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लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 भाग 29: पॉक्सो अधिनियम के प्रकरणों में पीड़िता के साक्ष्य की संपुष्टि से संबंधित प्रकरण

Shadab Salim
2 Aug 2022 4:30 AM GMT
लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 भाग 29: पॉक्सो अधिनियम के प्रकरणों में पीड़िता के साक्ष्य की संपुष्टि से संबंधित प्रकरण
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लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (The Protection Of Children From Sexual Offences Act, 2012) की धारा 33 विशेष न्यायलयों के लिए एक विशेष प्रक्रिया विहित करती है, इस ही के साथ पीड़िता के साक्ष्य की संपुष्टि से संबंधित अनेक प्रकरण भारत के उच्चतम न्यायालय तक पहुंचे है। इस आलेख में कुछ प्रकरणों का उल्लेख किया जा रहा है।

पीड़िता के साक्ष्य की संपुष्टि

महाराष्ट्र राज्य बनाम चन्द्रप्रकाश केवलचन्द जैन, ए आई आर 1990 एससी 658, के मामले में पीडिता के साक्ष्य की संपुष्टि के पक्ष पर निम्न प्रकार से संप्रेक्षण किया गया था -

अपराध की अभियोक्त्री को सह-अपराधी के सामने नहीं रखा जा सकता है। वह वास्तव में अपराध की पीड़िता होती है। साक्ष्य अधिनियम कहीं भी यह कथन नहीं करता है कि उसके साक्ष्य को तब तक स्वीकार नहीं किया जा सकता है, जब तक वह तात्विक विशिष्टियों में संपुष्ट न हो वह निःसंदेह साक्ष्य अधिनियम की धारा 118 के अधीन सक्षम साक्षी है और उसके साक्ष्य को वही महत्व प्राप्त होना चाहिए, जो शारीरिक हिंसा के मामलों में क्षतिग्रस्त व्यक्तियों से संलग्न होता है। सावधानी और सतर्कता की वही मात्रा उसके साक्ष्य के मूल्यांकन में सलग्न होनी चाहिए, जैसा कि क्षतिग्रस्त परिवादी अथवा साक्षी के मामले में होता है, न कि उससे अधिक होना चाहिए।

जो आवश्यक है, वह यह है कि न्यायालय को इस तथ्य से अवगत तथा सतर्क होना चाहिए कि वह व्यक्ति, जो अपने द्वारा लगाए गये आरोप के परिणाम में हितबद्ध हो, के साक्ष्य पर विचार करते समय यदि न्यायालय उसे ध्यान में रखता है और यह संतुष्टि महसूस करता है कि वह अभियोक्त्री के साक्ष्य पर कार्यवाही कर सकता है, तब धारा 114 के दृष्टांत (ख), जो उसकी संपुष्टि की अपेक्षा करता है के समान साक्ष्य अधिनियम में समाविष्ट विधि अथवा व्यवहार का कोई नियम नही है। यदि कुछ कारणों से न्यायालय को अभियोक्त्री के अभिसाक्ष्य पर अभिव्यक्त विश्वास व्यक्त करने में कोई हिचकिचाहट हो, तब वह सह-अपराधी के मामले में आवश्यक संपुष्टि से कम ऐसे साक्ष्य की माँग कर सकता है, जो उसके अभिसाक्ष्य को आश्वस्त कर सके।

अभियोक्त्री के अभिसाक्ष्य को आश्वस्त करने के लिए आवश्यक साक्ष्य की प्रकृति को आवश्यक रूप में प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर होना चाहिए। परन्तु यदि अभियोक्त्री वयस्क तथा पूर्ण रूप में समझदार हो, तब तक न्यायालय उसके साक्ष्य पर दोषसिद्धि आधारित करने का हकदार होता है, जब तक उसे निःशक्त और विश्वसनीय न होना दर्शाया गया हो।

यदि मामले के अभिलेख पर विद्यमान परिस्थितियों की सम्पूर्णता यह प्रकट करती हो कि अभियोक्त्री को आरोपित व्यक्ति को मिथ्या रूप में शामिल करने के लिए कोई सशक्त हेतुक प्राप्त नहीं है, तब न्यायालय को सामान्यतः उसके साक्ष्य को स्वीकार करने में नही हिचकिचाना चाहिए। इसलिए इस न्यायालय के मस्तिष्क में ऐसा कोई संदेह नहीं है कि सामान्यत: अभियोक्त्री, जिसमें समझ का अभाव नहीं है, के साक्ष्य को स्वीकार किया जाना चाहिए।

आवश्यक सबूत की मात्रा उससे उच्चतर नहीं होनी चाहिए, जो क्षतिग्रस्त साक्षी के लिए अपेक्षित हो, सामान्यतः अभियोक्त्री के साक्ष्य को वही महत्व प्राप्त होना चाहिए, जो ऐसे क्षतिग्रस्त व्यक्ति को सलग्न होता है, जो हिंसा का पीड़ित व्यक्ति हो, जब तक ऐसी विशेष परिस्थिति न हो, जो अधिक सावधानी की अपेक्षा करती हो, जिस स्थिति में उसके अभिसाक्ष्य पर कार्य करना सुरक्षित होगा, यदि उसके अभिकथन को आश्वस्त करते हुए स्वतंत्र साक्ष्य हो।"

