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जानिए संस्वीकृतियों की रिकॉर्डिंग के सन्दर्भ में (दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164)- भाग-2

LiveLaw News Network
14 Sep 2019 10:45 AM GMT
जानिए संस्वीकृतियों की रिकॉर्डिंग के सन्दर्भ में (दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164)- भाग-2
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वी. राम कुमार, केरल हाईकोर्ट के भूतपूर्व न्यायाधीश

(संस्वीकृतियों की रिकॉर्डिंग के सन्दर्भ में पहला भाग प्रकाशित किया जा चुका है, जिसमें दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के तहत संस्वीकृतियों की रिकॉर्डिंग के सन्दर्भ में विस्तार से बताया गया था। यह लेख आप यहां से पढ़ सकते हैं। पेश है इसी कड़ी का दूसरा भाग।)

जानिए संस्वीकृतियों की रिकॉर्डिंग के सन्दर्भ में (दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164)- भाग-१

कौन से स्टेज पर संस्वीकृति या बयान रिकॉर्ड किया जाता है?

7. "संस्वीकृति" या "बयान", अन्वेषण (तफ्तीश) के दौरान या उसके बाद किसी भी वक़्त पर जांच (इन्क्वायरी) या ट्रायल शुरू होने के पहले रिकॉर्ड किया जा सकता है।

धारा 164(1) के तहत उल्लेखित अन्वेषण या तो दंड प्रक्रिया संहिता के अध्याय XII या किसी भी अन्य कानून के तहत हो सकता है।

क्या अभियुक्त का गैर-संस्वीकृत बयान धारा 164 के तहत रिकॉर्ड किया जा सकता है?

8. हाँ। धारा 164 मात्र यह कहती है कि एक न्यायिक मजिस्ट्रेट बयान या संस्वीकृति रिकॉर्ड कर सकता है। दूसरे शब्दों में, धारा यह नहीं कहती है कि अभियुक्त के मामले में मजिस्ट्रेट मात्र संस्वीकृति ही रिकॉर्ड कर सकता है। यह धारा मजिस्ट्रेट को अभियुक्त की संस्वीकृति रिकॉर्ड करने या किसी भी व्यक्ति का बयान (जिसमें अभियुक्त भी शामिल है) रिकॉर्ड करने की शक्ति देती है।

इसलिए धारा 164 के तहत अभियुक्त का गैर-संस्वीकृत बयान भी रिकॉर्ड किया जा सकता है। [ देखिये- राव शिव बहादुर सिंह बनाम विंध्य राज्य AIR 1954 SC 322 = 1954 KHC 472- 3 जज बेंच; Varghese M.U. v. CBI, Cochin 2015 (3) KHC 417 (Kerala)]

धारा 164 के तहत दिया गया गैर-संस्वीकृत बयान, साक्ष्य विधि की धारा 18 से 21 के तहत 'एडमिशन' (स्वीकृति) मानते हुए देने वाले के विरुद्ध प्रयोग किया जा सकता है। [देखिये- Ghulam Hossain v. The King(1950) 51 Cri.L.J. 1552 (PC)]

धारा 164 के तहत संस्वीकृति कैसे रिकॉर्ड की जाये?

9. अब, अन्वेषण के स्टेज के दौरान मजिस्ट्रेट द्वारा अभियुक्त की "संस्वीकृति" रिकॉर्ड करने के नियमों की चर्चा करते है।

संस्वीकृति क्या है?

10. संस्वीकृति अभियुक्त द्वारा अपराध की स्वीकारोक्ति है। स्वीकारोक्ति एक मौखिक या लिखित बयान है, जो न्यायालय को किसी विवाद्यक तथ्य (fact in issue) या सुसंगत तथ्य (relevant fact)के रूप में एक निष्कर्ष निकालने में सक्षम बनाता है। 'स्वीकारोक्ति' और 'संस्वीकृति' में साफ़ तौर पर अंतर है। 'स्वीकारोक्ति' एक व्यापक अर्थ वाला शब्द है और इसमें संस्वीकृति भी शामिल है। अत: सभी संस्वीकृतियाँ स्वीकारोक्ति होती है पर हर स्वीकारोक्ति संस्वीकृति नहीं होती है। अगर स्वीकारोक्ति अभियुक्त का दोष सिद्ध करने हेतु पर्याप्त है तो वह संस्वीकृति होती है। [देखिये- paras 27 and 28 of State (NCT of Delhi) v. Navjot Sandhu (2005) 11 SCC 600.)]

