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लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 भाग 19: प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने में देरी का परिणाम

Shadab Salim
16 July 2022 4:30 AM GMT
लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 भाग 19: प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने में देरी का परिणाम
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लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (The Protection Of Children From Sexual Offences Act, 2012) की धारा 19 पॉक्सो अधिनियम में रिपोर्ट दर्ज करने की रीति प्रस्तुत करती है। इस आलेख में रिपोर्ट दर्ज करने में देरी के परिणाम के संबंध में चर्चा की जा रही है।

प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराने में विलम्ब

दोषमुक्ति न्यायसंगत नहीं लैंगिक अपराधों में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराने में विलम्ब अनेक कारणों से, विशेष रूप में अभियोक्त्री अथवा उसके परिवार के सदस्यों की पुलिस के पास जाने और उस घटना, जो अभियोक्त्री की ख्याति और उसके परिवार के सम्मान से सम्बन्धित है, के बारे में शिकायत करने की अनिच्छुकता के कारण हो सकती है।

यह केवल सोचने-विचारने के पश्चात है कि सामान्यतः लैगिक अपराध का परिवाद दर्ज कराया जाता है। प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराने में विलम्ब अभियोजन मामले के लिए घातक नहीं होगा, यदि विलम्ब को उचित रूप में स्पष्ट किया गया हो। इस सम्बन्ध में पंजाब राज्य बनाम गुरमीत सिंह, एआईआर 1996 एससी 1393 1996 क्रि लॉ ज 1728, के मामले में माननीय उच्चतम न्यायालय के निर्णय को निर्दिष्ट किया जा सकता है।

भेरू लाल बनाम राजस्थान राज्य, 2004 क्रि लॉ ज 1677 (राज) माननीय उच्चतम न्यायालय के द्वारा किए गये उक्त संप्रेक्षणों को ध्यान में रखते हुए और मामले के सम्पूर्ण तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए चूंकि उस दिन, जब लड़की अभियोक्त्री अभियोजन साक्षी 1 के द्वारा सम्पूर्ण घटना का प्रकथन अपनी माँ अभियोजन साक्षी 2 से किया गया था, तब लड़की अभियोक्त्री का पिता अभियोजन साक्षी 4 गांव में नहीं था, इसलिए गांव में आने के पश्चात् उसने विलम्ब के साथ रिपोर्ट दर्ज कराया था, ऐसे विलम्ब को अभियोजन मामले के लिए घातक होना नहीं कहा जा सकता है।

राजस्थान राज्य बनाम नूरे खान, 2000 (3) सुप्रीम 70 2000 मामले में अभियुक्त को इस आधार पर दोषमुक्त कर दिया गया था कि अभियोक्त्री 16 वर्ष से अधिक आयु की थी और सम्मत पक्षकार थी। लेकिन चिकित्सीय साक्ष्य के अनुसार वह 15 वर्ष आयु की थी, परन्तु फिर भी 3 वर्ष अधिक अथवा कम का परिवर्तन था। इसलिए यह अभिनिर्धारित नहीं किया जा सकता था कि वह 16 वर्ष से कम की थी ऐसी परिस्थितियों में क्षति का अभाव यह अभिनिर्धारित करने के लिए आधार नहीं हो सकता है कि वह सम्मत पक्षकार थी। प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराने में विलम्ब अभियुक्त के समुदाय के लोगों को मामला सुलझाने के प्रयत्न के कारण था। इसलिए अभियुक्त की दोषमुक्ति न्यायसंगत नहीं थी।

चमरू राम बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य, 2005 क्रि लॉ ज 1943 (एच पी) मामले में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराने में अस्पष्टीकृत विलम्ब न केवल कुछ घण्टो का, वरन् लगभग आठ दिन का है। एस. उसकी माँ, प्रेमी देवी और उसके पिता नन्त राम के अविश्वसनीय और अविश्वस्त साक्ष्य की दृष्टि में परामर्श के पश्चात् रंजित प्रकथन को शामिल करने की संभावना से विशेष रूप में उस समय इन्कार नहीं किया जा सकता है जब स्वीकृत रूप में एस के माता-पिता और अभियुक्त के बीच दुश्मनी हो और अभियुक्त स्वीकृत रूप में बलात्संग के अभियुक्त को मिथ्या मामले में फसा करके क्षतिपूर्ति के लिए दावा किया हो।

