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संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 भाग 6: जानिए कौन सी संपत्तियों को अंतरित नहीं किया जा सकता

Shadab Salim
3 Aug 2021 2:30 PM GMT
संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 भाग 6: जानिए कौन सी संपत्तियों को अंतरित नहीं किया जा सकता
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संपत्ति अंतरण अधिनियम 1882 की धारा 6 के अंतर्गत जिन संपत्तियों को अंतरित किया जा सकता है उनका उल्लेख किया गया है। धारा 6 के अनुसार सभी संपत्तियों को अंतरित किया जा सकता है पर इस धारा के अंतर्गत कुछ ऐसे अपवाद प्रस्तुत किए गए हैं जिन्हें अंतरित नहीं किया जा सकता है। इन अपवादों को कुल 10 खंडों में बांटा गया है।

इससे पूर्व के आलेख में संपत्ति अंतरण अधिनियम की धारा 6 के अंदर बताए गए अपवादों में सर्वप्रथम पहले अपवाद का उल्लेख किया गया था। इस आलेख के अंतर्गत अन्य अपवादों का उल्लेख किया जा रहा है अर्थात उन संपत्तियों तथा अधिकारों का वर्णन किया जा रहा है जिन का अंतरण नहीं किया जा सकता है।

ऐसी संपत्तियां जिनका अंतरण नहीं किया जा सकता-

खण्ड (B) पुनः प्रवेश का अधिकार-

यह खण्ड उपबन्धित करता है कि किसी उत्तरभाव्य (Subsequent) शर्त के भंग के कारण प्रवेश का अधिकार मात्र उस सम्पत्ति के जिस पर तदद्वारा प्रभाव पड़ा है. स्वामी के सिवाय किसी अन्य को अन्तरित नहीं किया जा सकता।

इसका कारण यह है कि इस प्रकार का अधिकार व्यक्तिगत प्रलाभ के लिए होता है। यदि इसे अन्तरणीय घोषित कर दिया जाए तो इसके सृष्ट किये जाने का प्रयोजन रद्द हो जाएगा। पुनः प्रवेश की स्थिति साधारणतया पट्टे के मामलों में उठती है। जब कोई पट्टादाता किसी पट्टाग्रहीता को किसी शर्त के अन्तर्गत पट्टा प्रदान करता है और शर्त के अनुसार शर्त का उल्लंघन होने की दशा में पट्टादाता सम्पत्ति को पुनः अपने कब्जे में लेने के लिए प्राधिकृत है तो ऐसे अधिकार को पुनः प्रवेश का अधिकार कहा जाएगा। इस अधिकार का अपना कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं होता है।

उस सम्पत्ति से जिससे यह उद्भूत हुआ है। इसका पृथक् अन्तरण सम्भव नहीं है। इसका अन्तरण सम्पत्ति के साथ ही हो सकेगा और सम्पत्ति के साथ इसका अन्तरण उसके एक अनुसंगति के रूप में होता है। पुनः प्रवेश का अधिकार सम्पत्ति सम्बन्धी हितों के बिना निजी अनुज्ञप्ति होता है जिसका अन्तरण अवैध एवं अस्वाभाविक होता है।

उदाहरण-

'अ' ने अपनी सम्पत्ति का पट्टा 'व' के पक्ष में इस शर्त के साथ किया कि वह सम्पत्ति का पुनः अन्तरण करेगा। पट्टाग्रहीता ने शर्त का उल्लंघन कर सम्पत्ति स के हाथों बेच दी। पट्टादाता को जब शर्त भंग का पता चला तो उसने पट्टे को जब्ती को नोटिस दिये बिना ही उस सम्पत्ति को वादी के हाथों बेच दिया। वादी ने सम्पत्ति का कब्जा प्राप्त करने हेतु याद चलाया।

प्रतिवादी 'स' का कथन था कि वादी शर्त भंग का लाभ उठाकर उसे सम्पत्ति से वंचित नहीं कर सकता है, यांकि उसके (वादी) पक्ष में अन्तरित हित केवल पुनः प्रवेश का अधिकार मात्र था। यह अभिनिर्णीत हुआ कि वादी सम्पत्ति का कब्जा पाने के लिए सक्षम है पट्टादाता ने वादो को न केवल पुनः प्रवेश का अधिकार बेचा था, अपितु सम्पत्ति को बेचा था।

एक इंग्लिश वाद में माहवारी किस्तों के आधार पर कुछ माल 'अ' ने 'ब' को दिया। संविदा की शर्तों के अनुसार यदि किसी महीने किस्त का भुगतान न हो सका तो अ को अधिकार था कि जहाँ माल रखा हो वह वहाँ प्रवेश कर माल उठा ने जमानत के रूप में इसी अधिकार का अन्तरण 'स' के हाथ कर दिया।

न्यायालय के अनुसार 'स' इस अधिकार का प्रयोग 'अ' के विरुद्ध नहीं कर सकता था, क्योंकि यह निजी अनुज्ञप्ति थी। अन्तरणीय सम्पत्ति नहीं थी।

इस खण्ड में वर्णित सिद्धान्त की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

