए हैं तथा उनसे संबंधित आवश्यक न्याय निर्णय का भी उल्लेख प्रस्तुत है।

सूचना के प्रकार-

इस अधिनियम के अंतर्गत सूचना के विषय में उल्लेख किया गया है तथा सूचना के प्रकारों पर विस्तार से उल्लेख मिलता है।

सूचना के प्रकार - सूचना को निम्नलिखित श्रेणियों में विभक्त किया गया है-

1)- वास्तविक सूचना (Actual notice)

(2)- विवक्षित सूचना (Constructive notice)

(3)- अभ्यारोपित सूचना (Imputed notice)

(1 ) वास्तविक सूचना -

वास्तविक सूचना से आशय तथ्य की उस स्थिति से है जिसमें तथ्य का असली ज्ञान या पता सम्बन्धित पक्ष को होता है। किसी व्यक्ति को किसी तथ्य की सूचना देने से आशय है, उस तथ्य से उसे परिचित कराना।

वास्तविक सूचना तभी बाध्यकारी होगी जबकि वह सुनिश्चित हो तथा ऐसे व्यक्ति द्वारा दी गयी हो, जो उस वस्तु में जिसके सम्बन्ध में सूचना दी गयी थी, हित रखता हो। कोई भी व्यक्ति मिथ्या अफवाहों अथवा अजनबी व्यक्तियों द्वारा दिये गये वाक्यों पर ध्यान देने के लिए बाध्य है। इसी प्रकार आकस्मिक विचार-विमर्श भी पर्याप्त नहीं है।

बैंक्स के एक इंग्लिश वाद में कहा गया था कि- सम्बन्धित व्यक्ति का ध्यान उपयुक्त रीति से आकर्षित किया जाना चाहिए जिससे कि युक्तियुक्त व्यक्ति या सामान्य प्रज्ञा वाला व्यक्ति उक्त सूचना के आधार पर कार्य करे तथा तद्नुसार आचरण करें।"

यह भी आवश्यक है कि सूचना उसी संव्यवहार के दौरान दी जाए। संव्यवहार से पूर्व दी गयी सूचना विस्मृत हो सकती है और संव्यवहार के उपरान्त दी गयी सूचना निरर्थक होगी। क्रेता से यह कहना कि एक तीसरा व्यक्ति सम्पत्ति पर अपना दावा' बताता है किसी दस्तावेज के सम्बन्ध में पर्याप्त सूचना नहीं होती, जब तक कि विक्रय के समय वह सूचना न दी गयी हो।

अखबारों में दी गयी सूचना तब तक पाठक के लिए वास्तविक सूचना नहीं होगी जब तक कि उसका ध्यान किसी विशिष्ट रीति से उस ओर आकर्षित न किया गया हो। समाचार पत्रों में दी जाने वाली सूचनाएँ बड़े अक्षरों में अथवा मोटी लकीरों के बीच प्रस्तुत की जानी चाहिए।

2)- प्रलक्षित सूचना-

प्रलक्षित सूचना तथ्य की उस स्थिति को कहते हैं जिसमें तथ्य का ज्ञान प्रत्यक्ष रूप से पक्षकार को नहीं होता है, परन्तु स्थिति ऐसी होती है कि यदि वह वास्तविक स्थिति का पता लगाना चाहे तो सामान्य प्रयास से पता लगा सकता है।

ऐसे मामलों में यदि दायित्वाधीन व्यक्ति अपने दायित्व का निर्वाह करने में विफल रहता है तो वह संव्यवहार से उत्पन्न परिणामों को भुगतने के लिए बाध्य होगा किसी अन्य व्यक्ति को दोषी नहीं ठहरा सकेगा।

एक वाद में आयर सी० बी० ने प्रेक्षित किया था कि- प्रलक्षित सूचना, मेरे मतानुसार, सूचना के साक्ष्य के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है जिसकी अवधारणा इतनी प्रबल होती है कि न्यायालय भी इसे खण्डित किये जाने की अनुमति नहीं प्रलक्षित सूचना एक साम्या है, जिसके अनुसार उस व्यक्ति के विरुद्ध, जिसे तथ्य का ज्ञान होना चाहिए था, तथ्य की अवधारणा की जाती है।

