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भारतीय दंड संहिता (IPC) भाग 12 : लोक सेवकों तथा लोक सेवकों के विधि पूर्ण प्राधिकार के अवमान से संबंधित अपराध

Shadab Salim
17 Dec 2020 10:45 AM GMT
भारतीय दंड संहिता (IPC) भाग 12 : लोक सेवकों तथा लोक सेवकों के विधि पूर्ण प्राधिकार के अवमान से संबंधित अपराध
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पिछले आलेख में लोग शांति से संबंधित अध्याय के प्रावधानों पर चर्चा की गई थी। इस आलेख में लोक सेवकों से संबंधित अपराधों के संबंध में चर्चा की जा रही है।

भारतीय दंड संहिता 1860 सभी प्रकार के अपराधों को संकलित करके एक संग्रह बनाया गया है। समय-समय पर इस संहिता में उल्लेखित अपराधों से संबंधित अन्य अधिनियम भी बना दिए गए हैं। उन अधिनियम के बनाए जाने के बाद इस सहिंता में उन अपराधों से संबंधित जो धाराएं दी गई थी उन धाराओं को निरसित कर दिया गया। जैसे कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम जब बनाया गया तो लोक सेवकों से संबंधित अपराधों के विषय में कुछ धाराओं को निरसित कर दिया गया। समय के साथ जैसे जैसे अपराध बढ़ते हैं संसद या विधानसभा उन अपराधों पर कोई विशेष कानून का निर्माण कर देता है। विशेष कानून का निर्माण कर दिया जाता है तो भारतीय दंड संहिता में उल्लेखित उन अपराधों से संबंधित धाराओं को निरसित कर दिया जाता है।

लोक सेवकों से संबंधित अपराध

भारतीय संहिता के अध्याय-9, अध्याय 9 ए तथा अध्याय 10 के अंतर्गत लोक सेवकों से संबंधित अपराधों का वर्णन किया गया है। इन तीनों अध्याय में सभी अपराध लोक सेवकों से संबंधित हैं। कोई अपराध स्वयं लोक सेवक द्वारा किया जाता है तथा कोई अपराध लोकसेवक के प्राधिकार के विरुद्ध किया जाता है परंतु इसका मूल लोक सेवक ही है। दंड संहिता की धारा 161 से लेकर धारा 190 तक 30 धाराओं में लोक सेवक से संबंधित अपराधों का उल्लेख है। इन तीनों अध्यायों में तीनों विषयों को संकलित किया गया है। पहले विषय में लोक सेवकों द्वारा की जाने वाले अपराध तथा उनसे संबंधित अपराधों के विषय में उल्लेख किया गया है, दूसरे अध्याय में निर्वाचन और रिश्वतखोरी से संबंधित प्रावधानों पर चर्चा की गई है तथा तीसरे अध्याय में लोक सेवकों के प्राधिकार से संबंधित अपराधों को लेकर प्रावधान किए गए।

लोक सेवक का सामान्य अर्थ होता है कोई सरकारी अधिकारी ऐसा सरकारी अधिकारी जिसे किसी सरकारी कामकाज के लिए केंद्रीय या राज्य सरकार द्वारा नियुक्त किया गया है तथा वह इसके बदले उस अधिकारी को परिश्रमिक का भुगतान करती है।

लोक सेवक शासन के अधीन होते हैं समस्त कार्यपालिका कार्यों का संचालन एवं संपादन लोक सेवकों द्वारा किया जाता है। शासन की सफलता या असफलता लोक सेवक पर निर्भर करती है।

लोक सेवक जितने ईमानदार कर्तव्यनिष्ठ होंगे शासन उतना ही साफ सुथरा होगा। लोक सेवक भ्रष्टाचार से दूर रहे और उसमें न्याय और कर्तव्यनिष्ठा की भावना बनी रहे, संहिता में कतिपय आवश्यक व्यवस्थाएं की गई हैं अर्थात ऐसे अपराधों का जो केवल लोक सेवक द्वारा ही कारित किए जा सकते हैं।

भारत दंड संहिता के अध्याय 9 में सामान्य रूप से चार प्रकार के अपराधों का उल्लेख किया गया है-

