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उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 भाग:19 इस अधिनियम के अंतर्गत मुकदमा लगाए जाने की प्रक्रिया और आवश्यक दस्तावेज

Shadab Salim
27 Dec 2021 5:31 AM GMT
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 भाग:19 इस अधिनियम के अंतर्गत मुकदमा लगाए जाने की प्रक्रिया और आवश्यक दस्तावेज
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उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 (The Consumer Protection Act, 2019) से संबंधित सभी आलेखों में इस अधिनियम के महत्वपूर्ण प्रावधानों पर चर्चा की गई है। उनसे संबंधित न्याय निर्णय प्रस्तुत किए गए हैं। इस आलेख के अंतर्गत इस अधिनियम के अंतर्गत कोई भी शिकायत दर्ज किए जाने की प्रक्रिया से संबंधित जानकारियां प्रस्तुत की जा रही है और किसी मुकदमे को दर्ज करवाने हेतु उसमें लगने वाले आवश्यक दस्तावेजों की सूची प्रस्तुत की जा रही है।

कैसे दर्ज करवाएं मुकदमा-

जैसा की विदित है इस अधिनियम के अंतर्गत त्रिस्तरीय आयोग बनाए गए हैं। इस अधिनियम में जो महत्वपूर्ण संशोधन किए गए हैं उसमें एक संशोधन यह है कि जिला आयोग के समक्ष लगाए जाने वाले परिवाद में लगने वाले समय को कम किया गया है और साथ ही जिस राशि के लिए परिवाद प्रस्तुत किया जा रहा है उसे बढ़ाया गया है।

वर्तमान में कोई भी परिवाद जिसमे एक करोड़ रूपए तक का मामला है उसे जिला आयोग के समक्ष प्रस्तुत किया जा सकता है। यदि कोई भी विवाद करोड़ रुपए तक का है ऐसी स्थिति में उसे प्राथमिक स्तर पर जिला आयोग के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा। जिला आयोग के समक्ष परिवाद प्रस्तुत किए जाते समय सबसे महत्वपूर्ण तथ्य परिसीमा को लेकर है।

कोई भी परिवाद उसके वाद हेतु के निर्मित होने से 2 वर्ष की अवधि के भीतर जिला आयोग के समक्ष प्रस्तुत किया जा सकता है और जिला न्यायालय के साथ राज्य आयोग और राष्ट्रीय आयोग के समक्ष भी किसी विवाद को प्रस्तुत किए जाने के लिए वाद हेतु से 2 वर्ष की अवधि का समय है। यह ध्यान देना चाहिए कि यह कोई भी नए मामले संस्थित करने के लिए परिसीमा है किसी अपील के लिए यह परिसीमा नहीं है।

लगने वाले आवश्यक दस्तावेज:-

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत दायर की जाने वाली शिकायत के लिए परामर्श तो यही होगा कि किसी अधिवक्ता को नियुक्त किया जाए परंतु यदि परिवादी स्वयं भी अपना मामला चलाना चाहता है तो उन दस्तावेजों को आयोग के समक्ष प्रस्तुत कर मामले को चलाया जा सकता है जो किसी मामले को चलाए जाने के लिए आवश्यक होते हैं।

उन दस्तावेजों की सूची यहां संलग्न की जा रही है-

1- परिवाद पत्र:-

यह परिवाद पत्र आयोग के अध्यक्ष के नाम से बनाया जाता है जिसमें वाद के पक्षकार उनके पते और उसी के साथ वाद के हेतु का भी उल्लेख किया जाता है। सभी बातों का उल्लेख सही-सही और ठीक तरीके से किया जाना चाहिए। पक्षकारों के पते ध्यान पूर्वक लिखे जाना चाहिए।

2- शपथ पत्र:-

ऐसे परिवाद पत्र के साथ एक शपथ पत्र आवश्यक होता है। शपथ पत्र इस मार्फ़त दिया जाएगा कि परिवाद पत्र में जो भी बातें कही गई है वह परिवादी के ज्ञान में सत्य है और कोई भी सत्य बात आयोग से छुपाई नहीं गई है। शपथ पत्र पर भी परिवादी के साथ विपक्षियों के नाम भी लिखे जाएंगे और ऐसे शपथ पत्र को एक शपथ आयुक्त के समक्ष अटेस्टेड करवाया जाएगा।

