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उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 भाग:17 इस अधिनियम पर कोई अन्य अधिनियम लागू नहीं होना

Shadab Salim
25 Dec 2021 12:08 PM GMT
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 भाग:17 इस अधिनियम पर कोई अन्य अधिनियम लागू नहीं होना
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उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 (The Consumer Protection Act, 2019) की धारा 100 उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के संदर्भ में इस विषय पर अन्य अधिनियम के अल्पीकरण के संबंध में अर्थात उनके लागू न होने के संबंध में उल्लेख करती है। इस आलेख के अंतर्गत धारा 100 से संबंधित प्रावधानों पर चर्चा की जा रही है।

यह अधिनियम में प्रस्तुत की गई धारा का मूल स्वरूप है:-

धारा-100

अधिनियम का किसी अन्य विधि के अल्पीकरण में न होना इस अधिनियम के उपबंध तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के उपबंधों के अतिरिक्त होंगे न कि उनके अल्पीकरण में ।

अधिनियम के प्राविधानों के भूतलक्षी प्रभाव-

प्रभात बैग फैक्ट्री बनाम यूनाइटेड इण्डिया इन्श्योरेंस के वाद में अधिनियम के अस्तित्व में आने पर प्रदान किया जा सकता है। वह पूर्व उपभोक्ताओं को भी प्रदान किया जाना चाहिए क्योंकि अधिनियम का लाभ उन्हें मिले यही न्यायसंगत होगा।

यह व्यवस्था की गई है कि यदि संविधि इस उद्देश्य से पारित की गई है कि पब्लिक को बुराइयों एवं परेशानियों से निजात मिल सके तो इसका प्रभाव भूतलक्षी होना चाहिए।

निष्कर्षतः न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुँची है कि यदि अधिनियम के अस्तित्व में आने से पूर्व किसी उपभोक्ता का अहित हुआ है तो उपभोक्ता प्राविधानों का लाभ परिवाद दाखिल कर प्राप्त कर सकता है।

विवाद के निपटारा के लिए माध्यस्थ खण्ड को अन्तर्विष्ट करने वाला करार उद्भूत है तो उपभोक्ता निराकरण अधिनियम द्वारा एक परिवाद को विचारण संग्रहण करने का एक वर्जन नहीं होता है। चूंकि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अधीन उपबंधित उपचार तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य करार या विधि के उपबंधों के अतिरिक्त है। इसलिए निर्णयक विधि को निर्देशित किया गया।

सिविल न्यायालय में संस्थित वाद प्रभाव प्रत्यर्थी कम्पनी द्वारा खरीदी मशीन की आपूर्ति के लिए परिवाद किया गया। क्षतिपूर्ति का दावा दीवानी न्यायालय में गया। लम्बित था यह विनिर्णीत किया गया कि एन सी डी आर आयोग क्षतिपूर्ति का कोई दावा याचिका स्वीकार नहीं करेगी।

मद्रास उच्च न्यायालय में इसी आशय का एक वाद मौलिक रूप से क्षतिपूर्ति के विचाराधीन है। अनुतोष के लिए इसी मामले का एक सिविल वाद भी विचाराधीन है। जब एक ही आशय और उद्देश्य का वाद अन्य सक्षम न्यायालय में विचाराधीन है तो एन० सी० डॉ० आर० आयोग ऐसे मामले पर कोई विचार नहीं करेगी।

प्रस्तुत वाद में धारण किया गया कि चूंकि परिवादी ने एक परिवाद मुंसिफ, पाली के न्यायालय में समान अनुतोष प्राप्त करने के लिए संस्थित किया है इसलिए यह आयोग मामले के गुणदोष का विचारण नहीं कर सकता है।