ऐसी अवधारणा केवल उन परिस्थितियों में की जायेगी जिनमें इस सिद्धान्त का लाभ उठाने वाले व्यक्ति ने दोष रहित होकर कार्य किया हो। दूसरे शब्दों में प्रलक्षित सूचना विशेष परिस्थितियों में तथ्यों के स्वाभाविक रूप में आचरित होने की वैधानिक अवधारणा है। अतएव उसकी स्थिति वास्तविक ज्ञान पर निर्भर नहीं होती है।

इस सिद्धान्त का लाभ केवल उन व्यक्तियों को प्राप्त होगा जो शुद्ध अन्तःकरण एवं सद्भाव से कार्य किये हो।

धारा 3 के अन्तर्गत निम्नलिखित अवस्थाओं में प्रलक्षित सूचना की अवधारणा की जाती है-

1) जाँच अथवा छानबीन से जानबूझ कर विरत रहना।

2) घोर उपेक्षा (Gross negligence)

3) लिखत का पंजीकरण

4) अचल सम्पत्ति का कब्जा. स्पष्टीकरण

1. जाँच अथवा छानबीन से जानबूझ कर विरत रहना -

इस पदावलि से आशय है सद्भाव रहित होकर कार्य करना। जब भी कोई व्यक्ति सम्पति प्राप्त करने की स्थिति में कार्य करता है तो विधि उसले कुछ अपेक्षाएँ करती हैं। ये अपेक्षाएँ उसके स्वयं के हित के लिए होती हैं।

इससे यह स्पष्ट होता है कि अपने हितों को सुरक्षित रखने हेतु वह किस सीमा तक जागरूक है। यदि वह जानबूझकर कर अथवा सोच-समझ कर सम्पत्ति के विषय में जाँच पड़ताल नहीं करता है अथवा छानबीन नहीं करता है, तो विधि को यह परिकल्पना होगी कि कोई ऐसा तथ्य था जिससे जान-बूझ कर वह व्यक्ति बचना चाह रहा था, इसलिए उसने छानबीन नहीं की।

यदि छानबीन किया होता तो उन तथ्यों का ज्ञान उसे प्रत्यक्ष रूप से प्राप्त हो गया होता। परन्तु भावी सम्पत्ति धारक प्रत्येक प्रकार की छानबीन करने के लिए बाध्य नहीं है। जांच अथवा छानबीन ऐसी होनी चाहिए जिसे करने के लिए वह बाध्य हो।

आगरा बैंक बनाम बेने के बाद में लाई सेलबोर्न ने प्रेक्षित किया था कि यह केवल आचरण है जिसका समुचित तथा साधारण रीति से अपने हित के लिए सद्भाव में कार्य करने वाले व्यक्ति द्वारा स्वयं अथवा अपने प्रवक्ता द्वारा अपने हित अथवा सुरक्षा के लिए अनुसरण किया जाना चाहिए। यदि वह उक्त प्रकार का आचरण नहीं करता है तो यह लोप एक ऐसी वस्तु होगी जिसका स्पष्टीकरण दिया जाना आवश्यक होगा।

यदि स्पष्टीकरण नहीं दिया गया तो यह सद्भावपूर्ण आचरण के विरुद्ध साक्ष्य होगा जिसका उद्देश्य वस्तुस्थिति के ज्ञान से बचना माना " जहाँ कोई व्यक्ति पंजीकृत पत्र लेने से इन्कार करता है और बाद में यह तर्क प्रस्तुत करता है कि उसे पत्र में वर्णित तथ्य का ज्ञान नहीं है, ऐसे व्यक्ति को इस प्रकार का तर्क प्रस्तुत करने की अनुमति नहीं होगी।

