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धारा 295A आईपीसी: जानिए कब धार्मिक भावनाओं को आहत करना बन जाता है अपराध?

SPARSH UPADHYAY
2 May 2020 11:02 AM GMT
धारा 295A आईपीसी: जानिए कब धार्मिक भावनाओं को आहत करना बन जाता है अपराध?
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अभी हाल ही में, केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने राष्ट्रीय लॉकडाउन के बीच "रामायण" धारावाहिक देखने की खुद की एक तस्वीर को ट्वीट किया था। इस ट्वीट पर वकील प्रशांत भूषण द्वारा ट्विटर पर ही कथित रूप से एक आलोचनात्मक टिपण्णी की गयी थी, जिसके चलते उनके खिलाफ एक एफआईआर दर्ज की गई थी।

दरअसल वकील प्रशांत भूषण ने अपने ट्विटर पर (केन्द्रीय मंत्री की तस्वीर के सम्बन्ध में) लिखा था, "लॉकडाउन के कारण करोड़ों भूखे और सैकड़ों मील घर के लिए चल रहे हैं, हमारे हृदयहीन मंत्री लोगों को रामायण और महाभारत की अफीम का सेवन करने और खिलाने के लिए मना रहे हैं!"

यह आरोप लगाते हुए कि यह ट्वीट धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला है, एक जयदेव रजनीकांत जोशी ने भक्तिनगर पुलिस स्टेशन, राजकोट, गुजरात में भारतीय दंड संहिता की धारा 295 ए के तहत उनके खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। इस शिकायत में उन पर धार्मिक भावनाओं को आहत करने का आरोप लगाया गया है।

हालाँकि, शुक्रवार (01 मई 2020) को सुप्रीम कोर्ट ने प्रशांत भूषण को गुजरात पुलिस द्वारा उनके खिलाफ दर्ज FIR पर गिरफ्तारी से अंतरिम सुरक्षा प्रदान कर दी थी।

न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति संजीव खन्ना की पीठ ने गुजरात सरकार को नोटिस जारी करते हुए दो सप्ताह के बाद मामले को सूचीबद्ध किया है।

मौजूदा लेख में हम यह जानेंगे कि आखिर भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 295 ए क्या है, इसकी मुख्य सामग्री क्या है और किन मामलों में इस धारा के तहत किसी के विरुद्ध अपराध बनता है। तो चलिए इस लेख की शुरुआत करते हैं।

क्या कहती है भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 295A?

भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 295A के अंतर्गत वह कृत्य अपराध माने जाते हैं जहाँ कोई आरोपी व्यक्ति, भारत के नागरिकों के किसी वर्ग (class of citizens) की धार्मिक भावनाओं (Religious Feelings) को आहत (outrage) करने के विमर्शित (deliberate) और विद्वेषपूर्ण आशय (malicious intention) से उस वर्ग के धर्म या धार्मिक विश्वासों का अपमान करता है या ऐसा करने का प्रयत्न करता है।

यह अपमान, उच्चारित शब्दों (Spoken words) या लिखित शब्दों (written words) द्वारा या संकेतों (signs) द्वारा या दृश्यरूपणों (visible representations) द्वारा या अन्यथा किया जा सकता है।

शिव शंकर बनाम एम्परर AIR 1940 Oudh 348 के मामले में आरोपी व्यक्ति ने एक अन्य व्यक्ति का जनेऊ खींच कर तोड़ दिया था, इसे "उच्चारित या लिखित शब्दों द्वारा या संकेतों द्वारा या दृश्यरूपणों द्वारा या अन्यथा" द्वारा धार्मिक भवना का अपमान नहीं माना गया था।

यहाँ इस धारा के लागू होने के लिए यह आवश्यक है कि किसी वर्ग के धर्म का या उसकी धार्मिक भावनाओं का अपमान, उस वर्ग की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के लिए जानबूझकर/विमर्शित (Deliberate) एवं विद्वेषपूर्ण आशय (malicious intention) से किया जाए, या ऐसा करने का प्रयत्न किया जाए।

दूसरे शब्दों में, अनिच्छुक और अनपेक्षित अभिव्यक्ति से हुए अपमान के मामलों में यह धारा को लागू नहीं किया जा सकता है। यह जरुरी है कि धर्म या धार्मिक भावनाओं का अपमान, धार्मिक भावनओं को आहत करने के विमर्शित (deliberate) और विद्वेषपूर्ण आशय (malicious intention) से ही किया जाए – जयमाला एवं अन्य बनाम राज्य (2013) Cr LJ 622 (SC)। आइये आगे बढ़ने से पहले हम धारा 295A को पढ़ लेते हैं।

