कैसे जटिल और अस्पष्ट फैसले न्याय प्रणाली पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं?

Himanshu Mishra

21 Feb 2025 12:04 PM

  • कैसे जटिल और अस्पष्ट फैसले न्याय प्रणाली पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं?

    मामला स्टेट बैंक ऑफ इंडिया बनाम अजय कुमार सूद (2022) में, भारत के सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने एक महत्वपूर्ण मुद्दे पर विचार किया कि न्यायालयों (Courts) को अपने फैसले (Judgments) कैसे लिखने चाहिए ताकि वे सभी लोगों के लिए स्पष्ट और समझने योग्य हों।

    इस मामले में मुख्य विवाद एक कर्मचारी की अनुशासनात्मक कार्रवाई (Disciplinary Action) से जुड़ा था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस अवसर का उपयोग न्यायिक तर्क (Judicial Reasoning), फैसले की संरचना (Structure of Judgment), और कानूनी लेखन (Legal Writing) की स्पष्टता (Clarity) पर ध्यान केंद्रित करने के लिए किया।

    अदालत ने जोर देकर कहा कि फैसले (Judgments) केवल वकीलों (Lawyers) और न्यायाधीशों (Judges) के लिए ही नहीं होते, बल्कि आम जनता (General Public) के लिए भी होते हैं। इसलिए, उनका स्पष्ट और सुगम (Accessible) होना आवश्यक है ताकि हर व्यक्ति यह समझ सके कि न्यायालय ने क्या निर्णय लिया और क्यों लिया।

    स्पष्ट निर्णय लेखन (Clear Judgment Writing) का महत्व

    एक अच्छी तरह से लिखा गया फैसला (Judgment) कई उद्देश्यों की पूर्ति करता है। यह कानूनी मुद्दों (Legal Issues) को स्पष्ट करता है, निर्णय के पीछे का तर्क (Reasoning) समझाता है, और भविष्य के मामलों के लिए एक मिसाल (Precedent) स्थापित करता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक फैसला (Judgment) अस्पष्ट (Unclear) या अत्यधिक जटिल (Complex) नहीं होना चाहिए, जिससे आम नागरिकों को इसे समझने में कठिनाई हो।

    अदालत ने शकुंतला शुक्ला बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2021) जैसे मामलों का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि एक फैसले (Judgment) में महत्वपूर्ण तथ्य (Material Facts), कानूनी मुद्दे (Legal Issues), तर्क (Reasoning), और एक स्पष्ट निष्कर्ष (Conclusion) होना चाहिए। यदि कोई फैसला (Judgment) सही तरीके से नहीं लिखा जाता है, तो यह सिर्फ संबंधित पक्षों को ही नहीं बल्कि पूरे न्यायिक प्रणाली (Judicial System) को प्रभावित करता है।

    फैसलों में तार्किक तर्क (Reasoning) की भूमिका

    सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि हर न्यायिक निर्णय (Judicial Decision) ठोस तर्क (Sound Reasoning) पर आधारित होना चाहिए। केवल आदेश जारी करना पर्याप्त नहीं है; बल्कि, अदालतों को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि वे किसी निष्कर्ष (Conclusion) पर कैसे पहुँचीं। यह प्रक्रिया न्यायालयों (Courts) की पारदर्शिता (Transparency) को बढ़ाती है और फैसलों को चुनौती देने (Appeal) के लिए उचित आधार (Grounds) प्रदान करती है।

    इस मामले में हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट (Himachal Pradesh High Court) द्वारा दिया गया फैसला इतना जटिल था कि सुप्रीम कोर्ट को इसे समझने में कठिनाई हुई। न्यायालय ने कहा कि कानूनी फैसले (Legal Judgments) केवल पेशेवरों (Professionals) के लिए नहीं होते, बल्कि वे आम लोगों को भी प्रभावित करते हैं। इसलिए, इनका स्पष्ट और तार्किक (Logical) होना आवश्यक है।

    स्पष्ट निर्णय लेखन (Clear Judgment Writing) के लिए दिशा-निर्देश

    सुप्रीम कोर्ट ने न्यायाधीशों (Judges) को फैसले (Judgments) को तार्किक, सुव्यवस्थित (Structured), और स्पष्ट (Clear) बनाने के लिए कुछ महत्वपूर्ण दिशानिर्देश दिए:

    1. सरल भाषा (Lucidity and Simplicity)

    न्यायाधीशों को सीधी और स्पष्ट भाषा (Simple and Clear Language) का उपयोग करना चाहिए। जटिल वाक्य संरचना (Complex Sentence Structure) और अत्यधिक कानूनी शब्दजाल (Legal Jargon) फैसले (Judgment) को समझने में कठिन बनाते हैं।

    2. तार्किक संरचना (Logical Structure)

    एक फैसले (Judgment) में निम्नलिखित क्रम होना चाहिए:

    o मुद्दा (Issue): कौन सा कानूनी प्रश्न (Legal Question) हल किया जा रहा है?

    o नियम (Rule): इस मुद्दे से संबंधित कौन से कानूनी सिद्धांत (Legal Principles) लागू होते हैं?

    o आवेदन (Application): इन कानूनी सिद्धांतों (Legal Principles) को इस मामले के तथ्यों (Facts) पर कैसे लागू किया गया?

    o निष्कर्ष (Conclusion): इस विश्लेषण (Analysis) के आधार पर अंतिम निर्णय (Final Decision) क्या है?