नगरपालिका अथवा नगर महापालिका के क्षेत्राधिकार के अन्तर्गत सम्पत्ति क्रय करने वाले व्यक्ति से यह अपेक्षित है कि वह उस सम्पत्ति के सम्बन्ध में देय करों की स्थिति का पता लगाए। यदि वह जानबूझ कर ऐसा नहीं करता है तो उसके विरुद्ध उन समस्त तथ्यों की सूचना मानी जाएगी जिनका ज्ञान उसे छानबीन से हुआ होता।

अधिकार अभिलेख (Record of rights) में वर्णित प्रविष्टियों की जाँच-पड़ताल न करना, जानबूझकर विरत रहने के तुल्य है। जाँच पड़ताल से विरत रहा साशय होना चाहिए केवल लोपमात्र नहीं।

इम्पोरियल बैंक ऑफ इण्डिया बनाम राय के बाद में यह अभिनिर्णीत हुआ था कि यदि बन्धककर्ता यह वक्तव्य देता है कि विलेख बैंक की सुरक्षित अभिरक्षा में है तथा बन्धक को बैंक से इस तथ्य की जांच नहीं करता है तो वह बन्धक की सूचना से बाध्य होगा यदि यह प्रमाणित हो जाता है कि विलेख बैंक के पास बन्धक रखे गये थे।

किसी विलेख की वास्तविक सूचना, उसमें उल्लिखित तथ्यों तथा उन सभी विलेखों की जिनका उसमें उल्लेख है और जो उस सम्पत्ति को प्रभावित करते हैं. प्रलक्षित सूचना मानी जाएगी।

उदाहरण के लिए यदि विक्रय विलेख में किसी बँटवारा विलेख का उल्लेख किया गया है जिसके तहत सम्पत्ति विक्रेता को प्राप्त हुई थी, तो क्रेता के विरुद्ध इस आशय की सूचना मानी जाएगी कि क्रेता को विक्रेता के दूसरे भागीदार को प्राप्त हकशुफ़ा के अधिकार का ज्ञान था।

विलेख के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण यह है कि यदि विलेख निश्चित रूप से सम्पत्ति को प्रभावित करता है तो छानबीन में लोप एक गम्भीर स्थिति का परिचायक होगा किन्तु यदि विलेख निश्चित रूप से सम्पत्ति को प्रभावित नहीं करता है तो छानबीन में लोप गम्भीर स्थिति का परिचायक नहीं होगा।

2. घोर उपेक्षा (Gross negligence) -

घोर उपेक्षा, तिरस्कारात्मक उपाधि के साथ साधारण उपेक्षा है। साधारण रूप से यह कहा जा सकता है कि घोर उपेक्षा, युक्तियुक्त सावधानी, कौशल तथा सचेतनता के प्रयोग में हुई विफलता है। साधारण उपेक्षा, सूचना के लिए पर्याप्त नहीं है।

जहाँ कोई व्यक्ति किसी कार्य को करने में उपेक्षा करता है जिसे एक युक्तियुक्त तथा प्रज्ञावान व्यक्ति यदि उन परिस्थितियों में कार्य न करता हो, तो यह कहा जाएगा कि वह व्यक्ति घोर उपेक्षा का दोषी है। ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध उन समस्त तथ्यों की सूचना जाएगी जिसकी उसे घोर उपेक्षा न होने की दशा में सूचना प्राप्त हुई होती।

लायड बैंक लि० बनाम पी० ई० के वाद में निम्नलिखित तथ्य थे-

'क' ने कतिपय स्वत्व विलेख 'ख' नामक बैंक के पास प्रतिभूति हेतु बन्धक रख दिया था। 'क' ने बैंक से यह अनुरोध किया कि एक इच्छुक क्रेता स्वत्व विलेखों का अवलोकन करना चाहता है। अपनी सामान्य प्रक्रिया का उल्लंघन करते हुए विलेख 'क' को वापस कर दिया जिससे उसने उन स्वत्व विलेखों को एक दूसरे पास बन्धक रखकर उससे भी ऋण प्राप्त कर लिया।

