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लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 भाग 20: पॉक्सो मामले को रिपोर्ट करने के लिए मीडिया, स्टूडियो और फोटो चित्रण सुविधाओं की बाध्यता

Shadab Salim
18 July 2022 6:46 AM GMT
लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 भाग 20: पॉक्सो मामले को रिपोर्ट करने के लिए मीडिया, स्टूडियो और फोटो चित्रण सुविधाओं की बाध्यता
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लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (The Protection Of Children From Sexual Offences Act, 2012) की धारा 20 कुछ संस्थओं को मामलों की रिपोर्ट से संबंधित कुछ बाध्यता देती है। इन संस्थाओं को रिपोर्ट पुलिस अधिकारियों को प्रदान करनी होती है। आलेख में धारा 20 के अर्थ को समझा जा रहा है।

यह अधिनियम में प्रस्तुत धारा का मूल रूप है

धारा 20

मामले को रिपोर्ट करने के लिए मीडिया, स्टूडियो और फोटो चित्रण सुविधाओं की बाध्यता-

मीडिया या होटल या लॉज या अस्पताल या क्लब या स्टूडियो या फोटो चित्रण संबंधी सुविधाओं का कोई कार्मिक, चाहे जिस नाम से ज्ञात हो, उनमें नियोजित व्यक्तियों की संख्या को ध्यान में लाए बिना किसी सामग्री या वस्तु जो किसी माध्यम के उपयोग से, किसी बालक के लैंगिक शोषण संबंधी है (जिसके अंतर्गत अश्लील साहित्य, लिंग संबंधी या बालक या बालकों के अश्लील प्रदर्शन करना भी है) यथास्थिति, विशेष किशोर पुलिस यूनिट या स्थानीय पुलिस को ऐसी जानकारी उपलब्ध कराएगा।

मीडिया (अथवा संसूचना का माध्यम)

यह दैनिक तथा सार्वधिक प्रेस, फिल्म रेडियो तथा टेलीविजन का व्यापक पद है। प्रत्येक तथा सभी व्यक्ति को सूचना प्रदान करने, राय अभिव्यक्त करने और विचारों तथा राय को प्रभावित करने की पर्याप्त शक्ति प्राप्त होती है। मीडिया के सभी रूप मानहानि, राजद्रोह तथा प्रतिलिप्य अधिकार के उल्लघन के दायित्व के निर्बन्धनों के अधीन होते हैं।

मीडिया सामाजिक न्याय के कारण के प्रति महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है

विधायिका और न्यायालयों की अपने प्रयत्नों में भूमिका "आर्थिक और सामाजिक न्याय में प्रवेश करने वाले व्यक्तियों के प्रति विधि का शासन बनाए रखना है और कमजोर वर्गों को फायदा तथा लाभ को सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक प्रशासनिक उपकरणों का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। लेकिन देश में मीडिया अनेक रीतियों में सामाजिक न्याय के कारण के प्रति बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। इस आलोचना के बावजूद कि मीडिया अपनी अधिकारपूर्ण भूमिका नहीं निभा रही है और स्वयं सामाजिक न्याय को प्रवर्धित करने के कार्य के साथ सभी सम्बद्ध क्षेत्रों के द्वारा किए गये अच्छे कार्य को प्रदर्शित करने की उपेक्षा करने के लिए आजकल राजनीति में व्यस्त है. इसलिए मीडिया के द्वारा किए गये अच्छे कार्य को तथा भविष्य में और अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की इसकी संभाव्य क्षमताओं और क्षमताओं के बारे में बताना आवश्यक है।

सार्वजनिक और प्राइवेट सम्पत्तियों का विनाश बनाम आन्ध्र प्रदेश राज्य, 2000 क्रि लॉ ज 2807 (एससी) मीडिया के द्वारा अपनाए जाने वाले पर्याप्त दिशानिर्देश उच्चतम न्यायालय के द्वारा स्थापित समिति के द्वारा बन्द / आन्दोलन, आदि में सार्वजनिक / प्राइवेट सम्पत्ति के विनाश को निवारित करने के लिए प्ररूप को तलाश करने का सुझाव दिया गया था। यह अभिनिर्धारित किया गया था कि वह ऐसा पर्याप्त दिशानिर्देश गठित करता है, जो मीडिया के द्वारा अपनाया जाना आवश्यक है, परन्तु उच्चतम न्यायालय ने उनके क्रियान्वयन के लिए कोई सकारात्मक निर्देश जारी करने से इन्कार कर दिया था।

मीडिया आर्थिक और सामाजिक न्याय को प्रवर्धित करने के लिए मूल्यवान उपायों का सशक्त उपकरण हो सकती है-

