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लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 भाग 28: पॉक्सो अधिनियम के अंतर्गत बनाए गए विशेष न्यायलयों की प्रक्रिया

Shadab Salim
1 Aug 2022 11:30 AM GMT
लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 भाग 28: पॉक्सो अधिनियम के अंतर्गत बनाए गए विशेष न्यायलयों की प्रक्रिया
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लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (The Protection Of Children From Sexual Offences Act, 2012) की धारा 33 विशेष न्यायलयों के लिए प्रक्रिया विहित करती है। पॉक्सो अधिनियम के अंतर्गत विशेष न्यायालय गठित किये गए हैं जिससे पीड़ित को शीघ्र न्याय मिल सके। इन विशेष न्यायलयों की प्रक्रिया भी इस अधिनियम में ही धारा 33 में निर्धारित की गई है। इस आलेख में इस ही धारा पर टिप्पणी प्रस्तुत की जा रही है।

यह अधिनियम में प्रस्तुत धारा का मूल रूप है

धारा 33

विशेष न्यायालयों की प्रक्रिया और शक्तियाँ (1) कोई विशेष न्यायालय अभियुक्त को विचारण के लिए सुपुर्द किए बिना किसी अपराध का ऐसे अपराध का गठन करने वाले तथ्यों का परिवाद प्राप्त होने पर या ऐसे तथ्यों की पुलिस रिपोर्ट पर संज्ञान ले सकेगा।

(2) यथास्थिति, विशेष लोक अभियोजक या अभियुक्त के लिए उपसंजात होने वाला काउंसेल बालक की मुख्य परीक्षा, प्रतिपरीक्षा, या पुनर्परीक्षा अभिलिखित करते समय बालक से पूछे जाने वाले प्रश्न विशेष न्यायालय को संसूचित करेगा जो पुनः उन प्रश्नों को बालक के समक्ष रखेगा।

(3) विशेष न्यायालय, यदि वह आवश्यक समझे, विचारण के दौरान बालक के लिए बार-बार विराम अनुज्ञात कर सकेगा।

(4) विशेष न्यायालय, बालक के परिवार के किसी सदस्य संरक्षक, मित्र या नातेदार की, जिसमें बालक अपना भरोसा रखता है, न्यायालय में उपस्थिति अनुज्ञात करके बालक के लिए मित्रतापूर्ण वातावरण सृजित करेगा।

(5) विशेष न्यायालय यह सुनिश्चित करेगा कि बालक को न्यायालय में परीक्षण के लिए बार-बार नहीं बुलाया जाएगा।

(6) विशेष न्यायालय विचारण के दौरान आक्रामक या बालक के चरित्र हनन संबंधी प्रश्न पूछने के लिए अनुज्ञात नहीं करेगा और यह सुनिश्चित करेगा कि सभी समय बालक की गरिमा बनाए रखी जाए।

(7) विशेष न्यायालय यह सुनिश्चित करेगा कि अन्वेषण या विचारण के दौरान किसी भी समय बालक की पहचान प्रकट नहीं की गई है

परंतु ऐसे कारणों से जो अभिलिखित किए जाएंगे. विशेष न्यायालय ऐसे प्रकटन की अनुज्ञा दे सकेगा, यदि उसकी राय में ऐसा प्रकटन बालक के हित में है।

स्पष्टीकरण- इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए बालक की पहचान में बालक के कुटुंब विद्यालय, नातेदार पड़ोसी की पहचान या कोई अन्य सूचना जिसके द्वारा बालक की पहचान का पता चल सके सम्मिलित होंगे।

(8) समुचित मामलों में विशेष न्यायालय बालक के लिए उसे कारित किसी शारीरिक या मानसिक आघात के लिए किसी दंड के अतिरिक्त, प्रतिकर के ऐसे संदाय, जो विहित किया जाए या ऐसे बालक के तुरंत पुनर्वास के लिए निदेश दे सकेगा।

(9) विशेष न्यायालय के पास इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध के विचारण के प्रयोजन के लिए सेशन न्यायालय की सभी शक्तियां होंगी और ऐसे अपराध का विचारण इस प्रकार करेगा, मानो वह सेशन न्यायालय हो, और यथासंभव सेशन न्यायालय के समक्ष विचारण के लिए दंड प्रक्रिया संहिता 1973 (1974 का 2) में विनिर्दिष्ट प्रक्रिया का अनुसरण करेगा।

