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भारतीय दंड संहिता (IPC) भाग 23 : व्यपहरण और अपहरण का अपराध

Shadab Salim
29 Dec 2020 10:45 AM GMT
भारतीय दंड संहिता (IPC) भाग 23 : व्यपहरण और अपहरण का अपराध
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भारतीय दंड संहिता सीरीज के अंतर्गत जीवन के लिए संकटकारी अपराध के बाद अध्याय 16 के अंतर्गत मारपीट में होने वाली साधारण और गंभीर चोट के अपराधों का उल्लेख किया गया था। भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत चोट के बाद अधिक गंभीर अपराध जिसका संबंध मानव शरीर से है व्यपहरण और अपहरण है। व्यपहरण और अपहरण के अपराध के संबंध में चर्चा इस आलेख में की जा रही है।

भारतीय दंड संहिता के अध्याय 16 के अंतर्गत जो मानव शरीर पर प्रभाव डालने वाले अपराधों का उल्लेख कर रहा है व्यपहरण और अपहरण का अपराध महत्वपूर्ण स्थान रखता है। व्यपहरण और अपहरण दोनों लगभग एक ही प्रकृति के हैं परंतु आयु और उद्देश्य इन अपराधों के बीच अंतर करता है। सर्वप्रथम हम व्यपहरण के अपराध के संबंध में चर्चा करते हैं।

व्यपहरण

भारतीय दंड संहिता की धारा 359 के अंतर्गत व्यपहरण का उल्लेख किया गया है। इस धारा के अनुसार व्यपहरण दो प्रकार का होता है। धारा 359 व्यपहरण शब्द को परिभाषित नहीं करती है केवल यह स्पष्ट किया गया है कि वह कितने प्रकार का होता है। अंग्रेजी भाषा में इस शब्द से तात्पर्य बच्चों की चोरी से हैं। एक निश्चित उम्र के नीचे के बालक और बालिकाओं को चुरा ले जाना अंग्रेजी में किडनैपिंग कहलाता है। यह धारा व्यपहरण को दो प्रकारों का उल्लेखित करती है।

1)- भारत में से व्यपहरण

2)- विधिपूर्ण संरक्षण में से व्यपहरण

इन दोनों में कोई विशेष अंतर नहीं है। यह दोनों ही एक दूसरे में सम्मिलित है। जब किसी अवयस्क शिशु का भारत में से व्यपहरण किया जाता है तब विधिपूर्ण संरक्षण में से भी व्यपहरण किया जाता है।

भारत में से व्यपहरण

भारतीय दंड संहिता की धारा 360 भारत में से व्यपहरण की परिभाषा या उसका वर्णन कर रही है। इस धारा के अंतर्गत अपराध की संरचना दो तत्वों से मिलकर बनती है।

1)-किसी व्यक्ति का भारत की सीमाओं से प्रवहण करना।

2)- यह प्रवहण उस व्यक्ति अथवा उस व्यक्ति की ओर से सम्मति देने के लिए अवैध रूप से अधिकृत व्यक्ति की सम्मति के बिना करना।

सीधा सा अर्थ यह है कि किसी व्यक्ति को भारत से उठाकर भारत की सीमाओं के बाहर ले जाना भारत में से व्यपहरण कहलाता है तथा किसी व्यक्ति को जो अवयस्क है उसके माता-पिता या किसी अन्य विधिपूर्ण संरक्षक की संरक्षता से उठाकर ले जाना वह भी उस संरक्षक की सहमति के बिना।

इस धारा के अंतर्गत किया गया अपराध किसी भी अवयस्क अथवा वयस्क व्यक्ति के प्रतिकूल भी हो सकता है। हिरा भाई दादा के वाद में मुंबई उच्च न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया था कि यदि व्यपहरित व्यक्ति ने भारत की सीमा से अपने प्रवहण के लिए अपनी सहमति दे दी है इस धारा के अंतर्गत किसी अपराध का निर्माण नहीं होता है। भारत में से किसी व्यक्ति के व्यपहरण का तात्पर्य किसी भी ऐसे व्यक्ति का व्यपहरण है जो चाहे स्त्री हो अथवा पुरुष वयस्क हो अथवा अवयस्क भारतीय नागरिक हो या विदेशी यह भी आवश्यक नहीं है कि भारत में उसका आवास हो। भारत की सीमा से बाहर जैसे ही प्रवहण पूरा हो जाता है इस धारा के अंतर्गत अपराध पूरा हो जाता है।

