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लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 भाग 30: किसी बालक द्वारा पॉक्सो अधिनियम का अपराध किए जाने पर प्रक्रिया

Shadab Salim
2 Aug 2022 11:30 AM GMT
लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 भाग 30: किसी बालक द्वारा पॉक्सो अधिनियम का अपराध किए जाने पर प्रक्रिया
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लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (The Protection Of Children From Sexual Offences Act, 2012) की धारा 34 इस अधिनियम की विशेष धाराओं में से एक है। इस धारा में यह प्रावधान किए गए हैं कि यदि किसी बालक द्वारा ही इस अधिनियम में उल्लेखित कोई आपराधिक कृत्य घटित किया जाए तब उस बालक की आयु निर्धारित करते समय विशेष न्यायालय किस प्रक्रिया को अपनाए। इस आलेख में धारा 34 पर टिप्पणी प्रस्तुत की जा रही है।

यह अधिनियम में प्रस्तुत धारा का मूल रूप है

धारा 34

बालक द्वारा किसी अपराध के घटित होने और विशेष न्यायालय द्वारा आयु का अवधारण करने की दशा में प्रक्रिया -

(1) जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी बालक के द्वारा किया जाता है वहां ऐसे बालक पर '[किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 (2016 का 2)], के उपबंधों के अधीन कार्रवाई की जाएगी ।

(2) यदि विशेष न्यायालय के समक्ष किसी कार्यवाही में इस संबंध में कोई प्रश्न उठता है कि कोई व्यक्ति बालक है या नहीं तो ऐसे प्रश्न का अवधारण विशेष न्यायालय द्वारा ऐसे व्यक्ति की आयु के बारे में स्वयं का समाधान करने के पश्चात् किया जाएगा और वह ऐसे अवधारण के लिए उसके कारणों को लेखबद्ध करेगा ।

(3) विशेष न्यायालय द्वारा किया गया कोई आदेश मात्र पश्चात्वर्ती इस सबूत के कारण अविधिमान्य नहीं समझा जाएगा कि उपधारा (2) के अधीन उसके द्वारा यथाअवधारित किसी व्यक्ति की आयु उस व्यक्ति की सही आयु नहीं थी

आयु अपराध के लिए विधिक क्षमता निर्धारित करती है

अनेक मामले में आयु ऐसा मुख्य आधार बनाती है, जिसके चारों तरफ मामले का भाग्य घूमता है। अन्य शब्दों में आयु का निर्धारण अथवा अवधारण विचारण के लिए महत्वपूर्ण बिन्दुओं में से एक है। यह इस तरह से इस कारण से समझा जाता है, जिससे कि आयु अपराध के लिए विधिक क्षमता, साक्षी की विश्वसनीयता, अपराध की कठोरता अथवा संपुष्टि को निर्धारित करती है। यह सिविल अधिकारों को भी निर्धारित तथा उपान्तरित करती है।

जहाँ तक आपराधिक मामलो का सम्बन्ध है, आयु को आपराधिक उत्तरदायित्व के साथ ही साथ दण्ड के प्रकार तथा कठोरता को नियत करने का महत्व प्राप्त है। आपराधिक उत्तरदायित्व की आयु 7 वर्ष नियत की गयी है। यह विधि के द्वारा अपेक्षित चिकित्सीय तथ्य के कारण है। उस आयु का अथवा उससे कम आयु का व्यक्ति कृत्य के द्वारा अनुसरित हेतुक, आशय बनाने के योग्य नहीं होता है, जिसके परिणामों को वह समझ सकता था (भारतीय दण्ड संहिता की धारा 83 )।

यह इस कारण से है कि उस आयु तथा उससे अधिक आयु के व्यक्ति के द्वारा कारित किए गये आपराधिक कृत्य को परिपक्व मस्तिष्क के व्यक्ति के कृत्य के रूप में समझा जाता है, इसके कारण वह कतिपय परन्तुकों के अधीन होता है। यह वास्तव में भारतीय दण्ड संहिता के अधीन अपराधों को लागू होता है, न कि स्थानीय अथवा विशेष अधिनियमों को लागू होता है।

