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विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम (Specific Relief Act) भाग 3: विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम के अंतर्गत संविदाओं का पालन क्या होता है (Performance of Contracts)

Shadab Salim
30 Nov 2020 5:51 AM GMT
विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम (Specific Relief Act) भाग 3: विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम के अंतर्गत संविदाओं का पालन क्या होता है (Performance of Contracts)
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पिछले आलेखों में विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम 1963 के संदर्भ में मूल बातें तथा कब्जे को पुनः प्राप्त करने हेतु प्रावधानों पर चर्चा की गई है। विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम से संबंधित इस आलेख भाग 3 के अंतर्गत संविदाओं के विशेष पालन के संबंध में उल्लेख किया जा रहा है।

संविदाओं का विनिर्दिष्ट पालन (Performance of Contracts)

भारतीय संविदा अधिनियम 1872 के अंतर्गत संविदा से संबंधित प्रावधानों का उपबंध किया गया है। भारतीय संविदा अधिनियम के अंतर्गत ही इस अधिनियम से जुड़े हुए उपचारों का भी उल्लेख किया गया है परंतु कभी-कभी परिस्थितियां ऐसी जन्म ले लेती हैं जिनमें संविदाओं का पालन ही आवश्यक होता है। संविदा अधिनियम केवल प्रतिकर की व्यवस्था करता है, उस अधिनियम में संविदा के पालन के लिए कोई विशेष व्यवस्था नहीं है, इस हेतु विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम 1963 की सहायता लेना होती है।

विनिर्दिष्ट पालन की डिक्री दो प्रकार की होती है। पहले प्रकार की डिक्री विनिर्दिष्ट पालन के उन मामलों में पारित की जाती है जहां संविदा की विषय वस्तु ऐसी होती है कि संविदा भंग होने पर प्रतिकर न तो यथेष्ट होता है तथा न ही उचित युक्तियुक्त होता है। दूसरे प्रकार की डिक्री उन मामलों में पारित की जाती है जहां संविदा की विशेष एवं व्यवहारिक विशेषताओं के कारण प्रतिकार का अभिनिश्चय करना कठिन हो जाता है।

सरल शब्दों में यूं समझा जा सकता है कि यदि किसी संविदा में कोई भंग होता है तो ऐसे संविदा के भंग होने के परिणाम स्वरूप प्रतिकर यथेष्ट अनुतोष नहीं होता है तथा प्रतिकर कोई युक्तियुक्त नहीं माना जा सकता।

इस परिस्थिति में विनिर्दिष्ट पालन ही एकमात्र न्याय होता है, विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम संविदा का पालन करवा कर इस प्रकार का ही न्याय करता है।

विनिर्दिष्ट पालन के कुछ मूल और महत्वपूर्ण सिद्धांत है जिन्हें न केवल स्वीकार किया गया वरण सामान्यता न्यायालय ने लागू करते हैं। सर्वप्रथम महत्वपूर्ण सिद्धांत यह है कि विनिर्दिष्ट पालन की डिक्री पारित करना न्यायालय के विवेक पर निर्भर करता है। दूसरा मौलिक सिद्धांत यह है कि विनिर्दिष्ट पालन का अनुतोष उन मामलों में लागू किया जाता है जहां प्रतिकर एक यथायोग्य नहीं अनुतोष है। तीसरा भली-भांति स्थापित सिद्धांत यह है कि न्यायालय उन मामलों में भी विनिर्दिष्ट अनुतोष प्रदान नहीं करते हैं जिनमें न्यायालय द्वारा पर्यवेक्षण निगरानी आवश्यक होती है तथा न्यायालय से सुविधाजनक रूप से नहीं कर सकते हैं।

यह सिद्धांत इस बात पर आधारित है कि न्यायालय कोई ऐसा आदेश है डिक्री पारित नहीं करते हैं जिसे वह प्रवर्तन न करा सकें। 1963 के अधिनियम के पूर्व यह भी एक सिद्धांत था कि विनिर्दिष्ट पालन का अनुतोष उन मामलों में प्रदान नहीं किया जाता था जहां संविदाओं में पारस्परिकता नहीं होती थी। विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम 1963 के द्वारा इस सिद्धांत को समाप्त कर दिया गया।