कोई व्यक्ति यदि भारत की सीमा से परे अपने प्रवहण की सहमति देता है तो उसकी सहमति धारा 90 के अर्थ में परपीड़न के अधीन नहीं होना चाहिए परंतु व्यपहरण का अपराध तब कारित होता है जब किसी अवयस्क को भारत की सीमाओं से बाहर ले जाया जाता है और अवयस्क की सहमति मान्य नहीं होती है।

विधिपूर्ण संरक्षण में से व्यपहरण ( धारा-361)

व्यपहरण धारा 361 विधिपूर्ण संरक्षण में से व्यपहरण के संबंध में विस्तृत परिभाषा प्रस्तुत कर रही है। व्यपहरण के संबंध में यह संहिता के सर्वाधिक महत्वपूर्ण धारा है। इस धारा के अंतर्गत उन सभी प्रश्नों का उत्तर मिल जाता है जो व्यपहरण के संबंध में जन्म लेते हैं। इस धारा का उद्देश्य किशोर तथा बाल आयु के लोगों को तथा बालक अवस्था के बालक बालिकाओं को और पागल व्यक्तियों को उनके माता-पिता अथवा संरक्षक के संरक्षण में से व्यपहरण अथवा विलंबित कर अनुचित प्रयोजनों में प्रयुक्त किए जाने से बचाना है। किसी अवयस्क अथवा स्वस्थ व्यक्ति का व्यपहरण इस धारा के अंतर्गत अपराध नहीं है। इस धारा के अंतर्गत अपराध की संरचना की प्रमुख शर्त ही अवयस्क होना है।

धारा 361 विधिपूर्ण संरक्षण में से व्यपहरण के संबंध में कुछ विशेष तत्वों को लिखित कर रही है। जैसे किसी आवश्यक अथवा विकृत चित्त व्यक्ति को ले जाना अथवा बहका ले जाना, ऐसे अवयस्क व्यक्ति यदि वह नर हो तो 16 वर्ष से कम यदि वह नारी हो तो 18 वर्ष से कम आयु का हो और ले जाना। बहला कर ले जाने का कार्य अवयस्क, विकृत चित्र व्यक्ति के विधिपूर्ण संरक्षण की संरक्षता में से किया गया हो।

किसी अवयस्क को बहला-फुसलाकर ले जाना

विधिपूर्ण संरक्षता में से व्यपहरण के लिए किसी अवयस्क को बहला-फुसलाकर ले कर जाना पहली आवश्यक शर्त है। किसी अवयस्क को ले जाने का तात्पर्य यह नहीं है कि उसे बलपूर्वक ही ले जाया जाए चाहे वह बल प्रयोग वास्तविक हो अथवा नहीं हो।

इसे अवयस्क नर अथवा नारी यदि अपनी संपत्ति भी दे देते हैं तो वह भी महत्वपूर्ण नहीं है। किसी अवयस्क को ले जाने का तात्पर्य है उसके माता-पिता के कब्जे से हटा कर ले जाना यदि ऐसा अवयस्क अपने माता पिता की सहमति से जाता है तो इस धारा के अंतर्गत उसका जाना अपराध की कोटि में नहीं आता है। ले जाना और किसी व्यक्ति का साथ करने में अंतर है। यदि ऐसी अवयस्क कोई नारी अपने माता-पिता के संरक्षण का अभित्याग कर देती है और इतनी क्षमता से परिपूर्ण है कि वह जान रही है कि वह क्या कर रही है उससे अच्छा किसी व्यक्ति के साथ चली जाती है तो यह नहीं कहा जा सकता कि उस व्यक्ति ने उस बालिका को उसके संरक्षक के संरक्षण से ले जाने का कार्य किया है। विधिपूर्ण संरक्षण से व्यपहरण के लिए प्रमुख आवश्यक शर्त के अंतर्गत किसी व्यपहरण का इस प्रकार से लेकर जाना कि उस पर उस के संरक्षक की सहमति नहीं हो इस अपराध का गठन करता है।

