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लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 भाग 24: मजिस्ट्रेट द्वारा बालक के कथन अभिलेखन के संबंध में अतिरिक्त उपबंध

Shadab Salim
25 July 2022 11:30 AM GMT
लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 भाग 24: मजिस्ट्रेट द्वारा बालक के कथन अभिलेखन के संबंध में अतिरिक्त उपबंध
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लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (The Protection Of Children From Sexual Offences Act, 2012) की धारा 26 बालकों के मजिस्ट्रेट के समक्ष कथन अभिलेखन के समय अतिरिक्त सावधानी बरतने पर ज़ोर देते हैं। पॉक्सो मामले अत्यंत संवेदनशील है और ऐसे मामलों में एक पीड़ित बालक के अवचेतन पर गहरा प्रभाव पड़ता है, बालक को ऐसे प्रभावों के दुष्परिणाम से बचाने के उद्घाटन से ही अधिनियम में यह प्रावधान किए गए हैं।

यह अधिनियम में प्रस्तुत धारा का मूल रूप है

धारा 26

अभिलिखित किए जाने वाले कथन के संबंध में अतिरिक्त उपबंध (1) यथास्थिति, मजिस्ट्रेट या पुलिस अधिकारी, बालक के माता-पिता या ऐसे किसी अन्य व्यक्ति की, जिसमें बालक का भरोसा या विश्वास है उपस्थिति में बालक द्वारा बोले गए कथन के अनुसार अभिलिखित करेगा ।

(2) जहां आवश्यक है, वहां यथास्थिति, मजिस्ट्रेट या पुलिस अधिकारी, बालक का कथन अभिलिखित करते समय किसी अनुवादक या किसी दुभाषिए जो ऐसी अर्हताएं, अनुभव रखता हो और ऐसी फीस के संदाय पर जो विहित की जाए की सहायता ले सकेगा।

(3) यथास्थिति, मजिस्ट्रेट या पुलिस अधिकारी किसी बालक का कथन अभिलिखित करने के लिए मानसिक या शारीरिक निःशक्तता वाले बालक के मामले में किसी विशेष शिक्षक या बालक से संपर्क की रीति से सुपरिचित किसी व्यक्ति या उस क्षेत्र में किसी विशेषज्ञ, जो ऐसी अर्हताएं, अनुभव रखता हो और ऐसी फीस के संदाय पर जो विहित की जाए की सहायता ले सकेगा।

(4) जहां आवश्यक है, वहां यथास्थिति, मजिस्ट्रेट या पुलिस अधिकारी यह सुनिश्चित करेगा कि बालक का कथन श्रव्य-दृश्य इलेक्ट्रानिक माध्यमों से भी अभिलिखित किया जाए।

इस धारा से तीन पक्ष निकाल कर सामने आते है जो निम्न है-

1 बालक के कथन की वीडियो रिकार्डिंग ।

2 विषय पर राय बनाना

3 साक्ष्य के प्रकार।

1 बालक के कथन की वीडियो रिकार्डिंग

पॉक्सो अधिनियम की धारा 26(4) के अधीन बालक के कथन की वीडियो रिकार्डिंग आज्ञापक नहीं होती है, क्योंकि उक्त प्रावधान में शब्दों "जब कभी संभाव्य हो" का प्रयोग किया गया है। परन्तु यह निश्चित रूप में वांछनीय होगा कि जब कभी संभाव्य हो और वीडियो रिकार्डिंग के लिए प्रावधान उपलब्ध हो तो पॉक्सो अधिनियम के अधीन मामलों में पीड़ित बालक के कथन को आडियो-वीडियो इलेक्ट्रानिक माध्यमों से भी अभिलिखित किया जाना चाहिए। नवीन धनीराम बारैये बनाम महाराष्ट्र राज्य, 2018 क्रि लॉ ज 3393 (बम्बई) के मामले में भी यही कहा गया है कि अधिनियम में यह प्रावधान आवश्यकता के अनुसार है न कि आज्ञापक है। जहां आवश्यकता होती है वहां इस प्रावधान की सहायता ली जा सकती है।

2 विषय पर राय बनाना

कोई व्यक्ति, जो विशिष्ट क्षेत्र में जानकारी रखने योग्य हो, वह जानकारी या तो शिक्षा या वैयक्तिक अनुभव से प्राप्त की गयी हो। कोई व्यक्ति, जो शिक्षा के कारण अथवा विशेष अनुभव के द्वारा उस विषय वस्तु से सम्बन्धित ज्ञान प्राप्त किया हो, जिसके बारे में विशेष प्रशिक्षण न रखने वाले व्यक्ति शुद्ध राय बनाने अथवा शुद्ध निगमन करने के लिए निर्योग्य होते हैं। कोई व्यक्ति, जो जीवन तथा व्यवसाय की आदतो के द्वारा विवादित विषय पर राय बनाने में विलक्षण कौशल प्राप्त किया हो।