संस्वीकृति की परिभाषा

11. प्रिवी कौंसिल ने पाकला नारायण स्वामी बनाम सम्राट AIR 1939 PC 47 मामले में संस्वीकृति की एक सर्व मान्य परिभाषा दी है-

संस्वीकृति में या तो अपराध स्वीकार किया जाना चाहिए या किसी भी हाल में वे सभी तथ्य स्वीकार किया जाने चाहिए जिनसे कोई अपराध गठित होता है।

उपर्युक्त परिभाषा को सुप्रीम कोर्ट ने इन मामलों में स्वीकार किया है- [देखिये- Palvinder Kaur v. State of Punjab AIR 1952 SC 354; Om Prakash v. State AIR 1960 SC 409; Veera Ibrahim v. State of Maharashtra (1976) 2 SCC 302; Jameel Ahmed v. State of Rajasthan AIR 2004 SC 588]

संस्वीकृति अत्यंत मान्य साक्ष्य है, क्योंकि कोई भी तर्कसंगत व्यक्ति, अपने ही विरुद्ध बयान नहीं देगा जब तक कि वह अपनी आत्मा से सत्य बोलने के लिए प्रेरित न हो। [देखिये- para 29, State (NCT of Delhi) v. Navjot Sandhu (2005) 11 SCC 600.]

संस्वीकृति के प्रकार-

12. मुख्यत: संस्वीकृति दो प्रकार की होती है - न्यायिक और गैर न्यायिक संस्वीकृति (judicial confession and extra judicial confession). न्यायिक संस्वीकृति भी दो प्रकार की होता है-

1. अन्वेषण के दौरान संस्वीकृति, एवं

2. ट्रायल के दौरान संस्वीकृति

दोनों ही संस्वीकृतियाँ कोर्ट में होती है। धारा 164, दंड प्रक्रिया संहिता अन्वेषण के दौरान संस्वीकृति से सम्बन्ध रखती है। ट्रायल के दौरान संस्वीकृति के दृष्टांत वह है जब समन ट्रायल के दौरान धारा 252, दंड प्रक्रिया संहिता के तहत अभियोग का सारांश अभियुक्त को पढ़ कर सुनाया जाता है या वारंट ट्रायल के तहत धारा 240 (1) या 246 (1), दंड प्रक्रिया संहिता के तहत 'चार्ज' फ्रेम किया जाता या धारा 229 के तहत सेशन ट्रायल के दौरान। इन सभी मामलों में कोर्ट अभियुक्त का अभिवचन (plea) अभियोग के सारांश पर या चार्ज पर लेती है।

अगर अभियुक्त स्वेच्छा से अभियोग के सारांश या चार्ज के सन्दर्भ में दोष स्वीकार करता है तो यह ट्रायल के दौरान संस्वीकृति का दृष्टांत है। गैर न्यायिक संस्वीकृति में वो संस्वीकृतियाँ शामिल हो सकती हैं, जो कोर्ट के बाहर किसी अधिकारी को की गयी हो जैसे पुलिस या किसी कानून के तहत पुलिस के अलावा कोई अधिकारी और इसमें वह संस्वीकृतियाँ भी शामिल है जो किसी मित्र, सम्बन्धी, या यहाँ तक कि एक अजनबी को दी गयी हो। किसी अधिकारी को दी गयी संस्वीकृति की वैधता, धारा 163, दंड प्रक्रिया संहिता और साक्ष्य विधि की धारा 24 के अनुसार निर्धारित की जाती है। किसी निजी व्यक्ति को की गयी संस्वीकृति के सन्दर्भ में कोर्ट सामान्यत: यह देखती है कि कहीं उस व्यक्ति का कोई गुप्-चुप उद्देश्य तो नहीं और उसकी गवाही ठोस, विश्वसनीय और विकृति से मुक्त है या नहीं।

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