सम्मति की वैधता आयु पर निर्भर करती है

सम्मति को वैध होने के लिए स्वतंत्र तथा तात्कालिक होना है। यह हानि उपगत करने के लिए सहमत होने की कोटि में आता है, उस कृत्य के परिणामस्वरूप सम्मति प्रदान की जाती है। यदि हानि उपगत करने के लिए सम्मति सद्भाव में दी गयी हो, तब उस प्रयोजन के लिए आयु 12 वर्ष होती है। यह ऐसी आयु है, जो बालक को अस्पताल में वयस्क से सुभेदित करती है। यह एक विचार बिन्दु से अन्वेषण अधिकारी के लिए महत्वपूर्ण है, जो रुचिकर तथा महत्वपूर्ण होता है।

चिकित्सा अधिकारी के द्वारा वैध सम्मति के बिना किया गया कोई ऑपरेशन, बड़ी अथवा छोटा हमले की कोटि में आता है। यदि दुर्भाग्यवश मृत्यु हो जाती है, तब इसे विधि में मानववध के रूप में समझा जा सकता है। ऐसे प्रयोजन के लिए 12 वर्ष से कम आयु के रोगी हेतु संरक्षक की सम्मति आवश्यक होती है।

व्यवहार में प्रचलित सम्मति का अन्य प्रकार सद्भाव में न की जाने वाली हानि उपगत करने की सम्मति होती है। यह महत्वपूर्ण अपराधों, जैसे बलात्संग, व्यपहरण तथा अपहरण से सम्बन्धित होती है। इन मामलों के लिए सम्मति की आयु 18 वर्ष के रूप में नियत की गयी है। यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि बलात्संग का अपराध वैध सम्मति के चारों तरफ घूमता है। सम्मति की वैधता आयु पर निर्भर करती है। इस विवाधक पर यह मूल्यांकन किया जा सकता है कि 15 वर्ष से कम आयु की विवाहित लडकी की सम्मति अविधिमान्य है और इसलिए अवैध होती है।

उस विवाहित महिला, जो 15 वर्ष से कम आयु की हो, के साथ सम्मति सहित अथवा रहित समागम बलात्संग के अपराध की कोटि में आता है। पति के लिए 15 वर्ष से अधिक आयु की विवाहित महिला के साथ समागम के लिए उसकी सम्मति आवश्यक नहीं होती है और इसलिए सम्मति के बिना भी समागम पर वह बलात्संग के अपराध की कोटि में नहीं आता है।

भारतीय दण्ड संहिता की धारा 375 में निर्दिष्ट सम्मति के लिए आयु 18 वर्ष होती है। यह सद्भाव में न की जाने वाली क्षति उपगत करने के लिए सम्मति है। वैध होने के लिए सम्मति को स्वतंत्र तथा तात्कालिक होना चाहिए धमकी तथा दबाव के अधीन महिला आ सकती है। ऐसी सम्मति शून्य होती है और इसलिए वह वैध सम्मति नहीं होती है।

ऐसी सम्मति का तब दावा किया जा सकता है, जब इच्छा के संकेत का अभाव हो जब ऐसी सम्मति की वैधानिकता से पीड़िता से अभिसाक्ष्य के रूप में इन्कार किया गया हो, तब संपुष्टि अथवा समर्थनकारी साक्ष्य आवश्यक हो जाता है। यह विधि में आवश्यक होता है, क्योंकि कृत्य को सामान्यतः उस समय किया जाता है. जब पीड़िता और बलात्संग कारित करने वाला व्यक्ति अकेले होते है। ऐसी स्थिति में यह बलात्संग कारित करने वाले उस व्यक्ति के विरुद्ध पीड़िता के कथन का प्रश्न होता है।

समुचित आयु महत्वपूर्ण कड़ी आयु के बारे में साक्ष्य की माँग निम्नलिखित परिस्थितियों में की जा सकती है-

(क) आपराधिक उत्तरदायित्व

(ख) न्यायिक दण्ड

(ग) व्यपहरण,

(घ) बलात्संग

(ङ) विवाह:

(च) वयस्कता की प्राप्तिः

(छ) नियोजन,

(ज) भ्रूण हत्या:

