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भारतीय दंड संहिता (IPC) भाग 26: भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत उद्यापन, लूट और डकैती के अंतर्गत अपराध

Shadab Salim
31 Dec 2020 11:32 AM GMT
भारतीय दंड संहिता (IPC) भाग 26: भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत उद्यापन, लूट और डकैती के अंतर्गत अपराध
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पिछले आलेख में चोरी से संबंधित विषय का अध्ययन किया गया था, इस आलेख में उद्यापन, लूट और डकैती के अपराधों पर प्रकाश डाला जा रहा है।

भारतीय दंड संहिता 1860 के अध्याय 17 के अंतर्गत संपत्ति से जुड़े हुए अपराधों के अंतर्गत उल्लेख किया गया है क्योंकि राज्य का यह परम कर्तव्य है कि वह अपनी सीमा में रहने वाले व्यक्तियों की संपत्ति की रक्षा करें।

संपत्ति से जुड़े अपराधों की सूची में चोरी,उद्यापन, लूट, डकैती, आपराधिक दुर्विनियोग,आपराधिक न्यास भंग, रिष्टि का उल्लेख मिलता है। संपत्ति से जुड़े हुए अपराधों के अंतर्गत किसी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से वंचित किया जाता है अब संपत्ति से वंचित किए जाने के तरीके भिन्न-भिन्न है और यह भिन्न-भिन्न तरीके से अपराध का गठन करते हैं।

इस आलेख में हम उद्यापन, लूट और डकैती के विषय में अध्ययन कर रहे हैं।

उद्यापन (धारा-383)

धारा 383 के अंतर्गत उद्यापन की परिभाषा दी गई है जिसके अनुसार जब कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति को स्वयं उसके या अन्य व्यक्ति को जानबूझकर कोई चोट या क्षति पहुंचाने के भय में इस आशय से डालता है कि वह उस व्यक्ति को उसकी कोई संपत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति या हस्ताक्षरित अथवा मुद्रांकित कोई चीज जिसे मूल्यवान प्रतिभूति में परिवर्तित किया जा सके परिदत्त करने के लिए उत्तेजित करें तो वह उद्यापन कहलाता है।

चोरी और उद्यापन में प्रमुख अंतर यही है कि उद्यापन में भय होता है जबकि चोरी में कोई भय नहीं होता। चोरी में जिसकी संपत्ति होती है उसे कोई भय नहीं दिया जाता जबकि उद्यापन में भय दिया जाता है। उद्यापन के आवश्यक तत्वों का अध्ययन करने से यह मालूम होता है कि किसी व्यक्ति को चोट या क्षति के भय में डाला जाना, स्वयं उस व्यक्ति को या उससे संबंधित किसी अन्य व्यक्ति को भय दिया जाना, ऐसा भय जानबूझकर दिया जाना, ऐसे भय का परिणाम उस व्यक्ति को कोई संपत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति या कोई हस्ताक्षरित या मुद्रण की चीज को जो मूल्यवान प्रतिभूति में परिवर्तित होने योग्य है देने के लिए उत्प्रेरित करना और ऐसा कोई बेमानीपूर्ण आशय से किया जाना।

उद्यापन का प्रथम तत्व किसी व्यक्ति को स्वयं या उसके अन्य किसी व्यक्ति को जानबूझकर क्षति पहुंचाने अथवा उपहति कारित करने के बारे में भय में डालना है। ऐसी क्षति अथवा उपहति शरीर, मस्तिष्क प्रतिष्ठा अथवा संपत्ति किसी की भी संबंध में हो सकती है।

जैसे मारने पीटने की धमकी देना, सदोष परिरोध में रखने की धमकी देना, अभियोग लगाने की धमकी देना, मानहानि कारक अपमान लेख प्रकाशित करने की धमकी देना, आदि फिर ऐसी धमकी संपत्ति के परिदान किए जाने के पूर्व किया जाना अथवा दिया जाना आवश्यक है। इस धारा में प्रयुक्त शब्द भय से अभिप्राय ऐसा भय होता है जो अभियुक्त द्वारा स्वयं कारित किया जा सके या करवाया जा सके।

उद्यापन के अंतर्गत किसी व्यक्ति को भय में डालकर उसकी मूल्यवान संपत्ति को हड़पना है। संपत्ति चल और अचल दोनों प्रकार की हो सकती है। यह आवश्यक नहीं है कि किसी व्यक्ति की केवल चल संपत्ति को हड़प आ जाए, किसी अचल संपत्ति को भी हड़पा जा सकता है।

