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लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 भाग 23: मजिस्ट्रेट द्वारा बालक के कथन का अभिलेखन

Shadab Salim
25 July 2022 4:36 AM GMT
लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 भाग 23: मजिस्ट्रेट द्वारा बालक के कथन का अभिलेखन
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लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (The Protection Of Children From Sexual Offences Act, 2012) की धारा 25 मजिस्ट्रेट द्वारा बालक के कथन के अभिलेखन से संबंधित है। यह दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 से संबंधित है जहां पीड़िता के कथन मजिस्ट्रेट द्वारा अभिलिखित किये जाने का उल्लेख मिलता है। इस धारा में कथन के अभिलेखन के अधिकार के साथ उसकी रीति भी बतलाई गई है।

यह अधिनियम में प्रस्तुत धारा का मूल रूप है

धारा 25 मजिस्ट्रेट द्वारा बालक के कथन का अभिलेखन–

(1) यदि बालक का कथन, दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) (जिसे इसमें इसके पश्चात् संहिता कहा गया है) की धारा 164 के अधीन अभिलिखित किया गया है तो ऐसे कथन का अभिलेखन मजिस्ट्रेट, उसमें अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी बालक द्वारा बोले गए अनुसार कथन अभिलिखित करेगा:

परंतु संहिता की धारा 164 की उपधारा (1) के प्रथम परंतुक में अंतर्विष्ट उपबंध, जहाँ तक वह अभियुक्त के अधिवक्ता की उपस्थिति अनुज्ञात करता है, इस मामले में लागू नहीं होगा ।

(2) मजिस्ट्रेट, बालक और उसके अभिभावकों या प्रतिनिधि को संहिता की धारा 207 के अधीन विनिर्दिष्ट दस्तावेज की एक प्रति, उस संहिता की धारा 173 के अधीन पुलिस द्वारा अंतिम रिपोर्ट फाइल किए जाने पर, प्रदान करेगा ।

अभियुक्त को पुलिस रिपोर्ट या अन्य दस्तावेजों की प्रतिलिपि देना-

किसी ऐसे मामले में जहाँ कार्यवाही पुलिस रिपोर्ट के आधार पर संस्थित की गई है, मजिस्ट्रेट निम्नलिखित में से प्रत्येक की एक प्रतिलिपि अभियुक्त को अविलंब निःशुल्क देगा :

(i) पुलिस रिपोर्ट;

(ii) धारा 154 के अधीन लेखबद्ध की गई प्रथम इत्तिला रिपोर्ट;

(iii) धारा 161 की उपधारा (3) के अधीन अभिलिखित उन सभी व्यक्तियों के कथन, जिनकी अपने साक्षियों के रूप में परीक्षा करने का अभियोजन का विचार है, उनमें से किसी ऐसे भाग को छोड़कर जिनको ऐसे छोड़ने के लिए निवेदन धारा 173 की उपधारा (6) के अधीन पुलिस अधिकारी द्वारा किया गया है;

(iv) धारा 164 के अधीन लेखबद्ध की गई संस्वीकृतियों या कथन, यदि कोई हो,

(v) कोई अन्य दस्तावेज या उसका सुसंगत उद्धरण, जो धारा 173 की उपधारा (5) के अधीन पुलिस रिपोर्ट के साथ मजिस्ट्रेट को भेजी गई है

परंतु मजिस्ट्रेट खण्ड (iii) में निर्दिष्ट कथन के किसी ऐसे भाग का परिशीलन करने और ऐसे निवेदन के लिए पुलिस अधिकारी द्वारा दिए गए कारणों पर विचार करने के पश्चात् यह निदेश दे सकता है कि कथन के उस भाग की या उसके ऐसे प्रभाग की, जैसा मजिस्ट्रेट ठीक समझे, एक प्रतिलिपि अभियुक्त को दी जाए

परंतु यह और कि यदि मजिस्ट्रेट का समाधान हो जाता है कि खंड (v) में निर्दिष्ट कोई दस्तावेज विशालकाय है तो यह अभियुक्त को उसकी प्रतिलिपि देने के बजाय यह निदेश देगा कि उसे स्वयं या प्लीडर द्वारा न्यायालय में उसका निरीक्षण ही करने दिया जाएगा।

