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लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 भाग 26: बालक का मेडिकल टेस्ट से संबंधित न्यायलयीन प्रकरण

Shadab Salim
26 July 2022 11:30 AM GMT
लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 भाग 26: बालक का मेडिकल टेस्ट से संबंधित न्यायलयीन प्रकरण
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लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (The Protection Of Children From Sexual Offences Act, 2012) की धारा 27 में पीड़ित बालक के मेडिकल एक्समिनेशन के संबंध में उल्लेख किया गया है। इस धारा से संबंधित अनेक न्यायलयीन प्रकरण है जिनमे कुछ प्रकरणों का यहां इस आलेख में उल्लेख किया जा रहा जिससे पीड़ित बालक के चिकित्सा परीक्षा के अर्थ को समझा जा सके।

अभियोक्त्री की चिकित्सा विधिक जांच

हिमाचल प्रदेश राज्य बनाम ज्ञान चन्द, 2001 क्रि लॉ ज 2548 एआईआर 2001 के वाद में अभियोक्त्री की चिकित्सा विधिक जांच के दौरान डॉक्टर के द्वारा किया गया और उल्लेख किया गया संप्रेक्षण स्पष्ट रूप में यह बताता है कि अभियोक्त्री के साथ बलात्संग कारित किया गया है। अभियोक्त्री ने अपने कथन में 'प्रवेशन' को बताया है। पीड़िता के गुप्तांग में शुक्राणु का पाया जाना प्रवेशन को साबित करने के लिए आवश्यक नहीं है। ऐसे अनेक कारक हैं, जो शुक्राणु की उपस्थिति को नकार सकते हैं। डॉक्टर की प्रतिपरीक्षा में दिया गया यह सुझाव कि अभियोक्त्री के योनिच्छद पर पायी गयी क्षति की प्रकृति गिरने के द्वारा कारित की जा सकती थी, कहीं भी अग्रसर नहीं होती है। पहला, अभियोक्त्री अथवा उसकी माँ ने प्रतिपरीक्षा के दौरान ऐसा कोई सुझाव नहीं दिया था।

दूसरा, लड़की अथवा उसकी माँ अभियुक्त को बलात्संग से आरोपित करते हुए क्यों फंसाएंगी, यदि क्षति गिरने के द्वारा कारित की गयी हो? अभिलेख पर पायी जाने वाली क्षति का निष्कर्ष निकालने के लिए कुछ भी नहीं है, इसका सुझाव देने के लिए भी कुछ नही है। डॉक्टर को दिए गये सुझाव का उत्तर सुझाव का समर्थन करने के लिए किसी अन्य सामग्री के अभाव में अभियोजन मामले को अविश्वसनीय नहीं बना सकता है। ऐसा पीड़िता के शरीर पर हिंसा के बाह्य चिन्हों के अभाव के मामले में होता है।

ऐसे बच्चों के मामले में, जो हिंसा के बाह्य चिन्हों का प्रतिरोध करने के लिए निर्योग्य होती है, यह नही पाया जा सकता है। यह सत्य है कि अभियुक्त के शरीर पर बाह्य क्षति का कोई चिन्ह नहीं पाया गया है, परन्तु वह स्वयं के द्वारा अभियोजन मामले को नहीं नकारता है। युवा पुरुष के द्वारा बलात्संग कारित की गयी पीड़ित लड़की के मामले में भी यह आवश्यक नहीं है कि ऐसे मामलो में लिंग पर सदैव क्षतियों का चिन्ह होना चाहिए। पुनः यह उल्लेख किया जाना है कि घटना के समय और अभियुक्त की चिकित्सीय जांच के बीच लगभग दो दिन बीत चुका था. जिस समय के भीतर लघु क्षतियां, यद्यपि कारित की गयी हो, सुधर सकती है।

केरल राज्य बनाम राजन उर्फ नासन 2004 क्रि लॉ ज 715 के मामले में अभियुक्त को अपराध से जोड़ने के लिए अन्य सशक्त परिस्थितियां हैं। इसलिए अपराध से अभियुक्त को जोड़ने के लिए अन्य परिस्थितियों के साथ बाल की वैज्ञानिक जांच के परिणामों पर विश्वास व्यक्त किया जा सकता है।

