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लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 भाग 31: पॉक्सो अधिनियम के अंतर्गत अस्थि परीक्षण के आधार पर आयु का निर्धारण

Shadab Salim
3 Aug 2022 4:42 AM GMT
लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 भाग 31: पॉक्सो अधिनियम के अंतर्गत अस्थि परीक्षण के आधार पर आयु का निर्धारण
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लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (The Protection Of Children From Sexual Offences Act, 2012) अधिनियम आयु के इर्दगिर्द घूमता है क्योंकि यह अधिनियम बालकों से संबंधित है, धारा 33 में बालक द्वारा किए जाने वाले अपराधों में प्रक्रिया का उल्लेख किया गया है जिसकी चर्चा पिछले आलेख में की गई है, इस आलेख में अस्थि परीक्षण के आधार पर आयु के निर्धारण से संबंधित कुछ एवं तथ्यों पर चर्चा की जा रही है।

अस्थि परीक्षण के आधार पर आयु का अवधारण

अस्थियों में अस्थि परीक्षण को किसी व्यक्ति की आयु के निर्धारण के लिए विचार किए जाने वाले सभी आकड़ों में सर्वाधिक विश्वसनीय होना समझा गया है। फिर भी इस परीक्षण की अपनी सीमाएं हैं।

व्यवहार में इसे इपिफाइसिस के संयोजन की अतिव्यापन अवधि के साथ अस्थियों के एक्स-रे ले करके प्राप्त किया जाता है। एकल एक्स-रे जब लिया जाता है, तब यह कभी नहीं लाभदायक हो सकता है और इसलिए न्यायालय में सारवान आकड़े के रूप में इस पर कभी नहीं विश्वास व्यक्त किया जाता है। इसके अतिरिक्त कतिपय आयु जैसे 20 वर्ष के पश्चात् यह परीक्षण पुनः प्रकाश में नहीं आ सकता है। जब आयु अधिक हो जाती है, तब यह परीक्षण पूर्ण रूप में वयस्क तथा अधिक आयु के व्यक्तियों में किसी उपयोगिता का नहीं होता है।

विनोद कुमार बनाम छत्तीसगढ़ राज्य, 2003 के मामले में अस्थि परीक्षण के अनुसार लड़की की आयु 15 और 17 वर्ष के बीच थी यह इस बात को दर्शाता है कि लड़की 17 वर्ष की थी और लड़की की सम्मति से आवेदक के लड़की के साथ लैंगिक समागम कारित करने से इन्कार नहीं किया जा सकता है। अधिवक्ता ने यह तर्क किया है कि आवेदक दिनांक 10.2.2003 से जेल में है।

मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए यह आवेदक को जमानत पर स्वीकार करने का उपयुक्त मामला है। तद्नुसार याचिका को अनुज्ञात किया गया और आवेदक को सम्बद्ध न्यायालय के समाधान तक उक्त न्यायालय/ विचारण न्यायालय के समक्ष अथवा जैसे और जहाँ निर्देशित किया जाए अपनी उपसंजाति के लिए समान धनराशि के दो प्रतिभुओं के साथ 5,000 रुपये (पांच हजार रुपये मात्र) की धनराशि में उसके बन्ध-पत्र निष्पादित करने पर जमानत पर निर्मुक्त किए जाने के लिए निर्देशित किया गया।

विनायक बिहारी उर्फ विनायक शर्मा बनाम राज्य, 2005 क्रि लॉ ज 2452 के प्रकरण में यदि डॉक्टर ने यह राय दी हो कि अभियोक्त्री की आयु 17 वर्ष से कम थी, तब यह सुनिश्चित नहीं किया जा सकता है कि वह घटना की तारीख पर सकारात्मक रूप में 16 वर्ष से अधिक आयु की थी। रेडियो विज्ञानी ने स्पष्ट रूप में यह अभिसाक्ष्य दिया है कि एक्स-रे प्लेट के आधार पर अभियोक्त्री की आयु 17 वर्ष से कम थी।

इस रेडियो विज्ञानी के द्वारा तैयार की गयी रिपोर्ट यह दर्शाती है कि कलाई के जोड़ की इपिफाइसिस विघटित नहीं हुई थी। इसलिए इस तथ्य की दृष्टि में कि कलाई के जोड़ की इपिफाइसिस विघटित नहीं हुई थी. अभियोक्त्री की आयु को घटना के समय 16 वर्ष से अधिक होना नहीं कहा जा सकता है।