प्रपत्र अभियुक्त को प्रदान किए जाएंगे-

जब मामला पुलिस रिपोर्ट पर संस्थित किया गया हो, तब निम्नलिखित प्रपत्रों की प्रतिलिपियां अभियुक्त को निःशुल्क अविलम्ब प्रदान की जाएंगी।

पुलिस रिपोर्ट की प्रतिलिपि (आरोप-पत्र):

धारा 154 के अधीन अभिलिखित की गयी प्रथम सूचना रिपोर्ट की प्रतिलिपि

सभी व्यक्तियों, जिन्हें अभियोजन अपने साक्षियों के रूप में परीक्षित करने का प्रस्ताव करता है, के धारा 161 की उपधारा (3) के अधीन अभिलिखित किए गये कथनों की प्रतिलिपियां साक्षियों के कथन के उस भाग की प्रतिलिपि अभियुक्त को प्रदान नहीं की जाएगी, जिसके बारे मे अन्वेषण अधिकारी ने धारा 173 (6) के अधीन निवेदन किया हो:

धारा 164 के अधीन अभिलिखित की गयी संस्वीकृति और कथनों, यदि कोई हो, की प्रतिलिपि;

धारा 173 की उपधारा (5) के अधीन पुलिस रिपोर्ट के साथ मजिस्ट्रेट के समक्ष भेजे गये अन्य दस्तावेजों अथवा उसके सुसंगत उद्धरणों की प्रतिलिपियां । अभियुक्त को उपरोलिखित दस्तावेजों की प्रतिलिपियां निशुल्क अविलम्ब प्रदान करना मजिस्ट्रेट का कर्तव्य है।

विचारण प्रारम्भ होने के पहले प्रतिलिपियां प्रदान करने का सत्र न्यायाधीश का कर्तव्य

अभियुक्त को कथनों और दस्तावेजों की प्रतिलिपियां प्रदान करने का प्रयोजन उसे उस मामले से अवगत कराना है, जिसका उसे सामना करना है और यह देखना न्यायालय का कर्तव्य है कि प्रतिलिपियां अभियुक्त को विचारण प्रारम्भ होने के पहले प्रदान की गयी हैं। यदि प्रतिलिपियां पहले प्रदान न की गयी हों और अभियुक्त सत्र न्यायाधीश के समक्ष कथनों और दस्तावेजों की प्रतिलिपियां चाहता है, तब अभियुक्त को उसका विचारण प्रारम्भ होने के पहले ऐसी प्रतिलिपियां प्रदान करना सत्र न्यायाधीश का कर्तव्य होता है।

मजिस्ट्रेट धारा 169 के अधीन संज्ञान लेने के लिए सशक्त

धारा 157, 167, 170 और 173 के एक साथ वाचन से यह प्रकट है कि विधायिका यह अनुचिन्तन करती है कि गिरफ्तार किए गये व्यक्ति के मामले में अन्वेषण धारा 57 के अधीन 24 घण्टे के भीतर पूरा किया जाना चाहिए और यदि यह संभाव्य न हो, तब धारा 167 के अधीन पन्द्रह दिन के भीतर और नवीनतम साठ दिन के भीतर पूरा किया जाना चाहिए। यदि ऐसे मामले में पुलिस थाना के भारसाधक अधिकारी की यह राय हो कि अभियुक्त को मजिस्ट्रेट के समक्ष भेजने को न्यायसंगत ठहराने के लिए पर्याप्त साक्ष्य अथवा युक्तियुक्त आधार अथवा संदेह नहीं है, तब वह यदि वह व्यक्ति अभिरक्षा में हो, तब उसे धारा 169 के अधीन संज्ञान लेने के लिए सशक्त मजिस्ट्रेट के समक्ष जैसे और जब आवश्यक हो, उपस्थित होने के लिए बाध्य बनाते हुए प्रतिभु सहित अथवा रहित उसके बन्ध-पत्र निष्पादित करने पर उसे निर्मुक्त कर देगा।