    3. अनुच्छेद क्रमांक और शीर्षक (Use of Paragraph Numbers and Headings)

    सुप्रीम कोर्ट ने सलाह दी कि सभी फैसलों (Judgments) में अनुच्छेद क्रमांक (Paragraph Numbers) और उपयुक्त शीर्षक (Headings) होने चाहिए, ताकि इसे पढ़ने और समझने में आसानी हो।

    4. दोहराव से बचाव (Avoiding Redundancy)

    अदालत ने अत्यधिक पुनरावृत्ति (Excessive Repetition) और अनावश्यक विस्तार (Unnecessary Elaboration) की आलोचना की। फैसला (Judgment) संक्षिप्त (Concise) होना चाहिए, लेकिन इसके तर्क (Reasoning) को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करना आवश्यक है।

    5. सभी के लिए सुगमता (Ensuring Accessibility)

    न्यायालय ने यह भी कहा कि फैसले (Judgments) समाज के सभी वर्गों के लिए सुगम (Accessible) होने चाहिए, विशेष रूप से दिव्यांग (Persons with Disabilities) व्यक्तियों के लिए। डिजिटल दस्तावेज़ (Digital Documents) ऐसे प्रारूप (Format) में होने चाहिए, जिन्हें स्क्रीन-रीडिंग सॉफ़्टवेयर (Screen-Reading Software) द्वारा पढ़ा जा सके।

    6. पूर्व निर्णयों (Precedents) का प्रभावी उपयोग

    एक फैसले (Judgment) में पूर्व के न्यायिक निर्णयों (Judicial Precedents) का सही संदर्भ (Proper Citation) होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल एल्युमिनियम एंड कंडक्टर्स और सरला सूद बनाम पवन कुमार शर्मा जैसे मामलों का हवाला दिया, जिनमें भी फैसले (Judgments) की अस्पष्टता (Unclear Language) के कारण पुनर्विचार (Reconsideration) की आवश्यकता पड़ी थी।

    खराब निर्णय लेखन (Poor Judgment Writing) के प्रभाव

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अस्पष्ट और जटिल फैसले (Judgments) जनता के न्यायालयों (Courts) पर विश्वास (Trust) को कमजोर कर सकते हैं। यदि कोई व्यक्ति यह नहीं समझ सकता कि उसके मामले (Case) में क्या निर्णय (Decision) हुआ और क्यों हुआ, तो वह महसूस कर सकता है कि उसके साथ अन्याय (Injustice) हुआ है।

    इसके अलावा, अस्पष्ट फैसले (Unclear Judgments) ऊपरी अदालतों (Appellate Courts) पर अतिरिक्त बोझ डालते हैं, क्योंकि उन्हें पहले यह समझना पड़ता है कि निचली अदालत (Lower Court) ने क्या कहा था। इससे न्याय प्रक्रिया (Justice Process) में देरी (Delay) और मुकदमेबाजी (Litigation) की लागत (Cost) बढ़ती है।

    न्यायाधीशों की भूमिका (Role of Judges)

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्यायाधीश (Judges) केवल निर्णय लेने वाले (Decision Makers) ही नहीं हैं, बल्कि वे कानून (Law) के संचारक (Communicators) भी हैं। उनके फैसले (Judgments) कानूनी सिद्धांतों (Legal Principles) को स्पष्ट करने और उन्हें लागू करने के लिए होते हैं।

    अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी, जस्टिस लॉर्ड बरोस (Lord Burrows) और जस्टिस डैफने बाराक-एरेज़ (Justice Daphne Barak-Erez) जैसे न्यायाधीशों ने फैसलों (Judgments) को सभी लोगों के लिए सुगम (Accessible) बनाने के महत्व पर जोर दिया है।

    सुप्रीम कोर्ट का फैसला स्टेट बैंक ऑफ इंडिया बनाम अजय कुमार सूद (2022) एक ऐतिहासिक निर्णय (Landmark Judgment) है, जो न्यायिक लेखन (Judicial Writing) की स्पष्टता (Clarity) और सुगमता (Accessibility) पर जोर देता है। यह फैसला याद दिलाता है कि न्याय (Justice) केवल किया ही नहीं जाना चाहिए, बल्कि इसे स्पष्ट और पारदर्शी (Transparent) रूप में प्रदर्शित भी किया जाना चाहिए ताकि आम जनता इसे समझ सके।

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