इस वर्धराजन बनाम स्टेट ऑफ मद्रास1965 उच्चतम न्यायालय 342 के प्रकरण में उच्चतम न्यायालय ने यह कहा था कि किसी अवयस्क को ले जाने का तात्पर्य उस अवयस्क को इस प्रकार उत्प्रेरित करना अथवा उसका इतना उत्प्रेरित करना कि उस व्यक्ति के मन में उसके साथ जाने का आशय उत्पन्न हो जाए। कुछ इसी प्रकार हरियाणा राज्य बनाम राजाराम 1973 उच्चतम न्यायालय 428 के प्रकरण में कहा गया है कि उच्चतम न्यायालय इस बात को स्पष्ट करते हुए कहता है यदि अभियुक्त के अनुनय या मनुहार के परिणामस्वरूप बालक अथवा बालिका उसके साथ जाने को स्वयं तैयार हो जाते हैं तो अभियुक्त का कार्य धारा के अंतर्गत अपराध माना जाएगा।

किसी भी अवयस्क को उसके माता-पिता की रजामंदी के बगैर उठाना इस धारा के अंतर्गत अपराध का गठन कर देता है। वह उठाकर ले जाने का तात्पर्य अभियुक्त का वह उत्प्रेरण है जिस से प्रभावित होकर व्यपहरित बालक अथवा बालिका या पागल व्यक्ति उसके साथ जाने को तैयार हो जाते हैं। अच्छे भोजन वस्त्र आवास मनोरंजन सुख सुविधा भोग विलास की इच्छा जागृत करो और उसे सुलभ करने का स्वपन दिखाकर किसी अवयस्क को अपने साथ चलने के लिए सहमत कर लेना बहला कर ले जाना कहलाता है।

16 वर्ष से कम आयु का बालक और 18 वर्ष से कम आयु की नारी और पागल व्यक्ति

जैसा कि आलेख के पूर्व में कहा गया है कि धारा 361 के अंतर्गत व्यपहरण के अपराध के लिए सबसे प्रमुख शर्त है किसी अवयस्क को उठाना। इस धारा के अंतर्गत 16 वर्ष से कम आयु का नर तथा 18 वर्ष से कम आयु की नारी अवयस्क मानी गई है। भारतीय दंड संहिता में सन 1949 ईस्वी के पूर्व व्यपहरण बालक और बालिका की आयु 15 और 16 वर्ष थी परंतु 1949 के अधिनियम द्वारा इसे बढ़ाकर बालकों की स्थिति में 16 वर्ष बालिकाओं की स्थिति में 18 वर्ष कर दिया गया। व्यपहरण के मामले में अभियुक्त यह तर्क प्रस्तुत करके अपनी प्रतिरक्षा नहीं कर सकता कि वह यह नहीं जानता था कि उस बालिका की आयु 18 वर्ष से कम है या यह कि अपने आकार और रूप से वह अपने स्वयं के खतरे पर ही उसे ले जा सकता है क्योंकि यदि 18 वर्ष से कम आयु की निकल गई तो उसका परिणाम उस व्यक्ति को भोगना पड़ेगा, चाहे भले ही वह सदभावनापूर्वक अथवा युक्तियुक्त आधारों पर यह विश्वास करता रहा हो कि बालिका 18 वर्ष से अधिक आयु की है।

दीन मोहम्मद के प्रकरण में एक 10 वर्षीय बालिका को धतूरे का विष खिलाकर अचेत कर दिया गया था और उसका व्यपहरण कर लिया गया था। न्यायालय द्वारा यह निर्धारित किया गया कि उस बालिका को ले जाने वाला व्यक्ति व्यपहरण का अपराध नहीं करता है क्योंकि वह बालिका ने न तो 18 वर्ष से कम आयु की थी और न ही पागल थी।

