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घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 भाग 18: आरोपी द्वारा घरेलू हिंसा अधिनियम के अंतर्गत दिए आदेश को नहीं मानने पर दंड

Shadab Salim
23 Feb 2022 1:30 PM GMT
घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 भाग 18: आरोपी द्वारा घरेलू हिंसा अधिनियम के अंतर्गत दिए आदेश को नहीं मानने पर दंड
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घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 ( The Protection Of Women From Domestic Violence Act, 2005) की धारा 31 दंड के संबंध में लेख करती है। घरेलू हिंसा अधिनियम सिविल उपचार प्रदान करता है परंतु इस अधिनियम को दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत चलाया जाता है।

इस अधिनियम में मजिस्ट्रेट को अलग-अलग तरह के आदेश पारित करने की शक्ति दी गई है। यदि किसी मजिस्ट्रेट द्वारा प्रत्यर्थी जिसमें पीड़ित महिला के घर के कोई भी सदस्य हो सकते हैं, उनके विरुद्ध किसी प्रकार का कोई आदेश पारित किया है और वे उस आदेश को नहीं मानते हैं तब उन्हें दंडित किए जाने का प्रावधान इस अधिनियम में किया गया है।

किसी भी न्यायालय के आदेश को नहीं मानने पर पहले भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत दंडित किया जाता था लेकिन अभी के अधिनियम ऐसे हैं जिनमें यह व्यवस्था उक्त अधिनियम में ही कर दी गई है। इस ही तरह घरेलू हिंसा अधिनियम में भी दंड की व्यवस्था की गई है। इस आलेख के अंतर्गत धारा 31 पर विवेचना प्रस्तुत की जा रही है।

यह अधिनियम में प्रस्तुत की गई धारा है

धारा 31

प्रत्यर्थी द्वारा संरक्षण आदेश के भंग के लिए शास्ति

(1) प्रत्यर्थी द्वारा संरक्षण आदेश या किसी अन्तरिम संरक्षण आदेश का भंग, इस अधिनियम के अधीन एक अपराध होगा और वह दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो बीस हजार रुपये तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डनीय होगा।

(2) उपधारा (1) के अधीन अपराध का विचारण यथासाध्य उस मजिस्ट्रेट द्वारा किया जायेगा जिसने वह आदेश पारित किया था, जिसका भंग अभियुक्त द्वारा कारित किया जाना अभिकथित किया गया है।

(3) उपधारा (1) के अधीन आरोपों को विरचित करते समय, मजिस्ट्रेट, यथास्थिति, भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498-क (1860 का 45), या उस संहिता के किसी अन्य उपबन्ध, या दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 (1961 का 28) के अधीन आरोपों को भी विरचित कर सकेगा, यदि तथ्यों से यह प्रकट होता है कि उन उपबन्धों के अधीन कोई अपराध हुआ है।

धारा 31 यह प्रावधान करती है कि संरक्षण आदेश अथवा अन्तरिम संरक्षण आदेश का भंग अपराध है और मजिस्ट्रेट के द्वारा विचारणीय होता है।

अधिनियम की धारा 31 दण्ड के लिए केवल तब प्रावधान करती है, यदि कोई व्यक्ति अधिनियम की धारा 18 के अधीन पारित किये गये संरक्षण आदेश अथवा धारा 23 के अधीन पारित किये गये अन्तरिम संरक्षण आदेश का भंग कारित करता है। इस प्रकार घरेलू हिंसा का कृत्य कारित करना स्वयं द्वारा अधिनियम के अधीन दण्डनीय कोई अपराध गठित नहीं करता है और यह केवल या तो अधिनियम की धारा 18 के अधीन या धारा 23 के अधीन पारित किये गये आदेश का भंग है, जिसे अधिनियम की धारा 31 के अधीन दण्डनीय बनाया गया है।

इस प्रकार किसी व्यक्ति के द्वारा इस अधिनियम के अधीन मात्र घरेलू हिंसा के कृत्य में अथवा साझी गृहस्थी के प्रयोग से किसी महिला को वंचित करने में अपने लिप्त होने के कारण आपराधिक दायित्व उपगत नहीं किया जाता है। यह केवल अधिनियम को धारा 18 तथा 23 के अधीन पारित किये गये आदेश का भंग है, जिसे दण्डनीय बनाया गया है।