अब उद्यापन अपराध कारित नहीं होता यदि अभियुक्त किसी व्यक्ति से ऐसी संपत्ति को प्राप्त करने का प्रयास करता है जिसके बारे में सदभावनापूर्वक यह विश्वास है कि वह उसी की है। क्योंकि यह उसका आशय न तो बेमानीपूर्वक होता है और न ही किसी व्यक्ति को दोषपूर्ण क्षति पहुंचाने का।

सम्राट बनाम चतुर भाई 1922 के प्रकरण में एक कपड़े के व्यापारी को धमकी दी गई कि यदि वह विदेशी वस्त्र बेचना जारी रखेगा तो वह जुर्माने से दंडित किया जाएगा। उसने विदेशी वस्त्र बेचना बंद नहीं किया और उसे जुर्माना देने के लिए विवश करने हेतु 2 घंटे तक उसकी दुकान पर पिकेटिंग की गई जिससे उसके व्यापार को कुछ हानि पहुंची और अंत में उसने जुर्माना दे दिया। प्रकरण में यह निर्धारित किया गया कि जो व्यक्ति पिकेटिंग के लिए उत्तरदायी था उसने इस धारा के अंतर्गत अपराध कार्य किया।

सामान्य भाव बोध में उद्यापन को ब्लैक मेलिंग के माध्यम से किसी व्यक्ति से कोई धन या संपत्ति को हड़पना समझा जा सकता है। जैसे कि किसी व्यक्ति को मानहानि कारक लेख लिखने का धमकी देकर किसी पत्रकार द्वारा ब्लैकमेल किया जाकर कोई संपत्ति हड़प्प लेना।

उद्यापन के लिए दंड

भारतीय दंड संहिता की धारा 384 उद्यापन के संदर्भ में दंड की व्यवस्था करती है। जो कोई इस प्रकार का उद्यापन करता है वह 3 वर्ष तक की अवधि के कारावास से दंडित किया जाएगा और जुर्माना भी अधिरोपित किया जा सकता है।

इतना ध्यान देना चाहिए की धारा 384 के अंतर्गत साधारण उद्यापन के लिए दंड की व्यवस्था है अर्थात उनका गंभीर रूप नहीं है। अगली धाराओं के अंतर्गत उनका गंभीर रूप दिया गया है तथा उसके लिए अधिक दंड की व्यवस्था है।

मृत्यु और गंभीर चोट पहुंचाए जाने का भय डालकर उद्यापन

भारतीय दंड संहिता की धारा 386 के अंतर्गत मृत्यु या गंभीर चोट पहुंचाई जाने का भय देकर उद्यापन करने को दंडनीय करार दिया गया है। यदि इस प्रकार से किसी व्यक्ति को मृत्यु का भय देकर या उसे गंभीर चोट पहुंचाने का भय दे कर उसकी की संपत्ति को हड़पा जाता है तो इस धारा के अंतर्गत 10 वर्ष तक के कारावास के दंड का निर्धारण किया गया है।

रामचंद्र एआईआर 1957 के प्रकरण में अभियुक्त ने एक लड़की का व्यपहरण करने के बाद उसके पिता को पत्र लिखा था कि यदि वह उस लड़की की मुक्ति के लिए मुक्ति धन प्रदान नहीं करेगा तो उस लड़की की हत्या कर दी जाएगी। पिता के मन में सदैव बना रहा कि अभी उस लड़के की मुक्ति के लिए मुक्तिधन नहीं दिया गया तो इस बात की प्रबल संभावना है कि लड़की की हत्या कर दी जाएगी धारा 386 के अंतर्गत दंडनीय माना गया।

मृत्यु या आजीवन कारावास का मुकदमा लगाने की धमकी देकर उद्यापन करना

भारतीय दंड संहिता की धारा 388 झूठे मुकदमे की धमकी लगाकर किसी व्यक्ति से उसकी संपत्ति को हड़पने को दंडनीय अपराध करार देती है। यदि किसी व्यक्ति से उसकी संपत्ति झूठे मुकदमे लगाने की धमकी देकर हड़पी जाती है तो यह धारा 386 के अंतर्गत 10 वर्ष तक के कारावास के दंड का निर्धारण किया गया है।