प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराने में विलम्ब का कारण बताया गया है। अभियोक्त्री के माता-पिता पहले अभियोक्त्री को तलाशने का प्रयत्न किए थे और जब वे विफल हुए थे, तब अभियोक्त्री के पिता ने प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराया था। ऐसी परिस्थितियों में विलम्ब यह निष्कर्ष अग्रसर नहीं करता है कि परिवाद मिथ्या था। मामले की परिस्थितियों में केवल प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराने में विलम्ब निर्णायक होना नहीं कहा जा सकता है।

मोहम्मद अख्तर बनाम बिहार राज्य, 2005 (35) ए आई सी 739 (झार) जहाँ पर अभियोजन मामला पर्याप्त रूप में पीड़िता और साक्षियों के द्वारा संपुष्ट हुआ हो वहां पर मात्र अन्वेषण अधिकारी और डॉक्टर की परीक्षा न होना तथा प्रथम सूचना रिपोर्ट के पहुंचने में विलम्ब अभियोजन मामले के विरुद्ध नहीं था इस प्रकार, दोषसिद्धि में कोई हस्तक्षेप आवश्यक नहीं है। चूंकि अभियुक्त पहले ही 9 वर्ष से अधिक समय तक अभिरक्षा में रहा है, इसलिए आजीवन कारावास के दण्ड को 12 वर्ष के कठोर कारावास तक कम किया गया।

मात्र इस कारण से कि परिवाद तत्काल दर्ज नहीं कराया गया था, यह निष्कर्ष अग्रसर नहीं करता है कि परिवाद मिथ्या था। पुलिस के पास जाने की अनिच्छुकता ऐसी महिलाओं के प्रति समाज के दृष्टिकोण के कारण है; यह उसके साथ आराम और सहानुभूति की अपेक्षा संदेह और शर्मिंदगी सृजित करता है। इसलिए ऐसे मामले में परिवाद दर्ज कराने में विलम्ब आवश्यक रूप में यह इंगित नहीं करता है कि उसका प्रकथन मिथ्या है।

मात्र प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराने में विलम्ब स्वयं के द्वारा आवश्यक रूप में अभियोजन मामले के लिए घातक नहीं था। परन्तु यह तथ्य कि रिपोर्ट विलम्बित रूप में दर्ज करायी गयी थी. ऐसा सुसंगत तथ्य था, जिसका न्यायालय को संज्ञान लेना चाहिए।

पीड़िता और उसके पति का साक्ष्य यह था कि पति के द्वारा पुलिस के पास मामले की रिपोर्ट दर्ज कराने की प्रारम्भिक अनिच्छुकता थी। वह वास्तव में घटना के दिन अपनी पत्नी को काम पर ले गया था और उसे थप्पड़ मारा था बलात्संग के मामलों में पुलिस के पास जाने की अनिच्छुकता ऐसी महिला के प्रति समाज के दृष्टिकोण के कारण होती है। यह उस पर आराम और सहानुभूति की अपेक्षा संदेह और शर्मिंदगी अधिरोपित करता है। इसलिए मात्र इस कारण से कि परिवाद को तत्काल दर्ज नहीं कराया गया था. परिवाद को मिथ्या नहीं बनाता था।

10 वर्षीय गांव की लड़की के बलात्संग के मामले में अभियुक्त को अपराधी के रूप में पहचानने पर तत्काल प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करायी गयी थी और ऐसे मामले में कारित विलम्ब घातक नहीं होता है।