विधि पूर्ण संरक्षण

धारा 361 के अंतर्गत स्पष्ट रूप से कहा गया है कि किसी बालक व बालिका को उसके विधिपूर्ण संरक्षण का से उठाया जाना व्यपहरण का अपराध कारित करता है। यहां पर प्रश्न यह है कि विधिपूर्ण संरक्षण क्या होती है? विधि पूर्ण संरक्षक की संरक्षता का तात्पर्य विधिपूर्ण संरक्षक का अनुरक्षण संरक्षण और नियंत्रण है।

किसी भी अवयस्क अथवा विकृत चित्त व्यक्ति का ऐसे संरक्षक से अनुरक्षण और नियंत्रण का संबंध बना रहता है जब तक वह अपनी इच्छा से लाभ को लेना चाहता है। यह आवश्यक नहीं है कि ऐसे अवयस्क का अथवा विकृत चित्त व्यक्ति अपने संरक्षक के वास्तविक अधिपत्य में रहे, इतना पर्याप्त है कि ऐसे व्यक्ति नियंत्रण उसके अनुरक्षण संरक्षण अथवा नियंत्रण में बने रहे जो तभी समाप्त होता है जब ऐसे व्यक्ति को बिना संरक्षक की सहमति के उठा ले जाया जाता है। यदि व्यक्ति अपनी इच्छा से किसी स्थानीय बाजार में जाते हैं तो इसका तात्पर्य यह नहीं हुआ कि उनके ऊपर से विधिपूर्ण संरक्षण समाप्त हो गया। यह संरक्षता तभी समाप्त होती है जब ऐसे बालक अथवा बालिका को या विकृत चित्त व्यक्ति को उनके विधि पूर्ण संरक्षण से हटा दिया जाए अथवा वे स्वयं बुरे व्यवहार आदि के ऐसे संरक्षक की संरक्षता का अभित्याग कर दें।

संरक्षक के अधिपत्य के स्थान पर संरक्षक की समरसता शब्द का चयन किया गया है ताकि संरक्षण के अधीन रखे गए व्यक्ति के कृत्यों की आत्मनिर्भरता और उनकी गतिविधि को संरक्षक के अनुरूप नियंत्रित किया जा सके। धारा 361 के अंतर्गत अपराध की संरचना के लिए यह आवश्यक है कि किसी व्यक्ति को उसके विधिपूर्ण संरक्षण की संरक्षता में से ले जाया जाए अथवा बहला कर ले जाया जाए। यदि कोई अवयस्क के घर को स्वयं छोड़ कर चला जाता है और पुनः लौट कर आने की इच्छा नहीं होती है तो यह नहीं कहा जा सकता कि वह अपनी संरक्षता में है ऐसे मामलों में यह नहीं कहा जा सकता है कि उस अवयस्क को उसके विधिपूर्ण संरक्षण की संरक्षित से ले जाया गया है अथवा बहला-फुसलाकर ले जाया गया है। कुछ ऐसा ही सुंदर सिंह के एक प्रकरण में देखने को मिला है। इस प्रकरण में एक अवयस्क बालिका अपने घर से बुरे व्यवहार के कारण भाग निकली थी। अभियुक्त से वह सड़क पर मिली और उसके साथ कुली के रूप में रहने के लिए स्वयं चली गई। न्यायालय ने यह निर्धारित किया कि अभियुक्त ने व्यपहरण का अपराध नहीं किया था इसका तात्पर्य यह है कि यदि अवयस्क बालक अथवा बालिका विधिपूर्ण संरक्षण में नहीं है तो धारा 361 के अंतर्गत व्यपहरण का अपराध नहीं हो सकता चाहे जिस भी विश्वास से व्यपहरणकर्ता ने उसका व्यपहरण किया हो।