अनेक मामलों में देखने को मिलता है कि लोग एक दूसरों को झूठे आपराधिक प्रकरणों में फंसा कर उनसे कोई संपत्ति या धन हड़पने का प्रयास करते हैं। भारतीय दंड संहिता की धारा 381 इस प्रकार के प्रयास को दंडनीय अपराध करार देती है और इसमें 10 वर्ष तक के दंड का निर्धारण किया गया है।

लूट (धारा-390)

भारतीय दंड संहिता की धारा 390 के अंतर्गत लूट को परिभाषित किया गया है। जैसा कि पूर्व में उल्लेख किया गया है संपत्ति से संबंधित अपराधों में अत्यंत सूक्ष्य अंतर होता है। सभी अपराध लगभग एक समान प्रतीत होते हैं परंतु फिर भी इन में कुछ तथ्य ऐसे होते हैं जिससे भिन्नता पैदा हो जाती है। चोरी, उद्यापन, लूट डकैती लगभग एक समान प्रतीत होते हैं परंतु फिर भी इन में अंतर है।

धारा 390 लूट की जो परिभाषा प्रस्तुत करती है उसके अनुसार चोरी और उद्यापन का उत्तेजित रूप लूट होता है अर्थात किसी भी लूट में चोरी भी होती है और उद्यापन भी होता है फिर वह लूट बनता है। यह समझ लिया जाए कि चोरी और उद्यापन का युवा रूप लूट है चोरी और उद्यापन शिशु है। संहिता की धारा के अनुसार चोरी और लूट तथा उद्यापन और लूट के बीच मुख्यता हिंसा के भय का तत्काल उपस्थित होना अंतर रखता है।

धारा 390 के दूसरे पैराग्राफ चोरी और लूट तथा तीसरा पैराग्राफ उद्यापन और लूट में अंतर स्थापित कर देता है। यदि गहनता के साथ इस धारा का अध्ययन किया जाए तो बात स्पष्ट हो जाती है कि तत्काल रुप से यदि भय दिया जाता है तो कोई चोरी लूट भी हो सकती है तथा चोरी उद्यापन भी हो सकती है।

चोरी उद्यापन और लूट के बीच के संबंधों में चर्चा करते हुए दंड संहिता के प्रारूप को तैयार करने वाले लोगों ने अभिमत व्यक्त किया था कि लूट का ऐसा कोई भी प्रकरण नहीं मिल सकता जो चोरी अथवा उद्यापन की परिभाषा में न आता हो परंतु व्यवहारिकता कभी-कभी यह संदेह उत्पन्न हो जाता है कि लूट का कोई प्रकरण चोरी है अथवा उद्यापन लूट का एक बहुत बड़ा भाग अंशतः चोरी अंशतः उद्यापन होता है।

जैसे कि किसी व्यक्ति को किसी सड़क पर रोक लिया जाता है और रोकने के बाद उसे बंदूक दिखाई जाती है तथा उससे यह कहा जाता है कि तुम अपना मोबाइल मुझे दो तथा अपने जेब में रखा पर्स भी मुझे सौंप दो। यहां पर बंदूक दिखाकर मृत्यु या गंभीर चोट पहुंचाई जाने का भय दिखाया जाता है इस प्रकार का भय दिखाना और मोबाइल और पर्स छीनने उद्यापन का अपराध प्रतीत होता है परंतु इस प्रकरण में उद्यापन नहीं है क्योंकि इस प्रकार का भय तत्काल और जिस व्यक्ति के साथ लूट की जा रही है उसकी उपस्थिति में दिखाया जा रहा है इसलिए यह प्रकरण लूट का होगा। जबकि यही व्यक्ति जो लूट कर रहा है जिस व्यक्ति से लूट की जा रही है उसे फोन काल के माध्यम से यह कहता है कि यदि उसने एक निश्चित धनराशि उसके बैंक खाते में क्रेडिट नहीं की या उसके घर तक नहीं भेजी तो आमुख दिनांक को उसकी हत्या कर दी जाएगी यह उद्यापन का अपराध है क्योंकि जिस व्यक्ति को हत्या की धमकी दी जा रही है उसकी उपस्थिति नहीं है तथा तत्काल संकट नहीं।

धारा 390 का अध्ययन करने से इस धारा के कुछ आवश्यक तत्व प्रतीत होते हैं जिनका उल्लेख इस आलेख में किया जा रहा है।