1. पुनः प्रवेश का अधिकार सम्पत्ति से अलग अन्तरणीय नहीं है।

2. इसे किसी उत्तरभोगी शर्त के भंग होने पर निर्भर होना चाहिए।

3. यह सम्पत्ति के साथ स्वतः अन्तरणीय है।

खण्ड (C) सुखाधिकार का अधिकार-

सुखाधिकार एक ऐसा अधिकार है जो किसी अचल सम्पत्ति के स्वामी या काबिज व्यक्ति को किसी अन्य अचल सम्पत्ति पर, जो उसको अपनी न हो, कोई कार्य करने या करते रहने या रोकने, या रोकते रहने के लिए प्राप्त है।

स्पष्ट है कि यह अधिकार दो अचल सम्पत्तियों को एक दूसरे पर भौगोलिक निर्भरता के कारण उत्पन्न होता है तथा एक सम्पत्ति के लाभप्रद उपभोग के लिए दूसरी सम्पत्ति पर प्राप्त होता है। इस अधिकार का अपना कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं होता है और न ही स्वतंत्र रूप में इसका कोई उपयोग सम्भव है।

अत: सुखाधिकार उस सम्पति, जिसके लाभप्रद उपभोग के लिए (अधिभावी सम्पत्ति) उपलब्ध रहता है. से अलग अन्तरित नहीं किया जा सकेगा और यदि अन्तरित किया जाता है तो ऐसा अन्तरण अवैध होगा।

भगवान सहाय बनाम नरसिंह सहाय के वाद में अ ने एक समीपवर्ती गृह स्वामी को यह अनुमति प्रदान की कि वह अपने मकान पर दूसरी मंजिल बना ले जिससे वह बरसात जल को सुविधापूर्वक निकाल सके। इसके अतिरिक्त घर के दैनिक कार्यों हेतु जल के उपभोग को भी अनुमति प्रदान की।

यह अभिनिर्णीत हुआ कि यह अधिकार सुखाधिकार की कोटि में है. स्वामित्व का अन्तरण नहीं है। 'अ' एक गृह स्वामी को 'ब' की समीपवर्ती जमीन पर से होकर सुखाधिकार का अधिकार प्राप्त था। 'अ' ने अपने इस अधिकार को 'स' के पक्ष में अन्तरित कर दिया। अन्तरण अवैध होगा। किन्तु यदि अ मकान ही स के पक्ष में अन्तरित कर देता है तो रास्ते का अधिकार स्वतः अन्तरित हो जाएगा। और यह अन्तरण वैध होगा।

खण्ड (D) व्यक्तिगत उपभोग के लिए निर्बन्धित हित-

यह खण्ड उपबन्धित करता है कि सम्पत्ति में का ऐसा हित, जो उपभोग में स्वयं स्वामी तक हो निर्बन्धित है, उसके द्वारा अन्तरित नहीं किया जा सकता। कोई हित उपभोग में केवल स्वामी तक ही सीमित है अथवा नहीं, इस तथ्य का निर्धारण पक्षकारों के आशय से किया जाता है।

उदाहरणार्थ 'अ' अपना मकान 'ब' को, 'ब' की पुत्रों का विवाह सम्पन्न कराने हेतु देता है। विवाह सम्पन्न हो जाने के बाद व मकान को वापस' अ को लौटाने के बजाय 'स' को किराये पर दे देता है। व द्वारा मकान का पक्ष में किया गया अन्तरण शून्य होगा क्योंकि मकान उसे 'अ' ने व्यक्तिगत उपभोग के लिए दिया था।

इस सिद्धान्त का उद्देश्य यह है कि यदि ऐसे हितों को अन्तरणीय बना दिया जाएगा तो निर्बन्धित हित सृष्ट करने का उद्देश्य की विफल हो जाएगा तथा अन्तरक के आशय के स्पष्ट विरोध में होगा सम्पत्ति में निबंन्धिक हित विधि, रूढ़ि अथवा अनुदान द्वारा सृष्ट किया जा सकता है।

हकशुफा का अधिकार (Right of Pre-emption) का अधिकार भी पूर्णरूपेण व्यक्तिगत होता है। अतः इसका अन्तरण नहीं किया जा सकेगा। कोई अजनबी व्यक्ति इस अधिकार का लाभ उठाने के लिए सक्षम नहीं हो सकेगा।

सिद्धान्त का यह भी एक उद्देश्य है कि सह भागीदारों के बीच कोई अजनबी व्यक्ति न आने पाये सहभागीदारों के बीच किसी अजनबी व्यक्ति के जाने से हकशुफाधारी लिए असुविधा उत्पन्न होने की सम्भावना हो जाती है। हकशुफा का अधिकार अपने उद्भव तथा प्रकृति की दृष्टिकोण से एक अस्थायी अधिकार है।