(झ) आपराधिक गर्भपात

(ञ) नपुंसकता और बांझपन,

(ट) साक्षी के रूप में सक्षमता और

(ठ) पहचान।

आपराधिक उत्तरदायित्व

विधि में उत्तरदायित्व का तात्पर्य दण्ड का दायित्व है। भारतीय दण्ड संहिता की धारा 82 के अधीन 7 वर्ष से कम आयु का बालक अपराध कारित करने के निर्योग्य होता है। यह इस कारण से है कि केवल कृत्य तब तक दोष की कोटि में नही आता है, जब तक वह दोषी मस्तिष्क के साथ न हो। कोमल आयु के बालक का दोषी मस्तिष्क अथवा ऐसा आपराधिक आशय, जिससे कृत्य को कारित किया गया हो, नहीं हो सकता है।

लेकिन यह उपधारणा केवल भारतीय दण्ड संहिता के अधीन अपराधों तक ही, न कि अन्य अधिनियमों, जैसे रेल अधिनियम तक सीमित होती है। इस प्रकार इस आयु के बालक को दण्डित किया जाएगा यदि वह ऐसी कोई चीज करता है जो उस अधिनियम के प्रावधानों के अधीन अपराध की कोटि में आता है। भारतीय दण्ड संहिता की धारा 83 के अधीन भारत में 7 वर्ष से अधिक आयु के और 12 वर्ष से कम आयु के बालक को अपराध कारित करने के योग्य होने की उपधारणा की जाती है। यदि उसने उस अवसर पर अपने आचरण की प्रकृति और परिणामों को समझने के लिए पर्याप्त परिपक्वता प्राप्त कर लिया हो।

विधि उस आयु के बालक में ऐसी परिपक्वता की उपधारणा करती है, जब तक बचाव पक्ष के द्वारा उसके प्रतिकूल साबित न किया गया हो। भारतीय दण्ड संहिता की धारा 89 के अधीन 12 वर्ष से कम आयु का बालक ऐसी कोई हानि उपगत करने के लिए वैध सम्मति नहीं दे सकता है, जो सदभाव तथा उसके लाभ के लिए किए गये कृत्य से उद्भूत हो सकती है, उदाहरण के लिए जैसे ऑपरेशन के लिए सम्मति ऐसी सम्मति केवल संरक्षक ही प्रदान कर सकता है।

भारतीय दण्ड संहिता की धारा 87 के अधीन 18 वर्ष से कम आयु का व्यक्ति ऐसी कोई हानि, जो मृत्यु अथवा घोर उपहति कारित करने के लिए आशयित न होने वाले अथवा अज्ञात होने वाले कृत्य से परिणामित हो सकती है, उदाहरण के लिए जैसे प्रबल विरोध करने के लिए वैध सम्मति, अभिव्यक्त अथवा विवक्षित नहीं दे सकता है।

न्यायिक दण्ड

किशोर अपराधी, अर्थात् 16 वर्ष से कम आयु का बालक, जिसने अपराध कारित किया हो, का विचारण किशोर न्यायालयों के द्वारा किया जाता है और दोषसिद्धि पर उन्हें विशेष देखभाल के लिए माता-पिता अथवा संरक्षकों के पास सौंपा जाता है अथवा उन्हें सुधारात्मक स्कूल, सुधारवादी स्कूल अथवा सुधार स्कूल में भेजा जाता है, जहाँ पर उन्हें 18 वर्ष की आयु के पश्चात् निरुद्ध नहीं किया जाता है।

यहाँ उनके निरोध की अवधि के दौरान उन्हें कठोर अनुशासन के अधीन कुछ लाभदायक व्यापार अथवा व्यवसाय में प्रशिक्षित किया जाता है। किशोर अपराधियों को दुर्दान्त अपराधियों के साहचर्य से उपेक्षित करने के लिए जेल में नहीं भेजा जाता है, न तो उन्हें मृत्युदण्ड अथवा देश निर्वासन अथवा कारावास से दण्डादेशित किया जाता है। जब तक अपराध गंम्भीर, उदाहरणार्थ हत्या न हो।