संपत्ति को ले जाना

चोरी के अपराध की परिणिति लूट में होने के लिए यह आवश्यक नहीं है कि चोरी के पूर्व ही मृत्यु उपहति या सदोष अवरोध कारित किया जाए। चोरी करने के बाद चोरी द्वारा प्राप्त माल को ले जाने के प्रयत्न में भी अपराधकर्ता द्वारा मृत्यु और उपहति अथवा सदोष अवरोध का तत्काल मृत्यु, तत्काल उपहति का,तत्काल सदोष अवरोध का भय कारित किया जाता है तो लूट का अपराध संरक्षित करती है।

चोरी में जिस व्यक्ति की संपत्ति उसके स्थान से हटती है उस व्यक्ति को इस बात का ज्ञान नहीं होता है जबकि लूट में जिस व्यक्ति की संपत्ति उसके स्थान से उसकी सहमति के बगैर हटती है इसका उसे ज्ञान होता है तथा उद्यापन में संकट तत्काल नहीं होता है और लूट में संकट तत्काल होता है। चोरी में किसी भय की आवश्यकता नहीं होती उद्यापन में भय होता है लूट में भी भय होता है परंतु लूट में भय तत्काल होता है।

चोरी के उद्देश्य से संपत्ति को ले जाना

चोरी के अपराध की परिणिति लूट में तभी होती है जब लूट के उद्देश्य से चोरी करने या चोरी द्वारा संपत्ति को ले जाने वाले जाने के प्रयास में मृत्यु, उपहति या सदोष अवरोध या तत्काल मृत्य या तत्काल उपहति का तत्काल सदोष अवरोध का भय कारित होता है।

इसका तात्पर्य यह है कि लूट की कोटि में चोरी का अपराध तभी आ सकता जब लूट के उद्देश्य चोरी करना अथवा चोरी द्वारा प्राप्त संपत्ति को ले जाने का प्रयत्न करना हो सकता है संपत्ति प्राप्ति के लिए मृत्यु का भय या सदोष अवरोध का तत्काल मृत्यु तत्काल उपहति है, तत्काल सदोष अवरोध का भय कारित किया जाए।

चोरी जब लूट हो जाती है जब अपराधकर्ता चोरी करने के लिए या उस चोरी द्वारा अभिप्राप्त संपत्ति को ले जाने का प्रयत्न करने में उस उद्देश्य से स्वेच्छा किसी व्यक्ति की मृत्यु या उपहति या उसका सदोष अवरोध तत्काल मृत्यु का तत्काल उपहति, तत्काल सदोष अवरोध का भय कारित करता है या कारित करने का प्रयत्न करता है। इसका तात्पर्य यह है कि यदि चोर किसी दुर्घटना क्षति की परिणति करता है तो उसका कार्य लूट की परिभाषा में नहीं आ सकता।

लूट के संबंध में केवल इतना समझ लेना चाहिए कि यदि मृत्यु उपहति या सदोष अवरोध तत्काल रूप से दिया जाता है उस व्यक्ति के साथ लूट की जा रही है, उसकी उपस्थिति में दिया जाता है और कोई संपत्ति उसके कब्जे से ली जाती है तो लूट का अपराध घटित हो जाता है।

लूट के लिए दंड (धारा-392)

भारतीय दंड संहिता की धारा 392 लूट के लिए दंड का निर्धारण करती है। इस धारा के अनुसार यदि धारा 390 के भाव बोध में लूट का अपराध कारित किया जाता है तो 10 वर्ष तक के कारावास के दंड का निर्धारण किया गया है। यदि ऐसी लूट किसी राजमार्ग पर सूर्यास्त और सूर्योदय के बीच की जाए अर्थात रात के पहर में की जाए तो 14 वर्ष तक के कारावास के दंड का निर्धारण किया गया। राजमार्ग पर लूट करना अत्यंत गंभीर अपराध है जिसके अंतर्गत बहुत अधिक लंबे कारावास के दंड का निर्धारण किया गया है।

थॉमस बनाम एस मोहम्मद ताजुद्दीन के प्रकरण में ए और बी नगद ₹70000 के साथ यात्रा कर रहे थे वह जब वह बस को परिवर्तित करने के लिए नीचे उतरे तो अभियुक्तों ने बी के पास से ₹40000 लूट लिए इस घटना के दूसरे दिन एफआईआर दाखिल की गई परंतु विलंब का समुचित स्पष्टीकरण कर दिया गया।