1)- घूस अथवा रिश्वत के सहवर्ती अपराध।

2)- बेमानीपूर्ण कार्य।

3)- विधि विरुद्ध कार्य।

4)- लोक सेवक का प्रतिरूपण।

भारतीय दंड संहिता के अध्याय 9 के अंतर्गत धारा 161 से लेकर धारा 165 (ए) तक भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1968 की धारा 31 द्वारा धाराओं को विलोपित कर दिया गया है। इन धारा को भारतीय दंड संहिता से विलोपित करने तथा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1980 में स्थान देने का मुख्य उद्देश भ्रष्टाचार जैसे अर्थ और समाज विरोधी अपराधों से कठोरता से निपटना है।

धारा 166

भारतीय दंड संहिता की धारा 164 के अनुसार जो कोई लोकसेवक होते हुए विधि के किसी ऐसे निर्देश की जो उस ढंग के बारे में हो जिस ढंग से लोक सेवक के नाते उसे आचरण करना है जानते हुए अवज्ञा इस आशय से यह संभव जानते हुए करेगा ऐसी अवज्ञा से वह किसी व्यक्ति को क्षति कारित करेगा वह सादा कारावास जिसकी अवधि 1 वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से दंडित किया जाएगा।

भारतीय दंड संहिता की धारा के अनुसार जानबूझकर किसी व्यक्ति को क्षति कारित करने के आशय से विधि की अवज्ञा करने वाले लोक सेवकों के लिए यह धारा दंड की व्यवस्था करती है लेकिन यदि कोई लोकसेवक केवल नियमों का उल्लंघन करता है तो वह इस धारा के अंतर्गत दंडनीय नहीं है।

भारतीय दंड संहिता की धारा 166 (ए) और 166(बी)

यह धारा लोक सेवक विधि के अधीन के निदेश की अवज्ञा करता है। उसके संबंध में उल्लेख कर रही है इस धारा के अनुसार विधि के किसी ऐसे निदेश की जो उसको किसी अपराध है किसी अन्य मामले में अन्वेषण के प्रयोजन के लिए किसी व्यक्ति की किसी स्थान पर उपस्थिति की अपेक्षा किए जाने से प्रतिषिद्ध करता है, जानते हुए अवज्ञा करता है।

या फिर दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 154 की उपधारा 1 के अधीन विशिष्ट धारा 226, 326 का धारा 326क धारा 354 धारा 376 जैसे संज्ञेय अपराध के संबंध में उसे दी गई सूचना को लेखबद्ध करने में असफल रहता है। जैसे किसी पुलिस अधिकारी को किसी महिला ने धारा 376 के संबंध में कोई सूचना दी तथा पुलिस अधिकारी उसकी सूचना पर बलात्कार से संबंधित कोई रिपोर्ट नहीं लिख रहा है यहां पर धारा 166 के अधीन इस प्रकार का अपराध कारित करने पर 2 महीने तक के कठोर कारावास और जुर्माने के दंड का प्रावधान किया गया।

धारा 167

धारा 166 धारा 167 के अंतर्गत किसी लोक सेवक द्वारा किए जाने वाले दोनों ही कार्य निदेश की अवज्ञा करना और दस्तावेज की इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख की अशुद्ध रचना या उसका अशुद्ध अनुवाद करना ऐसे हैं जो बेईमानीपूर्ण आशय से किसी व्यक्ति को क्षति कारित करने के लिए किए जाते हैं।

धारा 168 लोक सेवक होते हुए कोई व्यापार करना

भारत दंड संहिता की धारा 168 के अंतर्गत लोक सेवक होते हुए कोई व्यापार करना दंडनीय अपराध है। कुछ लोग सेवकों की सेवा के अधीन शासन द्वारा शर्तों को तय किया जाता है कि किसी लोक सेवक द्वारा कोई व्यापार नहीं किया जाएगा उसके पश्चात भी लोक सेवक द्वारा कोई व्यापार किया जाता है तो इसके परिणामस्वरूप ऐसे लोकसेवक को 1 वर्ष तक की अवधि के कारावास के दंड का निर्धारण किया गया है और इसके साथ जुर्माना भी आरोपित किया गया है।