विचारण का अर्थ

"सक्षम अधिकरण के समक्ष देश की विधि के अनुसार बाद में विवाद तथ्यों अथवा विध की ऐसे विवाद को अवधारित करने के प्रयोजन के लिए जांच जब न्यायालय पक्षकारों के अधिकारों को अवधारित करने के प्रयोजन के लिए तथ्य अथवा विधि के किसी विवाद को सुनता और अवधारित करता है, तब इसे विचारण कहा जा सकता है। इसे कुछ इस प्रकार भी कहा जा सकता है कि "कार्यवाही के पक्षकारों के बीच उस न्यायालय के समक्ष, जिसे अधिकारिता प्राप्त हो, विवादों, चाहे वे विधि अथवा तथ्य के विवाद हो, की न्यायिक जांच तथा अवधारण,वास्तव में पक्षकारों के बीच विवादों की, चाहे विधि अथवा तथ्य के हो, उस न्यायालय के समक्ष, जिसे उचित अधिकारिता प्राप्त हो, देश की विधि, या तो सिविल या दाण्डिक मामले के अनुसार न्यायिक जांच।"

अभिव्यक्ति विचारण को उस समय भी निर्बन्धित अर्थ प्राप्त हो सकता है, जब साक्ष्य लेना प्रारम्भ किया गया हो। संहिता ने अभिव्यक्ति विचारण को परिभाषित नहीं किया है। इस संदर्भ में अभिवचनों के संशोधन को अनुज्ञात करने के लिए शक्ति के प्रदत्तीकरण के द्वारा प्राप्त किए जाने के लिए ईप्सित उद्देश्य पर विचार करते हुए उस शक्ति पर परन्तुक के द्वारा अधिरोपित निर्बन्धन को ऐसे मामलों तक ही सीमित होना चाहिए, जब विचारण, जैसा कि सामान्य रूप में ज्ञात है, अर्थात् साक्षियों की जांच प्रारम्भ हो गयी हो।

विचारण कब प्रारम्भ होता है

विचारण अभियुक्त के विरुद्ध आरोप विरचित करने के साथ प्रारम्भ होता है। इसके पश्चात् अभियोजन अपना साक्ष्य प्रस्तुत करता है। इस प्रक्रम पर परिवादी साक्षी कक्ष में आएगा और उसकी परीक्षा तथा प्रतिपरीक्षा की जाएगी। यह महत्वपूर्ण है। कि जो परिवादिनी कथन करती है, यह उसके द्वारा पुलिस के समक्ष किए गये पूर्ववर्ती कथन के अनुरूप हो।

बलात्संग के मामलों के विचारण के लिए सिद्धांत सर्वोच्च न्यायालय ने बलात्संग के मामलों के विचारण के लिए निम्नलिखित सिद्धांत प्रतिपादित किया था।

(1) लैंगिक हमलों के परिवादियों को विधिक प्रतिनिधित्व प्रदान किया जाना चाहिए। ऐसे व्यक्ति को दाण्डिक न्याय से भली-भांति अवगत होना चाहिए। पीड़िता के अधिवक्ता की भूमिका केवल उसे कार्यवाही की प्रकृति को स्पष्ट करने मामले के लिए उसे तैयार करने और पुलिस थाना और न्यायालय में उसकी सहायता करने तक ही नहीं होनी चाहिए, वरन यह उसे इसके बारे में मार्गदर्शन प्रदान करने तक होनी चाहिए कि वह अन्य अभिकरणों से भिन्न प्रकृति की सहायता, उदाहरणार्थ परामर्श अथवा चिकित्सीय सहायता कैसे प्राप्त कर सकती है। यह सुनिश्चित करते हुए सहायता की निरन्तरता को सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि वही व्यक्ति जिसने पुलिस थाना में परिवादिनी के हित की देखभाल किए थे, मामले के अन्त तक उसका प्रतिनिधित्व किए थे।

(2) पुलिस थाना में विधिक सहायता प्रदान की जानी होगी, क्योंकि लैंगिक हमले की पीडिता भली-भांति पुलिस थाना में निराश अवस्था में होगी, इसलिए इस प्रक्रम पर अधिवक्ता का मार्गदर्शन तथा सहायता उसके लिए महान सहायता होगी।