अस्थि के इपिफाइसिस पर आधारित साक्ष्य वैज्ञानिक परीक्षण पर आधारित होता है, इसलिए उसे स्वीकार किया जा सकता है। परन्तु ऐसी चिकित्सीय राय और विद्यालय के प्रमाण-पत्र के बीच विरोध की स्थिति में अनिश्चितता का लाभ अभियुक्त को प्रदान किया जाना चाहिए।

हालांकि अस्थि परीक्षण आयु के निर्धारण के लिए महत्वपूर्ण परीक्षण होता है, फिर भी यह नहीं कहा जा सकता है कि यह लड़की की आयु के अवधारण के लिए अपरिहार्य परीक्षण था।

एक मामले में अस्थि परीक्षण की दृष्टि में अभियोक्त्री की आयु 15 वर्ष होनी थी लेकिन डॉक्टर ने यह राय दी थी कि किसी भी तरफ तीन वर्ष का अन्तराल हो सकता है। इस प्रकार आयु के बारे में चिकित्तीय राय विश्वसनीय नहीं थी।

अस्थि परीक्षण से अभियोक्त्री की आयु 18 वर्ष से कम अवधारित की गयी थी। लेकिन फीमर और टीबिया आदि के अन्य परीक्षणों से लड़की की आयु 16 वर्ष थी। पुनः दिया गया आकड़ा आयु को 18 वर्ष होना साबित किया था।

अस्थि परीक्षण के आधार पर आयु के अवधारण को विधि में उचित साक्ष्य होना समझा जाता है और उस पर भारत में न्यायालयों में विश्वास व्यक्त किया जा रहा है, जब उसे उचित रीति में साबित कर दिया जाता है और उसे विश्वसनीय होना अभिनिर्धारित किया जाता है।

हिमाचल प्रदेश राज्य बनाम धरम दास 1992 क्रि लॉ ज 1758 के मामले में बलात्संग के मामले में अभियोक्त्री की आयु को जन्म प्रमाण-पत्र प्रस्तुत करके साबित किए जाने की ईप्सा की गयी थी प्रवेश देने वाले व्यक्ति की परीक्षा नहीं की गयी थी। ग्राम पंचायत का सचिव, जिसकी अभिरक्षा में जन्म प्रमाण-पत्र था, उसमें ऊपरी लेखन को स्पष्ट नहीं कर सका था और पुनः प्रविष्टि का प्रतिस्थापन उस आनुक्रमिक आदेश के संगत नहीं था, जिसमें अन्य प्रविष्टियां की गयीं थी उक्त जन्म प्रमाण-पत्र बिल्कुल विश्वसनीय नहीं था।

अस्थि परीक्षण मोदी के चार्ट पर आधारित नहीं था और उच्च न्यायालय ने उस पर विश्वास व्यक्त करने से इन्कार कर दिया था। उच्च न्यायालय ने उसे 16 वर्ष से अधिक होना अभिनिर्धारित किया था और अभियुक्त को दोषमुक्त किया था, क्योंकि पीडिता, जिसे डॉक्टर के द्वारा लैंगिक समागम कारित किए जाने के लिए होना पाया गया था, अभिव्यक्त रूप में लैंगिक समागम के लिए सम्मत पक्षकार थी।

रामचित राजभर बनाम पश्चिम बंगाल राज्य 1992 क्रि लॉ ज 372 के मामले में अभियोक्त्री एक किशोर अवस्था की लड़की थी जब वह अपने माता-पिता के साथ अभिकथित बलात्संग के तुरन्त पश्चात पुलिस थाना आई थी और बलात्कारी का नाम बताते हुए प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराई थी और चिकित्सीय साक्ष्य उस पर लैंगिक हमले का समर्थन किए थे जो डॉक्टर के समक्ष दोषी का नाम नहीं ली थी, जिसने नौ दिन घटना के बाद अस्थि परीक्षण किया था, व्यर्थ था।