इन तथ्यों के आधार पर यह अभिनिर्णीत हुआ घोर उपेक्षा का दोषी सम्पत्ति पर उसको अग्रता समाप्त हो गयी है। इसी प्रकार 'अ' ने अपनी जमीन तथा घर अपनी प्रथम स्त्री के पुत्रों को दे दिया तथा वसीयत में उन्हें ही प्रबन्धक नियुक्त कर दिया।

अपनी द्वितीय स्त्री के लड़के को उसने पचास हजार रुपया दिया जिसके भुगतान का भार प्रथम स्त्री लड़कों को दी गयी सम्पत्ति पर डाला गया। जमीन तथा घर के दस्तावेजों को पहली स्त्री के लड़कों ने बैंक में बन्धक रखकर बावन हजार रुपये प्राप्त किया। वसीयत को बन्धक नहीं रखा। बैंक ने बन्धक धन की अदायगी हेतु न्यायालय से डिक्री प्राप्त मकान तथा जमीन की नीलामी हेतु प्रक्रिया प्रारम्भ की द्वितीय पत्नी के पुत्रों को इस तथ्य का पता चला तो उन्होंने नीलामी की धनराशि पर अपने अधिकार की वरीयता प्रकट की।

यह अभिनित हुआ कि बैंक ने यदि यह छानबीन की होती कि सम्पत्ति 'अ' की प्रथम स्त्री के पुत्रों को ही क्यों मिली, तो उसे वादी के हितों का पता चल गया होता। अतः बैंक के विरुद्ध घोर उपेक्षा के कारण प्रलक्षित सूचना को अवधारणा की गयी।

कोई व्यक्ति घोर उपेक्षा का दोषी है या नहीं यह प्रत्येक मामले की परिस्थिति पर निर्भर करता है। इस आशय का कोई सुनिश्चित सिद्धान्त प्रतिपादित करना कठिन है। नवल किशोर बनाम आगरा के म्युनिसिपलिटी के वाद में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अभिनिर्णीत किया था कि म्युनिसिपल परिक्षेत्र में सम्पत्ति क्रय करने वाले व्यक्ति के विरुद्ध यह अवधारणा होगी कि म्युनिसिपल करों के विषय में वह सम्पत्ति लेने से पहले छानबीन करे।

यदि वह छानबीन नहीं करता है, तो या जाएगा कि उसे करों की सूचना थी, न्यायालय ने अहमदाबाद म्युनिसिपैलिटी बनाम हाजी के वाद में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के इस मत को अस्वीकार कर दिया और यह कहा कि ऐसा कोई साधारण नियम प्रतिपादित नहीं किया जा सकता है।

अन्तरिती के दायित्व को अवधारणा प्रत्येक मामले की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर की जाएगी। घोर उपेक्षा तथा कपट में अन्तर- अनेक निर्णयों में यह मत व्यक्त किया गया है कि घोर उपेक्षा कपट का साक्ष्य मात्र है।

किन्तु दोनों में निम्नलिखित अन्तर है-

(1) घोर उपेक्षा के मामलों में साधारण ढीलापन या निष्क्रियता ही प्रधान होती है। इसके विपरीत कपट, में सक्रिय बेईमानी होती है।

(2) घोर उपेक्षा ऐसे आचरण या भूल का प्रतीक है जिसकी उत्पत्ति असावधानी या लापरवाही में होती है जबकि कपट ऐसे आचरण का प्रतीक है जो सोच-समझ कर धोखा देने के उद्देश्य से किया जाता है।

3. पंजीकरण (Registration) यह प्रावधान इस अधिनियम में सन् 1929 संशोधन के पश्चात् सम्मिलित किया गया। इससे पूर्व, इसकी स्थिति को लेकर दो प्रकार के मत इस देश में प्रचलित थे। एक मत के समर्थक थे इलाहाबाद तथा बम्बई उच्च न्यायालय जिनके अनुसार किसी दस्तावेज का यदि पंजीकरण हो गया है तो पंजीकरण के पश्चात् उस सम्पत्ति के सम्बन्ध में संव्यवहार करने वाले प्रत्येक व्यक्ति के विरुद्ध पंजीकृत दस्तावेज में उल्लिखित तथ्यों की सूचना मानी जाएगी।