दूसरी तरफ, यदि पुलिस थाना के भारसाधक अधिकारी को यह प्रतीत होता है कि अभियुक्त को मजिस्ट्रेट के समक्ष भेजने को न्यायसंगत ठहराने के लिए पर्याप्त साक्ष्य अथवा युक्तियुक्त आधार है, तब वह अभियुक्त को पुलिस रिपोर्ट पर संज्ञान लेने के लिए सशक्त मजिस्ट्रेट की अभिरक्षा के अन्तर्गत भेजेगा और यदि अपराध जमानतीय हो, तब अभियुक्त को जमानत पर निर्मुक्त कर सकेगा।

इन धाराओं में से कोई पुलिस अधिकारी के द्वारा भेजी जाने वाली किसी रिपोर्ट का कोई उल्लेख नहीं करती है। यह हो सकता है कि अभियुक्त को धारा 170 के अधीन भेजने के समय पुलिस थाना का भारसाधक अधिकारी किसी प्रकार की रिपोर्ट भेज सकता है। धारा 169 के अधीन कार्य करते हुए पुलिस अधिकारी के लिए मजिस्ट्रेट के पास कुछ प्रकार का लेखन भेजना भी संभाव्य हो सकता है। परन्तु अब वर्तमान अधिनियम के अधीन ऐसी रिपोर्ट धारा 2 (द) में यथापरिभाषित पुलिस रिपोर्ट नहीं होती है। परिभाषा के अनुसार पुलिस रिपोर्ट का तात्पर्य धारा 173 की उपधारा (2) के अधीन पुलिस अधिकारी के द्वारा मजिस्ट्रेट के पास भेजी गयो रिपोर्ट है।

इसके परिणामस्वरूप यदि धारा 170 के अधीन अभियुक्त को भेजते समय अथवा धारा 169 के अधीन किसी प्रपत्र को भेजते समय यदि मजिस्ट्रेट के पास किसी प्रकार की कोई रिपोर्ट अथवा लेखन भेजा जाता है, तब न्यायालय कोई संज्ञान नहीं ले सकता है-

(1) गिरफ्तारी के ठीक पश्चात् उसे पुलिस अथवा न्यायालय के द्वारा निर्मुक्त किया जा सकता है. अथवा (2) उसे न्यायालय के द्वारा न्यायालय के समक्ष आत्मसमर्पण करने के पश्चात् जमानत पर निर्मुक्त किया जा सकता है।

ऐसे मामलों में, धारा 169 और 170 के प्रावधान लागू नहीं होते हैं। मजिस्ट्रेट के समक्ष उपस्थित होने के लिए कोई बन्ध-पत्र धारा 169 के अधीन नहीं लिया जा सकता है, यदि आदेशित किया गया हो। धारा 170 के अधीन केवल अभियुक्त को मजिस्ट्रेट के समक्ष भेजा जाना है। दोनों प्रकार के मामलों में, चाहे वह धारा 169 अथवा 170 के अधीन आता हो अथवा ऐसे मामलों में, जहाँ पर अभियुक्त पुलिस अभिरक्षा में न हो, अन्वेषण पूरा किया जाना है। अन्वेषण पूरा करने के ठीक पश्चात् धारा 173 के प्रावधानों का अनुपालन करते हुए पुलिस रिपोर्ट मामले में अधिकारिता रखने वाले न्यायालय के समक्ष भेजी जानी है। पुलिस रिपोर्ट, जिस पर संज्ञान लिया जा सकता है, के रूप में "आरोप-पत्र को धारा 172 के अधीन भेजा जाना है। इस रिपोर्ट से भिन्न किसी रिपोर्ट को पद के वास्तविक अर्थ में आरोप-पत्र नहीं कहा जा सकता है।

