Transfer Of Property की धारा 91 के प्रावधान

Shadab Salim

12 Feb 2025 9:56 AM

  • Transfer Of Property की धारा 91 के प्रावधान

    एक बंधककर्ता को अपनी संपत्ति पर मोचन का अधिकार प्राप्त होता है। बंधककर्ता के अलावा भी कुछ व्यक्ति ऐसे हैं जिन्हें मोचन का अधिकार प्राप्त है, धारा-91 उन्हीं व्यक्तियों का उल्लेख कर रही है।

    विधि बन्धककर्ता को यह अधिकार प्रदान करती है कि वह बन्धक रकम का भुगतान कर बन्धक सम्पत्ति वापस प्राप्त करे। बन्धककर्ता का यह अधिकार मोचनाधिकार कहलाता है। मोचनाधिकार की विवेचना अधिनियम की धारा 60 में की गयी है। धारा 91 उन व्यक्तियों के सम्बन्ध में प्रावधान करती है जो मोचन हेतु वाद ला सकेंगे या बन्धक सम्पत्ति का मोचन करा सकेंगे।

    इसके अनुसार बन्धककर्ता के अतिरिक्त निम्नलिखित अन्य व्यक्ति भी बन्धक सम्पत्ति को मोचन करा सकेंगे अथवा मोचन कराने हेतु वाद संस्थित कर सकेंगे-

    (1) कोई व्यक्ति जिसका उस बन्धक सम्पत्ति में कोई हित या पर भार है, सिवाय उस हित के बन्धकदार जिसका मोचन कराया जाना है- (खण्ड-क)

    (2) कोई व्यक्ति जिसका मोचन अधिकार में कोई हित या पर भार है (खण्ड-क)

    (3) बन्धक धनराशि या उसके किसी भाग के भुगतान के लिए उत्तरदायी कोई प्रतिभू (खण्ड-ख)

    (4) बन्धककर्ता का कोई लेनदार जिसने उसकी सम्पदा के प्रशासन के लिए वाद में उस बन्धक सम्पत्ति के विक्रय के लिए डिक्री अभिप्राप्त की है (खण्ड ग)

    यह धारा इस बाबत कुछ भी नहीं स्पष्ट करती है कि यदि अनेक ऐसे व्यक्ति हैं जिन्हें मोचन कराने का अधिकार प्राप्त हैं तो वे किस क्रम में अपने इस अधिकार का प्रयोग करेंगे। यह धारा मात्र यह सुस्पष्ट करती है कि मोचन कराने के लिए कौन सक्षम व्यक्ति है। जो भी व्यक्ति सम्पत्ति का मोचन कराएगा वह उस बन्धकदार के अधिकारों को प्राप्त करेगा जिसको वह मोचित करेगा। इस धारा के अन्तर्गत मूल बन्धककर्ता एवं प्रतिस्थापित बन्धककर्ता दोनों ही सम्मिलित हैं।

    बन्धक सम्पत्ति में हित पर भार रखने वाला व्यक्ति कोई भी व्यक्ति जिसे बन्धक सम्पत्ति में कोई हित या भार प्राप्त है, वह उस सम्पत्ति का मोचन कराने के लिए हकदार है। सम्पत्ति में उसका हित बड़ा है या छोटा, यह तथ्य महत्वपूर्ण नहीं है। एक तुच्छ हित रखने वाला व्यक्ति भी मोचन कराने के लिए सक्षम है। इसी प्रकार एक ऐसा व्यक्ति जिसे बन्धक सम्पत्ति में कोई हित प्राप्त नहीं है, परन्तु उसे उस सम्पत्ति पर भार प्राप्त है अथवा मात्र मोचन के अधिकार पर में हित या पर भार प्राप्त है, मोचन कराने के लिए सक्षम है। एक बन्धकग्रहीता मोचन के अधिकार से युक्त नहीं है क्योंकि मोचन का अधिकार बन्धकग्रहीता के विरुद्ध ही प्रयोग में लाया जाता है।

    इस प्रावधान के अन्तर्गत बन्धककर्ता का भूस्वामी भी मोचन अधिकार का प्रयोग करने में समर्थ है यदि उत्तराधिकारी विहीन पट्टाग्रहीता की मृत्यु हो जाती है तथा पट्टाजनित भूस्वामी में निहित हो जाती है।

    पट्टाग्रहीता-बन्धककर्ता का पट्टाग्रहीता मोचन कर सकेगा। यह तब भी सम्भव हैं जबकि पट्टाग्रहीता पर बाध्यकारी नहीं है। यदि बन्धक का निष्पादन पहले होता है तदनन्तर पट्टा का सृजन किया जाता है उसी सम्पत्ति पर तो ऐसा पट्टाग्रहीता मोचन कराने का हकदार होगा, पर वह पट्टाग्रहीता जो बन्धक के पूर्व से सम्पत्ति पर है, मोचन कराने के लिए प्राधिकृत नहीं होगा न हो एक्स प्रोप्राइटरी टेनेन्टर तथा ऐसा टेनेन्ट जो एक निश्चित कालावधि के लिए हो ।