यह अभिकथन किया गया था कि अभियुक्त अभियोक्त्री एक विधवा को बलपूर्वक घसीटा था और उसके साथ बलात्संग कारित किया था। अभियोक्त्री का अभिसाक्ष्य सच्चा था और विश्वास प्रेरित करता था। प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराने में विलम्ब अभियोक्त्री तथा उसके साक्षियों के द्वारा बताए गये कारणों और इस तथ्य के कारण स्पष्ट किया गया था कि वे दूरस्थ क्षेत्र से सम्बन्धित थे।

प्रथम सूचना रिपोर्ट दाखिल करने की तारीख में भ्रम पुलिस अन्वेषण में शिथिलता के कारण था। अभियोक्त्री के शरीर पर, विशेष रूप में उसे रतन के क्षेत्र पर और पीठ पर खरोंच के चिन्ह पाए गये थे, जो तद्द्द्वारा अनियोजन मामले का समर्थन कर रहे थे। अभियुक्त की दोषसिद्धि उचित थी, परन्तु अन्वेषण में पुलिस के आचरण तथा चिकित्सीय जांच में डॉक्टर की भूमिका की निन्दा की गयी थी।

यह अभिकथन किया गया था कि अभियुक्त अभियोक्त्री के घर में उस समय आया था, जब यह अकेली थी, उसका मुंह दबाया था, उसे चारपाई पर फेक दिया था और लैंगिक समागम कारित किया था प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराने में विलम्ब, यदि कोई हो, घातक नहीं था, क्योंकि अभियोक्त्री ने घटना के ठीक पश्चात् घटना को अपनी सास को बताया था, जो अभियोक्त्री के चिल्लाने पर घटनास्थल पर आयी थी। अभियुक्त की दोषसिद्धि उचित थी, क्योंकि अभियोक्त्री पर क्षति का अभाव अभियोक्त्री के विश्वसनीय तथा विश्वस्त अभिसाक्ष्य को नामंजूर करने के लिए पर्याप्त नहीं था।

प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराने में पांच दिन के विलम्ब को अभियोक्त्री के द्वारा सम्यक रूप में स्पष्ट किया गया था। पीड़िता अभियुक्तों को नहीं जानती थी और निर्दोष व्यक्तियों को फँसाने का कोई हेतुक, चाहे जो कुछ भी हो, नहीं था। अभिलेख पर पूर्ववर्ती दुश्मनी को दर्शाने के लिए कुछ भी नहीं था। जब एक बार बलात्संग कारित करने का तथ्य साबित हो गया हो, तब लघु कमियां अमहत्वपूर्ण हो जाती है। यदि अभियोक्त्री अभियुक्तों को फँसाना चाहती होती. तब वह पांच दिन तक चुप न बैठती।

रामदास बनाम महाराष्ट्र राज्य, एआईआर 2007 एससी 155 (2007) 2 एससीसी 170] के मामले में कोई युक्तियुक्त स्पष्टीकरण नहीं दिया गया था। अभियोक्त्री का चाचा, जिसने अभिकथित रूप में अभियुक्त को अभियोक्त्री को खेत में घसीटते हुए देखा था और उसे बचाने का प्रयत्न किया था, का साक्ष्य विश्वसनीय नहीं था। अनियोक्त्री असंज्ञेय अपराध से सम्बन्धित पुलिस के पास पहले प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराने के तथ्य को छिपाने का प्रयत्न की थी। उक्त तथ्य की दृष्टि में बलात्संग का अभिकथन करते हुए उसके द्वारा दर्ज करायी गयी दूसरी रिपोर्ट उसकी सच्चाई के बारे में संदेह उदभूत करती है। अभियुक्त संदेह के लाभ का हकदार था, क्योंकि अभियोक्त्री ऐसी सच्ची गुणवत्ता की साक्षी होना प्रतीत नहीं होती है, जिसके एकमात्र अभिसाक्ष्य पर दोषसिद्धि आधारित की जा सकती है।

प्रथम सूचना रिपोर्ट / लिखित परिवाद दर्ज कराने के लिए छः दिन के विलम्ब को अभियोजन के द्वारा पर्याप्त रूप में स्पष्ट किया गया है और इसलिए अभियोजन मामला विलम्ब के पूर्वोक्त आधार पर प्रभावित नहीं हो सकता है।