अस्थि परीक्षण का आंकड़ा आयु के अवधारण के लिए प्रमुख बिन्दुओं को प्रदान करता है

अस्थि परीक्षण का आंकड़ा निम्नलिखित कालानुक्रम आयु के अवधारण के लिए प्रमुख बिन्दुओं को प्रदान करता है। आंकड़े पुरुषों के होते है, जब तक विनिर्दिष्ट रूप में अन्यथा कथन न किया गया हो-

(1) जन्म पर फीमर का निचला सिरा अस्थि का मध्य भाग लगभग 1/2 सेंटीमीटर के व्यास में दर्शाता है। अस्थि का मध्य भाग टेलस और कलकेनियम में विद्यमान होगा और वह क्यूबायड, टीबिया के ऊपरी सिरे और ह्यूमरस के सिर में विद्यमान हो सकता है।

(2) लगभग 1-1/2 वर्ष तक अगले भागों का करोटि अन्तराल समाप्त हो जाना चाहिए।

(3) दो वर्ष तक ऑक्सिपीटल अस्थि का कांडिलर भाग स्क्वैमा के साथ विलीन हो जाता है माथे की संरचनाए भी बन्द हो जाती है।

(4) दो तथा छः वर्ष के बीच एक्स-रे पर विद्यमान कार्पल अस्थियों की संख्या वर्षों में समुचित आयु प्रदर्शित करती है, उदाहरणार्थ जैसे चार कार्यल अस्थिया - चार वर्ष होता है।

(5) स्त्री में चार वर्ष तक और पुरुष में छः वर्ष तक अस्थि का मध्य भाग ह्यूमरस के चिकित्सीय एपिकांडाइल में विद्यमान होता है।

(6) लगभग छः वर्ष तक ऑक्सिपीटल अस्थि का कांडिलर भाग बेसी-अक्सिपुट में विलीन हो जाता है।

(7) सात-आठ वर्ष तक प्यूबिस और स्वियम का रामी एक हो जाता है। सैकलर कशेरुकाएं कार्टिलेज के द्वारा पृथक हो जाती है।

(8) आठ-दस वर्ष तक अस्थि का मध्य भाग ओलेकनन में विद्यमान होता है।

(9) दस-बारह वर्ष तक पिसीफार्म अस्थि में परिवर्तित हो जाता है।

(10) तेरह चौदह वर्ष तक ह्यूमरस का पार्श्वीय एपिकांडाइल ट्रोकलिया और कैपीटलम के साथ एक हो जाता है।

(11) पन्द्रह-सोलह वर्ष तक अस्कालसिस (कल्केनियम) की इपिफाइसिस अस्थि से जुड़ जाती है; एसिटेबुलम की ट्राईराडिएट कार्टिलेज विलीन हो जाती है; कोराकोएड को स्कैपुला के साथ एक हो जाना चाहिए ओलेकैनन को अलना के साथ एक हो जाना चाहिए।

(12) सोलह से अट्ठारह वर्ष तक कोहनियों की सभी एपिफाइसिस (मध्य की एपिकांडाइल के सिवाय), फीमर का सिर और टीबिया का निचला सिरा तत्सम्बन्धी शाफ्टों से जुड़ जाते हैं। महिलाओं में 13-14 वर्ष तक कोहनियों की इपिफाइसिस अपने तत्सम्बन्धी शापटों से जुड़ते हैं।

(13) अट्ठारह-बीस वर्ष तक कलाई, घुटना, इलियम के क्रेस्ट और क्लाविकल के पाश्र्वीय सिरे की सभी इपिफाइसिस एक साथ हो जानी चाहिए। एक्रोमियन को स्कैपुला के साथ जुड़ जाना चाहिए।

(14) बीस वर्ष के ठीक पश्चात् पसलियों के विशेष भागों को एक हो जाना चाहिए। इक्कीस बाइस वर्ष तक महिलाओं में स्चियल ट्यूबेरोसिटी को विलीन हो जाना चाहिए।

(15) बाइस वर्ष तक क्लाविकल की आन्तरिक (द्वितीयक) इपिफाइसिस विलीन हो जाती है।

(16) अट्ठारह से बाइस वर्ष तक बेसी अक्सीपुट को बासी- स्फेनायड के साथ विलीन हो जाना चाहिए।

