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धारा 165 साक्ष्य अधिनियम: जानिए क्या है गवाहों से प्रश्न पूछने की न्यायाधीश की स्वतंत्र शक्ति?

SPARSH UPADHYAY
17 April 2020 6:49 AM GMT
धारा 165 साक्ष्य अधिनियम: जानिए क्या है गवाहों से प्रश्न पूछने की न्यायाधीश की स्वतंत्र शक्ति?
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यदि एक अदालत को न्याय देने में एक प्रभावी साधन के तौर पर उभारना है, तो पीठासीन न्यायाधीश को महज़ एक दर्शक और एक रिकॉर्डिंग मशीन नहीं होना चाहिए कि वह मामले को बस सुने और एक टाइपिस्ट की तरह अपना निर्णय सुना दे।

उसे मामले में सत्य का पता लगाने हेतु स्वतंत्र रूप से गवाहों से सवाल करते हुए अपनी बुद्धिमत्ता, सक्रियता एवं रुचि का परिचय देना चाहिए। इसके जरिये न केवल सत्य की जीत होगी, बल्कि न्यायालय, मामले के परीक्षण में स्वयं भागीदार भी बन सकेगा और न्याय विजयी हो सकेगा।

यह आम तौर पर कहा भी जाता है कि

"प्रत्येक आपराधिक परीक्षण, खोज रूपी एक सफ़र है, जिसका मकसद या अंतिम पड़ाव सत्य की खोज है। सत्य की खोज करने और न्याय के कारण को आगे बढ़ाने के लिए प्रत्येक मौजूद तरीके का पता लगाना ही एक पीठासीन न्यायाधीश का कर्तव्य होता है।"

लॉर्ड डेनिंग ने भी यह कहा था कि सत्य की खोज करना, एक न्यायाधीश का कर्तव्य है और इस उद्देश्य के लिए वह किसी भी रूप में, किसी भी समय, किसी भी साक्षी या पक्षकारों से, किसी सुसंगत या विसंगत तथ्य के बारे में कोई भी प्रश्न, जो वह चाहे, पूछ सकता है।

इसी क्रम में, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की यह बेहद ही महत्वपूर्ण धारा यानी की धारा 165, अदालत में बैठे न्यायाधीश को न्यायतंत्र के अंतर्गत एक बहुमूल्य शक्ति प्रदान करती है। यह धारा, पीठासीन न्यायधीश को गवाहों एवं पक्षकारों से सवाल करने का अधिकार सौंपती है।

सुनील चंद्र रॉय एवं अन्य बनाम राज्य AIR 1954 Cal 305 के मामले में कलकत्ता उच्च न्यायालय द्वारा इस बात को रेखांकित किया गया कि धारा 165 को लागू करते वक्त यह विचार किया गया था कि देश के कई न्यायालयों में, जहां निचली रैंक के वकील अभ्यास करते थे, वो न तो मामले को ठीक से तैयार करते थे, न ही अदालत में गवाहों की ठीक से जांच की जाती थी। इसलिए यह आवश्यक हो जाता है कि न्यायाधीश को किसी भी प्रश्न को पूछकर सच्चाई पर पहुंचने के लिए पूरी शक्ति के साथ निहित किया जाए।

इसी उद्देश्य के साथ धारा 165 को अधिनियमित किया गया था जिसके अंतर्गत, न्यायाधीश द्वारा सुसंगत तथ्यों (relevant facts) का पता लगाने के लिए या उनका उचित सबूत अभिप्राप्त करने के लिए कोई भी प्रश्न पूछा जा सकता है या किसी भी दस्तावेज या चीज को पेश करने का आदेश दिया जा सकता है।

इस लेख में हम इस धारा को सीमित मायनों में समझेंगे और यह जानेंगे कि आखिर न्यायाधीश को इस धारा के अंतर्गत गवाह से सवाल पूछने से सम्बंधित क्या शक्तियां प्राप्त है।

क्या है भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 165?

भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 165 का उद्देश्य, जैसा कि हमने जाना, किसी मामले में न्यायाधीश को सच्चाई की गहराई तक जाने के उद्देश्य से सबसे व्यापक शक्ति प्रदान करना है। इस धारा के अंतर्गत न्यायाधीश, किसी गवाह या पक्षकार से प्रश्न पूछने या किसी भी दस्तावेज या चीज को पेश करने का आदेश देने के लिए स्वतन्त्र है। यह न्यायाधीश के रूप में उसकी स्वयं की शक्ति है, जिसके लिए किसी पक्ष को आवेदन देने की आवश्यकता नहीं होती है।

इस धारा का प्रभाव यह है कि किसी मामले की तह तक पहुंचने के लिए (सुसंगत तथ्यों का पता लगाने के लिए या उनका उचित सबूत अभिप्राप्त करने के लिए), न्यायालय हर तथ्य पर गौर कर सकता है, और सम्बंधित चीज़ों के बारे में पूछताछ कर सकता है, या किसी भी दस्तावेज या चीज को पेश करने का आदेश दिया जा सकता है।

इसी क्रम में, ऐसा (प्रश्न पूछते हुए या किसी भी दस्तावेज या चीज को पेश करने का आदेश देते हुए) करते हुए संभवतः अदालत द्वारा मूल्यवान साक्ष्य प्राप्त किये जा सकते हैं, जो अन्य साक्ष्यों की ओर इंगित करें जो प्रासंगिक/सुसंगत (relevant) और अदालत द्वारा स्वीकार्य (admissible) हो सकते हैं और इसलिए यह जरुरी हो जाता है कि अदालत/न्यायाधीश को धारा 165 में निहित शक्ति प्रदान की जाए- शिवानी शर्मा बनाम राम चंदर एवं अन्य 2015 ACJ 1547 दिल्ली उच्च न्यायालय।

आगे बढ़ने से पहले, आइये इस धारा को पढ़ लेते हैं और इसके बाद हम इस धारा से सम्बंधित अपनी चर्चा को जारी रखेंगे।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 165 यह कहती है कि

[BARE TEXT BEGINS] 165। प्रश्न करने या पेश करने का आदेश देने की न्यायालय की शक्ति — न्यायाधीश सुसंगत तथ्यों का पता चलाने के लिए या उनका उचित सबूत अभिप्राप्त करने के लिए, किसी भी रूप में, किसी भी समय, किसी भी साक्षी या पक्षकारों से, किसी सुसंगत या विसंगत तथ्य के बारे में कोई भी प्रश्न, जो वह चाहे, पूछ सकेगा तथा किसी भी दस्तावेज या चीज को पेश करने का आदेश दे सकेगा और न तो पक्षकार और न उनके अभिकर्ता हक़दार होंगे कि वे किसी भी ऐसे प्रश्न या आदेश के प्रति कोई भी आक्षेप करें, न ऐसे किसी भी प्रश्न के प्रत्युतर में दिए गए किसी भी उत्तर पर किसी भी साक्षी की न्यायालय की इजाजत के बिना प्रतिपरिक्षा करने के हक दार होंगे:

परंतु निर्णय को उन तथ्यो पर, जो इस अधिनियम द्वारा सुसंगत घोषित किए गए हैं और जो सम्यक॒ रूप से साबित किए गए हों, आधारित होना होगा

परंतु यह भी कि न तो यह धारा न्यायाधीश को किसी साक्षी को किसी ऐसे प्रश्न उत्तर देने के लिए या किसी ऐसी दसतावेज को पेश करने को विवश करने के लिए प्राधिकृत करेगी, जिसका उत्तर देने से या जिसे पेश करने से, यदि प्रतिपक्षी द्वारा वह प्रश्न पूछा गया होता या वह दस्तावेज मंगायी गई होती, तो ऐसा साक्षी दोनों धाराओं को सम्मिलित करते हुए धारा 121 से धारा 131 पर्यन्त धाराओं के अधीन इंकार करने का हकदार होता और न न्यायाधीश कोई ऐसा प्रश्न पूछेगा जिसका पूछना किसी अन्य व्यक्ति के लिए धारा 148 या धारा 149 के अधीन अनुचित होता; और न वह एतस्मिनपूर्व अपवादित दशाओं के सिवाय किसी भी दस्तावेज के प्राथमिक साक्ष्य का दिया जाना अभिमुक्त करेगा |[BARE TEXT ENDS]

धारा का महत्व

धारा 165 के अंतर्गत न्यायाधीश को यह शक्ति दी गयी है कि वह गवाहों से संगत या सुसंगत तथ्यों से सम्बंधित सवाल पूछ सके। यह धारा इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि प्रत्येक मामले में, न्यायाधीश से यह उम्मीद की जाती है कि वह अपने पास मौजूद हर तरीके से सच्चाई को खोजने की कोशिश करेगा और इसके लिए वह गवाहों से मामले के सम्बन्ध में प्रश्न कर सकता है।

वह उन बिन्दुओं पर भी प्रश्न कर सकता है, जिन्हें या तो पक्षों ने या उनके वकीलों ने नहीं छुआ या अनदेखा कर दिया। यदि न्यायाधीश को यह लगे कि मामले का परिक्षण इस प्रकार से नहीं हो रहा, जिससे सच्चाई का पता चल सके तो वह अधिकार-पूर्वक, स्वयं से सवाल पूछ सकता है, जैसा भी वह ठीक समझे।