(3) पुलिस का पीड़िता को उससे कोई प्रश्न पूछने के पहले प्रतिनिधित्व के उसके अधिकार को सूचित करना कर्तव्य होना चाहिए और पुलिस रिपोर्ट को यह कथन करना चाहिए कि पीड़िता को इस प्रकार सूचित किया गया था।

(4) उन मामलों में कार्य करने के लिए इच्छुक अधिवक्ताओं की सूची उन पीड़िताओं के लिए पुलिस थाना में रखी जानी चाहिए जिन्हें कोई विशेष अधिवक्ता प्राप्त न हो अथवा जिनका स्वयं का अधिवक्ता अनुपलब्ध हो।

(5) अधिवक्ता को पुलिस के द्वारा आवेदन-पत्र पर न्यायालय के द्वारा सर्वाधिक सुविधाजनक क्षण पर परन्तु यह सुनिश्चित करने के लिए नियुक्त किया जाएगा कि पीड़िताओं से असम्यक विलम्ब के बिना प्रश्न पूछा जाए, अधिवक्ताओं को न्यायालय की अनुमति की माँग करने अथवा प्राप्त करने के पहले पुलिस थाना में कार्य करने के लिए प्राधिकृत किया जाएगा।

(6) सभी बलात्संग के विचारणों में पीड़िताओं की अनामता (नाम प्रकट न किया जाना) को बनाए रखा जाना चाहिए, जहाँ तक आवश्यक हो।

(7) संविधान के अनुच्छेद 38 (1) के अधीन अन्तर्विष्ट नीति निदेशक तत्वों को ध्यान में रखते हुए आपराधिक क्षति प्रतिकर बोर्ड को स्थापित करना आवश्यक है। बलात्संग की पीड़िताएं बार-बार सारवान् हानि उपगत करती हैं। उदाहरणार्थ कुछ नियोजन में जारी रहने के लिए अधिक आतंकित की जाती है।

(8) पीडिताओं के प्रतिकर न्यायालय के द्वारा अपराधी की दोषसिद्धि पर तथा आपराधिक क्षति प्रतिकर बोर्ड के द्वारा, चाहे दोषसिद्धि हुई हो अथवा न हुई हो, प्रदान किया जाएगा। बोर्ड गर्भावस्था और बालक जन्म के कारण पीड़ा, कष्ट और आघात के साथ ही साथ उपार्जन की हानि पर विचार करेगा, यदि यह बलात्संग के परिणामस्वरूप उद्भूत हुआ हो।

बलात्संग का आरोप का सबूत

एक मामले में पीड़िता का परिसाक्ष्य स्पष्ट रूप से चित्रित करता है कि वह स्वेच्छा से अपीलार्थी के साथ शारीरिक सम्बन्ध में थी। कोई साक्ष्य नहीं है कि अपीलार्थी का पीड़िता से उसे कपट वंचित करने के आशय से शारीरिक सम्बन्ध था।

विवाह के अनुष्ठापन न करने का पश्चात्वर्ती आचरण, जिसका कारण अभिलेख पर नहीं है, कपटपूर्ण कार्य के मामले के रूप में नहीं कहा जा सकता। अभियोजन यह साबित करने में असफल था कि वह 16 वर्ष की आयु से कम थी, जैसा कि विधि के अधीन विहित है। इन परिस्थितियों में, वह सहमति देने के लिए सक्षम थी। इसलिए अभियोजन अपीलार्थी के विरुद्ध बलात्संग के आरोप को साबित करने में असफल रहा है।

अभियोग और दोष का विचारण

यह अभियुक्त के अभियोगों तथा दोष अथवा अन्यथा के विचारणों के व्यवहार की आश्चर्यजनक रीति है। कोई व्यक्ति दिए गये मामले में कैसे प्रतिक्रिया करता है, जहाँ तक उस मामले के सम्बन्ध है, निर्धारक कारक हो सकता है। उसे उस विशिष्ट मामले की तथ्यात्मक स्थिति पर ध्यान दिए बिना सभी के लिए सार्वभौमिक अनुप्रयोग के नियम के रूप में लागू नहीं किया जा सकता है। इसके बारे में कोई आनुभविक सूत्र नहीं हो सकता है कि कोई व्यक्ति दी गयी स्थिति में कैसे प्रतिक्रिया करता है तथा इसका प्रभाव और परिणाम क्या है। यह उस मामले के लिए सर्वाधिक उपयुक्त होगा।

