लक्ष्मी बनाम भारत संघ: एसिड हमलों पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

  • लक्ष्मी बनाम भारत संघ: एसिड हमलों पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

    परिचय

    लक्ष्मी बनाम भारत संघ के मामले में भारत के सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने एसिड अटैक सर्वाइवर्स के अधिकारों और सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ दिया। एसिड अटैक सर्वाइवर लक्ष्मी ने एक जनहित याचिका (PIL) दायर की, जिसके कारण एसिड की बिक्री पर सख्त नियम स्थापित हुए और पीड़ितों को बेहतर मुआवज़ा मिला।

    केस की पृष्ठभूमि

    लक्ष्मी सिर्फ़ 15 साल की थी, जब उस पर क्रूर एसिड अटैक हुआ था। वह एक मध्यम-वर्गीय परिवार से थी और अपने माता-पिता का भरण-पोषण करने के लिए पार्ट-टाइम काम करती थी। 22 अप्रैल, 2005 को, दो परिचितों ने उस पर एसिड से हमला किया, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गई। उसकी दर्दनाक चीखों के बावजूद, किसी ने तुरंत उसकी मदद नहीं की। बाद में उसे राम मनोहर लोहिया अस्पताल ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने उसके चेहरे, छाती, आँखों और अग्रभाग पर जलने के निशानों का इलाज किया।

    कानूनी यात्रा

    लक्ष्मी ने हमलावरों के रूप में नईम खान (गुड्डू) और उसकी भाभी राखी की पहचान की। नईम ने लक्ष्मी को प्रपोज किया था, लेकिन उसने उसे अस्वीकार कर दिया था। दिल्ली सत्र न्यायालय ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 307 (हत्या का प्रयास) और 120 बी (आपराधिक षड्यंत्र) के तहत दोषी पाया। दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस निर्णय को बरकरार रखा और आरोपी को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 357 (1) (बी) के तहत लक्ष्मी को 3 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया।

    पीआईएल दाखिल करना

    2013 में, लक्ष्मी ने एसिड अटैक सर्वाइवर्स की दुर्दशा को उजागर करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के समक्ष एक जनहित याचिका दायर की। जनहित याचिका में एसिड की बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध, एसिड हमलों के खिलाफ सख्त कानून और पीड़ितों के लिए बेहतर मुआवजा संरचना की मांग की गई। एसिड हमले अक्सर अस्वीकार किए गए विवाह प्रस्तावों, यौन संबंधों और दहेज विवादों से उत्पन्न होते हैं।

    उठाए गए मुद्दे

    पीआईएल ने कई प्रमुख मुद्दों पर जोर दिया:

    1. आईपीसी, आपराधिक प्रक्रिया संहिता और साक्ष्य अधिनियम सहित प्रासंगिक कानूनों में संशोधन, एसिड हमलों को गंभीर दंड के साथ अलग अपराध के रूप में मान्यता देना।

    2. हानिकारक पदार्थों तक आसान पहुंच को रोकने के लिए एसिड की बिक्री का विनियमन।

    3. पीड़ितों के लिए पर्याप्त मुआवज़ा और पुनर्वास का प्रावधान।

    याचिकाकर्ता के तर्क

    लक्ष्मी ने तर्क दिया कि:

    1. बाजार में एसिड बहुत आसानी से उपलब्ध था।

    2. एसिड हमले ने उसे बहुत ज़्यादा शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक नुकसान पहुँचाया।

    3. मौजूदा कानून एसिड हमलों को विशेष रूप से संबोधित नहीं करते थे, जिसके परिणामस्वरूप अपराधियों के लिए कम दंड का प्रावधान था।

    4. पीड़ितों को मुफ़्त चिकित्सा देखभाल और पर्याप्त मुआवज़े की ज़रूरत थी।

    प्रतिवादी के तर्क

    केंद्र सरकार, जिसका प्रतिनिधित्व सॉलिसिटर जनरल कर रहे थे, ने एक सप्ताह के भीतर मॉडल दिशा-निर्देशों को लागू करने की प्रतिबद्धता जताई। 1919 के ज़हर अधिनियम के तहत इन दिशा-निर्देशों का उद्देश्य एसिड और ख़तरनाक रसायनों की बिक्री को विनियमित करना था। तमिलनाडु राज्य ने भी एसिड की बिक्री को नियंत्रित करने के लिए दो महीने के भीतर कड़े कानून बनाने का वादा किया। इसके अतिरिक्त, राज्य और केंद्र शासित प्रदेश ज़हर अधिनियम के तहत अपराधों के लिए ज़मानत देने से इनकार करने पर सहमत हुए।

    सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला

    सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से कानूनी ढांचे में महत्वपूर्ण बदलाव हुए:

    1. नई आईपीसी धाराएँ: एसिड हमलों को विशेष रूप से संबोधित करने के लिए धाराएँ 326A और 326B जोड़ी गईं।

    2. मुआवज़ा प्रावधान: आईपीसी की धारा 326ए और 376डी के तहत जुर्माने के अलावा पीड़ितों को मुआवज़ा मिले, यह सुनिश्चित करने के लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 357बी शुरू की गई थी। धारा 357ए में पीड़ित मुआवज़ा कार्यक्रम की रूपरेखा बताई गई थी।

    3. साक्ष्य अधिनियम संशोधन: आईपीसी की धारा 326ए के तहत अपराधियों के इरादे और ज्ञान को स्पष्ट करने के लिए धारा 114बी को जोड़ा गया था।

    4. मुआवज़ा योजना: सरकार ने पीड़ितों के लिए कम से कम 3 लाख रुपये की गारंटी देते हुए एक पीड़ित मुआवज़ा योजना की स्थापना की। सार्वजनिक और निजी दोनों अस्पतालों को पीड़ितों को तत्काल चिकित्सा देखभाल प्रदान करने का आदेश दिया गया, यदि आवश्यक हो तो आवश्यक स्थानान्तरण के साथ।

    5. एसिड बिक्री का विनियमन: एसिड की बिक्री और खरीद पर प्रतिबंध लगाए गए थे। निष्कर्ष लक्ष्मी बनाम भारत संघ में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का भारत में एसिड अटैक सर्वाइवर्स के कानूनी और सामाजिक परिदृश्य पर गहरा प्रभाव पड़ा है। इस फैसले ने न केवल अपराधियों के लिए सख्त सजा सुनिश्चित की, बल्कि पीड़ितों के लिए बहुत जरूरी सहायता और पुनर्वास भी प्रदान किया। इस ऐतिहासिक मामले ने एसिड हमले से बचे लोगों के लिए कड़े नियमों और व्यापक सहायता प्रणालियों की तत्काल आवश्यकता को प्रकाश में लाया।

    Next Story