यह हकशुफाधारी का व्यक्तिगत विशेषाधिकार है जो इससे प्रभावित सम्पत्ति स्वामी से भिन्न किसी अन्य व्यक्ति के पक्ष में अन्तरणीय नहीं है। किन्तु यदि किसी व्यक्ति ने न्यायालय से इस आशय की डिक्री प्राप्त कर लिया है कि उसे कथित सम्पत्ति पर हकशुफा का अधिकार प्राप्त है तो वह इस अधिकार के प्रयोग हेतु धन संग्रह करने लिए उक्त डिक्री को बन्धक के रूप में अन्तरित कर सकेगा। बन्धक किसी भी व्यक्ति के पक्ष में सृष्ट किया जा सकेगा।

6. सेवाधृति (Service Tenure) सेवाधृति से आशय है किसी एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति को प्रदत्त व्यक्तिगत सेवा के लिए पारिश्रमिक के रूप में प्रथम के पक्ष में द्वितीय व्यक्ति द्वारा किया गया भूमि का अन्तरण। ऐसे अन्तरणों का यह आवश्यक गुण है कि वे पुनः अन्तरणीय नहीं होंगे। सेवाधृति अन्तरिती के लिए व्यक्तिगत रूप में आशयित रहती है।

अतः इसका अन्तरण अवैध होगा, किन्तु यदि व्यक्तिगत सेवा को स्थिति समाप्त हो जाए और सेवाधृति का स्वरूप परिवर्तित हो जाए तो ऐसी भूमि किसी भी अन्य भूमि की भाँति अन्तरणीय हो जाएगी। सेवाधृति को अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है।

उदाहरणार्थ, बंगाल में इसे घाटवाली नाम से; बम्बई में 'वतन के नाम से तथा मद्रास में 'करनम" के नाम से पुकारा जाता है। उपरोक्त के अतिरिक्त इनाम धृति भी सेवाधृति के अन्तर्गत आती है। अतः अनन्तरणीय है।

किन्तु 'मुआफी' के रूप में दी गयी भूमि (राजस्व से मुक्त किसी ब्राह्मण को इस आशय से दो कि वह अपना आशीर्वाद भूदाता तथा उसके वंशजों को प्रदान करता रहेगा) सेवाधृति अन्तर्गत नहीं आती है।

अतः ऐसी भूमि के अन्तरण पर इस खण्ड में कोई प्रतिबन्ध नहीं है? 7. किसी मुस्लिम विधवा का अपने महर भुगतान हेतु अपने मृत पति की सम्पत्ति को धारण करने का अधिकार पूर्णरूपेण व्यक्तिगत होता है। अतः अन्तरणीय नहीं

भरण पोषण हेतु प्रदत्त सम्पत्ति - किसी व्यक्ति के भरण-पोषण हेतु कोई सम्पत्ति प्रदान की गयी हो और पक्षकारों के आशय से यह सुस्पष्ट हो कि सम्पत्ति उस व्यक्ति के लिए ही सीमित है, तो ऐसे व्यक्ति द्वारा वह सम्पत्ति अन्तरणीय नहीं।

संविदाजन्य प्रलाभ व्यक्तिगत गुणों से प्रभावित अथवा किसी दायित्व से प्रभारित हितों को छोड़कर संविदाजन्य प्रलाभ अनुयोज्य दावे (Actionable Claim) के रूप में अन्तरणीय है। वाणिज्य की परिधि से परे वाली सम्पत्तियाँ ऐसी सम्पत्तियाँ हैं जो अपनी प्रकृति के कारण वाणिज्य की परिधि से परे हो गयी हैं। उदाहरणार्थ- मन्दिर के पुरोहित का अधिकार महाब्राह्मण का अधिकार पूजा की पारी (Term of worship) का अधिकार इत्यादि। ये हित ऐसे हैं जो अनन्तरणीय माने गये हैं।

खण्ड ( E ) - भावी भरण-पोषण का अधिकार- भावी भरण-पोषण का अधिकार चाहे वह किसी भी रीति से उद्धृत प्रतिभूत या अवधारित हो, अन्तरित नहीं किया जा सकता है। कारण यह है कि भरण-पोषण का अधिकार व्यक्तिगत सम्पत्ति होती है जिसका सृजन कुछ विशिष्ट कारणों एवं परिस्थितियों के कारण किया जाता है।

इसका प्रमुख उद्देश्य अधिकार प्राप्त व्यक्ति को उपयुक्त जीवन यापन में सहायता प्रदान करना है। यह खण्ड इस धारा में सन् 1929 में अधिनियम संशोधन द्वारा जोड़ा गया था जिसका उद्देश्य मद्रास तथा कलकत्ता उच्च न्यायालयों के बीच उत्पन्न विभेद को समाप्त करना था।

इसके अन्तर्गत किसी हिन्दू विधवा का भरण-पोषण का अधिकार जो भावी प्रकृति का है अन्तरणीय नहीं है, किन्तु भरण-पोषण की संचित निधि किसी अन्य निधि की भाँति अन्तरणीय है एवं कुर्क की जाने योग्य भी है।

खण्ड (F) केवल वाद लाने का अधिकार- यह खण्ड उपबन्धित करता है कि मात्र वाद का अधिकार अन्तरणीय नहीं है। 'वाद लाना' शब्दों से अभिप्रेत है किसी व्यक्ति के विरुद्ध विधिक दावा अथवा विधिक प्रक्रिया स्थापित करना वाद चलाने का अधिकार व्यक्तिगत होता है। अतः इसका अन्तरण इस खण्ड द्वारा प्रतिषिद्ध है। वाद चलाने का अधिकार सामान्यतः सम्पत्ति स्वामी तक ही सीमित रहता है।