संरक्षक की सम्मति

भारतीय दंड संहिता की धारा 361 के अंतर्गत व्यपहरण के अपराध के अंतर्गत संरक्षक की सहमति आवश्यक है। इस धारा के अंतर्गत व्यपहरण का अपराध तभी संचारित होता है जब किसी अवयस्क बालक बालिका अथवा पागल व्यक्ति को उनके विधिपूर्ण संरक्षण की संरक्षता से बिना उनकी सहमति के ले जाया गया हो अथवा बहला कर ले जाया गया हो। ऐसे अवयस्क बालक अथवा बालिका पागल व्यक्ति की सहमति कोई महत्व नहीं रखती है। माता पिता को उत्प्रेरित करके बालिका को ले जाने की सहमति ली गई है अथवा बालिका को ले जाने जाने के बाद उनकी सहमति मांगी गई है इस प्रकार का ले जाना का व्यपहरण माना जाएगा। जैसे कि प्राण कृष्ण शर्मा के मुकदमे में एक हिंदू महिला पति का घर छोड़कर अपनी नन्ही बच्ची के साथ का 'क' घर चली गई और वहां उसने उस बच्ची का विवाह क के भाई घर से कर दिया, यह विवाह उस बच्ची के पिता की सहमति के बिना किया गया था न्यायालय ने इस प्रकरण में कहा कि क ने व्यपहरण का दुष्प्रेरण का अपराध किया है।

भावेश जयंती लखानी बनाम महाराष्ट्र राज्य के प्रकरण में नीचे की अदालत द्वारा माता के पक्ष में पारित आदेश के विरुद्ध उच्च न्यायालय द्वारा मंजूर रोक के आधार पर बालक पिता की अभिरक्षा में था। तथ्यों के आधार पर यह अभिनिर्धारित किया गया कि पिता द्वारा बालक को तब तक विधिपूर्ण अभिरक्षा में रखा जाएगा जब तक सक्षम अधिकारी पिता के न्यायालय द्वारा कोई अन्य आदेश पारित नहीं किया जाता। यह भी स्पष्ट किया गया कि इस संबंध में भारत की विधि भारतीय दंड संहिता 1860 द्वारा शासित होती है न किसी इंटरनेशनल अधिनियम द्वारा शासित होती है।

चंद्रकला मेनन बनाम कैप्टन विपिन मैनन 1993 के एक प्रकरण में एक अवयस्क कन्या के माता-पिता के बीच तनावपूर्ण संबंध रहने के कारण उस कन्या के पिता ने उसका व्यपहरण कर लिया था।मजिस्ट्रेट ने कन्या के पिता को निर्दिष्ट किया है कि वह उस कन्या को पुलिस के हवाले कर दें ताकि उसे परिवादकर्ता के अभिरक्षण में वापस दिया जा सके अन्यथा पुलिस उसके विरुद्ध व्यपहरण का मामला दर्ज करेगी और उसको अपराधी घोषित करने की कार्यवाही की जाएगी। उस कन्या के पिता ने दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 482 के अधीन उच्च न्यायालय में दाखिल की, अपीलकर्ता ने उच्चतम न्यायालय अपील दाखिल की। यह निर्धारित किया गया कि उच्च न्यायालय ने इसके आधार पर पिता कन्या का नैसर्गिक संरक्षक है अतः उसे व्यपहरण अपराध के लिए आरोपित नहीं किया जा सकता। मजिस्ट्रेट के आदेश को अभिखंडित करके अपास्त कर दिया गया।

परंतु मुस्लिम विधि के लिए इस प्रकार का नियम लागू नहीं होता है क्योंकि मुस्लिम विधि के अंतर्गत 7 वर्ष तक के बालक की संरक्षक उसकी मां होती है तथा अवयस्क पुत्री की संरक्षक भी उसकी मां होती है तथा उसकी मां के संरक्षण से उसका पिता उसे नहीं उठा सकता है। इस प्रकार के संरक्षण व उसके पिता द्वारा उठाया जाता है तो उसका पिता व्यपहरण के अपराध का दोषी होगा।