अधिनियम, 2005 की धारा 31 प्रत्यर्थी द्वारा संरक्षण आदेश के भंग हेतु दण्ड के लिए प्रावधान करती है। प्रत्यर्थी द्वारा संरक्षण आदेश अथवा अन्तरिम संरक्षण आदेश का भंग इस अधिनियम के अधीन अपराध होगा और ऐसी अवधि से, जो एक वर्ष तक की हो सकेगी, ऐसी भांति के कारावास से अथवा ऐसे जुर्माने से, जो बीस हजार रुपये तक का हो सकेगा, अथवा दोनों से दण्डनीय होगा।

"घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 की धारा 31 के अधीन प्रत्यर्थी द्वारा संरक्षण आदेश अथवा अन्तरिम संरक्षण आदेश का भंग अधिनियम के अधीन अपराध होगा। इसलिए घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 की धारा 17, 18, 19, 20 और 22 के अधीन पारित किये गये सभी आदेशों का कोई दाण्डिक प्रभाव अधिनियम की धारा 31 के अधीन यथोपवन्धित के सिवाय नहीं है, हालांकि प्रत्यर्थी आदेश का भंग कारित किया था। इसलिए, जैसा कि अधिनियम के प्रावधान से देखा गया है, महिलाओं को विद्यमान अधिकारों के संदर्भ में कुछ नये उपचार प्रदान किये गये हैं।

ऐसे उपचार संविदा अथवा अधिक परिवर्तित नहीं करते हैं, इसने किसी निहित अधिकार को नहीं छीना था, क्योंकि राज्य की विधि में व्यतिक्रमी को ऐसा कोई निहित अधिकार प्राप्त नहीं हो सकता है, जो केवल दोषपूर्ण उपचार के बिना अथवा उसके साथ पीड़िता को छोड़ा हो। अधिनियम लिंग पर आधारित हिंसा को निवारित करने के उद्देश्य से किसी महिला के द्वारा उपगत सार्वभौमिक हिंसा को रोकने के लिए पारित किया गया है।

दो पृथक अनुतोषों, एक संरक्षण के लिए अधिनियम की धारा 18 के अधीन और दूसरा अधिनियम की धारा 20 के अधीन मौद्रिक अनुतोष के लिए उपबन्ध करने पर इस धारा के क्षेत्र का विश्लेषण करते समय विचार किया जायेगा। यदि संरक्षण आदेश भरण-पोषण प्रदान करने के लिए मौद्रिक अनुतोष को शामिल करने वाला था, तो अधिनियम की धारा 20 के लिए पृथक ढंग से उपबन्ध नहीं किया जायेगा।

भरण-पोषण प्रदान करने का आदेश "संरक्षण आदेश" के समान नहीं है और उसका उल्लंघन इस धारा के उपबन्धों को आकर्षित नहीं करेगा। उपधारा (1) अधिनियम की धारा 32 की उपधारा (1) अपराध को अधिनियम की धारा 31 की उपधारा (1) के अधीन संज्ञेय तथा अजमानतीय बनाती है।

शास्ति का अर्थ इस रूप में दिया गया है कि शब्द शास्ति से, किसी दण्ड चाहे कारावास के द्वारा अथवा अन्यथा का अर्थ बहुत व्यापक रूप में, आशयित रूप में, और तात्पर्यिंत रूप में, अभिप्रेत है।

संरक्षण आदेश का भंग

घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 31 संरक्षण आदेश, अन्तिम अथवा अन्तरिम के भंग को उक्त अधिनियम के अधीन अपराध बनाता है। उसमें विहित परिसीमा अवधि की समाप्ति के पश्चात् संज्ञान लेने के लिए रोक विहित करते हुए दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 468 को प्रयोज्यनीयता का विवाद घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 31 के अधीन यथा अभिव्यक्त ऐसे अपराध का केवल संज्ञान लेने के समय ही उद्भूत होगा।

प्रत्यर्थीगण के अभिकथित अभित्यजन की तारीख पर कोई संरक्षण आदेश नहीं था और इसके कारण उक्त घटना को उक्त अधिनियम की धारा 31 के अधीन यथा अभिव्यक्त उसे अपराध में परिवर्तित करते हुए कोई भंग नहीं हो सकता था। इस प्रकार संरक्षण आदेश के लिए घरेलू हिंसा अधिनियम के अधीन आवेदक द्वारा प्रस्तुत किये गये आवेदन को घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 31 के अधीन अपराध के परिवाद के रूप में नहीं समझा जा सकता है।

घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 के प्रावधानों के अधीन याचिका पोषणीय होती है, हालांकि घरेलू हिंसा का कृत्य अधिनियम के प्रवर्तन में आने के पहले कारित किया गया हो अथवा उसके अतीत में साझी गृहस्थी में प्रत्यर्थी के साथ एक साथ रहने के बावजूद महिला अधिनियम के प्रवर्तन में आने के समय अब उसके साथ न हो।