यदि वाद चलाने का अधिकार किसी अधिकार के उल्लंघन से उद्धृत है अथवा संविदा भंग से तो ऐसा अधिकार पूर्णरूपेण व्यक्तिगत होगा। किन्तु यदि सम्पत्ति, जिससे अधिकार सम्बद्ध है या उद्धृत हुआ है, अन्तरित कर दी जाती है तो वाद चलाने का अधिकार स्वतः अन्तरित हो जायेगा।

उदाहरण 'अ' एक स्थान से दूसरे स्थान पर माल भेजने का कार्य करता है। वह 'ब' के पक्ष में उपरोक्त संव्यवहार से उद्धृत वाद चलाने के अधिकार को अन्तरित कर देता। ब के पक्ष में किया गया अन्तरण इस खण्ड से प्रभावित होगा।

किन्तु यदि अ' अपना सम्पूर्ण कारोबार 'व' के पक्ष में अन्तरित कर दे तो वाद चलाने का अधिकार स्वतः अन्तरित हो जाएगा, क्योंकि ऐसी स्थिति में किया गया अन्तरण केवल वाद चलाने का अधिकार नहीं होगा

अनुयोज्य दावे का अन्तरण (Transfer of an actionable clalm)-

अनुयोज्य दावे की परिभाषा धारा 3 में दी गयी है जो इस प्रकार हैं-'अनुयोज्य दावे से स्थावर सम्पत्ति के बन्धक द्वारा या जंगम सम्पत्ति के अवमानना पर गिरी द्वारा प्रतिभूत ऋण से भिन्न किसी ऋण का या उस जंगम सम्पत्ति में जो दावेदार के वास्तविक या आन्वयिक कब्जे में नहीं है लाभप्रद हित का ऐसा दावा अभिप्रेत है जिसे सिविल न्यायालय अनुतोष देने के लिए आधार प्रदान करते वाला मानता हो चाहे ऐसा ऋण या लाभप्रद हित में सशर्त या समाश्रित हो।

अनुयोज्य दावा तथा वाद लाने का अधिकार दोनों एक ही प्रकृति के नहीं हैं। दोनों में अन्तर है। दोनों के अन्तर को प्रिवी कौंसिल ने मन्मथ नाथ बनाम हिदायत अली के बाद में सुस्पष्ट किया है। अनुयोज्य दावा एक ऐसी सम्पत्ति है जिसका अपना स्वतंत्र अस्तित्व होता है जो इस अधिनियम की धारा 130 के अन्तर्गत अन्तरणीय है, परन्तु वाद चलाने का अधिकार केवल एक आनुषंगिक अधिकार है जिसका अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता है।

अतः केवल वाद लाने का अधिकार अन्तरणीय नहीं है। इसका अन्तरण केवल उस सम्पत्ति के साथ ही हो सकेगा जिससे वह उद्धृत उक्त वाद में 'अ' ने अपनी सम्पत्ति स' को पट्टे पर दिया जिसने यह वचन दिया कि वह सरकारी निर्धारणों का भुगतान करेगा, और यदि वह विफल रहेगा तो हर्जाना अदा करने के दायित्वाधीन होगा।वह कई किस्तों का भुगतान करने में विफल रहा जिसका भुगतान 'अ' को करना पड़ा 'अ' ने अपने उत्तरभोगी अधिकार को स' से हर्जाना प्राप्त करने के अधिकार के साथ के पक्ष में अन्तरित कर दिया। इन तथ्यों के आधार पर यह अभिनिर्णीत हुआ कि स की विफलता के फलस्वरूप 'अ' के पक्ष में हर्जाना प्राप्त करने का जो अधिकार सृष्ट हुआ था वह केवल उस निश्चित धनराशि को प्राप्त करने का अधिकार था जिस की विफलता के कारण अ को भुगतान करना पड़ा था। निश्चित धनराशि को माँग अनुयोग्य दावा की कोटि में आती है।

अतः इसका ब के पक्ष में अन्तरण वैध था। यदि करार उस धनराशि से भिन्न केवल हर्जाना प्राप्त करने के सम्बन्ध में रहा होता. तो यह अधिकार वाद लाने के तुल्य होता और अनन्तरणीय होता।

मध्यवर्ती लाभ (Mesne Profit)- मध्यवर्ती लाभ प्राप्त करने का अधिकार केवल वाद लाने का अधिकार है, इसलिए यह अधिकार अन्तरणीय नहीं है। किन्तु यदि मध्यवर्ती लाभ का अधिकार, सम्पत्ति के उपभोग के अधिकार के साथ अन्तरित कर दिया जाए तो इस अधिकार का स्वरूप बदल जाएगा और इसका अन्तरण वैध होगा।" प्रतिकर प्राप्त करने का अधिकार संविदा भंग या दुष्कृति के लिए हर्जाना मांगने का - अधिकार अन्तरणीय नहीं है। इस प्रकार का अधिकार केवल वाद लाने का अधिकार है।