मार्डन मैकेनिकल एण्ड इलेक्ट्रानिक्स व चेयर मैन कम एम डी राज फाइनेन्सियल कारपोरेशन 1991 प्रस्तुत वाद में यह धारण किया गया कि यदि समान अनुतोष प्राप्त करने हेतु कोई परिवाद सक्षम दीवानी न्यायालय के समक्ष विचारधीन है तो यह आयोग उसी प्रकार के मामले की याचिका को ग्रहण नहीं कर सकता है।

जो मामला सिविल न्यायालय के समक्ष विचाराधीन है वह इस अधिनियम के अन्तर्गत आयोग द्वारा निर्णीत नहीं किया जा सकता है।

क्षेत्राधिकार:–

राज्य आयोग, भारतीय टेलीग्राफ अधिनियम की धारा 7 (ब) के अधीन स्थित मीटर रीडिंग तथा अत्यधिक बिल भेजे जाने से संबंधित वादों को निर्णीत करने का क्षेत्राधिकार रखता है।

एक वाद में राज्य आयोग ने परिवाद इस प्रारम्भिक आधार पर निरस्त कर दिया कि इसी मामले से संबंधित याचिका माननीय उच्च न्यायालय द्वारा निरस्त की जा चुकी है। राष्ट्रीय आयोग में अपील प्रस्तुत की गई। धारण किया गया कि याचिका का निरस्त किया जाना इस आयोग के क्षेत्राधिकार के लिए अवरोध नहीं है।

गीता सभा बनाम बी० एल० कपूर मेमोरियल हास्पिटल, 2004 के मामले में विचारणीय प्रश्न यह था कि क्या दोनों कार्यवाही एक मोटरयान अधिनियम के अन्तर्गत कार्यवाही तथा दूसरी अस्पताल तथा चिकित्सकों के विरुद्ध लापरवाही हेतु क्षतिधन की वापसी की कार्यवाही प्रचलन योग्य थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रश्न को निराकृत करने के लिए राष्ट्रीय आयोग को निर्देशित किया।

प्रस्तुत मामले में विचारणीय प्रश्न यह था कि क्या निष्कासन कार्यवाही को इस बारे में आदेश देने का अधिकार उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अन्तर्गत गठित न्यायालयों को होगा। इस बारे में मत नकारात्मक दिया गया। इस बारे में स्पष्ट विवेचना करते हुए राष्ट्रीय आयोग ने बताया कि अधिनियम की धारा 14 पर उपभोक्ता न्यायालयों को निष्कासन कार्यवाही का आदेश करने के लिए सक्षम नहीं करते है।

वित्तीय संस्थान में निक्षेप किए गये धन से सम्बन्धित विवाद पर कम्पनी लॉ बोर्ड द्वारा निर्णय दिए जाने पर उपभोक्ता फोरम की अधिकारिता वर्जित नहीं होगी।

सूचना प्रस्तुत वाद में राज्य के विरुद्ध परिवाद संस्थित किया गया। विपक्ष की ओर से यह तर्क दिया गया कि सिवित प्रक्रिया संहिता की धारा 50 के अन्तर्गत सूचना नहीं दी गई। न्यायालय ने धारण किया कि यह विशेष अधिनियम वादों के शीघ्र निपटारे के लिए निर्मित किया जाता है तथा विधायकों का यह इरादा नहीं था कि धारा 50 सिए प्रसंग के अन्तर्गत नोटिस की जाए।

महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय रोहतक बनाम शकुन्तला चौधरी, 1992 के प्रयोज्यता प्रस्तुत वाद में परिवादिनी बी एक (भाग-1) परीक्षा 1990 में बैठी उसका रोल नम्बर 41516 था। गजट में परिणाम घोषित किया गया। परिवादिनी का विवरण दिया गया। परिवादिनी की शिकायत यह थी कि गलत विवरण के कारण उसे अन्य संस्था से प्रवेश नहीं मिल सका।

इसलिये वर्तमान परिवाद संस्थित किया गया। प्रश्न यह था कि विश्वविद्यालय अधिनियम अन्य अधिनियमों के विरुद्ध विश्वविद्यालय को उन्मुक्ति प्रदान करता है, धारण किया गया कि नहीं। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के उपबंध विश्वविद्यालय पर लागू होंगे।