मजिस्ट्रेट के लिए ऐसी महिला के द्वारा याचिका पर अधिनियम की धारा 12, 18, 19, 20, 21, 22 अथवा 23 के प्रावधानों के अधीन उपयुक्त आदेश पारित करने का विकल्प प्राप्त होता है तथा व्यक्ति, जो ऐसी महिला के द्वारा दाखिल किये गये आवेदन पर पारित किये गये संरक्षण आदेश अथवा अन्तरिम संरक्षण आदेश का भंग कारित करता है, अधिनियम की धारा 31 के अधीन दण्ड के लिए दायी होगा

भरण-पोषण प्रदान करने वाले आदेश का उल्लंघन

भरण-पोषण प्रदान करने वाला आदेश अधिनियम की धारा 23 के अधीन है। यदि यह एकपक्षीय या कार्यवाही के पक्षकारों को सुनने के पश्चात् पारित किया जाता है और उस आदेश को सहन करने के पश्चात् ही आदेश के ज्ञान के साथ, यदि प्रत्यर्थी साशय ऐसे आदेश का उल्लंघन करता है या दुरुपयोग करता है, तो इसे घरेलू हिंसा से प्रतिषिद्ध करने के लिए या अधिनियम की धारा 18 के अधीन पीड़ित का संरक्षण करने के लिए पारित किये गये परिकल्पित आदेश के रूप में माना जायेगा। ऐसा उल्लंघन इस धारा के अधीन दण्डनीय है, जब तक ऐसा आदेश प्रवर्तनीय है, यदि ऐसा आदेश सक्षम न्यायालय द्वारा विखण्डित या रद्द नहीं किया जाता।

संरक्षण आदेश का अपालन अधिनियम की धारा 31 के अधीन यथोपबन्धित संरक्षण आदेश अथवा अन्तरिम संरक्षण आदेश का अपालन दण्डनीय बनाया गया है और इसके कारण यह कहा जा सकता है कि इस अपराध के लिए परिवाद केवल ऐसे वयस्क पुरुष/प्रत्यर्थी के विरुद्ध हो दाखिल किया जा सकता है, जो संरक्षण आदेश का अनुपालन नहीं किया है। इसलिए, यह स्पष्ट है कि अधिनियम की धारा 12 के अधीन आवेदन, जिसे प्रत्यर्थी के द्वारा याचीगण, जो वयस्क पुरुष नहीं, के विरुद्ध दाखिल किया गया है, पोषणीय नहीं है।

संरक्षण आदेश का उल्लंघन डेन्निसन पाल राज बनाम माया विनोला (2009) के मामले में मद्रास उच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से अभिनिर्धारित किया है कि चूंकि अधिनियम की धारा 31 के अधीन दाण्डिक परिणाम केवल तब आकर्षित होते है, यदि संरक्षण आदेश पारित किया गया हो और प्रत्यर्थी उस आदेश का भंग कारित करता है।

दाण्डिक परिणाम संरक्षण आदेश की तारीख से, न कि घरेलू हिंसा के कृत्यों के तारीख के समादेशित होता है और इसलिए न्यायालय अधिनियम के प्रवर्तन में आने के पहले कारित किये गये घरेलू हिंसा के कृत्यों का संज्ञान लेने और आवश्यक संरक्षण आदेश पारित करने के लिए सक्षम था। यह अभिनिर्धारित किया गया था कि अधिनियम के प्रवर्तन में आने के पहले भी कारित किये जाने के लिए अभिकथित हिंसा के कृत्यों का भूतकालीन रूप से संज्ञान लेने के लिए प्रयोग किया जा सकता था।

संरक्षण आदेश के भंग के लिए शास्ति अधिनियम में समाविष्ट दाण्डिक प्रावधान धारा 31 और 33 है, जो क्रमशः प्रत्यर्थी द्वारा संरक्षण आदेश के भंग के लिए और संरक्षण अधिकारी द्वारा कर्तव्य का निर्वहन न करने के लिए शास्ति का प्रावधान करते हैं। स्पष्ट रूप से धारा 31 और 33 के अधीन यथापूर्वोक्त उपबन्धित दण्ड अधिनियम के अधीन कारित किये गये अपराध के लिए शास्तियां हैं और इसका इसके कारण घरेलू हिंसा के कृत्य साथ कोई सम्बन्ध नहीं है, जो मजिस्ट्रेट के समक्ष कार्यवाही की विषयवस्तु थी, जिसमें संरक्षण आदेश पारित किया गया था।