हयात सिंह बनाम राज्य, 2005 क्रि लॉ ज 2473 के मामले में अभिलेख पर चिकित्सीय साक्ष्य से यह स्पष्ट है कि चिकित्सा अधिकारी के द्वारा यह साबित करने के लिए कोई साक्ष्य नहीं पाया जा सका था कि उस पर पांच व्यक्तियों के द्वारा लैंगिक हमला कारित किया गया था। मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए विशेष रूप में इस तथ्य की दृष्टि में अभियोक्त्री लैंगिक समागम की अभ्यस्त थी और उसकी घटना के 6 दिन पश्चात् जांच की गयी थी। यह तथ्य कि उसके शरीर पर कोई क्षति नहीं पायी गयी थी।

केवल यह दर्शाता है कि वह कोई प्रतिरोध नहीं की थी। वह इस तथ्य के कारण हो सकता है कि उस पर पांच व्यक्तियों के द्वारा हावी हुआ गया था और जैसा कि उसके द्वारा बताया गया है, वे उसके पैरों तथा हाथों को बांध दिए थे। लेकिन अभिलेख पर चिकित्सीय साक्ष्य सकारात्मक रूप में अभियोजन के मामले का समर्थन नहीं करता है और इसलिए अभियोजन अभिलेख पर चिकित्सीय साक्ष्य से कोई समर्थन प्राप्त नहीं कर सकता है।

सुब्रामणि बनाम राज्य, 2003 (5) जे टी 6131 के मामले में यह 14 वर्ष की आयु की युवा लड़की की हत्या और बलात्संग का मामला था। अभियुक्त से अन्वेषण अभिकरण के द्वारा जब्त की गयी लुंगी पर रक्त के धब्बे अन्तर्ग्रस्त थे। सीरम विज्ञानी की यह राय थी कि रक्त के धब्बे मानव के थे, परन्तु वह रक्त समूह को साबित करने में समर्थ नहीं था। अभियुक्त ने उस लुंगी को उससे सम्बन्धित होना और उससे जब्त किए जाने को स्वीकार किया था, क्योंकि उस मामले के लिए वह कहता है कि वह अन्वेषण अधिकारी को लुंगी दिया था परन्तु उसने यह स्पष्ट नहीं किया है कि रक्त के धब्बे, जो कम-से-कम मानव रक्त होना साबित किए गये है लुंगी पर कैसे आए थे। चूंकि इस सम्बन्ध में किसी स्पष्टीकरण का अभाव केवल इस अभियोजन मामले को सशक्त बनाएगा कि लुंगी पर रक्त के धब्बे मृतका पर आक्रमण के समय के होने चाहिए इसलिए अभियुक्त को ऐसी परिस्थितियों में अपराध का अपराधी होना अभिनिर्धारित किया जा सकता है।

लखन सिंह बनाम म प्र राज्य, 2004 क्रि लॉ ज 2642 (एम पी) मामले में रासायनिक परीक्षक की कोई रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की गयी है। यह सर्वोत्तम साक्ष्य होगी, क्योंकि प्रथम सूचना रिपोर्ट के अनुसार अभियुक्त ने बलात्संग पूरा करने के पश्चात् अभियोक्त्री के पेटीकोट के द्वारा अपने पुरुष जननांग को साफ किया था। यह भली-भांति कहा जा सकता है कि अभियोजन ने साक्ष्य के सारवान भाग को छिपाया था और इसलिए उसके विरुद्ध प्रतिकूल निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए था।

तमिलनाडु राज्य बनाम रवि, ए आई आर 2006 के प्रकरण में पाँच वर्षीय लड़की अभियोक्त्री का कथन भली-भांति उस साक्षी के द्वारा संपुष्ट हुआ था, जो घटनास्थल पर था। हालांकि डॉक्टर, जिसने अभियोक्त्री की जांच की थी, ने उसके यौनिक भाग और उसके कपड़ों पर रक्त के धब्बों की अनुपस्थिति के बारे में बताया था। अभियोक्त्री की माँ के द्वारा यह स्पष्ट कथन था कि उसे डॉक्टर के पास ले जाने के पहले स्नान कराया गया था और उसके कपड़ो को साफ किया गया था।

