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लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 भाग 32: बालक के साक्ष्य अभिलिखित करने एवं प्रकरण का निपटारा करने हेतु अवधि

Shadab Salim
3 Aug 2022 12:30 PM GMT
लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 भाग 32: बालक के साक्ष्य अभिलिखित करने एवं प्रकरण का निपटारा करने हेतु अवधि
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लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (The Protection Of Children From Sexual Offences Act, 2012) अधिनियम एक विशेष अधिनियम है, इस अधिनियम का उद्देश्य लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण है। इस अधिनियम के अंर्तगत बनाए गए प्रावधान बालकों को शीघ्र न्याय देने हेतु प्रयास करते है। उक्त अधिनियम की धारा 35 में ऐसी अवधि का उल्लेख किया गया है जिसमें बालकों के कथन अभिलिखित किए जाएंगे और मामले का निपटान किया जाएगा। इस आलेख में धारा 35 पर विवेचना प्रस्तुत की जा रही है।

यह अधिनियम में प्रस्तुत धारा का मूल रूप है

धारा 35

बालक के साक्ष्य को अभिलिखित और मामले का निपटारा करने के लिए अवधि

(1) बालक के साक्ष्य को विशेष न्यायालय द्वारा अपराध का संज्ञान लिए जाने के तीस दिन के भीतर अभिलिखित किया जाएगा और विलंब के लिए, यदि कोई हो, विशेष न्यायालय द्वारा कारण अभिलिखित किए जाएंगे।

(2) विशेष न्यायालय यथासंभव अपराध का संज्ञान लिए जाने की तारीख से एक वर्ष की अवधि के भीतर विचारण को पूरा करेगा

इस धारा के अंतर्गत एक माह की अवधि में साक्ष्य अभिलेख हेतु निर्देशित किया गया है एवं एक वर्ष के भीतर मामले का निपटारा करने के निर्देश दिए गए हैं। यह प्रावधान आदेशात्मक है लेकिन इसमे यह भी प्रावधान है कि कोई उचित कारण होने पर देरी स्वीकार की जाएगी और उस कारण का उल्लेख न्यायालय द्वारा किया जाएगा।

साक्ष्य किसी विधिक कार्यवाही में प्रस्तुत किया गया तथ्य का विषय

कार्यवाही के पक्षकारों के बीच विवादित अभिकथनों का या तो मौखिक, दस्तावेजी या साक्षियों के द्वारा सबूत । साक्ष्य का तात्पर्य ऐसे सभी कथन हैं, जिसे न्यायालय अपने समक्ष साक्षियों के द्वारा जांच के अधीन तथ्य के विषयों के सम्बन्ध में प्रस्तुत करने के लिए अनुज्ञात करता है अथवा अपेक्षा करता है। ऐसे कथनों को मौखिक साक्ष्य कहा जाता है, न्यायालय के निरीक्षण के लिए प्रस्तुत किए गये सभी दस्तावेजों को दस्तावेजी साक्ष्य कहा जाता है।

बालक के साक्ष्य को अभिलिखित करना

अनुसरित किए जाने वाले दिशानिर्देश शब्द "साक्ष्य" का तात्पर्य न्यायालय के द्वारा यथाअभिलिखित साक्षियों का कथन है और उसमें पुलिस का कथन शामिल नहीं होगा।

शब्द "साक्ष्य" का तात्पर्य ऐसा सभी कथन है, जिसे न्यायालय साक्षियों के द्वारा अपने समक्ष प्रस्तुत करने के लिए अनुज्ञात करता है अथवा अपेक्षा करता है। साक्षियों के कथनों में उनके द्वारा प्रतिपरीक्षा और पुन परीक्षा में किए गये कथन शामिल होते है।