दूसरे मत का पोषण मद्रास उच्च न्यायालय कर रहा था जिसके अनुसार पंजीकरण सूचना के रूप में प्रभावी नहीं होगा, क्योंकि यदि विधानांग का ऐसा आशय रहा होता तो उसने स्पष्टत: इसका उल्लेख किया होता।

इन दो स्पष्ट मतों के बीच कलकत्ता उच्च न्यायालय कभी एक मत का अनुसरण करता था और कभी दूसरे मत का। इसके अनुसार पंजीकरण सूचना के रूप में प्रभावी हो गया या नहीं प्रत्येक मामले की परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

सन् 1929 में अधिनियम को संशोधित कर पंजीकरण की स्थिति को सुस्पष्ट किया गया और यह स्वीकार किया गया कि जहाँ पंजीकरण अपेक्षित हैं और विधितः पंजीकरण किया गया है. पंजीकरण, सूचना के रूप में प्रभावी होगा जिससे ऐसे व्यक्तियों के हितों की सुरक्षा की जा सके जिन्होंने पंजीकृत दस्तावेज के माध्यम से सम्पत्ति प्राप्त की है।

पंजीकरण कब सूचना के रूप में प्रभावी होगा- स्पष्टीकरण 1 के अनुसार नोटिस के रूप में प्रभावी होने के लिए निम्नलिखित शर्तों का पूर्ण होना आवश्यक है-

1) पंजीकरण विधि द्वारा अपेक्षित हो तथा पंजीकरण विधितः हुआ हो।

2) पंजीकरण के पश्चात् कोई व्यक्ति उस सम्पत्ति को या उसका एक अंश प्राप्त करे। उपरोक्त से यह स्पष्ट है कि पंजीकरण केवल उन मामलों में सूचना के रूप में प्रभावी होगा जिनमें पंजीकरण विधि द्वारा अपेक्षित है।

यदि पंजीकरण अपेक्षित नहीं है, पक्षकारों ने अपनी सुरक्षा हेतु दस्तावेज पंजीकृत कराया है तो ऐसा पंजीकरण प्रलक्षित सूचना के रूप में प्रभावी नहीं होगा पंजीकरण केवल पश्चात्वर्ती अन्तरितियों के लिए सूचना के रूप में प्रभावी होता है।

पंजीकरण से पूर्व, सम्पत्ति के सम्बन्ध में संव्यवहार करने वाले व्यक्ति के विरुद्ध यह सूचना के रूप में प्रभावी नहीं होगा परन्तु पंजीकरण सभी संव्यवहारों के विरुद्ध सूचना नहीं होगा।

कब से पंजीकरण नोटिस के रूप में प्रभावी होगा-

साधारणतः पंजीकरण पंजीकरण की तिथि से सूचना के रूप में प्रभावी होता है यदि पंजीकरण उसी पंजीकरण कार्यालय में हुआ है। जिसके क्षेत्राधिकार में सम्पत्ति स्थित है क्योंकि सामान्य रूप में कोई भी व्यक्ति उसी पंजीकरण कार्यालय में दस्तावेजों का अवलोकन करने के दायित्वाधीन है जिसके क्षेत्राधिकार में सम्पत्ति आती है।

किन्तु यदि सम्पत्ति एक से अधिक कार्यालयों के क्षेत्राधिकार के अन्तर्गत स्थित है तथा पंजीकरण किसी एक कार्यालय में कराया गया है तो पंजीकरण उस तिथि से सूचना के रूप में प्रभावी होगा जिस तिथि को कार्यालयों ने उक्त पंजीकरण की सूचना अपने यहाँ दर्ज की है। इसी प्रकार यदि पंजीकरण एक ऐसे कार्यालय में कराया गया है जिसके क्षेत्राधिकार के अन्तर्गत वह सम्पत्ति आती हो।

नहीं है तो ऐसा पंजीकरण उस तिथि से प्रभावी होगा जिस तिथि को, उस कार्यालय ने, जिसके क्षेत्राधिकार में सम्पत्ति स्थित है. पंजीकरण की सूचना दर्ज की है बनारस बैंक लि. सहारनपुर बनाम हर प्रसाद के बाद में सम्पत्ति दिल्ली में स्थित थी, जबकि पंजीकरण लाहौर में कराया गया।