प्रेस और अन्य माध्यम सामाजिक वैज्ञानिक" "आलोचक", परियोजनाओं तथा योजनाओं के मूल्यांकक के विचारों तथा विचारधाराओं को प्रकोपित करके भूमिका निभाए हैं, गरीब और कमजोर वर्गों के न्याय के प्रति पहुंच तथा कार्यपालिका की मनमानी तथा सनकपूर्ण शक्ति को सुधारने के मामले में तथा सामाजिक न्याय के परिदान के उत्तरदायित्व से प्रभारित विभिन्न संस्थाओं के द्वारा सहायता प्रदान किए है। इसके अलावा वे "विधि के शासन के अनुरक्षण के प्रति योगदान दिए हैं तथा "लोकतंत्र" और "स्वतंत्र समाज" को अपमानित करने का बलपूर्वक विरोध करने का प्रयत्न किए हैं। सार्वजनिक राय के माध्यम से प्रदर्शित प्रेस की शक्ति सरकार के सशस्त्र बलों पर राय की विजय को समर्थ बनाती है।

जनता तक पहुंचने के लिए सूचना, विचार-विमर्श और समर्थन के मुख्य स्त्रोत के रूप में कार्य किया है। यह विचार तथा विचार-विमर्श को सुकर बना सकती है. सभ्यता को अग्रसर कर सकती है, विश्व समुदाय सृजित करने में सहायता प्रदान कर सकती है, स्वतंत्र समाज के लक्ष्य के व्यापक प्रवर्धन तथा मूल्यांकन में सहायता प्रदान कर सकती है।

शक्ति के नियन्त्रक के रूप में सरकार के प्रयत्नों को स्वतंत्र प्रेस के बिना उसके मनमाने ढंग से अथवा जनकपूर्ण रूप में प्रयोग से अवरूद्ध नहीं किया जा सकता है। जैसा कि प्रेस पर रॉयल आयोग के द्वारा बताया गया है प्रेस की राजनीतिक मान्यता प्रेस को प्रस्तुत करने की नीति का समर्थन अथवा विरोध करने के लिए समर्थ बनाती है। राजनीति के विवाद अथवा आजकल की राजनीति पर प्रेस का आधार स्वतंत्र समाज की अपेक्षाओं के प्रकाश में समझने योग्य है परन्तु सामाजिक अथवा आर्थिक न्याय अथवा सवितरित न्याय से सम्बन्धित विवाद विभिन्न विधिया योजनाओं और परियोजनाओं का समाज के कल्याण तथा निम्न वर्ग के व्यक्ति के प्रति न्याय को सुनिश्चित करने के लिए परिवर्तन हेतु समाज की भाँग की आवश्यकता के दृष्टिकोण से मूल्याकन आवश्यक है।

यह इस बात को आवश्यक बना सकता है कि मीडिया सध्ये ढंग से तथ्यों को अभिलिखित करती है और राय की अभिव्यक्ति रंजित दमित अथवा विकृत नहीं होती है। यदि ऐसा दृष्टिकोण अपनाया जाता है तब मीडिया आर्थिक और सामाजिक न्याय को प्रवर्धित करने और उस रीति को बताने के मूल्यवान उपाय के रूप में सशक्त उपकरण हो सकती है कि उसमें किस रीति में दोष और कमिया पायी गयी है। यह विधियों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए व्यवहार्य तथा आन्वयिक सुझाव भी प्रदान कर सकती है।

भारतीय प्रेस परिषद के पास समाज के द्वारा प्रस्तुत किए गये दस्तावेज-

चूंकि सोसाइटी के द्वारा अपने पुनर्गठन के लिए भारतीय प्रेस परिषद में दस्तावेजों को प्रस्तुत कर दिया गया था. इसलिए वे दस्तावेज सार्वजनिक दस्तावेज थे और वह शुद्ध रूप में सोसाइटी का वैयक्तिक दस्तावेज था. जिसे उन्हें प्रदान किया गया था. उनके बारे में कोई गोपनीयता नहीं थी।

मीडिया के प्रतिनिधि के लिए कोई बाधा नहीं जब कोई व्यक्ति अवैध रूप में अथवा विधि के उल्लंघन में निरुद्ध असहाय महिला के लिए न्याय की माँग करते हुए न्यायाधीशों के पास पत्र सम्बोधित कर सकता है।