व्यपहरण

इसका तात्पर्य किसी व्यक्ति को अवैध साधनों के द्वारा विधिपूर्ण संरक्षकता से ले जाना है। भारतीय दण्ड संहिता की धारा 369 के अधीन व्यपहरण अथवा अपहरण का अपराध गठित करने के लिए अपने शरीर से किसी जगम सम्पत्ति को बेईमानपूर्वक ले जाने के आशय से बालक हेतु ऐसे बालक की आयु 10 वर्ष से कम होनी चाहिए।

भारतीय दण्ड संहिता की धारा 361 और 366 यह प्रतिपादित करती है कि यह व्यपहरण अथवा अपहरण के अपराध में विधिक संरक्षकता से अवयस्क को ले जाने हेतु यदि वह लड़का हो, तब 16 वर्ष से कम आयु का यदि वह लड़की हो, तब 18 वर्ष से कम आयु की हो भारतीय दण्ड संहिता की धारा 366-ए 372 और 373 यह प्रतिपादित करती है कि यह अवयस्क लड़की को अवैध समागम के लिए अथवा अवयस्क लड़की को वेश्यावृत्ति के प्रयोजन के लिए विक्रय अथवा क्रय का अपराध है, यदि उसकी आयु 18 वर्ष से कम हो। भारतीय दण्ड संहिता की धारा 366-ख यह प्रतिपादित करती है कि यह अवैध समागन के प्रयोजन के लिए विदेश से भारत में लड़की के आयात का अपराध है, यदि उसकी आयु 21 वर्ष से कम हो।

वयस्कता की प्राप्ति भारतीय वयस्कता अधिनियम ( अधिनियम 9 वर्ष 1875) के अधीन भारत में अधिवास करने वाले व्यक्ति उसके सिवाय 18 वर्ष की पूर्णता पर वयस्कता प्राप्त करते हैं, जब न्यायालय के द्वारा अथवा प्रतिपाल्य न्यायालय के अधीन संरक्षक नियुक्त किया गया हो, जब व्यक्ति 21 वर्ष की आयु की पूर्णता पर वयस्कता प्राप्त करता है। इस आयु से कम के व्यक्ति अवयस्क होते हैं। वयस्कता की प्राप्ति के पश्चात् व्यक्ति पूर्ण सिविल अधिकार तथा उत्तरदायित्व अर्जित करता है।

भ्रूण हत्या

चूंकि अपरिपक्व नवजात शिशु जन्म के पश्चात् पृथक् अस्तित्व बनाए रखने योग्य नहीं होता है, इसलिए भ्रूण हत्या का आरोप केवल तब संघार्य हो सकता है, यदि यह साबित किया जा सकता है कि भ्रूण ने व्यवहार्यता की आयु अर्थात् गर्भावस्था का 210 दिन और अपवादजनक परिस्थितियों में 180 दिन का जीवन प्राप्त कर लिया है।

आपराधिक गर्भपात गर्भावस्था के पश्चात् अपराध के लिए वर्धित दण्ड की दृष्टि में गर्भधारण के उत्पाद के विकास के प्रक्रम को पहचानना आवश्यक है, जिसके परे वह प्रक्रम प्राप्त कर लेता है। यह जानना भी आवश्यक है कि क्या महिला बालक के पालन-पोषण की अवधि बिता चुकी है, जिससे कि कहीं ऐसा न हो कि मिथ्या आरोप लगाया जा सके।

नपुंसकता और बांझपन

कोई बालक वयस्कता के पहले बांझ होता है, यद्यपि वह नपुंसक नहीं होता है। पुरुष की पुसंकता अथवा उर्वरता से सम्बन्धित कोई ऊपरी आयु सीमा नहीं है। महिलाएं मासिक धर्म की समाप्ति के पश्चात् बांझ हो जाती है।

पहचान

आयु का अवधारण व्यक्ति, जीवित अथवा मृत की पहचान के लिए आवश्यक हो सकता है। जब कोई व्यक्ति अनेक वर्षों के पश्चात् एकाएक उपस्थित होता है और व्यक्ति के गायब होने का दावा किया जाता है अथवा जब मृत व्यक्ति को उस गायब व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तब सम्पूर्ण पहचान पूर्ण रूप में आवश्यक हो जाती है। लगभग आयु पहचान के आकड़े की श्रृंखला में महत्वपूर्ण कड़ी होती है।

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