न्यायालय के द्वारा न्यायिक विवेकाधिकार का प्रयोग

रूपन देओल बजाज बनाम के पी एस गिल, ए आई र 1996 एस सी 309 चूंकि संज्ञान लेते समय न्यायालय का अपने न्यायिक विवेकाधिकार का प्रयोग करना है, इसलिए इससे आवश्यक रूप में यह समझा जाता है कि यदि वर्तमान मामले की तरह दिए गये मामले में परिवादी व्यथित व्यक्ति के रूप में उस पुलिस रिपोर्ट, जो अभियुक्त के उन्मोचित होने की सिफारिश करती है, की स्वीकृति पर आपत्ति उठाता है और न्यायालय का यह समाधान करने की ईप्सा करता है कि संज्ञान लेने के लिए मामला बनता था, परन्तु न्यायालय ऐसी आपत्तियों को नामंजूर कर देता है, तब इसलिए यह न्यायसंगत और वांछनीय है कि उसके लिए कारणों को अभिलिखित किया जाए। उन कारणों को, जो न्यायालय के समक्ष विवाद का उचित मूल्यांकन प्रकट करता है, को देने की आवश्यकता पर बल देना आवश्यक नहीं है।

कारण स्पष्टता को शामिल करता है तथा मनमानेपन की संभावना को कम करता है। उसका आवश्यक रूप में तात्पर्य यह है कि कारणों को अभिलिखित करना तब आवश्यक नहीं होगा, जब न्यायालय ऐसी पुलिस रिपोर्ट को परिवादी से किसी आपत्ति के बिना स्वीकार करता है। चूंकि वर्तमान मामले में मजिस्ट्रेट के आदेश में ऐसा कोई कारण, चाहे जो कुछ भी हो, अन्तर्विष्ट नहीं है, यद्यपि उसे परिवादी का आपत्तियों को सुनने के पश्चात् पारित किया गया था, तब उसे अपास्त किया जाना है।

धारा 164 के प्रावधानों के अनुरूप अभिलिखित किया गया कथन–

यदि धारा 164 के अधीन संस्वीकृति अभिलिखित करने वाले मजिस्ट्रेट को ऐसा करने के लिए कोई शक्ति प्राप्त न हो, तब इस प्रकार अभिलिखित किया गया कथन साक्ष्य में अग्राह्य होगा और मजिस्ट्रेट की उस कथन को साबित करने के लिए परीक्षा नहीं की जा सकती है। इसी प्रकार जब संस्वीकृति अथवा कथन धारा 164 के प्रावधानों के अनुरूप अभिलिखित न किया गया हो, तब मजिस्ट्रेट की उसके समक्ष संस्वीकृति अथवा कथन को साबित करने के लिए परीक्षा नहीं की जा सकती है। इसे इस सिद्धांत पर अभिनिर्धारित किया गया है कि जब किसी कृत्य को कतिपय रीति में करने की शक्ति प्रदान की गयी हो, तब उसे उसी रीति में किया जाना चाहिए अथवा बिल्कुल नहीं किया जाना चाहिए।

ऐसे मामलों में, जहाँ पर कथन धारा 164 के प्रावधानों के अनुरूप अभिलिखित किया गया हो, परन्तु अभिलेख उसका उल्लेख नहीं करता है, धारा 463 के प्रावधान लागू होते हैं।

कथन का किसी अन्य प्रयोजन के लिए प्रयोग नहीं धारा 164 के अधीन अभिलिखित किए गये साक्षी के कथन का प्रयोग साक्ष्य के सारवान भाग के रूप में नहीं किया जा सकता है। ऐसे कथन का प्रयोग केवल भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 157 के अधीन साक्षी को संपुष्ट करने के लिए अथवा धारा 145 के अधीन उसका खण्डन करने के लिए किया जा सकता है, यदि वह न्यायालय के समक्ष उपस्थित होता है। कथन का प्रयोग किसी अन्य प्रयोजन के लिए नहीं किया जा सकता है।

धारा 164 के अधीन अभिलिखित किया गया साक्षी का कथन

जब साक्षी के कथन को धारा 164 के अधीन अभिलिखित किया गया हो, तब वह शपथ पर अपने पूर्ववर्ती कथन से आबद्ध होना महसूस करता है। सच्चाई प्रकट करने की स्वतंत्रता केवल सैद्धांतिक होती है। शपथ भंग के लिए अभियोजित किए जाने का जोखिम सदैव उसके समक्ष स्थित होता है। इसलिए सावधानी के विलक्षण नियम को सदैव ध्यान में रखा जाना चाहिए और न्यायालय को सतर्क रूप में ऐसे साक्ष्य का सनिरीक्षण करना है और यह देखना है कि क्या अन्य परिस्थितिया उसका समर्थन करती है।

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