डॉक्टर यह अभिलिखित करते हुए कि योनि का योनिच्छद फटा हुआ था, यह राय देने में न्यायसंगत नहीं था कि युवा लड़की की योनि में पुरुष जननांग का प्रवेशन न हुआ होगा। डॉक्टर, जिसने अभियुक्त की जांच की थी, उसके लिंग के निचले भाग पर घाव पाया था और जब उसने कटे हुए घाव को दबाया था, तब उसने रक्त के धब्बे को पाया था, जो उस समय संभाव्य था, जब लिंग को योनि में बलपूर्वक प्रवेश किया गया हो। डॉक्टर ने पुनः यह राय दी थी कि उसका लिंग भली-भांति विकसित था और वह उत्तेजना धारित करता था। अभियुक्त की दोषमुक्ति अपास्त की गयी।

अंगद राम बनाम बिहार राज्य, 2007 क्रि लॉ ज 2337 के मामले में यह अभिकथन किया गया था कि अभियुक्त ने अभियोक्त्री के घर में मध्यरात्रि में प्रवेश किया था और उसके साथ बलपूर्वक बलात्संग कारित किया था। अभियोक्त्री का अभियुक्त के द्वारा उसके साथ बलात्संग कारित करने का अभिसाक्ष्य सच्चा और विश्वसनीय था। अभियुक्त की दोषसिद्धि उचित थी, क्योंकि महिला डॉक्टर की अपरीक्षा और चिकित्सीय रिपोर्ट प्रस्तुत न करना अमहत्वपूर्ण हो जाता है।

जगदीश बनाम राज्य (दिल्ली), 2006 क्रि लॉ ज 408 (दिल्ली) के मामले में अभियुक्त को अभियोक्त्री, एक अवयस्क लड़की को पकड़ने, उसे घर के अन्दर ले जाने, दरवाजा बन्द करने और उसके साथ बलात्संग कारित करने के लिए अभिकथित किया गया था। अभियुक्त ने अभियोक्त्री की उसे अवसर प्रदान करने के बावजूद प्रतिपरीक्षा नहीं की थी। इसलिए अभियुक्त को अपनी प्रतिरक्षा में प्रतिकूल रूप में प्रभावित होना नहीं कहा जा सकता है। अभियोक्त्री का अभिसाक्ष्य स्पष्ट, सशक्त था और वह चिकित्सीय साक्ष्य तथा उसके माता-पिता के कथन के द्वारा भी संपुष्ट था। अभियुक्त की दोषसिद्धि उचित थी, क्योंकि एम एल सी में अभियुक्त के नाम का मात्र लोप घातक नहीं था।

मेडिकल टेस्ट की रिपोर्ट

कण्डामूथन बनाम केरल राज्य, 2020 सी आर एल जे 4367 (केरल) के प्रकरण में चिकित्सक ने जिसने पीड़िता महिला की परीक्षा की थी, अभिसाक्ष्य दिया था कि वह परीक्षण पर विगत योनि प्रवेशन का साक्ष्य पायी थी और उसके द्वारा जारी की गयी उस प्रभाव की चिकित्सा परीक्षा की रिपोर्ट साबित की थी किन्तु यह देखा गया है कि चिकित्सक ने चिकित्सीय परीक्षण की रिपोर्ट में उन कारणों को दर्शित नहीं किया है, जिसके आधार पर वह उस निष्कर्ष पर आयी थी, जो संहिता की धारा 164(क) की उपधारा (3) के निबन्धनों में आज्ञापक है। इस प्रकार, चिकित्सक द्वारा पेश किया गया साक्ष्य अभियोजन के लिए कोई सहायक नहीं है। इसलिए, अभियुक्त सन्देह के लाभ के लिए हकदार है।

मेडिकल रिपोर्ट का महत्व

साधारणतया बलात्संग के अभिकथन को अन्तर्ग्रस्त करने वाले मामले में, जहाँ रिपोर्ट तत्परता से पुलिस के समक्ष दाखिल की गयी है, वहाँ अभियोक्त्री की चिकित्सीय रिपोर्ट महत्व ग्रहण करती है।

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