एक निर्णीत मामले की शुद्ध तथ्यात्मक स्थिति को उसके प्रभाव तथा सुभिन्न लक्षण विधितः अननुज्ञेय होने के होते हुए भी असमानता किसी अथवा प्रत्येक अन्य मामले के लिए दिए गये नामले के विलक्षण तथ्यों में किए गये किसी अन्य मामले अथवा संप्रेक्षण पर लागू करना उचित है।

प्रत्येक मामला, अधिक विशिष्ट रूप में दाण्डिक मामला स्वयं अपने तथ्यों पर निर्भर करता है तथा एक मामले और अन्य मामले के बीच गहन समानता उपचार की तरह प्राधिकृत करने के लिए पर्याप्त नहीं है. क्योंकि महत्वपूर्ण विवरण सम्पूर्ण पक्ष को परिवर्तित कर सकता है। ऐसे मामलों को निर्णीत करने में किसी व्यक्ति को एक मामले के रूप को एक अन्य मामले के रूप में मिलाते हुए निर्णीत मामलों की प्रवृत्ति को उपेक्षित करना (जैसा कि कॉर्डोजो के द्वारा कहा गया था)। होना चाहिए। इसलिए यह निर्णीत करने के लिए कि मामला किस तरफ आता है।

अपील का मेरिट पर अविचारण

सत्र न्यायालय, जिसने भारतीय दण्ड संहिता की धारा 376 के अधीन अपराध के लिए मामले का विचारण किया था, उसका विचारण की अधिकारिता रखना जारी था और सुपुर्दगी का आदेश विधितः वैध था। उच्च न्यायालय के समक्ष दाखिल की गयी अपील को केवल गुणावगुण पर न कि विद्वान एकल न्यायाधीश के द्वारा त्रुटिपूर्ण ढंग से अपनाए गये आधार पर निस्तारित किया जा सकता था। उसने अपील को गुणावगुण पर विचार नहीं किया है। इसलिए आक्षेपित निर्णय को अपास्त किया और मामले को गुणावगुण पर निस्तारण के लिए उच्च न्यायालय के समक्ष प्रतिप्रेषित किया गया।

पंजाब राज्य बनाम गुरमीत सिंह के मामले में भारत के उच्चतम न्यायालय द्वारा कहा गया है कि अभियोक्त्री के साक्ष्य की इसके बारे में विचारण न्यायालय के द्वारा आलोचना कि वह महिला अध्यापकों अथवा अन्य बालिका विद्यार्थियों से उस समय शिकायत क्यों नहीं की थी जब वह केन्द्र पर परीक्षा के लिए उपस्थित हुई थी और वह घर आने तक इन्तजार की थी और अपनी माँ को घटना बतायी थी, अन्यायसंगत है इस सम्बन्ध में अभियोक्त्री का आचरण बहुत स्वाभाविक होना प्रतीत होता है विचारण न्यायालय ने इस बात की अनदेखी की थी कि भारत में परम्पराबद्ध अननुज्ञेय समाज में लड़की यह स्वीकार करने के लिए भी बहुत इच्छुक होगी कि कोई घटना, जो उसके सतीत्व को प्रभावित करने के लिए संभाव्य हो, समाज के द्वारा आलोचना के खतरे तथा समाज के द्वारा अवरुद्ध किए जाने के खतरे को देखते हुए बताए। ऐसी परिस्थितियों के अधीन परीक्षा केन्द्र पर उसे अध्यापकों अथवा अपने मित्रों को न बताना उसे उसकी विश्वसनीयता से विचलित नहीं कर सकता है।

मानवीय आचरण के सामान्य अनुक्रम में अविवाहित अवयस्क लड़की अपने उस आघातकारी अनुभव, जिसे उसने उपगत किया था, को प्रचारित करना नहीं चाहेगी और घटना के सम्बन्ध में शर्मिंदगी की भावना के द्वारा प्रभावित हो करके अपने अध्यापकों तथा अन्य व्यक्तियों से बताने का भयानक शर्मिन्दगी महसूस करेगी और उसकी स्वाभाविक प्रवृत्ति किसी व्यक्ति से इसके बारे में बातचीत करने को उपेक्षित करने की होगी, जिससे कि कहीं ऐसा न हो कि उसके परिवार का नाम तथा सम्मान विवादित हो सके।