लाहौर उच्च न्यायालय ने यह अभिनिर्णीत किया कि जब तक पंजीकरण की सूचना पंजीकरण अधिनियम की धारा 51 के अन्तर्गत दिल्ली के सब रजिस्ट्रार के कार्यालय में दर्ज नहीं हो जाती, लाहौर में हुआ पंजीकरण पाश्चिक-क्रेता के लिए सूचना का कार्य नहीं करेगा।

3)- अध्यारोपित सूचना या अभिकर्ता द्वारा प्राप्त की गयी सूचना- स्पष्टीकरण अभ्यारोपित सूचना का सिद्धान्त उन मामलों में लागू होता है जिनमें कार्य स्वयं न कर किसी माध्यम से किया जाता है। जिस व्यक्ति के माध्यम से कार्य किया जाता है उसे अभिकर्ता या एजेन्ट कहा जाता है। अभिकर्ता द्वारा अपने कार्य क्षेत्र के अन्तर्गत किए गये सभी कार्यों के लिए स्वामी उत्तरदायी होता है।

इसी प्रकार कार्य के दौरान अभिकर्ता द्वारा प्राप्त सूचना से स्वामी बाध्य होता है जब तक कि अभिकर्ता ने साशय उस सूचना को स्वामी से छिपाता न हो। इतना ही नहीं, जिन तथ्यों की सूचना अभिकर्ता द्वारा प्राप्त की जानी चाहिए थी, किन्तु उसने नहीं प्राप्त किया था, उसकी भी सूचना स्वामी के विरुद्ध अभ्यारोपित की जाएगी।

अतः अभ्यारोपित सूचना एक ऐसी सूचना है जिसमें किसी व्यक्ति को तथ्य की वास्तविक सूचना नहीं होती है जिसकी सूचना उसे उसके अभिकर्ता के माध्यम से प्राप्त होती है। इस प्रकार की सूचना के तत्व पर प्रकाश डालते हुए कोर्ट ऑफ चांसलर बरविक एण्ड कं० बनाम प्राइस के बाद में प्रेक्षित किया या कि 'यदि अभिकर्ता द्वारा प्राप्त सूचना को स्वामी विरुद्ध सूचना न माना जाए तो प्रत्येक मामले में अभिकर्ता की नियुक्ति करके सूचना से बचा जा सकेगा।

आवश्यक तत्व-

इस सिद्धान्त के लागू होने के लिए निम्नलिखित आवश्यक तत्व है-

(1) सूचना अभिकरण के दौरान मिली हो

(2) अभिकर्ता के रूप में मिली हो

(3) अभिकरण के कार्य के दौरान मिलो हो

(4) अभिकरण के सम्बन्ध में मिली हो

(5) अभिकर्ता द्वारा सूचना स्वामी से कपटपूर्ण छिपायी न गयी हो

(1) अभिकरण के दौरान-

प्रथम आवश्यक तत्व यह है कि अभिकर्ता को सूचना अभिकरण के दौरान मिलनी चाहिए। अभिकर्ता के रूप में नियुक्ति होने से पहले प्राप्त हुई सूचना नोटिस के रूप में प्रभावी नहीं होगी। छवील दास लालू भाई बनाम दयाल मोवजी के वाद में बन्धकी ने बंधक सम्पत्ति का विक्रय किया जिसमें एक शर्त ऐसी थी जिसे विक्रय शर्त के रूप में लगाया नहीं जा सकता था।

क्रेता ने दस्तावेज पर हस्ताक्षर किया तथा संव्यवहार के निष्पादन हेतु एक सॉलिसिटर नियुक्ति को विवाद उत्पन्न होने पर प्रिवी कॉसिल ने मत व्यक्त किया कि अभिकर्ता के रूप में एक सॉलिसीटर की नियुक्ति होने से पूर्व, उसे प्राप्त हुई सूचना संव्यवहार को प्रभावित नहीं कर सकेगी।