शब्द "साक्ष्य" का शब्दकोशीय अर्थ यह है कि जो स्पष्ट करता है इसका तात्पर्य विधिक मामले में अज्ञात अथवा विवादित तथ्य सूचना को साबित करना है। सामान्य भाषा में किसी विधिक कार्यवाही में प्रस्तुत किया गया तथ्य का विषय साक्ष्य होता है।

पीड़िता का साक्ष्य अभिलिखित करना

एम कन्नन बनाम राज्य, 2018 क्रि लॉ ज 116 (मद्रास) के मामले में मद्रास उच्च न्यायालय ने पीड़िताओं के लिए रक्षोपाय प्रदान करने हेतु न्यायालय के द्वारा अनुसरित किए जाने वाले दिशानिर्देश जारी किया था। इस संदर्भ में इसने अधिनियम 2012 की धारा 35 पर विचार किया था, जो यह समादेशित करता है कि बालक का साक्ष्य अपराध का संज्ञान लेने की 30 दिन की अवधि के भीतर अभिलिखित किया जाएगा। पुनः धारा 35 के अनुसार बालक को अभिसाक्ष्य के समय अभियुक्त को नहीं दिखलाया जाना चाहिए। अन्ततः धारा 37 के अनुसार विचारण बन्द कमरे में किया जाएगा।

लैंगिक हमला की पीड़िता का साक्ष्य

विधि स्थापित है कि लैंगिक हमला के पीड़ित के साक्ष्य का मूल्यांकन करते समय इसे उपहत साक्षी के साक्ष्य के समान माना जाना चाहिए। कारण साधारण है कि अननुज्ञेय भारतीय समाज में निवास करने वाली लड़की या महिला यह स्वीकार करने के लिए अनिच्छुक होगी कि कोई ऐसी घटना, जो उसकी पवित्रता पर प्रभाव डालने के लिए बाध्य है, घटी थी।

सामान्यतया भारतीय महिला की ऐसे अपराध को, उसके परिवार के सदस्यों के समक्ष कमोवेश सामान्य जनता के समक्ष या पुलिस के समक्ष भी छिपाने की प्रवृत्ति है। इसलिए कुछ हद तक अभियोक्त्री का परिसाक्ष्य उपहत साक्षी के पदक्रम की अपेक्षा उच्चतर पदक्रम पर विद्यमान है।

पीड़िता का साक्ष्य

विधि की स्थापित प्रस्थापना है कि बलात्संग के मामले में पीड़िता के साक्ष्य का भी घटना की व्यापक असम्भाव्यताओं को ध्यान में रखते हुए अत्यधिक संवेदनशीलता के साथ आलोचनात्मक ढंग से मूल्यांकन किया जाना चाहिए।

पीड़िता का साक्ष्य अभिलिखित करने में उपेक्षा वर्तमान मामले में अभियुक्त विचारण न्यायालय के द्वारा नियत की गयी तारीखों पर अभियोजन साक्षियों की प्रतिपरीक्षा करने में विफल हुआ था। यह अभियुक्त के अधिवक्ता की ओर से घोर उपेक्षा की कोटि में आता था, जो अभियुक्त को निष्पक्ष विचारण की इन्कारी में परिणामित हुआ था।

एम कन्नन बनाम राज्य 2018 क्रि लॉ ज 116 (मद्रास) अधिनियम 2012 के प्रावधानों के अनुसार न्यायालय में बलात्संग की पीडिता को पुनः बुलाने के लिए अनुज्ञात नहीं किया जाता है। इसलिए मामला कठोरतापूर्वक अधिनियम, 2012 के प्रावधानों का अनुपालन करते हुए साक्षियों की पुनः परीक्षा करने के लिए अभियुक्त को अनुज्ञात करने के लिए विचारण न्यायालय के समक्ष वापस प्रतिप्रेषित किया गया।