राम चंदर बनाम हरियाणा राज्य 1981 AIR 1036 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने धारा 165 के अंतर्गत न्यायाधीश द्वारा इस शक्ति का इस्तेमाल करते हुए कुछ बातों को ध्यान में रखने की बात को रेखांकित किया था।

अदालत ने कहा था कि धारा 165 के अंतर्गत, न्यायाधीश को, लोक अभियोजक और बचाव पक्ष के अधिवक्ताओं के साथ अन्यायपूर्ण व्यवहार किये बिना, किसी प्रकार के पक्षपात के बगैर और बिना गवाहों को डराए हुए अपनी शक्तियों का प्रयोग करना चाहिए।

अदालत ने इस मामले में आगे यह भी कहा था कि न्यायाधीश को धारा 165 के अंतर्गत शक्तियों का प्रयोग करते हुए, अपने साथ अभियोजन और बचाव पक्ष को साथ लेकर चलना चाहिए। न्यायालय, अभियोजन और बचाव को एक टीम के रूप में काम करना चाहिए, जिसका लक्ष्य न्याय की प्राप्ति होना चाहिए और उस टीम का कप्तान एक न्यायाधीश होता है।

हालांकि, इस धारा के अंतर्गत किसी भी विशेष समय का उल्लेख नहीं मिलता है कि आखिर कब एक न्यायाधीश को कोई भी प्रश्न गवाह या पक्षकार से करना चाहिए। अर्थात, वह कभी भी गवाहों या पक्षकारों से कोई भी प्रश्न पूछ सकता है और इसके लिए उसे किसी स्टेज का इंतजार करने की आवश्यकता नहीं है।

लेकिन यह जरुर है कि आमतौर पर, न्यायाधीश द्वारा प्रश्न पूछे जाने के लिए उचित समय वह समय माना जाता है, जब पार्टियों के वकीलों ने अपने सवालों को खत्म कर दिया हो या कम से कम जब वकील, जो मौजूदा समय में गवाह की जांच/परीक्षा कर रहा हो, वह एक नए विषय पर जा रहा हो।

काउंसिल द्वारा परीक्षा/जांच के दौरान, न्यायाधीश हमेशा हस्तक्षेप कर सकता है। वह ऐसा हस्तक्षेप, एक स्पष्ट रूप में एक प्रश्न डालने या एक अस्पष्ट उत्तर को स्पष्ट करने के लिए या एक गवाह को गलत तरीके से गुमराह होने से रोकने के लिए कर सकता है।

लेकिन अगर वह ऐसा बार बार करता है और काउंसिल को बार-बार रोकता है, या वह अपने स्वयं के प्रश्नों की एक लंबी श्रृंखला रखता है तो वह एक प्रभावी एग्जामिनेशन या क्रॉस-एग्जामिनेशन को असंभव बना देता है और अपने प्राकृतिक कोर्स से परीक्षण को विचलित कर सकता है, जिसे होने से हमेशा रोका जाना चाहिए।

अंत में, सैद्धांतिक रूप से न्यायाधीशों की शक्तियां असीम और अपरिवर्तित हैं, परन्तु अदालतों द्वारा तय किये गए तमाम मामलों द्वारा कुछ सिद्धांतों को मान्यता अवश्य दी गई है, जिसका उन्हें उस तरीके से पालन करना चाहिए, जिस तरीके से इस शक्ति का सुचारू रूप से प्रयोग हो सके।

यह अवश्य इंगित किया जाना चाहिए कि धारा 165 के अंतर्गत शक्तिओं का प्रयोग करते हुए न्यायाधीश को कभी भी किसी का पक्ष नहीं लेना चाहिए। न्यायाधीश को कभी भी अपनी मूल गरिमा को छोड़कर इस शक्ति का प्रयोग नहीं करना चाहिए.

यदि वह ऐसा करता है और गवाह को जबरदस्ती कोई जवाब देने के लिए प्रोत्साहित करने की भावना से सवाल करता है, तो न्यायाधीश की कार्रवाई का गवाहों पर डराने या भड़काने वाला प्रभाव हो सकता है और ऐसे गवाहों के साक्ष्य, वास्तव में वे साक्ष्य नहीं हो सकते जो उन्होंने स्वतंत्र रूप से दिए हैं और ऐसे में अदालत द्वारा सुनाया गया निर्णय, त्रुटी से परिपूर्ण होगा जोकि न्याय के विरुद्ध होगा।

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