पी बी विजय कुमार बनाम आन्ध्र प्रदेश राज्य ए आई आर 1988 ए पी 295 निलमा प्रिय दर्शिनी बनाम बिहार राज्य, ए आई आर 1987 एस सी 2021 तब मीडिया के प्रतिनिधि अथवा सूचीबद्ध व्यवसायी के लिए विधि के गम्भीर अतिलघनों के प्रति न्यायालयों का ध्यान आकर्षित करते हुए समाचार-पत्र के स्तम्भों मे कहानी लिखने में कोई बाधा नहीं हो सकती है।

वास्तव में जैसा कि अनेक मामलों में सूचित किया गया है यह किया गया है. उदाहरणार्थ शीर्षक सैनिक की पत्नी 40 साल से पेंशन के लिए भटक रही है (हवलदार की विधवा की पेंशन को विगत 40 वर्षों से रोक दिया गया है) के अन्तर्गत दैनिक समाचार-पत्र (सितम्बर 1985) में विद्यमान कहानी। राजस्थान उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति ने रिपोर्ट का संज्ञान लिया था।

राम प्यारी बनाम भारत सघ एआईआर 1988 राजस्थान 124, और वह यह डिक्रीत करने के लिए समर्थ था कि वह उस रियायत और लाभों की हकदार थी. जो उस व्यक्ति के परिवार को प्रदान किया जाना था और एक मास के भीतर पेंशन के सभी बकायों को विधवा को सदत्त करने और व्यतिक्रम में बकाए पर 12 प्रतिशत की दर से ब्याज सदत्त करने के लिए सरकार को निर्देशित किया था।

मीडिया विधि के बारे में शिक्षित करने के लिए सेवा प्रदान कर रही है-

विधिक साक्षरता विधि के शासन को बनाए रखने की पूर्ववर्ती शर्त है। मीडिया लोगो को विधियों, उनके अधिकारों तथा विभिन्न योजनाओं और उपायों से उद्भूत लाभों के बारे में शिक्षित करने के लिए महत्वपूर्ण सेवा प्रदान कर रही है। कार्यक्रम, जैसे अपने अधिकारों के बारे में जानिए "सामान्य व्यक्ति की विधि", विधिक पक्षो पर टी वी के सीरियल और सिनेमा शिक्षित करने के अलावा विधिक जागरूकता सृजित करते हैं।

दूरदर्शन को निष्पक्ष रूप में, युक्तियुक्त रूप में, वस्तुनिष्ठ रूप में और किसी विद्वेष अथवा बुरी इच्छा के बिना समझा गया टी वी सीरियलों के प्रस्तावों की स्वीकृति के सम्बन्ध में निष्पक्ष प्रसारण होना चाहिए। यह सुनिश्चित है कि दूरदर्शन जैसे प्राधिकारियों को निष्पक्ष रखा जाना चाहिए और उनकी कार्यवाही को विधिमान्य होना चाहिए तथा निष्पक्ष और संव्यवहार को किसी प्रतिक्रिया, विद्वेष अथवा स्नेह के बिना होना चाहिए। ऐसा कुछ भी नहीं किया जाना चाहिए, जो पक्षपात अथवा भाई-भतीजा वाद का प्रभाव प्रदान करता हो।

वर्तमान जैसे मामलों में कार्यवाही में निष्पक्ष प्रवाह आवश्यक अपेक्षाएं हैं, लेकिन इसी तरह "संयोजनों में स्वतंत्र प्रवाह भी प्रशासनिक क्षेत्र अथवा अर्धप्रशासनिक क्षेत्र में कार्य करने वाले प्रशासनिक निकाय के लिए आवश्यक सहवर्तिता है। उस विचार बिन्दु से निश्चित करने पर यद्यपि सभी प्रस्तावों पर पूर्व निर्णय की व्यवस्था के अनुसार कठोर रूप में विचार नहीं किया जा सकता है, फिर भी यह प्रतीत होता है कि इन पर निष्पक्ष रूप में, युक्तियुक्त रूप में, वस्तुनिष्ठ रूप में और बिना किसी विद्वेष अथवा बुरी इच्छा के विचार किया गया था।

मीडिया द्वारा स्टिंग ऑपरेशन

मीडिया के द्वारा विचारण नहीं किया गया है, क्योंकि दूरदर्शन स्वयं बी एम डब्ल्यू मामले के गुणावगुण से सम्बन्धित नहीं है। दूरदर्शन मात्र उसे विशेष रूप में स्पष्ट करने की माँग करता है, जो एन डी टी वी मामले को संभालने वाले अधिवक्ताओं के आचरण के सम्बन्ध में क्रियाकलापों की अवस्था होने का विश्वास करता है।