डिक्री– डिक्री अन्तरणीय सम्पत्ति है। इसी प्रकार लेखा मांगने का अधिकार भी अन्तरणीय है।

बीमा पॉलिसी - बीमा अधिनियम, 1963 उपबन्धित करता है कि यह खण्ड उक्त अधिनियम की धाराओं 17, 52, 53 तथा 79 को प्रभावित नहीं करेगा। ये धाराएँ समुद्री बीमा पॉलिसी को अन्तरणीय घोषित करती हैं। समुद्री बीमा की भाँति जीवन बीमा, मोटर बीमा दुर्घटना बीमा, आदि भी अन्तरणीय हैं। बीमा का सिद्धान्त, प्रतिभूति के सिद्धान्त पर आधारित है।

भागीदारी में हित — भागीदारी में किसी भागीदार का हित एक सम्पत्ति है जिसका वैधतः अन्तरण किया जा सकता है।

खण्ड (G) लोक पद-

खण्ड उपबन्धित करता है कि न तो लोक पद और न ही लोकाधिकार को मिलने वाला वेतन अन्तरणीय है। लोक पद कुछ कर्तव्यों की अपेक्षा करता है तथा इसके लिए विशिष्ट गुणों से युक्त व्यक्तियों का ही चयन होता है, किन्तु महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि प्रतिबन्ध केवल लोक पद के ही सम्बन्ध में है। यदि कथित पद लोक पद को कोटि नहीं आता है तो उपरोक्त प्रतिबन्ध लागू नहीं होगा। यह प्रतिबन्ध लोकनीति पर आधारित है।

लोक पद से सम्बद्ध वेतन के सम्बन्ध में ने ग्रेनफेल बनाम दि डीन एण्ड कैनन्स ऑफ के वाद में निम्नलिखित महत्वपूर्ण मत व्यक्त किया है-

"लोकदायित्व से सम्बद्ध अनेक ऐसे मामले हैं जिनमें यह लोक नीति के विरुद्ध होगा कि लोक दायित्व के निर्वाह से सृष्ट आप को अन्तरित किया जाए। ऐसा इसलिए है, क्योंकि जनता न केवल समय-समय पर लोक दायित्वों के निर्वाह में रुचि रखती है, अपितु उस व्यक्ति के, जिसे इन दायित्वों का निर्वाह करना है समुचित अवस्था में रहने में भी रुचि रखती हैं। उपरोक्त वक्तव्य समीचीन प्रतीत होता है। परन्तु बी० अनन्थैय्या बनाम चो० सुब्बा राव के वाद में एक विचित्र स्थिति उत्पन्न हुई थी। इस वाद में अपीलार्थी तथा प्रत्यर्थी क्रमशः छोटे तथा बड़े भाई थे। प्रत्यर्थी ने अपीलार्थी को आर्थिक सहायता की थी जिससे उसने जीवन में अच्छी शिक्षा प्राप्त को और एक महत्वपूर्ण पद प्राप्त किया। पद प्राप्त करने से पूर्व बड़े भाई अर्थात् प्रत्यर्थी के पक्ष में एक करार किया कि चूँकि बड़े भाई ने उसका लालन पालन किया है अतः पद प्राप्त करने के उपरान्त वह एक निश्चित धनराशि प्रतिमाह अदा करेगा।

इन तथ्यों के आधार पर मद्रास उच्च न्यायालय ने यह मत व्यक्त किया कि अपीलार्थी तथा प्रत्यर्थी के बीच हुआ करार वैध है। प्रतिज्ञाबद्ध धनराशि का भुगतान अपीलार्थी अपनी बचत से या अन्य स्रोत से कर सकेगा।

लोक प्राधिकारी बन जाने के कारण वह अपने दायित्व से मुक्त नहीं हो सकेगा करार की शर्तों से यह सुस्पष्ट है कि अपीलार्थी ने लोक पद से सम्बद्ध वेतन अन्तरित करने के लिए करार नहीं किया था।

लोक पद से सम्बद्ध वेतन न केवल अनन्तरणीय है, अपितु यह सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 60(1) के अन्तर्गत कुर्क किये जाने से भी उन्मुक्त है। वेतन की धनराशि लोक प्राधिकारी द्वारा प्राप्त कर लिए जाने के बाद उसकी अपनी सम्पत्ति हो जाती है और अन्य सम्पत्तियों की भाँति अन्तरणीय है।

खण्ड (H) पेंशन–

इस खण्ड के अन्तर्गत पेंशन या वृत्तिकाएं, जो सैनिक नौसैनिक वायुसैनिक को अतीत में उसके द्वारा की गयी विशिष्ट सेवा अथवा विशिष्ट गुण के कारण देय होती है। अतः इसका स्वरूप व्यक्तिगत होता है।

सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 को धारा 60 (छ) के अन्तर्गत इसकी कुर्सी पर भी प्रतिबन्ध है। पेंशन की राशि केवल तब तक अन्तरणीय है जब तक वह प्राप्तकर्ता के हाथ में नहीं आ जाती है। उसके हाथ में आ जाने के उपरान्त उसकी अन्य सम्पत्ति की भाँति यह भी अन्तरणीय हो जाती है।