धारा 169

लोक सेवक द्वारा जो विधि विरुद्ध रूप से संपत्ति क्रय करता है या उसके लिए बोली लगाता है। धारा 168 में प्रयुक्त शब्द व्यापार में सभी प्रकार के व्यापार कारोबार धंधे सम्मिलित हैं तथा धारा 169 में कोई ऐसी संपत्ति को खरीदना जो विधि विरुद्ध है जैसे कि कोई चोरी के संपत्ति खरीदना या प्राप्त करने के लिए किया गया करार व्यापार की परिभाषा में नहीं आता है। जहां कोई व्यक्ति पर शिक्षण प्राप्त करने के लिए अप्रेंटिस के रूप में रेलवे प्रशासन के साथ करार करता है वहां मात्र शिष्यवृत्ती प्राप्त करने के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि वह रेलवे प्रशासन के साथ में सम्मिलित हुआ था, रेलवे की सेवा में सम्मिलित होना था न कि रेलवे के साथ कोई व्यापार व्यवस्था करना।

धारा 169 के अधीन यदि कोई व्यक्ति लोकसेवक रहते हुए ऐसे लोक सेवक के नाते इस बात के लिए वैध रूप से आबद्ध होते हुए कि वह आमुख संपत्ति को न तो क्या करें और न उसके लिए बोली लगाएं या तो अपने निज के नाम में यह किसी दूसरे के नाम में अथवा दूसरों के साथ संयुक्त रूप से या अंशों में उस संपत्ति को क्या करेगा या उसके लिए बोली लगाएगा तो ऐसी स्थिति में 2 वर्ष तक के साधारण कारावास के दंड का निर्धारण किया गया है और उसके साथ में जुर्माना भी अधिरोपित किया जाएगा।

धारा 170

भारतीय दंड संहिता की धारा 170 लोक सेवक की नकल करने को भी अपराध घोषित करती है। कोई व्यक्ति लोक सेवक की वेशभूषा पहनकर या नाटक के द्वारा लोक सेवक की नकल करता है जिससे यह प्रतीत हो कि वह व्यक्ति लोकसेवक हो। जैसे कि कोई व्यक्ति पुलिस की ड्रेस पहन कर समाज में घूम कर लोगों को यह कह रहा है कि वह पुलिस है तथा राज्य शासन के अधीन कार्य करता है यह स्थिति भी भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत अपराध है। यदि कोई इस प्रकार से मिथ्या नाटक के माध्यम से समाज में संदेश देता है कि वह लोकसेवक है तथा लोक सेवक का प्रतिरूपण करता है तो ऐसी स्थिति में 2 वर्ष तक के कारावास का प्रावधान किया गया है। संहिता की धारा 170 के अंतर्गत 2 वर्ष का कारावास दिया जाएगा।

इसी प्रकार भारतीय दंड संहिता की धारा 171 के अधीन मात्र प्रतिरूपण धारा के अंतर्गत अपराध का गठन नहीं करता जब तक कि प्रतिरूपण करने वाला ऐसा व्यक्ति उस लोक सेवक के पद आभास के अंतर्गत कोई कार्य नहीं कर लेता या करने का प्रयास नहीं कर लेता।

इस संबंध में एक महत्वपूर्ण मामला है इस मामले में एक व्यक्ति पुलिस का जैकेट अपनी बगल में दबाए हुए ले जा रहा था इस आशय से कि लोग यह विश्वास कर ले कि वह पुलिस का सिपाही है। यह धारण किया गया कि उसका यह कार्य अपने आप में अपराध नहीं है। भारतीय दंड संहिता की धारा 171 के अंतर्गत दोषसिद्धि के लिए कुछ बातों का होना आवश्यक है तथा यह बातें जब सिद्ध होती है तो ही इन धाराओं के अंतर्गत किसी व्यक्ति को दोषसिद्ध किया जा सकता है।

किसी व्यक्ति द्वारा

किसी लोक सेवक के पद को यह जानते हुए कि वह ऐसा पद धारण नहीं करता है धारण करने का आदेश किया जाना।

ऐसे पद धारण करने वाले किसी अन्य व्यक्ति का प्रतिरूपण किया जाना।

ऐसे व्यक्ति द्वारा ऐसे पदभास के अंतर्गत कोई कार्य किया जाना अथवा करने का प्रयत्न किया जाना।