जब दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के अधीन परीक्षा में दोष अभियुक्त के बचाव पर कोई प्रतिकूल प्रभाव कारित न कर रहा हो और जब अभिलेख पर साक्ष्य अभियुक्त के दोष को साबित करने के लिए पर्याप्त हो, तब सहिता की धारा 313 के अधीन उसकी परीक्षा में ऐसे दोष की उपेक्षा की जानी है। अभियोजन तथा अभियोजन के न्यायनिर्णयन तक जाने वाली मशीनरी के किसी भाग के द्वारा कारित भूलों को असहाय पीड़ित व्यक्तियों को न्याय प्रदान करने में बाधक होने के लिए अनुज्ञात नहीं किया जाना चाहिए।

अभियोक्त्री का साक्ष्य बहुत शुद्ध होता है और वह न्यायिक मस्तिष्क में विश्वास सृजित करता है। उस पर आधारित दोषसिद्धि और दण्डादेश स्वयं के द्वारा स्वस्थ तथा विधिक होता है। परन्तु इस मामले में इसे भली-भांति चिकित्सीय साक्ष्य के द्वारा संपुष्ट किया गया है।

इस प्रकार उच्च न्यायालय को इस निष्कर्ष पर पहुंचने में कोई हिचकिचाहट नहीं है कि विचारण न्यायालय ने सही तौर पर अपना यह निष्कर्ष अभिलिखित किया है कि अपीलार्थी ने भारतीय दण्ड संहिता की धारा 376 के अधीन दण्डनीय अपराध कारित किया है।

महाराष्ट्र राज्य बनाम मधुकर, जे टी (1990) 4 एस सी 169 के मामले में पुलिस निरीक्षक ने रात्रि में किसी बानूबी की झोपड़ी खटखटाया था और उसमें प्रवेश किया था तथा उसके साथ मैथुन की माँग किया था। उसकी इन्कारी पर उसने उसे विवश करने का प्रयत्न किया था। उसने शोर मचाया था, जिससे उसके पडोसी तथा उसका पति भाग कर आए थे।

इसके उपरान्त बहादुर निरीक्षक ने पुलिस को बुलाया था और यह आदेश दिया था कि बानूबी को पुलिस थाना लाया जाए। बानूबी की शिकायत पर जांच की गयी थी और निरीक्षक को बर्खास्त कर दिया गया था जांच के अनुक्रम में यह प्रकट हुआ था कि बानुबी एक दुष्चरित्र महिला थी निरीक्षक की अपील पर उच्च न्यायालय ने यह संप्रेक्षण किया था कि चूंकि बानूबी एक दुष्चरित्र महिला थी इसलिए ऐसी महिला के असंपुष्ट प्रकथन पर एक शासकीय अधिकारी के भाग्य तथा वृत्ति को संकट में डालने के लिए अनुज्ञात करना असुरक्षित होगा। मामला उच्चतम न्यायालय तक गया।

उच्चतम न्यायालय के द्वारा यह पाया गया था कि बानूबी का साक्ष्य तात्विक विशिष्टियों में संपुष्ट था। उच्च न्यायालय का निर्णय उलट दिया गया।

यदि अभियोक्त्री को उसके अभिसाक्ष्य में सच्ची साक्षी होने के लिए विश्वास किया गया हो, तब किसी अग्रिम संपुष्टि पर जोर नहीं दिया जा सकता है। चूंकि संपुष्टि स्वीकृत रूप में केवल प्रज्ञा का नियम होती है।

मोहम्मद जैनल उद्दीन उर्फ आबेदीन बनाम त्रिपुरा राज्य, 2009 क्रि लॉ ज 2572 (गौहाटी) के मामले में किसी भी अभियोजन साक्षियों ने अभियोक्त्री सहित उसकी माँ, अभियोजन साक्षी 3 जिससे उसकी माँ ने उस घटना को बताया था, जो प्रथम बार बलात्संग कारित करने के प्रति घटित हुई थी, अभिसाक्ष्य का खण्डन नहीं किया था। मामले के साक्ष्य का मूल्यांकन मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है। कोई अतिरिक्त अथवा भिन्न तथ्य शब्द को भिन्न बना सकता है, बलात्संग के ऐसे मामले में स्वयं पीड़िता के अलावा बलात्संग के बारे में ऐसा कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य प्राप्त करना मुश्किल से संभाव्य है, क्योंकि यह एकमात्र चक्षुदर्शी साक्षी थी।

रंजीत हजारिका बनाम असम राज्य के मामले में और हिमाचल प्रदेश राज्य बनान लेखराज, 2000 क्रि लॉ ज 44, के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की दृष्टि में यह कहा जा सकता है कि डॉक्टर का चिकित्सीय साक्ष्य कुछ नहीं, वरन् कारित क्षति के समर्थन में प्रक्रिया सम्बन्धी साक्ष्य होता है, यदि ऐसा साक्ष्य अभियोक्त्री के साक्ष्य के प्रतिकूल हो, तब भी इस शर्त के अधीन एकमात्र अभियोक्त्री के साक्ष्य पर विश्वास व्यक्त करते हुए दोषसिद्धि अभिलिखित की जा सकती है कि यह विश्वसनीय है, क्योंकि प्रत्यक्ष साक्ष्य को चिकित्सीय साक्ष्य, अर्थात् प्रक्रिया सम्बन्धी साक्ष्य, जो केवल राय है, की अपेक्षा अधिक महत्व प्राप्त होता है।

वर्तमान मामले में यह नहीं कहा जा सकता है कि अभियोक्त्री का साक्ष्य विश्वसनीय नहीं है. क्योंकि उसने अभियुक्त-अपीलार्थी के द्वारा कारित किए गये अपराध के सम्बन्ध में पूर्ववर्ती प्रक्रम पर कथन किया था। इसके अतिरिक्त अभियोक्त्री और उसके माता-पिता अपराध कारित करने के लिए किसी निर्दोष व्यक्ति को मिथ्या रूप मे क्यों फसाएंगे।

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