खण्ड (I) - इस खण्ड में निम्नलिखित तीन विषयों पर प्रकाश डाला गया है-

(1) किसी सम्पत्ति या हित की प्रकृति के प्रतिकूल अन्तरण-

(2) विधि-विरुद्ध उद्देश्य या प्रतिफल के लिए किया गया अन्तरण-

(3) अयोग्य अन्तरितों के पक्ष में किया गया अन्तरण

इस खंड में दिए गए इन तीनों ही बिंदुओं को विस्तार पूर्वक नीचे प्रस्तुत किया जा रहा है।

(1) सम्पत्ति या हित की प्रकृति के प्रतिकूल अन्तरण- यह उपबन्ध उन सम्पतियों को अन्तरणीयता पर प्रतिबन्ध लगाता है जो अन्तरण के योग्य नहीं। उदाहरणार्थ बहता हुआ पानी, हवा. प्रकाश इत्यादि। ये वस्तुएं ऐसी हैं जिनका अन्तरण सम्भव नहीं है। ये वस्तुएं न किसी की होती हैं। और न ही कोई इन्हें प्राप्त कर सकता है। कुछ ऐसी वस्तुएँ भी हैं जिन्हें मनुष्य ने स्वयं कुछ विशिष्ट कारणों से व्यापार एवं वाणिज्य की परिधि से बाहर कर दिया है। ऐसी वस्तुओं का अन्तरण भी इस उपबन्ध से प्रभावित होगा। उदाहरण स्वरूप देवोत्तर सम्पत्तियों वक्फ की सम्पत्ति, राजदण्ड, पूजा के पात्र शेवायतों के अधिकार इत्यादि।

किन्तु यदि कोई धनराशि अथवा सम्पत्ति प्राप्त करने का अधिकार किसी धार्मिक पद से सम्बद्ध न हो, अपितु स्वतंत्र हो तो ऐसी सम्पत्ति अन्तरणीय होगी किसी मन्दिर के पुजारी को पारिश्रमिक के रूप में प्राप्त भूमि पर उगने वाली फसल, जो कि उसके पूर्ण नियंत्रण में है का अन्तरण इस सिद्धान्त से प्रभावित नहीं होगा।

(2) अवैध उद्देश्य अथवा प्रतिफल- यदि अन्तरण का उद्देश्य अथवा प्रतिफल विधि विरुद्ध है तो अन्तरण इस प्रावधान के अन्तर्गत शून्य होगा। किसी अन्तरण का उद्देश्य अथवा प्रतिफल कब विधि विरुद्ध होगा, इसका निर्धारण संविदा अधिनियम, 1872 की धारा में उल्लिखित परिस्थितियों के आधार पर किया जा सकेगा।

धारा 23 उपबन्धित करती है कि किसी करार का उद्देश्य अथवा प्रतिफल विधिपूर्ण होगा जब तक कि,

(1) यह विधि द्वारा प्रतिषिद्ध न हो।

(2) वह ऐसी प्रकृति का है कि यदि अनुज्ञात हो तो उससे विधि के किसी उपबन्ध का उल्लंघन होगा।

(3) वह कपटपूर्ण है।

(4) वह ऐसा है जिससे किसी व्यक्ति को या उसकी सम्पत्ति को क्षति अन्तर्विष्ट है।

(5) उसे न्यायालय अनैतिक या लोक नीति के प्रतिकूल मानता हो। इनमें से प्रत्येक परिस्थिति में करार का उद्देश्य या प्रतिफल विधि विरुद्ध माना जाएगा।

विधि-विरुद्ध उद्देश्य या प्रतिफल का प्रभाव- यदि अन्तरण का उद्देश्य या प्रतिफल विधि विरुद्ध है और अन्तरिती अन्तरण के फलस्वरूप सम्पत्ति का कब्जा प्राप्त कर चुका हो, तो अन्तरक सम्पति का फब्जा वापस नहीं प्राप्त कर सकेगा।

यदि अन्तरिती सम्पत्ति का कब्जा प्राप्त नहीं की सका है तो वह कब्जे की माँग करने में सफल नहीं हो सकेगा। इसका कारण यह है कि न्यायालय यथास्थिति बनाये रखना चाहता है।

अंशतः विधि-विरुद्ध उद्देश्य या प्रतिफल का प्रभाव- यदि अन्तरण का उद्देश्य या प्रतिफल अंशतः विधि-विरुद्ध है और अंशतः विधिपूर्ण तथा विधिपूर्ण अंश विधि-विरुद्ध अंश से अलग नहीं किया जा सकता है तो ऐसी स्थिति में सम्पूर्ण संव्यवहार संविदा अधिनियम की धारा 24 में उल्लिखित सिद्धान्त के अन्तर्गत शून्य होगा।

किन्तु यदि विधिसम्मत अंश, विधि-विरुद्ध अंश से अलग किया जा सकता है और अन्तरितो ने संविदा के अनुपालन में सम्पत्ति का कब्जा प्राप्त कर लिया है तो अन्तरक सम्पति को प्राप्त करने का अधिकारी नहीं होगा।