3- प्रति:-

परिवाद पत्र और उसके साथ जिन भी दस्तावेज को साक्ष्यों के लिए प्रस्तुत किया गया है उनकी फोटो प्रति आयोग के समक्ष प्रस्तुत की जाएगी। एक प्रति आयोग को दी जाएगी और इसी के साथ जितने भी पक्षकार विपक्षी बनाए गए हैं परिवादी द्वारा उन पक्षकारों के लिए भी अलग से प्रत्येक के लिए एक प्रति दी जाएगी। यहां पर यह ध्यान रखने योग्य है कि ऐसी प्रति में केवल परिवाद पत्र नहीं होगा अपितु वे सभी दस्तावेज होंगे जिन्हें हम आयोग के समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं अर्थात परिवाद पत्र के साथ शपथ पत्र उसके साथ संलग्न फेहरिस्त फॉर्म और उसके साक्ष्य की फोटो प्रतिलिपि।

4- पोस्टल आर्डर:-

यह पोस्टल आर्डर कोर्ट फीस के होते हैं। जिन परिवाद के अंतर्गत कोर्ट फीस लागू होती है जिसका उल्लेख इससे पूर्व के आलेख के अंतर्गत किया गया है किन मामलों में कितनी कोर्ट फीस देना होती है। मामले के परिवाद मूल्य के आधार पर कोर्ट फीस का निर्धारण होता है। लगने वाली कोर्ट फीस को पोस्टल आर्डर के माध्यम से दिया जाता है जो भी कोर्ट फीस लगती है उसका पोस्टल आर्डर परिवाद के साथ प्रस्तुत किया जाता है।

5- लिफाफा डाक टिकट और रजिस्टर ए डी:-

यह ध्यान देना चाहिए कि किसी भी परिवाद में आयोग द्वारा पक्षकारों को नोटिस किए जाते हैं परंतु ऐसे नोटिस को किए जाने में जो भी खर्च आता है वह खर्च पक्षकारों द्वारा ही वहन किया जाता है। जब भी परिवाद को प्रस्तुत किया जाता है तब प्रस्तुत किए गए परिवाद के स्वीकार हो जाने पर आयोग विपक्षियों को नोटिस जारी करता है और ऐसे नोटिस को जारी किए जाने के लिए परिवाद के दस्तावेजों को विपक्षी को भेजे जाने हेतु एक लिफाफे की आवश्यकता होती है। लिफाफे के साथ आवश्यक डाक टिकट की आवश्यकता होती है और साथ ही साथ एक रजिस्टर एडी की आवश्यकता होती है। ऐसी रजिस्टर ए डी लिफाफे को पक्षकार स्वयं भरते हैं। उन्हें भरने के बाद आयोग के समक्ष प्रस्तुत करते हैं। आयोग उन्हें लिफाफे में रखकर दस्तावेजों को विपक्षियों को प्रेषित करता है।

यह आवश्यक दस्तावेज किसी भी परिवाद के लिए होते हैं। इन दस्तावेजों के साथ किसी भी परिवाद को प्रस्तुत किया जा सकता है। विपक्षियों को नोटिस होने के बाद आयोग के समक्ष उपस्थित होकर अपना जवाब दावा प्रस्तुत करना होता है या फिर उनके द्वारा अपनी कमी को स्वीकारा जाता है। तब आयोग पक्षकारों के मध्य राजीनामा करा कर मामले का निपटारा कर देती है परंतु जवाब दावा पेश कर मामले के तथ्यों से इनकार किया जाता है ऐसी स्थिति में एक सिविल मामले की तरह यह मामला चलता है जिसमें साक्ष्य होते हैं, साक्ष्यों के बाद आयोग द्वारा निर्णय लिया जाता है परंतु यहां पर मामले शीघ्र चलाए जाते हैं। इसमें अधिक समय नहीं लगता है और सिविल न्यायालय से जल्दी आयोग में न्याय हो जाता है।

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