हिमाचल प्रदेश राज्य बनाम जयलाल, ए आई आर 1999 एस सी 3318 कोई व्यक्ति, जो विशेषज्ञ के रूप में साक्षी कक्ष में साक्ष्य दिया हो, को उस विषय पर विशेष अध्ययन करने अथवा विशेष अनुभव अर्जित करने के रूप में दर्शाया जाना चाहिए।

कोई व्यक्ति, जो शिक्षा अथवा अनुभव के माध्यम से किसी विशेष विषय पर कौशल अथवा ज्ञान प्राप्त किया हो, जिससे कि वह ऐसी राय बना सके, जो तथ्य प्राप्त करने वाले व्यक्ति के लिए सहायक होगी।

3 साक्ष्य के प्रकार

उन निष्कर्षो, जिन पर वह अपने ज्ञान, अपने द्वारा परीक्षणों, मापों अथवा समान साधनों के द्वारा रिपोर्ट दिए गये अथवा खोजे गये तथ्यों के आधार पर पहुंचा हो, के किसी व्यवसायी अथवा तकनीकी क्षेत्र में प्रबुद्ध तथा अनुभवी व्यक्ति के द्वारा न्यायालय में साक्ष्य दिया गया था। साक्ष्य का यह प्रकार सामान्यतः डॉक्टरों, मनोचिकित्सकों, रसायनज्ञों, वास्तुविदों, अंगुलिचिन्ह विशेषज्ञों और इसी तरह के व्यक्तियों के द्वारा प्रदान किया जाता है।

संस्वीकृति अभिलिखित करने के लिए केवल न्यायिक अथवा महानगर मजिस्ट्रेट सक्षम

दण्ड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 164 का सामान्य वाचन यह दर्शाता है कि केवल महानगर मजिस्ट्रेट अथवा न्यायिक मजिस्ट्रेट को उस प्रावधान के अधीन संस्वीकृति अभिलिखित करने को सशक्त किया गया है। कार्यपालक मजिस्ट्रेट को उसके लिए सशक्त नहीं किया गया है।

संहिता की धारा 164 के प्रावधान पूर्ण रूप में इसके लिए संदेह की कोई गुन्जाइश नहीं छोड़ते हैं कि मामले के अन्वेषण के दौरान अभियुक्त की संस्वीकृति को अभिलिखित करना न्यायिक मजिस्ट्रेट अथवा महानगर मजिस्ट्रेट पर न कि किसी कार्यापालक मजिस्ट्रेट पर अनन्य रूप में छोड़ा गया है।

संहिता की धारा 164 के अधीन कथन को केवल न्यायिक मजिस्ट्रेट के द्वारा ही अभिलिखित किया जा सकता है। इसे कार्यपालक मजिस्ट्रेट के द्वारा अभिलिखित नहीं किया जा सकता है।

जब संस्वीकृति महानगर मजिस्ट्रेट के द्वारा अभिलिखित की गयी हो, तब वह न्यायालय की भाषा में अभियुक्त की परीक्षा के सार का ज्ञाप बनाएगा और ऐसे ज्ञाप को मजिस्ट्रेट के द्वारा हस्ताक्षरित किया जाएगा। जब संस्वीकृति को न्यायिक मजिस्ट्रेट के द्वारा अभिलिखित किया गया हो तब उसे प्रश्न और उत्तर के रूप में अभिलिखित किया जाएगा और स्वयं मजिस्ट्रेट के द्वारा अभिलिखित किया जाएगा। संस्वीकृति को उस भाषा में अभिलिखित किया जाएगा, जिसमें अभियुक्त की परीक्षा की गयी हो। यदि इसे उचित रूप में अभिलिखित न किया गया हो, तब यह अपना महत्व खो देता है।

धारा 164 के अधीन महानगर मजिस्ट्रेट अथवा न्यायिक मजिस्ट्रेट, चाहे वह प्रथम वर्ग अथवा द्वितीय वर्ग का हो, कार्य कर सकता है। पुराने अधिनियम में द्वितीय वर्ग मजिस्ट्रेट, जब तक उसे विनिर्दिष्ट रूप में सशक्त न किया गया हो, वह धारा 164 के अधीन कथन अभिलिखित नहीं कर सकता था, परन्तु अब न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम वर्ग अथवा द्वितीय वर्ग धारा 164 के अधीन कथन अभिलिखित कर सकता है। यह केवल कार्यपालक मजिस्ट्रेट है, जिसे धारा 164 के अधीन कथन अथवा संस्वीकृति अभिलिखित करने के लिए सशक्त नहीं किया गया है।

संस्वीकृति अभिलिखित करने के समय पुलिस की उपस्थिति

हरि किशन बनाम हरियाणा राज्य 1990 क्रि लॉ ज 385 के मामले में जहाँ पर संस्वीकृति अभिलिखित करने के समय न्यायालय कक्ष के बाहर पुलिस अधिकारियों की उपस्थिति पायी गयी थी, वहां पर यह अभिनिर्धारित किया गया था कि पुलिस की उपस्थिति संस्वीकृतिकारी कथन को अस्वैच्छिक और अवास्तविक बना सकती है।

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