विधिक दायित्व का निर्धारण केवल विधि सम्मत अंश के सम्बन्ध में किया जाएगा, परन्तु यदि प्रतिफल का एक अंश शून्य है तो वह विधि विरुद्ध नहीं है तथा दूसरा अंश विधि सम्मत है तो अन्तरण पूर्णरूपेण उचित होगा।

(1) विधि द्वारा निषिद्ध हो- कोई कार्य विधि द्वारा प्रतिषिद्ध समझा जाएगा यदि उस कार्य को करने पर प्रतिबन्ध लगाया गया हो अथवा उस कार्य के किए जाने पर शास्ति का प्रावधान किया गया हो। विधि द्वारा प्रतिषिद्ध कार्य अवैध और शून्य होगा।

उदाहरणार्थ, उ० प्र० रेंट नियंत्रण अधिनियम के अन्तर्गत पारित आदेश के विरुद्ध भवन को किराये पर देने के सम्बन्ध में किया गया करार इस अधिनियम के अन्तर्गत शुन्य होगा। इसी प्रकार मोटर यान अधिनियम के अन्तर्गत किसी एक रास्ते के लिए जारी किये गये परमिट का दूसरे रास्ते के लिए अन्तरण का उद्देश्य विधिविरुद्ध होगा और इसलिए शून्य होगा इस उपखण्ड में प्रयुक्त विधि द्वारा प्रतिषिद्ध' पदावलि से आशय किसी करार अथवा न्यायालय द्वारा पारित डिक्री से नहीं है। इसका आशय अधिनियमित विधि द्वारा लगाये गये प्रतिबन्ध से है।

(2) विधि के किसी उपबन्ध का उल्लंघन हो — यदि सम्पत्ति के अन्तरण का प्रभाव देश में लागू किसी विधि के उपबन्धों का उल्लंघन करना है तो ऐसा अन्तरण शून्य होगा। उदाहरणार्थ, किसी दिवालिए व्यक्ति द्वारा अपनी सम्पत्ति का अन्तरण दिवालिया अधिनियम के उपबन्धों का उल्लंघन करेगा, अत: अवैध होगा।

इसी प्रकार किसी अधिवक्ता न्यायाधीश या अन्य कर्मचारी को उसके पारिश्रमिक के सम्बन्ध में पारिश्रमिक के अतिरिक्त अन्यथा किया गया सम्पत्ति अन्तरण अवैध होगा क्योंकि इससे इस अधिनियम की धारा 136 का उल्लंघन होगा।

(2) कपटपूर्ण ऋणदाताओं के हितों को क्षति पहुँचाने के उद्देश्य से किया गया अन्तरण, इत्यादि इस खण्ड के अन्तर्गत आते हैं, किन्तु सम्भावित निष्पादन से बचने के उद्देश्य से सम्पत्ति का विक्रय इस सिद्धान्त से प्रभावित नहीं होगा यदि अन्तरण मूल्यवान प्रतिफल के बदले किया गया है। किसी अभिकर्ता के पक्ष में इस आशय से सम्पत्ति का अन्तरण कि वह अपने स्वामी को अनुमति के बिना किसी भूमि का पट्टा अन्तरक के पक्ष में कर देगा इस सिद्धान्त से प्रभावित होगा।"

(3) किसी अन्य व्यक्ति की शरीर या उसकी सम्पत्ति को क्षति पहुंचना अन्तर्विष्ट हो— यदि अन्तरण के फलस्वरूप किसी अन्य व्यक्ति को स्वयं या उसको सम्पति को क्षति पहुँचना अन्तर्विष्ट हो तो ऐसा अन्तरण अवैध एवं शून्य होगा। उदारणार्थ कपटपूर्ण अथवा धोखाधड़ी द्वारा किसी कम्पनी के शेयरों को इस आशय से खरीदने का करार जिससे अन्य लोगों को यह विश्वास हो सके कि उक्त कम्पनी की साख बाजार में अच्छी है इस सिद्धान्त से प्रभावित होगा । किसी हिन्दू पिता को इस उद्देश्य से कोई सम्पत्ति देना कि वह अपने पुत्र को गोद दे दें. इस सिद्धान्त से प्रभावित होगा।