यह कहना पर्याप्त है कि धारा 18 से 23 के प्रावधानों के निम्बन्धनों में अनुतोष न तो व्यथित व्यक्ति को प्रदान किया जाना है, न ही धारा 31 और 33 के अधीन कार्यवाही अधिनियम के प्रारम्भ के पहले कारित किये गये घरेलू हिंसा के कृत्य को दण्डनीय बनाती है और इसलिए अनुच्छेद 20 (1) के प्रावधान मामले में आकर्षित नहीं होते हैं।

धारा 31 प्रत्यर्थी, जिसमें वह स्त्री शामिल है, जो संरक्षण आदेश का भंग कारित करती है, द्वारा संरक्षण आदेश अथवा अन्तरिम संरक्षण आदेश के भंग के लिए शास्ति का वर्णन करती है। धारा 31 की उपधारा (3) यह प्राधिकृत करती है कि मजिस्ट्रेट धारा 31 की उपधारा (1) के अधीन आरोप विरचित करते समय भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498-क अथवा भारतीय दण्ड संहिता के किसी अन्य प्रावधान के अधीन अथवा दहेज प्रतिषेध अधिनियम, जैसो भी स्थिति हो, के अधीन भी आरोप विरचित कर सकता है।

यदि तथ्य भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498-क अथवा भारतीय दण्ड संहिता अथवा दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 के किसी अन्य प्रावधान के अधीन अपराध कारित करने को प्रकट करते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि मजिस्ट्रेट सदैव प्रत्यर्थी के स्त्री नातेदारों, जो भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498-क अथवा भारतीय दण्ड संहिता के किसी अन्य प्रावधान अथवा दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 के अधीन अपराध कारित किए हों, के विरुद्ध आरोप विरचित कर सकता है।

अपराध कारित करने के सम्बन्ध में परिवाद

अजय कान्त बनाम श्रीमती अल्का शर्मा, 2008 के मामले में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित करने के लिए दण्ड प्रक्रिया संहिता में पद परिवाद की परिभाषा पर विश्वास व्यक्त किया कि अधिनियम की धारा 2 के खण्ड (घ) का परन्तुक केवल अपराध कारित करने के सम्बन्ध में ही परिवाद से सम्बन्धित है। इसमें निम्न प्रकार से संप्रेक्षण किया गया था:

"इस परिभाषा के द्वारा स्पष्ट है कि दण्ड प्रक्रिया संहिता में यथोपबन्धित परिवाद केवल अपराध के लिए ही हो सकता है। जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है, इस अधिनियम में केवल दो अपराधों का उल्लेख किया गया है और वे (1) धारा 31 के अधीन और (2) धारा 33 के अधीन होते हैं। यह प्रतीत होता है कि प्रत्यर्थी को परिभाषा में विद्यमान शब्द परिवाद का प्रयोग इन दोनों अपराधों के लिए कार्यवाही संस्थित करने हेतु किया गया है और व्यथित पत्नी अथवा विवाह की प्रकृति के सम्बन्ध में रहने वाली महिला को पति अथवा पुरुष भागीदार के नातेदार के विरुद्ध परिवाद दाखिल करने का अधिकार प्रदान किया गया है।

शब्द परिवाद पर इस धारा के मुख्य प्रावधान, जिसे धारा 2 (थ) के पहले भाग में परिभाषित किया गया है, जो इस अधिनियम के अधीन अनुतोष के लिए हैं के क्षेत्र के परे विचार नहीं किया जा सकता है। जैसा कि अधिनियम की धारा 31 में प्रावधान किया गया है, परिवाद किसी ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध, जो संरक्षण आदेश अथवा अन्तरिम संरक्षण आदेश का अनुपालन नहीं किया है, दाखिल किया जा सकता है।

धनीय अनुतोष का आदेश अपराध, जो धारा 31 के द्वारा सृजित किया गया है, विनिर्दिष्ट रूप से संरक्षण आदेश अथवा अन्तरिम संरक्षण आदेश के भंग के सम्बन्ध में है। पद "धनीय अनुतोष" को इस धारा में शामिल नहीं किया गया है, और एतद्वारा अधिनियम 2005 को धारा 31 के प्रवर्तन से धनीय अनुतोष के किसी आदेश को लिया गया है। कोई आवेदक, जिसके पक्ष में धनीय अनुतोष का आदेश पारित किया गया है, अधिनियम, 2005 की धारा 20 के अनुसार आदेश के निष्पादन के लिए मांग करते हुए मजिस्ट्रेट के समक्ष, उसको आवेदन प्रस्तुत करना है।