मामलों का त्वरित निस्तारण विशेष न्यायालय यह सुनिश्चित करेगा कि पॉक्सो अधिनियम के अधीन मामलों में विचारण असम्यक रूप में विलम्बित न हो और विचारण को पॉक्सो अधिनियम, 2012 की धारा 35(2) के निबन्धनों में पक्षकारों को अयुक्तियुक्त स्थगन प्रदान किये बिना शीघ्रतापूर्वक अधिमानतः यथासंभव अपराध का संज्ञान लेने से एक वर्ष के भीतर समाप्त करने के लिए सभी उपाय करेगा।

पीड़ित व्यक्ति के लिए सांविधिक रक्षोपाय

अधिनियम की धारा 36 यह समादेशित करती है कि बालक को अभिसाक्ष्य देते समय अभियुक्त को नहीं दिखलाया जाना चाहिए और अधिनियम की धारा 37 यह कथन करती है कि विचारण को बन्द कमरे में संचालित किया जायेगा। ये पीड़ित व्यक्ति के लिए सांविधिक रक्षोपाय है, जिससे कि उसकी निजता और निष्पक्ष विचारण के उसके अधिकार को सुनिश्चित किया जा सके। पॉक्सो अधिनियम की धारा 35 से 37 पीड़ित व्यक्ति के लिए भारत का संविधान के अनुच्छेद 21 के अधीन यथा गारण्टीकृत निष्पक्ष विचारण को आश्वस्त करती है।

प्रवेशन लैंगिक हमले के पीड़ित व्यक्ति को बार-बार न्यायालय में बुलाना और उसकी परीक्षा करना अपराध के अपराधी के द्वारा पीडित व्यक्ति को कारित उसके आघात और तनाव को पुनः अग्रसर करेगा। पीड़ित व्यक्ति को आघात से उबरने के लिए उसकी सहायता करने के बजाय यह उसकी निजता के उलंघन की कोटि में आ सकता है और इस प्रकार वह उसके निष्पक्ष विचारण का उल्लंघन करेगा इसलिए परीक्षा के प्रयोजन के लिए बलात्संग के पीड़ित व्यक्ति को न्यायालय में दैनिक रूप में बुलाने को अनुज्ञात नहीं किया जाना चाहिए।

निष्पक्ष विचारण

त्वरित विचारण, जिसके लिए भारत का संविधान के अनुच्छेद 21 के अधीन यथा गारण्टी प्रदान की गयी है, न केवल अभियुक्त का वरन् पीड़ित व्यक्ति का भी भलीभाँति गारण्टीकृत अधिकार है। न्यायालय सावधानीपूर्वक अभियुक्त के साथ ही साथ पीडित व्यक्ति के निष्पक्ष विचारण के बीच सन्तुलन बैठायेगा। अन्य शब्दों में पीड़ित व्यक्ति की प्रतिपरीक्षा करने के अभियुक्त के अधिकार तथा निजता के पीड़ित व्यक्ति के अधिकार को सावधानीपूर्वक मापा जाना चाहिए और इन अधिकारों में से किसी को कोई हानि कारित किये बिना न्यायालय को अन्तर करना चाहिए।

अधिनियम के बेहतर क्रियान्वयन के लिए निर्देश

अलख आलोक श्रीवास्तव बनाम भारत संघ, 2018 कि लॉ ज 2929 (एस सी) के मामले में भारत के उच्चतम न्यायालय द्वारा कहा गया है कि बालकों के संरक्षण और पॉक्सो अधिनियम के अधीन अनुचिन्तित सांविधिक योजना को ध्यान में रखते हुए कतिपय निर्देश जारी करना आवश्यक है, जिससे कि विधायी आशय तथा प्रयोजन को आधारभूत स्तर पर वास्तविक रूप में प्रभावी बनाया जा सके और विधायन के सामाजिक परिवर्तन का मात्र ढांचा अथवा रूपरेखा बने रहने के बीच की रिक्ति को पूरा करना संभाव्य हो सके तथा वास्तविक अर्थ और भावना में उसके व्यवहार अथवा क्रियान्वयन को प्राप्त किया जा सके।