अभियुक्त व्यक्तियों के पश्चातवर्ती कथन के आधार पर उनके पास से ₹39000 अभिप्राप्त किए गए, शेष ₹30000 ए और बी के घर से प्राप्त किए गए। विचारण न्यायालय और उच्च न्यायालय द्वारा ए और बी का यह मत स्वीकार कर दिया गया कि पिछले 10 वर्ष के भीतर उन लोगों ने इस धनराशि को बचत के रूप में एकत्र किया था और अभियुक्तों को दोषमुक्त कर दिया गया।

उच्चतम न्यायालय द्वारा यह निर्धारित किया गया है कि इन न्यायालयों का निष्कर्ष गलत था। ए और बी की कृषि योग्य भूमि और उनकी आय के अन्य स्त्रोतों के आधार पर इस तथ्य पर संदेह नहीं किया जाना चाहिए कि उन्होंने वह धनराशि बचाई थी। पुनः अभियुक्तों के अभिप्रेरण पर उनके पास से 40000 को अभिप्राप्त करना और शेष धनराशि को अपराध के शिकार व्यक्तियों के पास से अभिप्राप्त करना और अभियुक्तों के विरुद्ध मिथ्या रिपोर्ट दाखिल करने संबंधी किसी आश्वस्त करने योग्य कारण का अभाव ए और बी की साक्ष्य और अभियोजन पक्ष की इस कहानी की पुष्टि करते हैं कि अभियुक्तों ने ₹40000 को लूट लिया था तथा धारा 392 के अधीन अभियुक्तों को दोषसिद्ध किया गया।

लूट करने का प्रयत्न

भारतीय दंड संहिता केवल लूट के अपराध को कारित कर देने पर ही दंडित करने का प्रावधान नहीं करती अपितु इस प्रकार लूट का प्रयत्न करने को भी दंडनीय अपराध करार देती है। धारा 393 के अंतर्गत लूट के प्रयत्न को अपराध घोषित किया गया है। यदि इस प्रकार लूट का प्रयत्न किया जाता है तो इस धारा के अनुसार 7 वर्ष तक के कारावास के दंड का निर्धारण किया गया है।

यदि लूट करते हुए किसी व्यक्ति को उपहति दी जाती है धारा 394 के अंतर्गत 10 वर्ष तक के कठिन कारावास या आजीवन कारावास के दंड का निर्धारण किया गया है।

डकैती

धारा 390 के अंतर्गत जो लूट का अपराध उल्लेखित किया गया है उसका संगठित रूप डकैती है। डकैती कोई विशेष अपराध नहीं होता है केवल व्यक्तियों की संख्या के आधार पर कोई लूट डकैती में तब्दील हो जाता है। लूट किसी एक व्यक्ति द्वारा भी की जा सकती है परंतु डकैती किसी एक व्यक्ति द्वारा नहीं की जा सकती। किसी समय भारत राज्य डकैतों की समस्या से व्यथित था तथा संगठित रूप से डकैती की जाती थी।

डकैतों द्वारा गांव पर हमले कर दिए जाते थे और गांव के गांव लूट लिए जाते थे। इस प्रकार के संगठित लूट को डकैती की अवधारणा में पेश किया गया है। जब किसी लूट में 5 या 5 से अधिक व्यक्ति सम्मिलित होते हैं तब इस प्रकार की लूट डकैती में परिवर्तित हो जाती है।

भारतीय दंड संहिता की धारा 391 के अंतर्गत डकैती की परिभाषा प्रस्तुत की गई है जिसमें स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि कोई लूट ही डकैती का रूप धर लेती है यदि उस लूट में 5 या 5 से अधिक व्यक्ति होते हैं।

डकैती से संबंधित अपराध में धारा 402 के अंतर्गत जब डकैती करने के प्रयोजन से 5 या 5 से अधिक व्यक्ति एकत्र होते हैं तो इसे हर एक व्यक्ति इस धारा के अंतर्गत दंडनीय है। धारा 399 के अंतर्गत डकैती की तैयारी को दंडनीय बनाया गया है। धारा 391 की परिभाषा डकैती करने के प्रयत्न को अपराध बनाती है। धारा 391 की परिभाषा डकैती अपराध की पूर्णता को डकैती के प्रयत्न के समक्ष रखकर अपराध की चतुर्थ अवस्था को दंडनीय बनाती है।