संविदाओं के विनिर्दिष्ट पालन के संबंध में उपबंध विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम 1963 के भाग 2 के अध्याय 2 में दिए गए हैं। इस अध्याय की पहली धारा अर्थात धारा 9 संविदा पर आधारित अनुतोष के वादों में प्रतिरक्षाओं से संबंधित है। धारा 9 में स्पष्ट किया गया है कि जहां किसी संविदा के बारे में किसी अनुतोष प्राप्त करने हेतु दावा इस अध्याय के अधीन किया जाए तो सिवाय इसके कि कोई अन्यथा उपबंध हो वहां वह व्यक्ति जिसके विरुद्ध उक्त अनुतोष का दावा किया जाए तो वह किसी भी ऐसे आधार का अभिवचन प्रतिरक्षा के तौर पर कर सकता है जो उसे संविदा से संबंधित किसी भी विधि के अधीन उपलब्ध हो।

संविदा के विरुद्ध पालन की दृष्टि से विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम 1963 में 2 भाग उपलब्ध किया गया है जिनका विनिर्दिष्ट प्रवर्तन कराया जा सकता है तथा वह संविदा जिनका विनिर्दिष्ट प्रवर्तन नहीं कराया जा सकता अर्थात ऐसी संविदा जिन्हें न्यायालय में जाकर इंफोर्स कराया जा सकता है और ऐसी संविदा जिन्हें न्यायालय में इन्फॉर्म नहीं कराया जा सकता।

ऐसी संविदाएं जिनका प्रवर्तन कराया जा सकता है-

विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम 1963 की धारा 10 के अनुसार अध्याय 2 में अन्यथा बंधित के सिवाय किसी भी संविदा का पालन न्यायालय के विवेक अनुसार निम्नलिखित मामलों में प्रवर्तन कराया जा सकता है-

जबकि उस कार्य का जिसे करने का करार हुआ है अपालन द्वारा कार्य नुकसान का विनिश्चय करने का कोई मानक विद्यमान न हो।

जबकि वह कार्य जिसके करने का करार हुआ हो कि अपालन के लिए धन के रूप में प्रतिकर योग्य अनुतोष न हो।

स्पष्टीकरण- जब तक की और जहां तक की तब प्रतिकूल सिद्ध न किया जाए न्यायालय यह आधारित करेगा कि-

स्थावर संपत्ति के अंतरण की संविदा के भंग का धन के रूप में प्रतिकर द्वारा यथायोग्य अनुतोष नहीं दिया जा सकता।

जंगम संपत्ति के अंतरण की संविदा भंग इस प्रकार अनुतोष दिया जा सकता है सिवाय निम्नलिखित दशाओं के-

जहां की संपत्ति मामूली वाणिज्य वस्तु न हो अथवा वादी के लिए उसका विशेष मूल लिए या हित हो अथवा ऐसा माल हो जो बाजार में सुगमता से अभि प्राप्त न हो।

जहां की संपत्ति प्रतिवादी द्वारा वादी के अभिकर्ता या न्यासी के रूप में धारित हो।

1877 के अधिनियम में कुछ दृष्टांत प्रस्तुत किए गए थे जिससे इसे सरलता से समझा जा सकता है। लेखक द्वारा वह दृष्टांत यहां प्रस्तुत किए जा रहे हैं-

क एक मृतक चित्रकार के चित्र तथा दो दुष्पराय चीनी बर्तनों के क्रय करने का करार करता है तथा ख उन्हें क को बेचने का करार करता है। इस संविदा में कोई ऐसा मानक नहीं है जिससे अपालन से होने वाले नुकसान को अभिनिश्चित किया जा सके अतः क ख को संविदा पालन के लिए विवश कर सकता है।

क ख के हाथ एक घोड़ा ₹1000 में बेचने की संविदा करता है ख सिविल न्यायालय की विनिर्दिष्ट पालन की डिक्री प्राप्त करने का अधिकारी है जिसके द्वारा क को निर्देश दिया जाए कि वह घोड़ा ख को ₹1000 में दे।

विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम की धारा 10 के अनुसार दो दशाओं में संविदा का विनिर्दिष्ट पालन प्रवर्तनीय हैं।

पहली दशा वह है जहां की जिस कार्य को करने का करार हुआ है यदि उसका पालन नहीं होता है तो इससे होने वाली वास्तविक हानि को अभिनिश्चित करने का कोई मानाक विद्यमान नहीं है।

उदाहरण के लिए उपर्युक्त दृष्टांत में चित्रकार की मृत्यु हो चुकी है अब वैसा ही चित्र दोबारा नहीं बन सकता तथा चीनी के बर्तन दुष्पराय हैं अतः वास्तविक नुकसान को अभिनिश्चित करने के लिए कोई मानक नहीं है। दूसरी दशा वह है जबकि कार्य जिसको करने का करार हुआ है उसका पालन न होने पर यदि धन के रूप में प्रतिकर दिया जाए तो उसे वादी को यथायोग्य अनुतोष नहीं मिलेगा।