संव्यवहार को प्रभावित करने वालो सूचना अभिकरण के दौरान मिलनी चाहिए। इसी प्रकार अभिकरण समाप्त होने के पश्चात् प्राप्त हुई सूचना भी प्रभावी नहीं होगी, किन्तु यदि सूचना होने के पश्चात् अभिकर्ता कार्य करना बन्द कर देता है तो ऐसी सूचना स्वामी के विरुद्ध होगी।

(2) अभिकर्ता के रूप में आवश्यक तत्व यह है कि अभिकर्ता द्वारा अभिकर्ता रूप में सूचना प्राप्त करनी चाहिए, अभिकर्ता से भिन्न रूप में नहीं। यदि कोई व्यक्ति दो अधिकारी हो तो एक कम्पनी के विषय में उसका वैयक्तिक ज्ञान दूसरी कम्पनों के लिए सूचना माना जाएगा। जब किसी विशेष सिलसिले में उस पर इस आशय का कोई दायित्व न रखा गया हो।

(3) अभिकरण के कार्य के दौरान तीसरा आवश्यक तत्व यह है कि सूचना अभिकरण के - कार्य के दौरान प्राप्त की गयी हो किसी व्यक्ति को एक संव्यवहार के लिए अभिकर्ता के रूप में नियुक्ति, उसे उसी स्वामी के दूसरे संव्यवहार के लिए स्वयमेव अभिकर्ता नहीं बना देगी।

जिस कार्य के लिए अभिकर्ता की नियुक्ति की गयी है उसी कार्य के सन्दर्भ में सूचना प्राप्त की जानी चाहिए। किसी सीमित प्रयोजन के लिए नियुक्त विशिष्ट अभिकर्ता एक अन्य व्यक्ति के लिए सामान्य अभिकर्ता की हैसियत से कार्य करते हुए एकत्रित की गई सूचना स्वामी को बताने के दायित्वाधीन नहीं होता है।

(4) अभिकरण कार्यवाही के लिए विशिष्ट वस्तु के विषय चौथा अवयव यह है कि प्राप्त की गयी सूचना अभिकरण के लिए आवश्यक किसी विशिष्ट वस्तु के विषय में होनी चाहिए। अभिकर्ता अनावश्यक सूचना एकत्र करने के दायित्वाधीन नहीं होता है, और यदि वह ऐसी सूचना एकत्र भी करता है तो वह सूचना स्वामी पर बाध्यकारी नहीं होगी साधारण रूप से यह माना जाता है कि अधिवक्ता का ज्ञान उसके मुवक्किल का ज्ञान होता है, किन्तु अभिवक्ता के विधिक ज्ञान की अवधारणा मुवक्किल के विरुद्ध नहीं की जाएगी।

यदि स्वामी ने अभिकर्ता के कार्यों की संस्तुति कर दी है तो वह उसके सभी कार्यों से बाध्य होगा क्योंकि अनुसमर्थन अथवा संस्तुति से आराय है अभिकर्ता के कार्यों का अनुमोदन।

(5) सूचना स्वामी से कपटपूर्वक छिपायी न गयी हो यदि अभिकर्ता ने स्वामी से कोई न तथ्य कपट पूर्वक छिपाया था तो स्वामी अभ्यारोपित सूचना के सिद्धान्त मे बाध्य नहीं होगा।

इस सन्दर्भ में फ्राई जे० ने केव बनाम केक के वाद में न्यायालय का मत व्यक्त करते हुए सिद्धान्त दो आधार प्रस्तुत किए हैं

(i) यह कि अभिकर्ता द्वारा किया गया कार्य एक ऐसा कार्य है जिसे अभिकर्ता के रूप में किया गया कार्य नहीं कहा जा सकता। अपितु यह ऐसा कार्य है जिसे केवल एक स्वतंत्र हैसियत से ही किया जा सकेगा। अतः ऐसे कार्य की सूचना स्वामी के विरुद्ध नहीं मानी जाएगी तथा