सहिंता की धारा 171 के अंतर्गत अभियुक्त का लोक सेवक के किसी विशिष्ट वर्ग का नहीं होना और ऐसे विशिष्ट वर्ग की पोशाक अथवा टोकन धारण करना और ऐसा इसलिए किया जाना कि लोग उसे कोई विशिष्ट सेवक समझे।

नाटक अभिनय इत्यादि के लिए पुलिस की पोशाक धारण करना अपराध नहीं है परंतु ऐसा नाटक इसलिए किया जाना क्योंकि लोग उसे वाकई में पुलिसवाला समझने लग जाए, यह अपराध है। जब इस प्रकार के नाटक के पीछे आशय स्वयं को लोक सेवक बता कर कोई कार्य कर दिया जाए तब भारतीय दंड संहिता की धारा 171 ऐसे कार्य को अपराध करार देती है।

निर्वाचन संबंधी अपराध

भारतीय दंड संहिता का अध्याय 9 (ए) निर्वाचन संबंधी अपराधों के संबंध में प्रावधान करता है। प्रजातांत्रिक शासन पद्धति में निर्वाचन का एक महत्वपूर्ण स्थान होता है क्योंकि ऐसा शासन जनता के लिए जनता के द्वारा और जनता का होता है। जनता के द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि शासन का संचालन करते हैं और देश के लिए नीतियों का निर्धारण भी करते हैं।

यह आवश्यक है कि इसे प्रतिनिधियों का निर्वाचन अत्यंत सावधानी से किया जाए ताकि ऐसी सरकार का निर्माण कर सके जो देश को स्वच्छ प्रशासन निष्पक्ष न्याय प्रदान कर सकें।

भारतीय दंड संहिता के इस अध्याय को सन 1920 के भारतीय 'निर्वाचन अपराध जांच अधिनियम' के द्वारा सहिंता में शामिल किया गया है। इस अध्याय में धारा 171 के अंतर्गत धाराओं को जोड़ा गया है। इस अध्याय में निर्वाचन की परिभाषा प्रस्तुत की गई है।

धारा 171(क) निर्वाचन संबंधी परिभाषा को प्रस्तुत करती है जिसके अनुसार निर्वाचन अधिकार से अभिप्राय है निर्वाचन में खड़ा होना या खड़ा न होना उम्मीदवार सूची से अपना नाम वापस ले लेना या मतदान करना।

इस धारा के अंतर्गत निर्वाचन से संबंधित रिश्वतखोरी को अपराध घोषित किया गया है। निर्वाचन में असम्यक असर डालने वाले कामों को भी दंड संहिता के अंतर्गत अपराध घोषित किया गया है। चुनाव निष्पक्ष होना चाहिए, चुनाव में किसी भी प्रकार के आपराधिक कार्य और लोप का समावेश नहीं होना चाहिए। जो भी किसी उम्मीदवार जब मतदाता को किसी ऐसे व्यक्ति को जिसे किसी उम्मीदवार या मतदाता का निर्वाचन संबंधित संबंध है किसी प्रकार की क्षति पहुंचाने की धमकी देता है या किसी उम्मीदवार या मतदाता को यह विश्वास करने के लिए प्रेरित करता है कि वह या कोई व्यक्ति जिससे उसका हित है किसी भी कारण से नुकसान में रहेगा जैसे की देवी प्रकोप आ जाएगा या फिर आध्यात्मिक निंदा हो जाएगी इत्यादि विषय को असम्यक असर कहा जाता है।

भारतीय दंड संहिता की धारा 171 के अंतर्गत निर्वाचन के प्रतिरूपण को भी अपराध घोषित किया गया है। इस धारा के अंतर्गत भ्रष्टाचार का होना आवश्यक माना गया है। जहां कोई व्यक्ति किसी चुनाव में मतदान कर चुका है और वही व्यक्ति उसी चुनाव में दोबारा मतपत्र की मांग करता है तो वह इस धारा के अधीन दंडनीय अपराध का दोषी माना जाएगा लेकिन यदि कोई व्यक्ति तत्समय प्रवृत किसी विधि के अधीन किसी अन्य निर्वाचक की ओर से प्रॉक्सी के तौर पर मतदान करता है तो उस पर धारा 171 के उपबंध लागू नहीं होंगे।

निर्वाचन संबंधी अपराधों के इस खंड में रिश्वत लेने के लिए 1 वर्ष तक की अवधी का कारावास निर्धारित किया गया है।