धारा 295A यह कहती है कि,

विमर्शित (Deliberate) और विदेषपूर्ण (Malicious) कार्य जो किसी वर्ग के धर्म या धार्मिक विश्वासों का अपमान करके उसकी धार्मिक भावनाओं को आहत करने के आशय से किए गए हों– जो कोई भारत के नागरिकों के किसी वर्ग की धार्मिक भावनओं (Religious Feelings)को आहत करने के विमर्शित (Deliberate) और विद्वेषपूर्ण आशय (Malicious Intention) से उस वर्ग के धर्म या धार्मिक विश्वासों का अपमान, उच्चारित या लिखित शब्दों द्वारा या संकेतों द्वारा या दृश्यरूपणों द्वारा या अन्यथा करेगा या करने का प्रयत्न करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से दण्डित किया जाएगा।

धारा 295A के अंतर्गत अपराध बनाने के लिए आवश्यक सामग्री

जैसा कि हमने जाना, इस धारा का मुख्य हिस्सा/सामग्री, भारत के नागरिकों के किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं या धर्म को अपमानित करना या करने का प्रयास करना है। लेकिन हम संक्षेप में यह जान लेते हैं कि इस धारा के अंतर्गत अपराध बनाने के लिए आवश्यक सामग्री क्या है:-

1- आरोपी को भारत के किसी वर्ग के व्यक्तियों के धर्म या धार्मिक भावनाओं का अपमान करना चाहिए या ऐसा करने का प्रयत्न करना चाहिए।

2- यह अपमान, इत्यादि, ऐसे वर्ग के व्यक्तियों की धार्मिक भावनओं को आहत करने के विमर्शित (deliberate) और विद्वेषपूर्ण आशय (malicious intention) से किया गया होना चाहिए

3- यह अपमान, उच्चारित या लिखित शब्दों द्वारा या संकेतों द्वारा या दृश्यरूपणों द्वारा या अन्यथा किया गया होना चाहिए।

विद्वेषपूर्ण आशय (malicious intention) होना है आवश्यक

जैसा कि हमने जाना, इस धारा के लागू होने के लिए आरोपी व्यक्ति का भारत के किसी वर्ग के व्यक्तियों की धार्मिक भावना को आहत करने का विमर्शित (deliberate) एवं विद्वेषपूर्ण आशय (malicious intention) होना बेहद आवश्यक होता है।

अब वह ऐसा करने के लिए उच्चारित या लिखित शब्दों द्वारा या संकेतों द्वारा या दृश्यरूपणों द्वारा या अन्यथा का सहारा लेता है जिसके फलस्वरूप, या तो ऐसे वर्ग के व्यक्तियों के धर्म या धार्मिक भावनाओं का अपमान हो जाता है या आरोपी व्यक्ति की ओर से ऐसा करने का प्रयत्न होता है, जिसे धारा 295A के अंतर्गत दण्डित किया गया है।

उच्चतम न्यायालय ने रामजी लाल मोदी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य AIR 1957 SC 620 के मामले में यह साफ़ किया था कि भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 295A, भारत के नागरिकों के एक वर्ग के धर्म या धार्मिक विश्वासों का अपमान करने या अपमान करने का प्रयास करने के हर कृत्य को दण्डित नहीं करती है।

इस निर्णय में आगे यह कहा गया था कि यह धारा केवल उन मामलों/कृत्यों को दण्डित करती है, जहाँ धर्म या धार्मिक भावनाओं का अपमान, ऐसे वर्ग के व्यक्तियों की धार्मिक भावनओं को आहत करने के विमर्शित (deliberate) और विद्वेषपूर्ण आशय (malicious intention) से किया गया हो।

दूसरे शब्दों में, आरोपी का यह ठोस इरादा होना चाहिए कि उसके कृत्य से, एक वर्ग की धार्मिक भावनाएं आहत हों और फिर जब उसके द्वारा धर्म या धार्मिक भावना आहत की जाती हैं या ऐसा करने का प्रयत्न किया जाता है तो यह धारा लागू होती है। अनजाने में या लापरवाही के चलते धर्म का अपमान किया जाना, बिना धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के ठोस एवं विद्वेषपूर्ण आशय से, इस धारा के अंतर्गत दण्डित नहीं किया जा सकता है।