(ii) परिस्थितियाँ ऐसे अवश्यम्भावी निष्कर्ष की ओर संकेत करती हैं कि सूचना स्वामी तक पहुँचायी ही नहीं गयी थी। परन्तु इस सिद्धान्त का, कि अभिकर्ता द्वारा किया गया कपट स्वामी को सूचना से बचाता है, एक अपवाद भी है।

यदि अभिकर्ता द्वारा किये गये कपट अतिरिक्त, परिस्थितियों से यह भी स्पष्ट करते है कि यदि एक इमानदार अभिकर्ता की नियुक्ति की गयी होती तो उसने न किया होता, तो ऐसी स्थिति में स्वामी, कपट बावजूद भी नोटिस से प्रभावित होगा। यदि अन्तरण का एक पक्षकार अभिकर्ता के साथ मिलीभगत का दोषी है और इस आधार पर अभिकर्ता, स्वामी को सूचना से वंचित रखता है, तो ऐसा पक्षकार अपनी मिलीभगत का लाभ नहीं उठा सकेगा तथा सूचना, स्वामी के विरुद्ध अभ्यारोपित नहीं होगी, क्योंकि ऐसा करना कपट को बढ़ावा देने के तुल्य होगा तथा सूचना का जो सिद्धान्त मनुष्य के लाभ लिए बनाया गया है उसी सिद्धान्त से उसके साथ छल किया जा सकेगा।

अभिकर्ता द्वारा कपटपूर्ण छिपाव के सिद्धान्त को व्यापक विवेचना प्रिवी कौंसिल की न्यायिक समिति ने टेक्सास कं० लि० बनाम बाम्बे बैंकिंग कं० के वाद में की है। इस वाद में बैंक के अभिकर्ता के वैयक्तिक खाता में ओवर ड्राफ्ट हो गया था।

उसने उस ओवर ड्राफ्ट का भुगतान टेक्सास कं० लि० के पैसे से किया जो कि एक तेल के कारोबार में उसके स्वामी थे। जब पैसे को लेकर विवाद उठा तो न्यायालय ने यह अभिनिर्णीत किया कि 'ऐसी परिस्थिति में यह मानना कि पूर्णरूपेण सद्भाव में प्राप्त की गयी धनराशि को किसी स्वतन्त्र स्वामित्व हेतु अलग किया जा सकेगा सूचना के सिद्धान्त को सभी युक्तियुक्त सीमाओं से परे ले जाने के तुल्य हैं क्योंकि ऋणी, जो कि कम्पनी का एक सेवक भी था, ने अपने दायित्वों का निर्वाह करने के लिए कपट किया था।'

यदि उपरोक्त वर्णित सभी शर्तें पूर्ण हो जाती हैं तो स्वामी के विरुद्ध सूचना अभ्यारोपित होगी भले ही उसे वास्तविक सूचना न दी गयी हो। लार्ड चेल्म्स फोर्ड के शब्दों में 'सूचना, जो अभिकर्ता के माध्यम से स्वामी को प्रभावित करती है।

इस तथ्य पर आधारित नहीं है कि वह स्वामी को सूचित की गयी थी अथवा नहीं। यदि कोई व्यक्ति किसी अभिकर्ता को नियोजित करता है और वह अपने कर्तव्य के निर्वाह के दौरान किसी तथ्य की जानकारी प्राप्त करता है जो संव्यवहार को प्रभावित करने की स्थिति में थी तो स्वामी उस तथ्य से बाध्य होगा चाहे उस तथ्य को उसे सूचना दी गयी हो या नहीं।

यदि किसी नाबालिग या शिशु के बदले उसके न्यासी सम्पत्ति क्रय करने हेतु एक अभिकर्ता को नियुक्ति करते हैं और वह अभिकर्ता अपने दायित्व के निर्वाह के दौरान सम्पत्ति पर विद्यमान किसी प्रभार की सूचना प्राप्त करता है तो ऐसी सूचना से नाबालिग या शिशु बाध्य होगा किन्तु यह आवश्यक है कि तथ्य की वास्तविक सूचना अभिकर्ता को रही हो।

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