चुनाव में असम में असम्यक असर और प्रतिरूपण करने अर्थात फर्जी मतदान करने के लिए भी 1 वर्ष तक की अवधि का कारावास निर्धारित किया गया है।

धारा 171 की धारा (ज) के अनुसार जो कोई किसी अभ्यर्थी के साधारण या विशेष लिखित प्राधिकार के बिना ऐसे अभ्यर्थी का निर्वाचन अग्रसर करने या निर्वाचन करा देने के लिए कोई सार्वजनिक सभा करने में या किसी विज्ञापन परिपत्र या प्रकाशन या किसी अन्य ढंग से वह करेगा अर्थात किसी प्रकार से मतदाताओं को रुपए देकर बरगलाया जाएगा तथा उनसे मत लिया जाएगा ऐसी स्थिति में ₹500 तक का जुर्माना अधिरोपित किया जा सकता है।

अध्याय 10 (भारतीय दंड संहिता, 1860)

भारतीय दंड संहिता का अध्याय 10 लोक सेवकों के विधिपूर्ण अधिकार के अवमान के संबंध में उल्लेख कर रहा है। अधिकार एवं कर्तव्य दोनों एक दूसरे के सहवर्ती हैं। एक के अभाव में दूसरे के स्थिति की कल्पना ही नहीं की जा सकती प्रत्येक व्यक्ति का यह कर्तव्य है कि वह अधिकार के साथ-साथ अपने दायित्व को भी ईमानदारी के साथ निष्ठा और सच्चाई से निर्वाह करें।

इस उद्देश्य से भारत एंड संहिता अध्याय 10 के अंतर्गत लोक सेवकों के प्राधिकार की अवमानना करने को अपराध माना गया है तथा यह दंड संहिता के अंतर्गत एक महत्वपूर्ण अपराध है।

अध्याय 10 का अध्ययन करने के बाद लोक सेवकों के विधि पूर्ण प्राधिकार के अवमान से संबंधित अपराधों को कुछ धाराओं में विभक्त किया जा सकता है-

1)- स्वेच्छापूर्वक किसी लोक कर्तव्य का पालन नहीं करना है।

2)- स्वेच्छापूर्वक कतिपय कार्यों के पालन से इनकार करना।

3)- लोक सेवक को मिथ्या सूचना देना।

4)- अवैध संपत्ति का क्रय करना या बोली लगाना।

5)- लोक सेवक को बाधा पहुंचाना या उसके आदेश का पालन न करना।

6)- लोक सेवक को नुकसान पहुंचाने की धमकी देना।

इन सभी बातों को भारतीय दंड संहिता के अध्याय 10 के अंतर्गत लोक सेवकों के विधिपूर्ण प्राधिकार के अवमान से संबंधित अपराधों के अंतर्गत उल्लेखित किया गया है जिनका उल्लेख धारा 172 से लेकर धारा 190 तक है।

कोरोना संक्रमण काल हाल में अत्यंत प्रचलित रहने वाली धारा- 188 भी इसी अध्याय का हिस्सा है जिसके अंतर्गत लोक सेवक द्वारा दिए गए आदेश की अवमानना पर दंड की व्यवस्था की गई है। जैसे कि कोरोना संक्रमण काल के अंतर्गत कोरोना के संक्रमण को रोकने हेतु सरकार द्वारा कुछ दिशानिर्देश स्थापित किए गए थे इन दिशानिर्देशों को नहीं मानने के परिणामस्वरूप धारा 188 के अंतर्गत कार्यवाही की जाती थी।

इन धाराओं के अंतर्गत छोटे-छोटे दंड और जुर्माने से संबंधित अपराध है। कुछ अपराधों में 1 माह का कारावास तथा जुर्माना, कुछ अपराधों में 6 माह का कारावास तथा जुर्माना अधिकतम 1 वर्ष का कारावास और जुर्माना निर्धारित किया गया है।

धारा 177 झूठी सूचना देने के संदर्भ में उल्लेख करती है। इस धारा के अनुसार किसी लोकसेवक को मिथ्या सूचना दी जाती है ऐसी झूठी सूचना देने के पर 6 माह तक की अवधि के कारावास का निर्धारण किया गया है।

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