मोहम्मद ताहिर अली बनाम असम राज्य, 2007 क्रि लॉ ज 1024 (गौहाटी) यह अभिकथन किया गया था कि अभियुक्त ने पीडिता के निवास गृह में प्रवेश किया था और उसके साथ बलपूर्वक समागम कारित किया था प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराने में दो दिन के विलम्ब को संतोषजनक रूप में स्पष्ट किया गया था। अनियोक्त्री का साक्ष्य सच्चा था और वह उसके पति तथा सौतेले पुत्र के द्वारा संपुष्ट था। इसके बारे में पीड़िता के अभिसाक्ष्य में विसंगति कि क्या उसे उसके साथ बलात्संग के पहले अथवा उसके पश्चात् पीटा गया था, सुसंगत नहीं था। पीड़िता की विलम्बित जांच के कारण हिंसा अथवा लैंगिक समागम का कोई संकेत प्राप्त करने की कोई संभावना नहीं थी। अभियुक्त की दोषसिद्धि उचित थी।

प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराने में विलम्ब, जिसके लिए परिवादिनी / अभियोक्त्री के साथ ही साथ उसके पिता मुरारी (अ सा 5) के द्वारा युक्तियुक्त स्पष्टीकरण दिया गया है. के सम्बन्ध में अपीलार्थी की ओर से यह तर्क किया गया है कि जब वे रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए जा रहे थे, तब अपीलार्थी/अभियुक्त ने बन्दूक से लैस हो करके उन्हें मार डालने की धमकी दी थी। ऐसी परिस्थितियों में युक्तियुक्त स्पष्टीकरण अभिलेख पर है, इसलिए प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराने में विलम्ब को अभियोजन के लिए भी घातक नहीं पाया गया है।

यह सुस्थापित है कि बलात्संग को और वह भी उन पीड़िताओं का अन्तर्ग्रस्त करने वाले मामलों में, जो अवयस्क आयु की हैं और जो सामाजिक रूप से और आर्थिक रूप से अविशेषाधिकृत वर्ग से सम्बन्धित है केवल समय का अन्तराल अभियोजन के लिए घातक नहीं हो सकता। फिर भी, समय का लम्बा अन्तराल अभिलेख पर अन्य साक्ष्य का मूल्यांकन करते समय निःसन्देह विचार में लिया जाने वाला तथ्य होगा।

प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराने में विलम्ब सत्यता पर संदेह सृजित नहीं करता है-

जहाँ पर बलात्संग के मामले में प्रथम सूचना रिपोर्ट अगले दिन दर्ज करायी गयी थी, वहां पर मात्र इस कारण से कि परिवाद को तत्काल दर्ज नहीं कराया गया था, यह प्रश्न उद्भूत नहीं करता है कि परिवाद मिथ्या था। पुलिस के पास जाने की अनिच्छुकता ऐसी महिलाओं के प्रति समाज के दृष्टिकोण के कारण है। यह उस पर आराम और सहानुभूति की अपेक्षा संदेह और शर्मिंदगी सृजित करता है।

इसलिए ऐसे मामलों में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराने में विलम्ब आवश्यक रूप में यह इंगित नहीं करता था कि उनका प्रकथन मिथ्या है। किसी भी स्थिति में विलम्ब स्वयं अभियुक्त के लिए उस समय परित्रणकारी परिस्थिति नहीं होता है, जब बलात्संग के अभिकथन अन्तर्ग्रस्त हो। प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराने में विलम्ब का प्रयोग अभियोजन मामले को नामंजूर करने और उसकी प्रमाणिकता पर संदेह करने के लिए रूढ़िवादी सूत्र के रूप में नहीं किया जा सकता है। यह न्यायालय पर उसकी जाच करने और इस बात पर विचार करने का केवल कर्तव्य अधिरोपित करता है कि क्या विलम्ब के लिए कोई स्पष्टीकरण प्रस्तुत किया गया है।

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