धनीय अनुतोष के आदेश का निष्पादन

दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के अधीन आदेश के निष्पादन के सम्बन्ध में दण्ड प्रक्रिया संहिता के प्रावधानों का आश्रय अवर न्यायालय के द्वारा धनीय अनुतोष के आदेश को प्रभावी बनाने के लिए लिया जाना है।

वसूली का वारंट

विधायन की प्रकृति तथा उस प्रयोजन को, जिसके लिए इसे अधिनियमित किया गया था, देखते हुए एतद्वारा यह निर्देशित किया जाता है कि अब से आगे अधिनियम, 2005 के प्रावधानों के अधीन धनीय अनुतोष के सभी आदेश दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के अधीन उपबन्धित रीति से, परन्तु ऐसे उपान्तरण के साथ निष्पादित किये जायेंगे कि ऐसे निष्पादन के लिए कोई औपचारिक आवेदन आवश्यक नहीं होगा। ज्योंहि धनीय अनुतोष को निर्देशित करने के लिए अधिनियम, 2005 की धारा 12 अथवा 23 के अधीन आदेश पारित किया जाता है, त्योंही उसे निष्पादित किया जायेगा।

श्रीमती कंचन बनाम विक्रमजीत सेतिया, 2013 के मामले में कहा गया है कि न्यायालय अपील के लिए उपबन्धित अवधि की समाप्ति के पश्चात् संदत्त किये जाने लिए यथानिर्देशित धनीय अनुतोष की वसूली के लिए वसूली का वारंट स्वप्रेरणा से जारी करेगा और यदि वसूली के लिए वारंट संतुष्ट नहीं होता है, तब दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के अधीन उपबन्धित प्रक्रिया के अनुसार प्रत्यर्थी को सिविल जेल में भेजने के परिणाम का आश्रय लिया जाना होगा।

दोषसिद्धि

संविधान का अनुच्छेद 20 (1) यह प्रावधान करता है कि किसी व्यक्ति अपराध के रूप में आरोपित कृत्य कारित करते समय प्रवृत्ति विधि के उल्लंघन सिवाय किसी अपराध के लिए दोषसिद्ध नहीं किया जायेगा। अधिनियम का कोई प्रावधान अधिनियम के प्रवर्तन में आने के पहले कारित किये गये किसी कृत्य को किसी कारावास, जुर्माने अथवा शास्ति से दण्डनीय नहीं बनाता है। चूंकि आदेश, जैसा कि धारा 18 अथवा 23, जैसी भी स्थिति हो, में अनुचिन्तित किया गया हो, केवल अधिनियम के प्रवर्तन में आने के पश्चात् ही पारित किया जा सकता है।

इसलिए यह नहीं कहा जा सकता है कि यदि किसी व्यक्ति को अधिनियम की धारा 31 के अधीन दोपसिद्ध किया जाता है, तब उसे उस विधि के उल्लंघन के लिए दोषसिद्ध किया जाता है, जो अपराध के रूप में आरोपित कृत्य कारित करने के समय प्रवर्तन में नहीं थी।

इसका मूल्यांकन किया जाना है कि अधिनियम की धारा 31 के अधीन अपराध के रूप में आरोपित कृत्य किसी व्यक्ति द्वारा कारित किया गया घरेलू हिंसा का कृत्य नहीं होता है। यह अधिनियम की धारा 18 अथवा धारा 23 के अधीन पारित किये गये संरक्षण आदेश का भंग है, जो अधिनियम के अधीन दण्डनीय बनाया गया है। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता है कि संविधान का अनुच्छेद 20 (1) का उल्लंघन किया जाता है, यदि किसी व्यक्ति को अधिनियम की धारा 31 अथवा 33 के अधीन दोषसिद्ध किया जाता है।

दण्डादेश

धारा 31 यह स्पष्ट करती है कि अन्तरिम संरक्षण आदेश का भंग प्रत्यर्थी को एक वर्ष की अवधि के कारावास तथा जुर्माने में भी प्रदर्शित कर सकता है।

अपराध के लिए परिवाद की प्रक्रिया

संतोष कुमार यादव एवं 5 अन्य बनाम उत्तरप्रदेश राज्य एवं एक अन्य, 2016 के मामले में यह अभिनिर्धारित किया गया था कि धारा 31 के अधीन दण्डनीय अपराध का विचारण संहिता के अध्याय XXI के प्रावधानों के अनुसार होना चाहिए जो संक्षिप्त विचारणों से सम्बन्धित है।

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