अधिनियम किसी अन्य विधियों में बाधक न होंगे-

अधिनियम के अन्तर्गत बीमा पालिसी पंचाट निर्णय बाबत किसी विवाद में किसी धनराशि होनी चाहिए उपचारात्मक अधिकरणों में जाने के लिए कोई बाधक न होगी।

पंच निर्णय कार्यवाही स्थगन-

परिवादी ने अपने आवास पर वातानुकूलित लगवाने की सेवा में आई कमी के लिए आरोप लगाते हुए 3.75 लाख का क्षतिपूर्ति दाखिल किया। प्रतिपक्षी ने पंच निर्णय उपबंध का हवाला देते हुए एक स्थगन प्रार्थनापत्र दी। राज्य आयोग ने स्थगित कर दी जिस पर की अपील दाखिल हुई यह अभिनिर्धारित किया गया कि धारा 34 पंचाट अधिनियम के अन्तर्गत जिला मंच की कार्यवाही स्थगित योग्य नहीं है।

ट्रान्सपोर्ट सेवा:-

सामानों को ले जाना आना। जिला मंच को अतिरिक्त आय का उपचार देने का अधिकार वाहन अधिनियम के प्रतिरोध में नहीं है जैसा कि धारा 2 (1) (ठ) उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम में ट्रान्सपोर्ट सेवा सेवाएं। इसलिए राज्य आयोग को पूरा अधिकार एवं क्षेत्राधिकार है कि धारा 3 के अन्तर्गत अतिरिक्त स्रोत के रूप में उपचार थे और यह वाहन अधिनियम को बाधित नहीं करेगा।

जहाँ पर कि विपक्षी ने यह दलील पेश की कि धारा 17वी इण्डियन टेलीग्राफ अधिनियम 1885 जिला मंच को इस तरह के मामले को निपटारे के लिए रोकता है। यह अभिनिर्धारित किया गया कि पंच निर्णय में 2 रूप में 7 व इण्डियन टेलीग्राफ अधिनियम जिला मंच को अपने क्षेत्राधिकार प्रयोग में बाधा नहीं पहुंचाता है। यह अधिनियम क्षुब्ध उपभोक्ता को मंच से उपचार पाने के लिए अन्तर्गत उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम रोक नहीं लगाता है। क्योंकि संसद् द्वारा उपबंधित विशेष रूप त्वरित उपचार के लिए विशेष उद्देश्य के लिए बनाया गया है।

व्यापारी के विरुद्ध परिवाद उपभोक्ता मंच का संक्षिप्त क्षेत्राधिकार वाय अपमिश्रण अधिनियम के अन्तर्गत आपराधिक अभियोजन से भिन्न है इसलिए वाय अपमिश्रण पर रोक अधिनियम के अन्तर्गत हो रही कार्यवाही की सहायता नहीं ली जा सकती है।

सेवा में कमी:-

कोल्ड स्टोरेज की तरफ से सेवा में कमी से सम्बन्धित उपभोक्ता परिवाद उत्तर प्रदेश कोल्ड स्टोरेज अधिनियम के अधीन उपलब्ध उपचार के बावजूद भी पोषणीय है।

संविदा में उपार्जन खण्ड की भूमिका का निर्धारण-

एक प्रस्तुत मामले में पक्षकारों के बीच संविदा हुई कि सभी विवादों का निपटारा बम्बई में न्यायालय द्वार न्यायनिर्णयन किया जायेगा। जहां तक फर्नाटक में फोरम में उपभोक्ता परिवाद की पोषणीयता का प्रश्न है तो उपभोक्ता फोरम न्यायालय नहीं होती बल्कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अधीन गणित प्राधिकरण होते हैं, एतएव संविदा में अपवर्जन खण्ड उपभोक्ता न्यायालय द्वारा अधिकारिता के प्रयोग का एक वर्णन नही होगा जहां वाद हेतुक परिवादी को पैदा हुआ।