(17) तेइस वर्ष तक सेक्राल कशेरुका को नीचे से ऊपर तक किसी अन्य के साथ एक हो जाना चाहिए।

यदि सभी इपिफाइसिस एक हो गयी हो, तब व्यक्ति 25 वर्ष से अधिक आयु का होता है। इन आंकड़ों से यह देखा गया है कि वयस्कता के पहले एक अथवा अधिक वर्ष के भीतर संभाव्य आयु का तुलनात्मक रूप में आसानी से अवधारण किया जाता है। और वयस्कता से, जब तक 22 से 25 वर्ष तक कंकाल का समेकन नहीं हो जाता है, तब तक अभी भी 2 वर्ष की सीमा के भीतर निष्पक्ष रूप में गहन आकलन किया जा सकता है।

कतिपय परिस्थितियों में अस्थि का एक्स-रे जांच इलियम के क्रेस्ट के विलीन होने (महिलाओं में 18-19 वर्ष पर) और स्वियल ट्यूबेरोसिटी और क्लाविकल के आन्तरिक सिरे के विलीन होने (महिलाओं मे 21-22 वर्ष पर) को निर्धारित करने के लिए की जाती है।

25 वर्ष पश्चात् निम्नलिखित आकड़ों से आयु का कुछ संकेत प्राप्त किया जा सकता है-

(1) स्टर्नम के चार मध्य के भाग 14 और 25 वर्ष की आयु के बीच नीचे से ऊपर तक किसी अन्य के साथ विलीन हो जाते हैं। शीफाइड प्रक्रिया लगभग 40 वर्ष पर स्टर्नम के शरीर के साथ एक हो जाती है और मैनुनियम वृद्धावस्था में शरीर के साथ जुड़ जाती है।

(2) खोपड़ी की किसी संरचना की समाप्ति का अभाव इस सतत् संभावना का संकेत करता है कि आयु 30 वर्ष से अधिक नहीं है। संरचना की समाप्ति की सामान्य व्यवहार्यता का अपवाद बेसिलर संरचना है, बेसी- अक्सीपुट और बेसी स्फेनायड के बीच का विलयन 18-22 वर्ष पर पूरा होता है। नियमतः संरचनाओं के संयोजन के प्रारम्भ का साक्ष्य पहले आन्तरिक सतह पर और तब बाह्य सतह पर देखा जाता है. आन्तरिक सतह बाह्य के अनेक वर्ष पहले समाप्त हो जाती है। समाप्ति पराइटो-मास्टाइड और स्क्वामस संरचना, जो लगभग 55 और 60 वर्ष तक पूर्ण रूप में समाप्त हो जाती है, के द्वारा अनुसरित सैजिटल (30-35 वर्ष) कोरोनायड (35-40 वर्ष) और लैम्बडायड संरचनाओं ( 45-50 वर्ष) (परिवर्तनीय) के साथ प्रारम्भ होती है और स्फेनो-पराइटल संरचना, जो लगभग 70 वर्ष पर पूर्ण रूप में समाप्त होती है।

(3) अस्थियों का मिलना 40 वर्ष की आयु के पश्चात् प्रारम्भ होता है और इसे सामान्यतः कतिपय स्थानों, जैसे लुम्बार केशरुका और अन्तिम सिरों के जोड़ों में देखा जाता है। अन्ततः कशेरुका की डिस्कों के अगले और पार्वीय अन्तरालों से ऑस्टियोफाइटिक वृद्धि कभी-कभार 40 वर्ष के पहले हो जाती है। डिस्क में स्वयं लगभग 40-45 वर्ष पर असमान परिवर्तन होता है।

(4) होइड अस्थि का बड़ा कोरनू 40 और 60 वर्ष के बीच शरीर के साथ मिल जाता है।

(5) वृद्धावस्था में लेरिजील और कोस्टल कार्टिलेज एक हो जाती है। अस्थियों का सामान्य विघटन भी होता है। ये सभी परिवर्तन संक्षेप में कोई आंकड़े प्रदान नहीं करते हैं, वे केवल इस बात का कुछ संकेत प्रदान करते हैं कि शरीर वृद्ध व्यक्ति का है। इन परिस्थितियों के अधीन दशकों तक आयु का अधिक शुद्ध रूप में आकलन करना मुश्किल से सुरक्षित है।

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