धारा 391 के अंतर्गत 5 या 5 से अधिक व्यक्तियों द्वारा संयुक्त होकर लूट करने की बात कही गई है। इसका अर्थ यह है कि 5 या 5 से अधिक व्यक्ति मिलकर अथवा सम्मिलित होकर लूट का कार्य संपन्न करें किस धारा के अंतर्गत सभी व्यक्ति के निजी कार्य को दंडनीय बनाया जा सकता है जब वह सम्मिलित कार्य से संदर्भ रखता हो।

इस धारा के प्रवर्तन के लिए आसन्न मृत्यु या तत्काल चोट और तत्काल सदोष अवरोध का भय उपस्थित होना ही पर्याप्त है। यदि बहुत से व्यक्ति किसी घर पर धावा बोलकर बहुत सी संपत्ति लेकर चंपत हो जाते हैं तो उनका कार्य डकैती का अपराध माना जाएगा चाहे भले ही गृह स्वामी उनके आक्रमण के पूर्व ही घर छोड़कर भाग जाए। गृह वासियों द्वारा घर छोड़कर भाग जाना तत्काल उपहति और तत्काल सदोष अवरोध के भय का घोतक है।

डकैती के लिए दंड (धारा-395)

भारतीय दंड संहिता की धारा 395 डकैती के संदर्भ में दंड का उल्लेख कर रही है। इस धारा के अनुसार जो कोई डकैती का अपराध करेगा वह आजीवन कारावास या फिर कठिन 10 वर्ष के कारावास से दंडित किया जाएगा और साथ में जुर्माना भी अधिरोपित किया जा सकता है। डकैती का अपराध जहां अत्यंत उत्तेजक परिस्थितियों में किया जाता है वहां अभियुक्त आजीवन कारावास से दंडित हो सकता है और जहां वह अपेक्षाकृत कम उत्तेजक स्थितियों में किया जाता है वह अभियुक्त को कठिन कारावास से जिसकी अवधि 10 वर्ष तक की हो सकती है दंडित किया जा सकता है। डकैती के अपराध के लिए अभियुक्त इन दंड के अतिरिक्त जुर्माने की सजा के लिए भी उत्तरदायी है।

बृजमोहन बनाम राजस्थान राज्य 2008 उच्चतम न्यायालय 166 के प्रकरण में अभिनिर्धारित किया गया कि अभियोजक का यह कर्तव्य है कि वह धारा 395, 396, 397 के अंतर्गत किए गए अपराध के लिए पहचान परीक्षण अति शीघ्र करें परंतु कोई समय सीमा निर्धारित नहीं की जा सकती। इस मामले में डाका डाला गया था जिसमें 4 व्यक्तियों को भयानक और क्रूरता के साथ मार डाला गया था। पहचान परीक्षण घटना के 3 महीने के बाद परंतु गिरफ्तारी के 24 घंटों के भीतर ही किया गया था।

यह निर्धारित किया गया है कि ऐसे पहचान साक्ष्य को भरोसेमंद माना जाएगा परंतु जहां डकैती रात्रि काल में पड़ी हो वहां अभियोजन को संतुष्ट करना पड़ेगा की साक्षी अपराधकर्ता को पहचान लेने की स्थिति में थे। साक्ष्यों द्वारा पहचान कर लेने के दावे का किसी मामले की परिस्थितियों में विशेष परिलक्षित किया जाना चाहिए। यदि प्रथम इत्तिला रिपोर्ट के प्रकाश के स्त्रोत में कोई उल्लेख नहीं है तो वह घटक नहीं है, यदि उस गांव में जिस में डकैती पड़ी है घरों में और सड़क पर विद्युत कनेक्शन लगाए गए हैं।

धारा 396 के अंतर्गत हत्या के साथ डकैती करने पर मृत्युदंड और आजीवन कारावास के दंड का निर्धारण किया गया है।

गंभीर चोट पहुंचाकर डकैती और लूट करने पर धारा 397 के अंतर्गत आजीवन कारावास का प्रावधान किया गया है जो कम से कम 7 वर्ष तक का तो होगा ही।

धारा 398 डकैती के प्रयत्नों को अपराध करार देती है यदि घातक हथियारों से सज्जित होकर लूट या डकैती की जाती है तो धारा 398 के अंतर्गत कम से कम 7 वर्ष का कारावास होगा।

धारा 399 डकैती करने की तैयारी को भी दंडनीय अपराध घोषित करती है। जो कोई डकैती करने की तैयारी करेगा वह 10 वर्ष के कठिन कारावास और जुर्माने से दंडित किया जाएगा।

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