व्यपहरण के अपराध के लिए दंड

व्यपहरण के अपराध के लिए कारावास के दंड की अवधि अनेक प्रकार से निर्धारित की गई है। सामान्य रूप से धारा 363 के अंतर्गत व्यपहरण के अपराध के लिए दंड का उल्लेख किया गया है। इस धारा के अंतर्गत जो कोई व्यपहरण का अपराध कारित करेगा उसे 7 वर्ष की अवधि तक के कारावास से दंडित किया जाएगा। इस धारा के अंतर्गत धारा 360 धारा 361 के अंतर्गत जो अपराध परिभाषित किए गए हैं उन अपराधों का दंड रखा गया है।

सज्जन कुमार बनाम बिहार राज्य उच्चतम न्यायालय 2005 के प्रकरण में एक अवयस्क लड़की का उसके स्कूल से व्यपहरण किया गया था। धारा 361 के स्पष्टीकरण के अनुसार विधिपूर्ण संरक्षक शब्दों के अंतर्गत ऐसा व्यक्ति आता है जिस पर ऐसे व्यपहरण की देखरेख की अभिरक्षा का भार विधिपूर्वक नियुक्त किया गया है।

इस प्रकरण में स्कूल को प्राप्त हुए लड़की की देखरेख या अभिरक्षा का भार विधिपूर्वक न्यस्त किया गया था तथा धारा 363 का अपराध तब पूरा हो गया था जब अभियुक्त ने उक्त लड़की को उसके स्कूल से उठा लिया था क्योंकि इस मामले में स्कूल विधिपूर्वक संरक्षक हो गया था। इस प्रकरण में अभियुक्त अभियोजन साक्षी 6 के विद्यालय गया था और वहां उसके अध्यापक से यह कहा था कि लड़की के पिता ने उसको बुलवा ले जाने के लिए भेजा है क्योंकि उसके दादा गंभीर रूप से बीमार है। अभियुक्त लड़की को लेकर दूसरे राज्य में अपने भाई के पास चला गया था। रास्ते में लड़की ने महसूस किया कि उसे चिकित्सालय न ले जाकर कहीं अन्य जगह ले जाया जा रहा है परंतु अभियुक्त द्वारा दी गई धमकी के कारण उसने कुछ व्यक्त नहीं किया। उसी क्षण में व्यपहरण का अपराध पूरा हो गया। यह तथ्य कि उस लड़की को रास्ते में भोजन दिया गया या यह कि उसके साथ अभियुक्त के भाई के घर में अच्छी देखभाल की गई थी सुसंगत नहीं है। अभियुक्त की दोषसिद्धि को बरकरार रखा गया।

भीख मांगने के प्रयोजन से अवयस्क का व्यपहरण- (धारा-363 ए)

व्यपहरण के दंड के अपराध के अंतर्गत गंभीर अपराध भीख मांगने के प्रायोजन से किसी बालक की चोरी करना है। इस धारा के अंतर्गत बालकों की चोरी भीख मंगवाने के उद्देश्य से की जाती है। एक अत्यंत गंभीर अपराध है। यह धारा भीख मांगने के लिए किसी बच्चे के व्यपहरण या उसके अंगों को काट देने के कार्य को दंडनीय बनाती है। इस धारा के उद्देश्यों और कारण को व्यक्त करते हुए कहा गया है कि भारतीय दंड संहिता के वर्तमान उपबंध भीख मांगने के लिए बालक और बालिकाओं के शोषण की भयंकर बुराई के प्रभावशाली ढंग से समाप्त करने के लिए पर्याप्त नहीं है बालक और बालिकाओं को विकलांग करने के माध्यम से दया का पात्र बना कर उनके दुरुपयोग किए जाने के कार्य को भी रोकने के लिए भारतीय दंड संहिता में निवारक दंड की कोई विशिष्ट व्यवस्था नहीं है। इस उद्देश्य से दंड संहिता में उल्लेखित की गई है इस धारा के अनुसार यदि कोई बच्चे की चोरी भीख मांगने के उद्देश्य से करता है तथा उसके अंगों को काट देता है यदि भीख मांगने के उद्देश्य से केवल चोरी करता है तो 10 वर्ष तक के कारावास के दंड का निर्धारण किया गया है वहीं इस प्रकार चोरी किए गए बालक के अंगों को काट देता है जिससे उसको दया का पात्र बनाया जा सके इस स्थिति में आजीवन कारावास के दंड का प्रावधान किया गया है।