इसलिए निम्नलिखित निर्देश जारी किये जाते हैं:-

(i) उच्च न्यायालय यह सुनिश्चित करेंगे कि पॉक्सो अधिनियम के अधीन पंजीकृत मामलों को विशेष न्यायालयों के द्वारा विचारित तथा निस्तारित किया जाए और उक्त न्यायालयों के पीठासीन अधिकारीगण बालक के संरक्षण तथा मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया में संवेदनशील हो।

(ii) विशेष न्यायालय, जैसा कि अनुचिन्तित किया गया है, स्थापित किये जाए यदि पहले स्थापित न किये गये हो और उन्हें पॉक्सो अधिनियम के अधीन मामलों को विचारित करने का उत्तरदायित्व प्रदान किया जाए।

(iii) विशेष न्यायालयों को अनावश्यक स्थगन मंजूर न करते हुए तथा पॉक्सो अधिनियम में प्रतिपादित प्रक्रिया का अनुपालन करते हुए मामलों को शीघ्रतापूर्वक निस्तारित करने और इस प्रकार विचारण को समयबद्ध रीति में अथवा अधिनियम के अधीन विरचित विनिर्दिष्ट समय-सीमा के भीतर पूरा करने के लिए अनुदेश जारी किया जाना चाहिए।

(iv) उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायमूर्तियों से पॉक्सो अधिनियम के अधीन विचारणी की प्रगति को विनियमित करने तथा मानीटरी करने के लिए तीन न्यायाधीशों की समिति गठित करने का निवेदन किया जाता है। उच्च न्यायालयों में जहाँ पर तीन न्यायाधीश उपलब्ध न हो, वहीं पर उक्त न्यायालयों के मुख्य न्यायमूर्तिगण एक न्यायाधीश की समिति गठित करेंगे।

(v) उच्च न्यायालयों के द्वारा विशेष न्यायालयों में पॉक्सो अधिनियम के प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए बाल-मित्रवत वातावरण प्रदान करने के लिए उपयुक्त कदम उठाया जायेगा, जिससे कि अधिनियम की भावना को पूरा किया जा सके।

बालक का साक्ष्य

अलुंग गांगमी बनाम मणिपुर राज्य, 2020 क्रि लॉ ज 357 ए आई आर पॉक्सो के मामले में कहा गया है कि अधिनियम के अधीन पंजीकृत मामलों को सम्बद्ध न्यायालयों के द्वारा समयबद्ध रीति में अथवा अधिनियम के अधीन विरचित विनिर्दिष्ट समय-सीमा के भीतर विचारित और निस्तारित किया जाना है पॉक्सो अधिनियम की धारा 35 के अनुसार, बालक का साक्ष्य विशेष न्यायालय के अपराध का संज्ञान लेने की तारीख से तीस दिन की अवधि के भीतर अभिलिखित किया जायेगा और विलम्ब यदि कोई हो, का कारण विशेष न्यायालय के द्वारा अभिलिखित किया जायेगा पॉक्सो अधिनियम का प्रावधान यह उपबन्धित करता है कि विशेष न्यायालय विचारण को यथासंभव अपराध का संज्ञान लेने की तारीख से एक वर्ष की अवधि के भीतर पूरा करेगा।

बालक के साक्ष्य को अभिलिखित करना अनुसरित किए जाने वाले दिशानिर्देश

अधिनियम, 2012 की धारा 35 यह समादेशित करती है कि बालक का साक्ष्य अपराध का संज्ञान लेने की 30 दिन की अवधि के भीतर अभिलिखित किया जाएगा। अधिनियम की धारा 36 यह समादेशित करती है कि बालक को अभिसाक्ष्य के समय अभियुक्त को नहीं दिखलाया जाना चाहिए। अधिनियम की धारा 37 यह कथन करती है कि विचारण बन्द कमरे में किया जाएगा।

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