यह विशेष रूप में यह स्पष्ट करने की माँग करता है कि उसके द्वारा स्टिंग ऑपरेशन के समूह के माध्यम से एकत्र की गयी सामग्री के आधार पर क्रियाकलापों की अवस्था है। एन. डी. टी. बी. निःसंदेह अपने विचार विन्दु को विशेष रूप में स्पष्ट करने की हकदार है, यह स्पष्ट रूप में वाक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के द्वारा आच्छादित है यह कि इसे इस प्रकार और सक्रिय मामले में घुसपैठ और चालाकीपूर्वक रीति में एकत्र की गयी सामग्री के साथ किया जाना चाहिए, पूर्ण रूप में भिन्न विवाद है।

मीडिया के अप्राधिकृत विचारण से व्यक्ति के अधिकारों तथा ख्याति को संरक्षित करने में सतर्क और अग्रसक्रिय न्यायालय यह सराहना करता है कि कुछ मामलों (व्यापक रूप में आपराधिक मामलों) के सम्बन्ध में हमारे देश की न्यायिक परिदान प्रणाली वास्तविक रूप में उस तरह से प्रगति करती है, जैसे कछुआ चाल होती है और अधिकांशतः किसी निर्दोष व्यक्ति को कोई वास्तविक उपचार उपलब्ध नहीं होता है. यदि उसे किसी मामले में आरोपित किया गया हो अथवा उसे मीडिया के द्वारा विचारण के अधीन बनाया गया हो।

इसके परिणामस्वरूप कभी-कभी वह या तो व्यादेश के माध्यम से या मीडिया के द्वारा विचारण के मामले में क्षतिपूर्ति के लिए अनुतोष हेतु न्यायालय के किसी दृष्टिकोण को अपनाता है। ऐसी वास्तविकता होने के कारण न्यायालय की यह राय है कि न्यायालयों को महान उत्तरदायित्व प्राप्त है और इसलिए उसे किसी व्यक्ति के अधिकारों तथा ख्याति को मीडिया के द्वारा अप्राधिकृत विचारण से संरक्षित करने में और अधिक सतर्क तथा अग्रसक्रिय होना आवश्यक है। यह हमारे दण्ड न्यायालयों पर भार बढ़ा सकता है, जबकि न्यायालय का यह विचार है कि न्यायालयों के लिए।

नागरिक को उससे संरक्षित करना आज्ञापक है, जो अत्याचार होना प्रतीत हो सकता है, यह निश्चित रूप में न्यायालयों का कर्तव्य है, यदि आबद्धता नहीं है। यदि अभियुक्त को विचारण के अधीन या तो प्रिंट या श्रव्य दृश्य माध्यम के द्वारा बनाया जाता है, तब यह न्यायाधीश के निर्णय को प्रतिकूल रूप में प्रभावित कर सकता है और वह अभियुक्त के प्रतिकूल हो सकेगा, जिससे हमारी न्यायिक परिदान प्रणाली में तब तक निर्दोष होने की उपधारणा की जाती है, जब तक उसे दोषी साबित न किया गया हो।

ऐसी स्थिति में, न्यायाधीश को समानान्तर विचारण करने से मीडिया को अवरुद्ध करते हुए अग्रसक्रिय होना चाहिए, अन्यथा हमारी दाण्डिक न्याय सामान्य व्यक्ति की विधि विधिक पक्षों पर टी. वी के सीरियल और सिनेमा शिक्षित करने के अलावा विधिक जागरूकता सृजित करते हैं।

दूरदर्शन को निष्पक्ष रूप में, युक्तियुक्त रूप में, वस्तुनिष्ठ रूप में और किसी विद्वेष अथवा बुरी इच्छा के बिना समझा गया टी वी सीरियलों के प्रस्तावों की स्वीकृति के सम्बन्ध में निष्पक्ष प्रसारण होना चाहिए। यह सुनिश्चित है कि दूरदर्शन जैसे प्राधिकारियों को निष्पक्ष रखा जाना चाहिए और उनकी कार्यवाही को विधिमान्य होना चाहिए तथा निष्पक्ष और संव्यवहार को किसी प्रतिक्रिया, विद्वेष अथवा स्नेह के बिना होना चाहिए। ऐसा कुछ भी नहीं किया जाना चाहिए जो पक्षपात अथवा भाई-भतीजा वाद का प्रभाव प्रदान करता हो।