फीस का भुगतान:-

उपभोक्ता फोरम के समक्ष फीस के भुगतान की दर सम्बन्धी विवाद विचार योग्य नहीं है। इस बारे में सिविल न्यायालय में कार्यवाही की जानी चाहिए।

सेवा में कमी:-

गृह निर्माण मण्डल के विरुद्ध सेवा में कमी किए जाने के आधार पर परिवाद प्रस्तुत किया गया। सेवा में कमी पर आधारित परिवाद को सुनने की अधिकारिता अधिनियम के अन्तर्गत गठित उपभोक्ता अदालत की मानी गयी। इस स्थिति में वाद प्रस्तुत करने केले निर्देशित करने की आवश्यकता नहीं है।

यह अभिनिर्धारित किया गया कि उपभोक्ता वहां इस प्रकृति के मामले को निर्णीत कर सकता है जहां सेवा में कमी / अनुचित व्यापार पद्धति के आधार पर निर्माताओं / विकासकर्ता के विरुद्ध परिवाद दाखिल किया हो।

बैंक प्रभार की वसूली-

बैंक प्रभार की वसूली को चुनौती इस आधार पर दी गयी रिजर्व बैंक के निर्देशों के विपरीत था। मामले में इस तथ्य को दृष्टिगत रखते हुए कि मामले में विधि व तथ्य के जटिल प्रश्न अन्तर्ग्रस्त है। मामले को निराकृत करने की अधिकारिता अधिनियम के अधीन नहीं है।

माध्यस्थम करार माध्यस्थम खण्ड का अवलम्ब लेने का अधिकार होने के बावजूद भी यदि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अन्तर्गत दावा प्रस्तुत किया गया हो तथा यह गुणागुण पर निराकृत हुआ हो तो इसके बाद माध्यस्थम खण्ड का अवलम्ब लेने का अधिकार नहीं रहेगा।

समझौता:-

सिविल वाद में समझौता हुआ समझौते के अनुसार यदि बैंक के द्वारा सिविल न्यायालय द्वारा घोषित "अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी न किया गया हो तो इस बारे में परिवादी को सिवित न्यायालय में ही इस आदेश का निष्पादन करवाकर अनुतोष हासिल करना चाहिए। इस बारे में उपभोक्ता संरक्षण के तहत परिवाद अप्रचलन योग्य मानी गयी।

सोसाइटी तथा सदस्यों के बीच विवाद:-

सोसाइटी तथा इसके सदस्यों के बीच विवाद का निराकृत करने की अधिकारिता उपभोक्ता फोरम को है।

दाखिल किये गये परिवाद की विधिमान्यता:-

जहां करार खण्ड बम्बई में न्यायालय की अधिकारिता को निबंधित कर रहा था, वहां जब उपभोक्ता परिवाद कर्नाटक में फोरम के समक्ष दाखिल किया तब उसको वापस कर दिये जाने योग्य या खारिज कर दिये जाने योग्य माना गया।

एक प्रकरण में मशीनरी का क्रय किया गया दाखिल किया गया जिसमें प्रारम्भिक आपत्ति कि मामला मध्यस्थ को जायेगा स्वीकार नहीं किया गया। उसमें खराबी पायी गयी। परिवाद

उपभोक्ता विवाद निपटारा-

उपभोक्ता फोरमों के समक्ष एक उपभोक्ता द्वारा दायित्व किया गया परिवाद मध्यस्थ को विवाद निर्देशित करने के करार में उनके होने के बावजूद भी पोषणीय होगा क्योंकि एक शीघ्र एवं खर्चीली रीति से प्रभावित किये गये उपभोक्ताओं की शिकायतों के निवारण के उद्देश्य से एक विशेष उपचार होता है।

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