धारा 10 में दिए गए स्पष्टीकरण के अनुसार स्थावर संपत्ति के मामले में जब तक कि इसके विपरीत सिद्ध न कर दिया जाए न्यायालय उद्धृत करेगा कि धन के रूप में प्रतिकर यथायोग्य अनुतोष नहीं होगा। जंगम संपत्ति के संबंध में इस प्रकार की अवधारणा साधारण उत्पन्न नहीं होती है परंतु इसके दो अपवाद हैं जिनके विषय में न्यायालय इसी प्रकार की उपधारणा करेगा।

पहले अपवाद में वह मामले आते हैं जहां संपत्ति साधारण वाणिज्यिक वस्तु नहीं है या इस वादी के लिए विशेष मूल्य या हित की है या वस्तु ऐसी है जो सरलता से बाजार में उपलब्ध नहीं है।

उपर्युक्त नियम उच्चतम न्यायालय ने एक्जीक्यूटिव कमिटी वेस्ट डिग्री कॉलेज शामली बनाम लक्ष्मी नारायण के प्रकरण में धारित किए हैं।

प्रस्तुत वाद में कार्यकारी समिति को ऑपरेटिव सोसायटी अधिनियम 1912 के अंतर्गत रजिस्टर्ड थी तथा विश्वविद्यालय से संबंध थी। बिना विश्वविद्यालय का अनुमोदन प्राप्त किए कार्यकारी समिति ने कालेज के प्रधानाचार्य को सेवा से निष्कासित कर दिया।

प्रधानाचार्य ने इस आदेश के विरोध में वाद किया परीक्षण न्यायालय ने वाद खारिज करते हुए निर्णय दिया कि कार्यकारी समिति एक विधिक निकाय नहीं है अतः वह विश्वविद्यालय के अधिनियम नियम तथा उप नियमों से बाध्य नहीं है, इसके अतिरिक्त वादी यह सिद्ध करने में असफल रहा कि उसने प्रतिवादी अथवा कॉलेज के साथ कोई संविदा निष्पादित की थी।

इस आदेश के विरुद्ध अपील करने पर प्रथम अतिरिक्त सिविल सेशन न्यायाधीश ने परीक्षण न्यायालय के निर्णय को उलट दिया तथा वादी के पक्ष में वह आदेश जारी कर दिया।

प्रतिवादी जो अब अपीलार्थी है इस आदेश के विरुद्ध उच्च न्यायालय में अपील की उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ ने वादी के पक्ष में निर्णय देते हुए धारित किया कि कार्यकारी समिति एक विधिक निकाय है अतः यह विश्वविद्यालय के अधिनियम तथा नियमों से बाध्य है अतः वादी अनुतोष प्राप्त करने का अधिकारी है।

जब उच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध प्रतिवादी वर्तमान अपीलार्थी ने उच्चतम न्यायालय में अपील की उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय के निर्णय को उलट दिया। उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि उच्च न्यायालय का निर्णय त्रुटिपूर्ण है। उच्चतम न्यायालय ने धारित किया की अपीलार्थी अथवा कार्यकारी समिति एक विधिक निकाय नहीं है।

उच्चतम न्यायालय ने कहा कि प्रस्तुत वाद उपर्युक्त तीनों अपवादों में नहीं आता है। उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्णय में यह भी कहा कि विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम 1963 के अंतर्गत अनुतोष दिया जाना न्यायालय के विवेक पर निर्भर करता है अनुतोष की मांग अधिकार के रूप में नहीं की जा सकती है।

न्यायालय अनुतोष ठोस विधिक सिद्धांतों के आधार पर प्रदान करता है, न्यायालय का कार्य न्याय प्रदान करना है तथा वह ऐसा करते समय अन्याय अत्याचार का शास्त्र नहीं बन सकता। अपना विवेक प्रयोग करते समय न्यायालय को न्याय के सिद्धांतों को ध्यान में रखना चाहिए तथा अपने विवेक का प्रयोग करना चाहिए जब ऐसा करना न्याय के लिए आवश्यक हो।

करतार सिंह बनाम हरजिंदर सिंह एआईआर 1990 एससी 854 के प्रकरण में कोई संपत्ति संयुक्त रूप से प्रत्यार्थी तथा उसकी बहन के नाम थी तथा वह अपने एक बहन की ओर से ₹20000 में विक्रय करने की संविदा की। उसने प्रत्यार्थी से यह भी करार किया था कि वह विक्रय विलेख का रजिस्ट्रीकरण कराएगा परंतु उसकी बहन ने संपत्ति में अपने हिस्से को बेचने से इंकार कर दिया।