वर्तमान जैसे मामलों में कार्यवाही में निष्पक्ष प्रवाह आवश्यक अपेक्षाए है, लेकिन इसी तरह "संयोजनों में स्वतंत्र प्रवाह भी प्रशासनिक क्षेत्र अथवा अर्धप्रशासनिक क्षेत्र में कार्य करने वाले प्रशासनिक निकाय के लिए आवश्यक सहवर्तिता है उस विचार बिन्दु से निश्चित करने पर यद्यपि सभी प्रस्तावों पर पूर्व निर्णय की व्यवस्था के अनुसार कठोर रूप में विचार नहीं किया जा सकता है, फिर भी यह प्रतीत होता है कि इन पर निष्पक्ष रूप में युक्तियुक्त रूप में वस्तुनिष्ठ रूप में और बिना किसी विद्वेष अथवा बुरी इच्छा के विचार किया गया था।

न्यायालय की स्वप्रेरणा से संबंधित एक मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा कहा गया है कि मीडिया द्वारा स्टिंग ऑपरेशन मीडिया के द्वारा विचारण नहीं किया गया है, क्योंकि दूरदर्शन स्वयं बी एम डब्ल्यू मामले के गुणावगुण से सम्बन्धित नहीं है। दूरदर्शन मात्र उसे विशेष रूप में स्पष्ट करने की माँग करता है, जो एन. डी. टी. वी. मामले को संभालने वाले अधिवक्ताओं के आचरण के सम्बन्ध में क्रियाकलापों की अवस्था होने का विश्वास करता है।

यह विशेष रूप में यह स्पष्ट करने की माँग करता है कि उसके द्वारा स्टिंग ऑपरेशन के समूह के माध्यम से एकत्र की गयी सामग्री के आधार पर क्रियाकलापों की अवस्था है। एन. डी. टी. वी. निःसंदेह अपने विचार बिन्दु को विशेष रूप में स्पष्ट करने की हकदार है, यह स्पष्ट रूप में वाक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के द्वारा आच्छादित है यह कि इसे इस प्रकार और सक्रिय मामले में घुसपैठ और चालाकीपूर्वक रीति में एकत्र की गयी सामग्री के साथ किया जाना चाहिए, पूर्ण रूप में भिन्न विवाद है।

मीडिया के अप्राधिकृत विचारण से व्यक्ति के अधिकारों तथा ख्याति को संरक्षित करने में सतर्क और अग्रसक्रिय न्यायालय यह सराहना करता है कि कुछ मामलों (व्यापक रूप में आपराधिक मामलों) के सम्बन्ध में हमारे देश की न्यायिक परिदान प्रणाली वास्तविक रूप में उस तरह से प्रगति करती है, जैसे कछुआ चाल होती है और अधिकांशत किसी निर्दोष व्यक्ति को कोई वास्तविक उपचार उपलब्ध नहीं होता है, यदि उसे किसी मामले में आरोपित किया गया हो अथवा उसे मीडिया के द्वारा विचारण के अधीन बनाया गया हो।

इसके परिणामस्वरूप कभी-कभी वह या तो व्यादेश के माध्यम से या मीडिया के द्वारा विचारण के मामले में क्षतिपूर्ति के लिए अनुतोष हेतु न्यायालय के किसी दृष्टिकोण को अपनाता है। ऐसी वास्तविकता होने के कारण न्यायालय की यह राय है कि न्यायालयों को महान उत्तरदायित्व प्राप्त है और इसलिए उसे किसी व्यक्ति के अधिकारों तथा ख्याति को मीडिया के द्वारा अप्राधिकृत विचारण से संरक्षित करने में और अधिक सतर्क तथा अग्रसक्रिय होना आवश्यक है।

यह हमारे दण्ड न्यायालयों पर भार बढा सकता है, जबकि न्यायालय का यह विचार है कि न्यायालयों के लिए नागरिक को उससे संरक्षित करना आज्ञापक है, जो अत्याचार होना प्रतीत हो सकता है, यह निश्चित रूप में न्यायालयों का कर्तव्य है. यदि आबद्धता नहीं है। यदि अभियुक्त को विचारण के अधीन या तो प्रिंट या श्रव्य-दृश्य माध्यम के द्वारा बनाया जाता है।

तब यह न्यायाधीश के निर्णय को प्रतिकूल रूप में प्रभावित कर सकता है और वह अभियुक्त के प्रतिकूल हो सकेगा, जिससे हमारी न्यायिक परिदान प्रणाली में तब तक निर्दोष होने की उपधारणा की जाती है, जब तक उसे दोषी साबित न किया गया हो। ऐसी स्थिति में न्यायाधीश को समानान्तर विचारण करने से मीडिया को अवरुद्ध करते हुए अग्रसक्रिय होना चाहिए, अन्यथा हमारी दाण्डिक न्याय की परिदान प्रणाली पूर्ण रूप में समाप्त हो जाएगी। ऐसा करने की असफलता कुछ मामलों में उद्भूत दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति में परिणामित होगी।

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