    जहाँ बन्धक एक अक्यूपेंसो टेनेन्ट द्वारा सृजित किया गया था तथा इसके बाद टेनेन्ट ने, भूस्वामी को सम्मति से अपना अधिकार अन्य व्यक्तियों को हस्तान्तरित कर दिया तो ऐसे अन्तरिती बन्धक का मोचन कराने के हककार होंगे। बन्धकदार, 12 वर्षों से अधिक समय तक कब्जा में बने रहने के कारण बन्धककर्ता के मोचन के अधिकार को समाप्त नहीं कर सकेगा। जहाँ किसी सम्पत्ति का बन्धक किया गया है और बन्धक के पश्चात् उसे कुर्क कर बेंच दिया जाता है तो ऐसी सम्पत्ति का क्रेता बन्धक के मोचन के अधिकार से युक्त होगा।

    अनेक सह बन्धककर्ताओं में से कोई भी एक मोचन करा सकेगा। इसी प्रकार निष्पादन क्रेता, चाहे वह सम्पूर्ण 10 या आंशिक। मोचनाधिकार का क्रेता हो, मोचन कर सकेगा। नवी रसूल बनाम मोहम्मद मकसूद के वाद में एक सहअंशधारी ने भोग बन्धकदार को मोचित करने की प्रवंचना किया पर बन्धकदार ने यह तर्क प्रस्तुत किया कि बन्धक से पूर्व वह एक पट्टाग्रहीता था। अतः से वह मोचन के पश्चात् भी सम्पत्ति को अपने कब्जे में रखने के लिए प्राधिकृत है, पर वह पट्टा प्रमाणित करने में असमर्थ रहा। अतः उसे आदेश दिया गया कि वह मोचन पर सम्पत्ति का कब्जा मोचक को सौंप दे।

    चेरियन सोसम्मा बनाम एस० पी० एस० अम्मा एवं अन्य के वाद में पट्टेदार बन्धकदार के पक्ष में सम्पति का बन्धक किया गया। बन्धक विलेख में यह उल्लिखित था कि पट्टेदार के अधिकार सुरक्षित हैं और बन्धक के निष्पादन के पश्चात् भी पट्टा जारी रहेगा इन तथ्यों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने अभिनित किया कि बन्धक के समापन के पश्चात् भी बन्धकदार सम्पत्ति का पट्टादार के रूप में धारित करने का अधिकारी है और बन्धककर्ता सम्पत्ति का भौतिक कब्जा प्राप्त करने का अधिकारी नहीं है।

    बन्धककर्ता के अतिरिक्त जो अन्य व्यक्ति मोचन करने के अधिकार से युक्त हैं, वे इसलिए प्राधिकृत किए गए हैं क्योंकि वे बन्धक सम्पत्ति में हित रखते हैं। धारा 59-क. जो सम्पत्ति अन्तरण संशोधन अधिनियम, 1929 द्वारा समावेशित किया गया है, इस स्थिति को सुस्पष्ट करती है। परन्तु धारा 91 प्रारम्भ से ही इसी रूप में और कोर्ट ने इसे स्वीकृति भी प्रदान की है। अत: शब्द "बन्धककर्ता" से अभिप्रेत है ऐसे सभी व्यक्ति जो बन्धकर्ता से हित प्राप्त करते हैं और ये सभी व्यक्ति मोचन के अधिकारी हैं।

    कोई व्यक्ति जिसे मोचन अधिकार में या पर कोई हित प्राप्त है - यदि किसी व्यक्ति ने मोचन अधिकार में या पर कोई हित प्राप्त कर लिया है तो वह बन्धक सम्पत्ति का मोचन कराने के लिए उसी प्रकार प्राधिकृत है जिस प्रकार स्वयं बन्धककर्ता क्योंकि ऐसा व्यक्ति बन्धककर्ता के अध्यधीन हित प्राप्त करता है, पर ऐसे व्यक्ति को मोचन का अधिकार नहीं होगा। बन्धकदार के वाद के सम्बन के दौरान, मोचनाधिकार का समनुदेशिती, विक्रय पूर्ण होने से पूर्व, मोचन कर सकेगा।

    बन्धक ऋण या उसके किसी भाग के भुगतान के लिए प्रतिभू- एक प्रतिभू मोचन के अधिकार से युक्त है क्योंकि वह ऋण के लिए दायी है तथा ऋण के भुगतान पर वह ऋणदाता की समस्त प्रतिभूतियों का उपभोग करने के लिए सक्षम है। यह बन्धक का मोचन किसी भिन्न ऋण के लिए नहीं कर सकता है।

    बन्धककर्ता का कोई लेनदार- यह खण्ड क्रिश्चियन बनाम फील्ड के वाद में प्रतिपादित सिद्धान्त पर आधारित है। इसके अनुसार यदि कोई वादी बन्धककर्ता को सम्पदा के प्रशासन हेतु संस्थित वाद में सम्पत्ति की बिक्री हेतु डिक्री प्राप्त कर चुका है तो उसे मोचन कराने का अधिकार होगा जिससे उसे डिक्री के अध्यधीन प्राप्त हो सके। लेनदार के हितों को संरक्षित करने हेतु यह एक अत्यन्त आवश्यक सिद्धान्त है।

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