इसलिए केवल अपने माता-पिता के घर वापस लौटने पर उसका अपनी माँ से बताना तथा उसके पहले परीक्षा केन्द्र में किसी व्यक्ति से न बताना महिला के स्वाभाविक मानवीय आचरण के अनुरूप है। न्यायालय को साक्ष्य का मूल्यांकन करते समय इस तथ्य से अवगत होना चाहिए कि बलात्संग के मामले में कोई स्वाभिमानी महिला न्यायालय में अपने सम्मान के विरुद्ध, जैसे उसके साथ बलात्संग कारित किए जाने में शामिल होने के लिए अपमानजनक कथन करने के लिए न्यायालय में आगे नहीं आएगी।

लैंगिक छेडछाड को अन्तर्ग्रस्त करने वाले मामलों में परिकल्पित विचारण, जिनका अभियोजन मामले की वास्तविकता पर अथवा अभियोक्त्री के कथन में कमियों पर भी कोई तात्विक प्रभाव प्राप्त न हो, तब तक अन्यथा विश्वसनीय अभियोजन मामले को नामंजूर करने के लिए अनुज्ञात नहीं किया जाना चाहिए, जब तक कमियां ऐसी न हो, जो घातक प्रकृति की हो। महिलाओं का अन्तर्निहित संकोच तथा लैंगिक आक्रमण की लज्जा को छिपाने की प्रवृत्ति ऐसे कारक हैं, जिनकी न्यायालयों को उपेक्षा नहीं करनी चाहिए।

श्री ललहुनपुइया बनाम मिजोरम राज्य, 2004 क्रि लॉ ज 3447 के मामले में अभिनिर्धारित किया गया है कि यह सत्य है कि यदि अभियुक्त दोषी होने का अभिवचन करता है, तब उसे इस आधार पर दोषसिद्ध किया जा सकता है और यह विचारण न्यायालय का विवेकाधिकार होगा। ऐसे विवेकाधिकार का मनमाने ढंग से प्रयोग नहीं किया जा सकता है और उसे विद्यमान परिस्थितियों के आधार पर होना है। अभिलेख यह प्रकट नहीं करता है कि अभियुक्त ने स्वेच्छापूर्वक अथवा कथन करते हुए दोषी होने का अभिवचन किया था और उसे अपना हस्ताक्षर करते हुए किसी पृष्ठांकन पर स्वीकार किया था।

संस्वीकृति अथवा दोष अभिलिखित करना दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 303 के अधीन कार्यवाही है। अभियुक्त को अपने अधिवक्ता से परामर्श करने का अधिकार प्राप्त है और इसलिए मजिस्ट्रेट को अभिकथित संस्वीकृतिकारी कथन और दोष के अभिवाकू को अभिलिखित करने के पहले अभियुक्त को ऐसा अधिकार प्रदान करना चाहिए था। अभियुक्त, जो आर्थिक रूप में गरीब और सामाजिक रूप में पिछड़ा होना प्रतीत होता है, को विचारण न्यायालय के द्वारा दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 304 के अधीन यथोपबन्धित निःशुल्क विधिक सहायता प्रदान की जानी चाहिए थी।

लैंगिक हिंसा अपमानजनक कृत्य होने के अलावा महिला की निजता और पवित्रता के अधिकार पर विधिविरुद्ध घुसपैठ है। यह उसके सर्वोच्च सम्मान पर गंभीर प्रहार है और उसके आत्मसम्मान तथा गरिमा को प्रभावित करता है; यह पीड़िता को अपमानित तथा मानमर्दित करता है और जहाँ पर पीडिता असहाय निर्दोष लड़की हो, वहां पर यह उसके पीछे आघातकारी अनुभव छोड़ता है। इसलिए न्यायालयों से महिलाओं के विरुद्ध लैंगिक अपराध के मामलों को बहुत सावधानी के साथ विचार करने की अपेक्षा की जाती है।

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