(4) अनैतिक कार्यों के लिए अन्तरण- यदि अन्तरण का उद्देश्य अथवा प्रयोजन अनैतिक है तो अन्तरण शून्य होगा। उदाहरणार्थ वेश्यावृत्ति चलाने के लिए मकान किराये पर देना किसी स्त्री अथवा पुरुष के पक्ष में इस आशय से मकान का अन्तरण कि वह अपने पति अथवा पत्नी का अभित्याग कर दें किसी दम्पति की इस प्रयोजन से सम्पति का अन्तरण कि अन्तरक अन्तरितों की पत्नी के साथ अनैतिक सम्बन्ध स्थापित कर सके इत्यादि इस सिद्धान्त से प्रभावित होंगे। किसी स्त्री के पक्ष में किया गया अन्तरण यदि इस उद्देश्य से प्रभावित है कि भविष्य में अन्तरक तथा अन्तरितो स्त्री के बीच अवैध सम्बन्ध कायम रहेंगे तो अन्तरण अनैतिक तथा शून्य होगा किन्तु यदि उनके बीच अनैतिक सम्बन्ध समाप्त हो चुका है, केवल अतीत के सम्बन्ध में ध्यान में रखकर सम्पति अन्तरित की गयी है तो ऐसा अन्तरण शून्य नहीं होगा। उच्चतम न्यायालय के मतानुसार ऐसी स्थिति में अन्तरण के प्रयोजन तथा उसके उद्देश्य से बीच अन्तर सुनिश्चित किया जाना चाहिए। यदि अन्तरण अतीत के सम्बन्धों के प्रयोजनार्थ है तो वैध है अथवा अवैध एवं शून्य है।

लोकनीति के प्रतिकूल प्रयोजनों के लिए अन्तरण- यदि अन्तरण के उद्देश्य लोकनीति के प्रतिकूल है तो ऐसा अन्तरण शुन्य होगा। लोकनीति' क्या है इसका कोई सार्वभौम परिभाषा नहीं व्यक्त की जा सकती है किन्तु कतिपय विशिष्ट क्रियाकलापों को लोकनीति के प्रतिकूल मान्यता प्रदान की गयी है।

धीरेन्द्र कुमार बनाम चन्द्र कॉल राय के वाद में निम्नलिखित करारों को लोकनीति के प्रतिकूल मान्यता प्रदान की गयी हैः

1. ऐसा करार जो एक राज्य के दूसरे राज्य से सम्बन्ध को क्षति उदाहरणार्थ शत्रु के साथ व्यापारिक सम्बन्ध पहुंचाता हो।

2 लोक सेवा को क्षति पहुंचाने वाले करार जैसे लोक सेवा में संलग्न किसी व्यक्ति को इस प्रकार प्रभावित करना जिससे वह अपने दायित्व का निर्वाह उचित प्रकार न कर पाए।

3. न्याय की दिशा को प्रभावित करने वाला करार, जैसा लोक प्रकृति के किसी अपराध के अभियोजन में सट्टेबाजी।

4. विधिक प्रक्रिया का दुरुपयोग करने के सम्बन्ध में करार।

5. समुचित नैतिकता के विरुद्ध करार।

6 विवाह को स्वतंत्रता या वैवाहिक सम्बन्धों को प्रभावित करने वाला करार।

7 व्यापार के अवरोध में करार

8. एकाधिकार कायम करने के सम्बन्ध में करार

9 किसी लोक सेवक को अनुतोष का भुगतान करना

अयोग्य और अनर्ह अन्तरितों के पक्ष में किया गया अन्तरण-

वैध अन्तरण के लिए यह आवश्यक है कि अन्तरक और अन्तरितों दोनों ही अन्तरण के संव्यवहार में सम्मिलित होने के लिए सक्षम हो। इस अधिनियम के अन्तर्गत कोई भी व्यक्ति अन्तरिती होने के लिए सक्षम है यदि वह इस अधिनियम की धारा 136 से प्रभावित नहीं है।

धारा 136 यह उपबन्ध करती है कि कोई भी न्यायाधीश विधि व्यवसायी न्यायालय से सम्बद्ध कोई भी अधिकारी किसी अनुयोज्य दावे को न तो क्रय करेगा और न हो उसमें किसी प्रकार की दखलंदाजी करेगा।

इसी प्रकार आदेश 21 नियम 73 सिविल प्रक्रिया संहिता, 1905 उन व्यक्तियों को, जो किसी सम्पत्ति की नीलामी से सम्बद्ध होते हैं, उसमें किसी प्रकार का हित प्राप्त करने से प्रतिषिद्ध करता है। न्यास अधिनियम 1852 की धारा 52 उपबंधित करती है कि न्यासी, जिस पर सम्पत्ति के विक्रय का दायित्व है या उसका अभिकर्ता ऐसी सम्पति का क्रय करने में अक्षम है।

अन्तरितों के रूप में अवयस्क-

यद्यपि अवयस्क द्वारा की गयी संविदा शून्य होती है किन्तु यह अन्तरिती होने के लिए अक्षम नहीं है। इस अधिनियम की धारा 107 उक्त नियम का एकमात्र अपवाद है। धारा 107 के अन्तर्गत पट्टे पर दोनों पक्षकारों द्वारा निष्पादन आवश्यक होता है और अवयस्क निष्पादन करने के लिए सक्षम नहीं माना जाता है। अतः पट्टे द्वारा सम्पत्ति के अन्तरण को छोड़कर अवयस्क अन्तरितो होने के लिए सक्षम नहीं।

जहाँ किसी व्यक्ति को सम्पति प्राप्त करने के पूर्व प्राधिकारिक संस्तुति की आवश्यकता होती है. किन्तु वह ऐसी संस्तुति नहीं प्राप्त करता है तो वह व्यक्ति विधिक अनर्हता से प्रभावित नहीं समझा जाएगा यह केवल एक अनियमितता मात्र है।

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