हत्या करने के लिए व्यपहरण

भारतीय दंड संहिता की धारा 364 हत्या करने के उद्देश्य से व्यपहरण को दंडित करार देती है। इस धारा में अपराध तब होता है जब व्यपहरण अथवा अपहरण व्यक्ति की वास्तव में हत्या नहीं की गई है। मुक्ति धन प्राप्त करने के उद्देश्य से यदि किसी व्यक्ति का व्यपहरण अथवा अपहरण किया जाता है तो भी यह धारा लागू नहीं होती है। व्यपहरण अथवा अपरहण के पूर्व ही यदि अपहृत व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है तो भी यह धारा लागू नहीं होती है, यदि अपहरण के समय अभियुक्त व्यक्ति का आशय अपहृत व्यक्ति की हत्या करना नहीं है या उसे ऐसी खतरनाक स्थिति में नहीं रखा था जिससे अपहृत व्यक्ति को उसकी हत्या किए जाने का खतरा बना रहे धारा 364 यह 386 के अंतर्गत नहीं आएगा किंतु ऐसे अभियुक्त को धारा 365 के अधीन दोष सिद्ध किया जा सकता है।

मुरलीधर बनाम राजस्थान राज्य 2005 के प्रकरण में साक्षियों के साक्ष्य दर्शित हो रहा था कि आर नामक व्यक्ति अपराध के शिकार व्यक्ति को जो एक ऊंट गाड़ी में सवार होकर जा रहा था उस समय गाड़ी में से खींच लिया गया था जब वह गाड़ी 'के' नामक अभियुक्त के घर के पास से गुजर रही थी। उस स्थान पर अभियुक्त व्यक्तियों द्वारा आर की बहुत अच्छी पिटाई की गई और गाड़ी में से उसको खींचकर 'के' के घर में ले जाया गया वहां एक अभियुक्त दूसरे अभियुक्त से कह रहा था कि लाठी लाओ ताकि आर को मार डाला जाए।

यह अभिनिर्धारित किया गया कि अभियुक्तों ने अध्यारोपित कार्य और शब्द जबकि उन्होंने खींचा था उसकी पिटाई की थी इस बात को स्पष्ट करते हैं कि उनका आशय आर को इस तरह समाप्त करना था कि वह हत्या किए जाने वाले खतरे में पड़ जाए। नीचे की अदालतों द्वारा अभियुक्त को धारा 364 के अधीन दंडित किया जाना ठीक है। इस प्रकार का अपराध कार्य करने पर आजीवन कारावास के दंड का निर्धारण किया गया है।

फिरौती मांगने के उद्देश्य से व्यपहरण (धारा-364 ए)

बालकों की चोरी करके उनके माता-पिता या संरक्षक से कोई धनराशि मांगी जाती है। इसे बालकों की चोरी करने के बाद फिरौती मांगना कहा जाता है। भारतीय दंड संहिता की धारा 364 इस प्रकार के दंड को दंडनीय अपराध करार देती है। इस धारा के अंतर्गत अपराध कारित करने वाला मृत्यु या आजीवन कारावास से दंडित किया जाता है।

भारतीय दंड संहिता में यह धारा को दंड विधि संशोधन अधिनियम 1993 की धारा 2 द्वारा स्थापित किया गया है। इस धारा के अंतर्गत अपराधी को फिरौती आदि के लिए किसी व्यक्ति के व्यपहरण या अपहरण को कठोर दंड से दंडित भी बनाना है।