अब यहाँ एक सवाल यह उठता है कि आखिर किसी के विद्वेषपूर्ण आशय (malicious intention) का पता कैसे लगाया जाए? इसके लिए, बाबा खलील अहमद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य AIR 1960 ALL 715 (718) का वाद देखा जा सकता है। इस मामले में यह आयोजित किया गया था कि धारा 295A के उद्देश्य के लिए विद्वेष (MALICE) स्थापित करने के लिए क्या आवश्यक है।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इसी (बाबा खलील अहमद) मामले में यह तय किया था कि अभियोजन के लिए यह साबित करना आवश्यक नहीं है कि, आरोपी की किसी ख़ास वर्ग के व्यक्तियों (जिनकी भावनाएं आहत हुई हैं) से कोई दुश्मनी थी। बल्कि, यदि किया गया कृत्य, स्वेच्छिक था और बिना किसी कानूनी समर्थन/औचित्य के किया गया, तो विद्वेष (MALICE) का अनुमान लगाया जा सकता है।

विद्वेष (MALICE) का अनुमान, हालातों, पृष्ठभूमि एवं सम्बंधित तथ्यों की रौशनी में परिस्थितियों का आंकलन करते हुए लगाया जा सकता है – (1962) Cr LJ 146 (Mad)।

इसके अलावा, व्यक्ति के आशय को उसकी भाषा और परिस्थितियों के अनुसार आँका जाना चाहिए, हालाँकि उस सम्बन्ध में अलग से साक्ष्य पर भी गौर किया जा सकता है।

उदाहरण के लिए, यदि किसी पुस्तक के लेखक द्वारा कथित रूप से धार्मिक भावनाओं को आहत करने के उद्देश्य से किसी वर्ग के धर्म या उसकी धार्मिक भावना का अपमान किया गया है तो अदालत का कार्य यह होना चाहिए कि वह लेखक के इरादे को मुख्य रूप से पुस्तक की भाषा से ही आंके, हालाँकि उसके अर्थ को समझने के लिए बाहरी साक्ष्य पर गौर किया जा सकता है।

यदि भाषा की प्रकृति ऐसी है, जो दुश्मनी या घृणा की भावनाओं को उत्पन्न करने या बढ़ावा देने का कार्य करती है, तो लेखक के सापेक्ष अदालत द्वारा यह माना जा सकता है कि उसे यह पता था कि उसके कार्य के क्या परिणाम होंगे।

धारा 295A की संवैधानिकता पर लग चुका है प्रश्नचिन्ह

भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 295 ए की संवैधानिक पर प्रश्नचिन्ह रामजी लाल मोदी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य AIR 1957 SC 620 के मामले में लगा था और उच्चतम न्यायालय द्वारा यह आयोजित किया गया था कि यह धारा संविधान के विरुद्ध नहीं है।

दरअसल, इस मामले में याचिकाकर्ता एक मासिक पत्रिका 'गौरक्षक' का संपादक-प्रकाशक था, जिसे भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 295 ए के तहत अपनी पत्रिका में छपे एक लेख के चलते सेशन अदालत द्वारा दोषी ठहराया गया था (दोषसिद्धि को अपील पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बरक़रार रखा था)।

इसके बाद याचिकाकर्ता उच्चतम न्यायालय पहुंचा, उसकी यह दलील थी कि यह धारा संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (a) के अंतर्गत गारंटी किये गए मूल अधिकार 'वाक्-स्वातंत्र्य' के खिलाफ है। अदालत ने इस दलील को ख़ारिज करते हुए कहा था कि:-

"यह धारा, केवल धर्म के अपमान के गंभीर रूप को दण्डित करती है, जब वह अपमान किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के विमर्शित और विद्वेषपूर्ण आशय से किया जाता है।

अपमान के इस उग्र रूप की गणना की प्रवृत्ति स्पष्ट रूप से लोक व्यवस्था को बाधित करना होती है और यह धारा, इस तरह की गतिविधियों को दंडित करती है। इसलिए इस धारा को संविधान के अनुच्छेद 19 (2) का संरक्षण अच्छी तरह से प्राप्त है, जोकि अनुच्छेद 19 (1) (a) द्वारा गारंटीकृत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के अभ्यास पर उचित प्रतिबंध लगाने वाले कानून को संरक्षण देता है।"

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