वादी द्वारा वाद करने पर न्यायालय ने विनिर्दिष्ट पालन की डिक्री जारी की परंतु उच्च न्यायालय धारा 12 के उपबंधों को ध्यान में रखते हुए उपर्युक्त निर्णय को उलट दिया।

अपील में उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय के निर्णय को उलट कर निचले न्यायालय के निर्णय को बहाल करते हुए कहा कि यह धारा 12 के अंतर्गत नहीं आता है। इस प्रकरण में संविदा के एक भाग के पालन का नहीं था और संविदा पूर्ण संपत्ति के विक्रय के लिए की थी।

अपीलार्थी तथा प्रत्यार्थी की बहन के मध्य कोई संविदा नहीं थी केवल वैध संविदा अपीलार्थी के अपने हिस्से हेतु प्रत्यार्थी के साथ हुई। इन परिस्थितियों में वैध संविदा के लिए विनिर्दिष्ट पालन का अनुतोष प्रदान किया जा सकता है तथा यह अनुतोष इस आधार पर स्वीकार नहीं किया जा सकता है कि संपत्ति का विभाजन करना पड़ेगा यह अनुतोष इस आधार पर भी स्वीकार नहीं किया जा सकता है कि संपत्ति कई जगह बटी हुई है।

वह संविदा जिनका प्रवर्तन नहीं कराया जा सकता

विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम केवल उन संविदा का उल्लेख नहीं करता है जिनका न्यायालय में प्रवर्तन कराया जा सकता है अपितु उन संविदाओं का भी उल्लेख कर रहा है जिनका प्रवर्तन नहीं कराया जा सकता।

धारा 14 के अनुसार निम्नलिखित संविदा को विनिर्दिष्ट प्रवर्तित नहीं कराया जा सकता-

1)- वह संविदा जिसके पालन के लिए धन के रूप में प्रतिकर योग्य अनुतोष है यदि संविदा ऐसी है जिसका पालन नहीं किए जाने पर धन के रूप में प्रतिकर दिया जा सकता है और ऐसा प्रतिकर योग्य प्रतिकार है तो विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम के अंतर्गत अनुतोष नहीं दिया जाएगा और उसको प्रतिकर हेतु वाद करना होगा।

2)- वह संविदा जो पक्षकारों के व्यक्तिगत योग्यताओं या स्वेच्छा पर इतनी आश्रित हो अन्यथा अपनी प्रकृति के कारण ऐसी हो कि न्यायालय उसके तात्विक निबंधनों के पालन का प्रवर्तन न करा सकता हो।

3)- संविदा जो अपनी प्रकृति से ही समाप्त हो।

4)- वह संविदा जिसके पालन में ऐसा सतत कर्तव्य पालन अन्तर्विलित हो जिसका न्यायालय परीक्षण नहीं कर सकता है।

5)- मध्यस्थम अधिनियम 1940 में अन्यथा उपबंधित के सिवाय वर्तमान या भावी मतभेदों को मध्यस्थम के लिए निर्देशन करने की कोई संविदा विनिर्दिष्ट प्रवर्तित नहीं की जाएगी किंतु यदि कोई व्यक्ति जिसने ऐसी संविदा की हो और उसका पालन करने से इंकार कर दिया हो किसी ऐसे विषय के बारे में वाद लाए जिसके निर्देशन की उसने संविदा की है तो ऐसी संविदा का अस्तित्व उस बात पर वाचन करेगा।

जहां धन प्रतिकर के रूप में योग्य अनुतोष है वहां संविदा प्रवर्तनीय नहीं होती है-

धारा 14 (1) (क) के अनुसार वह संविदाएं जिनके अपालन के लिए धन के रूप में प्रतिकर योग्य अनुतोष माना जाता है उनका प्रवर्तन नहीं कराया जा सकता।

उदाहरण के लिए क ख से करार करता है कि वह 1 माह के भीतर 1000 बोरे बासमती चावल प्रदान करेगा। का चावल प्रदान करने में असफल रहता है, ख के वाद करने पर इस संविदा का विनिर्दिष्ट पालन नहीं कराया जा सकता क्योंकि इसके अपालन के लिए धन के रूप में प्रतिकार यथायोग्य अनुतोष होगा।

अशोक कुमार श्रीवास्तव बनाम नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड के वाद में अपीलार्थी को एक संविदा के अंतर्गत निरीक्षक 19-9-1980 को कुछ शर्तों के अधीन नियुक्त किया गया था। 13-3-1982 को प्रत्यार्थी कंपनी ने 20 दिन का नोटिस देकर इस आधार पर निकाल दिया कि प्रीमियम के निर्धारित लक्ष्य प्राप्त करने में असफल रहा। अपीलार्थी ने वाद किया और यह आधार लिया गया की निष्कासन अवैध है तथा यह घोषणा की जाए की वह अभी सेवा में है।

उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया की अपीलार्थी द्वारा दायर किया गया वाद विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम 1963 की धारा 14 (4 ) के अंतर्गत स्वीकार नहीं है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यद्यपि धारा 14 के अंतर्गत वाद पोषणीय नहीं है परंतु सिविल न्यायालय की धारा 34 के अंतर्गत घोषणात्मक डिक्री के लिए वाद स्वीकार किया जा सकता है।

छोटी और व्यक्तिगत योग्यता के ऊपर आश्रित संविदा-

विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम 1963 की धारा 14 (1) ख के अंतर्गत ऐसी संविदाओं का विनिर्दिष्ट प्रवर्तन नहीं कराया जा सकता जिनमें बहुत से तथ्य जानकारियां हो या फिर पक्षकारों की व्यक्तिगत योग्यताओं या सुरक्षा पर निर्भर हो जैसे कि किसी अभिनेता या गायक द्वारा गीत गाया जाना अभिनय किया जाना।

कार्यपालिक समिति उत्तर प्रदेश राज्य भंडारण निगम लखनऊ बनाम चंद्रकिरण त्यागी के वाद में उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि व्यक्तिगत सेवा की संविदा के विनिर्दिष्ट प्रवर्तन का आदेश सामान्यता नहीं दिया जा सकता है परंतु इस नियम को निम्नलिखित तीन अपवाद हैं-

जहां किसी लोक सेवक को संविधान के अनुच्छेद 311 के उल्लंघन में पद तथा सेवा से निष्कासित किया जाता है।

जहां किसी कर्मचारी को औद्योगिक विधि के अंतर्गत पद से हटा दिया जाता है।

जहां कोई कानूनी निकाय अधिनियम के प्रावधानों के उल्लंघन में कुर्की करती हैं।

उपर्युक्त नियम का अनुमोदन उच्चतम न्यायालय ने कार्यकारिणी समिति वेस्ट डिग्री कॉलेज श्यामली बनाम लक्ष्मीनारायण के वाद में कर दिया है।

शिवकुमार तिवारी विधिक प्रतिनिधियों द्वारा बनाम जगत नारायण राय के मुकदमे में अपीलार्थी एक कॉलेज में अस्थाई लेक्चरर नियुक्त किया गया था।

जिला इंस्पेक्टर ने उसकी नियुक्ति का अनुमोदन प्रति वर्ष के आधार पर किया था। उक्त अनुमोदन 1973 के पश्चात नहीं दिया गया। तत्पश्चात प्रत्यार्थी को शिक्षा विभाग में लेक्चरर नियुक्त किया। अपीलार्थी ने कालेज के विरुद्ध सिविल वाद किया जिस पर शिक्षा विभाग पक्षकार नहीं बनाया गया। सिविल न्यायालय ने निर्णय दिया की अपीलार्थी कॉलेज का स्थाई लेक्चरर है अतः शिक्षा विभाग से संबंधित क्षेत्र के डिप्टी डायरेक्टर ने आदेश पारित किया।

सिविल न्यायालय के निर्णय के फलस्वरुप अपीलार्थी कॉलेज का स्थाई लेक्चरर हो गया तथा प्रत्यार्थी की सेवाएं समाप्त की जाती है। उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि सिविल न्यायालय का निर्णय शिक्षा विभाग पर बाध्यकारी नहीं है तथा डिप्टी डायरेक्टर का आदेश अपास्त होने योग्य है, उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्णय में यह भी कहा कि प्रार्थी द्वारा निबंध का तर्क मान्य नहीं है इसके अतिरिक्त विरुद्ध विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम के उपबंधों को ध्यान में रखते हुए सिविल न्यायालय उक्त घोषणा नहीं कर सकता था।

इन सब बातों के बाद भी आधुनिक नियम यह है कि विशिष्ट पालन की डिक्री प्रदान करना न्यायालय के विवेक पर निर्भर करता है तथा इसका प्रयोग करते समय न्यायालय वाद की परिस्थितियों पक्षकारों का आचरण तथा उक्त संविदा में उनके हितों को ध्यान में रखता है इसका मुख्य कारण यह है कि विनिर्दिष्ट पालन की विधि का विकास साम्य न्यायालय द्वारा किया गया था और साम्य न्यायालय में न्याय न्यायालयों के विवेक अनुसार होता है।

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