लियाकत अली खान बनाम आंध्र प्रदेश राज्य के प्रकरण में दो पत्र अभियुक्त द्वारा लिखे गए थे जो अपराध से पीड़ित व्यक्ति को लिखे गए थे। उस पत्र में क्रमश एक करोड़ पर और 7500000 रुपए की मांग की गई थी। अभियुक्त द्वारा पत्र का लिखा जाना साबित हो गया था उसका घर अपराध से पीड़ित व्यक्ति के घर के नजदीक ही था। अभियुक्त द्वारा बतलाए जाने पर बच्चे की बरामदगी भी हो गई थी। अभियुक्त कौन से स्थान से रुपए से भरा हुआ बैग उठाते हुए पकड़ लिया गया था जो पहले से निर्धारित कर लिया गया था। प्रकरण में अभियुक्त की फिरौती की मांग इस प्रकार की साबित हो गई थी वह धारा 364 स्पष्ट रुप से लागू होती है।

विवाह के लिए विवश करने के उद्देश्य से व्यपहरण-(धारा-366)

यदि किसी महिला को विवाह के उद्देश्य से व्यपहरण या अपहरण किया जाता है तब धारा 366 का अपराध कारित होता है। इस धारा के अंतर्गत 10 वर्ष तक के दंड का प्रावधान रखा गया है। व्यपहरण अथवा अपहरण के समय यदि महिला की इच्छा विवाह अथवा विधिपूर्ण संभोग करना नहीं थी तो इस धारा का प्रवर्तन आरंभ हो जाता है। यह धारा अपराध की संरचना के लिए कुछ तत्वों को आवश्यक मानती है।

जैसे किसी स्त्री का व्यपहरण अथवा अपहरण का कार्य इससे से किया गया हो कि वह स्त्री अपनी इच्छा के विरुद्ध किसी व्यक्ति से विवाह करने के लिए विवश हो जाएगी या यह जानते किया गया हो कि संभवत वह स्त्री अपनी इच्छा के विरुद्ध किसी व्यक्ति से विवाह करने के लिए विवश हो जाएगी। इस प्रयोजन से किया गया हो कि वह स्त्री संभोग के लिए विवश की जाएगी यह जानते हुए किया गया हो कि संभवतः उस स्त्री को आयुक्त संभोग के लिए विवश किया जाएगा,आपराधिक अभित्रास द्वारा या अन्यथा किसी स्त्री को एक स्थान से किसी दूसरे स्थान ले जाने के लिए विवश किया जा रहा था कि वह स्त्री आयुक्त संभोग के लिए विवश हो जाए ।

धारा-366ए किसी अवयस्क लड़की को संभोग करने के उद्देश्य से उठा ले जाने के संदर्भ में उल्लेख कर रही है। यदि किसी अवयस्क लड़की को संभोग के उद्देश्य से उसके विधिपूर्ण संरक्षण में से उठाकर ले जाया जाता है, इस स्थिति में 10 वर्ष के कारावास की अवधि का निर्धारण किया गया है।

अपहरण

इस लेख में अब तक व्यपहरण के संबंध में उल्लेख किया गया है। अपहरण का अपराध भी व्यपहरण के अपराध से संबंधित एक अपराध है। जिसका उल्लेख भारतीय दंड संहिता की धारा 362 में किया गया है।

व्यपहरण और अपहरण में केवल इतना अंतर है कि सूर्य किसी अवयस्क बालक या बालिका का उसके विधिपूर्ण संरक्षण में से किया जाता है तथा अपहरण के लिए कोई आयु निर्धारित नहीं है। अपहरण किसी भी व्यक्ति का किया जा सकता है जिसने 18 वर्ष की आयु प्राप्त कर ली है। अपहरण का संदर्भ पूर्णता उस व्यक्ति से होता है जिसे अपहृत किया जाता है, इसमें कोई विधिपूर्ण संरक्षक जैसी कोई बात नहीं होती है। अपहरण के अपराध में बल विवशता होता हैं।

अनेक मामलों में देखने को मिलता है कहीं पर हत्या करने के उद्देश्य से अपहरण किया जाता है, कहीं पर घोर उपहति के उद्देश्य से अपहरण किया जाता है तथा कहीं फिरौती मांगने के उद्देश्य से भी अपहरण किया जाता है। अपहरण के लिए वही दंड निर्धारित किया गया है जो दंड व्यपहरण के निर्धारित किया गया है।

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