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उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 भाग:13 राष्ट्रीय आयोग के आदेश के विरुद्ध अपील

Shadab Salim
23 Dec 2021 11:41 AM GMT
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 भाग:13 राष्ट्रीय आयोग के आदेश के विरुद्ध अपील
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उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 (The Consumer Protection Act, 2019) की धारा 67 राष्ट्र आयोग के दिए गए आदेश के विरुद्ध अपील के संबंध में प्रावधान करती है। यह अधिनियम राष्ट्र आयोग के आदेश को भी अंतिम नहीं मानता है तथा उसके आदेश के विरुद्ध भी अपील का अधिकार देता है। इस आलेख के अंतर्गत धारा 67 से संबंधित प्रावधानों पर चर्चा की जा रही है।

यह अधिनियम में प्रस्तुत की गई धारा का मूल स्वरूप है:-

धारा- 67

राष्ट्रीय आयोग के आदेश के विरुद्ध अपील-

धारा 58 की उपधारा (1) के खंड (क) के उपखंड (i) या (ii) द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए राष्ट्रीय आयोग द्वारा किए गए आदेशों से व्यथति कोई व्यक्ति, आदेश की तारीख से तीस दिन की अवधि के भीतर ऐसे आदेशों के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय को अपील कर सकेगा :

परंतु उच्चतम न्यायालय उक्त तीस दिन की अवधि के अवसान के पश्चात् अपील ग्रहण कर सकेगा, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि उस अवधि के भीतर इसे फाइल न करने का पर्याप्त कारण था :

परंतु यह और कि किसी व्यक्ति द्वारा जिससे राष्ट्रीय आयोग के आदेश के निबंधानुसार किसी रकम का संदाय करने के लिए अपेक्षा की जाती है, उच्चतम न्यायालय द्वारा तब तक ग्रहण नहीं की जाएगी, यदि उस व्यक्ति ने उच्चतम न्यायालय में विहित रीति में उस रकम का पचास प्रतिशत जमा नहीं किया है।

अपील का अधिकार:-

हालांकि अपील का कोई अन्तर्निहित अधिकार नहीं है, परन्तु यदि इस तरह के अधिकार का कोई उपबंध है, तो उसे वाजिब ढंग से व्यावहारिक रूप से तथा उदारतापूर्वक तरीके से पढ़ा जाना चाहिए।

यह धारा राष्ट्रीय आयोग के आदेश के विरुद्ध अपील का समृद्ध अधिकार देती है परंतु इस धारा के अंतर्गत अपील तभी की जा सकती है जब आदेश के अंतर्गत दी गई राशि का 50% उच्चतम न्यायालय में जमा कर दिया जाता है।

शासकीय सेवा उसकी सेवा शर्तों ग्रेच्युटी या जीपीएफ या उसके सेवानिवृत्त लाभों में से किसी के हेतु कोई भी विवाद अधिनियम के अधीन किमी फोरम के समझ नहीं उठ सकता शासकीय सेवक उपभोक्ता की परिभाषा के अधीन नहीं आता।

ऐसा शासकीय सेववक उसके सेवानिवृत्त लाभ उसकी सेवा शर्तों तथा विनियमों अथवा उस प्रयोजन के लिए विरचित वैधानिक नियमों के अनुसार कठोरतापूर्वक दावा करने का पत्र है। समुचित फोरम उसकी किसी ज्यादा के प्रतिपोषण के लिए राज्य प्रशासनिक अधिकरण हो सकती है। यदि कोई हो या सिविल न्यायाय परंतु निश्चित रूप से अधिनियम के अधीन फोरम नहीं।

2. नियमित उपभोक्ता परिषद्:-

कामन बान रजिस्टर्ड सोसाइटी बनाम भारत संघ पिटीशनर का सामान्य कारण जो कि एक पंजीकृत संस्था थी जिसे जनता के विवादों का निवारण किया करती थी। इस अधिनियम के आने से 2 वर्ष बाद याचिका दाखिल की जिसमें यह परिवाद किया गया कि अधिनियम के उपबंध भ्रामक है तथा कुछ जिलों को छोड़कर प्रत्येक जिलों में उपचारात्मक मंच नहीं स्थापित किये गये हैं, अतः भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 के अन्तर्गत उच्चतम न्यायालय के निर्देश उचित सरकार को देने हेतु याचिका प्रस्तुत की गयी बाबत अधिनियम के उपबंधों के अनुसार अविलम्ब जिला मंच स्थापित किये जाए तथा उनकी जल्दी क्रियान्वयन हो

उच्चतम न्यायालय ने प्रस्तुत वाद में निम्न निर्देश दिये:-

(1) जहाँ कहीं भी कार्यरत जिला जज जिला मंच व अध्यक्ष बनकर कार्य कर रहे हों तथा कार्य का भार कम से कम मासिक 150 वादों से 6 महीने में अधिक हो तो वह उच्च न्यायालय को इसकी संसूचना देगा जो वे प्राप्ति के 6 महीने के भीतर एक स्वतंत्र एवं नियमित जिला मंच जैसा धारा 9 में अभिप्रेत है, नियुक्त करेगा। 6 महीने की समाप्ति पर उच्च न्यायालय ऐसे वैकल्पिक व्यवस्था को समाप्त करने को स्वतंत्र होगा तथा राज्य सरकार यू० टी० को सूचना देते हुए जिला जजों को अपने-अपने कार्यों पर वापस बुला देगा तथा फिर यह राज्य सरकार यू टी प्रशासन की जिम्मेदारी होगी कि अधिनियम के ऐसे उपबंधों को कार्यान्वित करने हेतु कोई प्रबंध करें।

(2) उन जिलों में जहाँ कि कार्यभार उच्चतम न्यायालय के आदेश दिनांक 5-8-1991 से वांछित से पार नहीं करता है तो यह अस्थाई व्यवस्था साल भर तक चलेगी और उस समय के दौरान राज्य सरकार यू टी प्रशासन प्रत्येक जिलों में एक उपभोक्ता मंच गठित करने हेतु कदम उठायेगा या यदि केन्द्र सरकार आज्ञा देती है तो 2/3 जिलों में एक उपभोक्ता मंच का गठन किया जायेगा। सालभर की समाप्ति पर संबंधित उच्च न्यायालय इस तरह के अस्थाई व्यवस्था को खत्म कर देगा, जो कि जिला जजों को मंच का अध्यक्ष बना कर काम ले रहा है और इस तरह से राज्य सरकार यू० टी० प्रशासन अधिनियम के उपबंधों को कार्यरूप में परिणित करायेगा।

(3) इस आदेश की एक प्रति प्रत्येक राज्य सरकार यू टी प्रशासन के मुख्य सचिवों को भेजी जावें जिससे कि इस दिशा में अधिनियम के उपबंधों को कार्यरूप में समय भीतर करने हेतु उद्यत हो और अन्ततः उपभोक्ता का हित सुरक्षित किया जा सके।

यदि राज्य उपभोक्ता फोरम ने अपने आदेश में इस प्रकार का उल्लेख किया है कि (मे०) जबलपुर ट्रैक्टर्स गैरेज चार्ज के लिए जो 1800 रुपये की एक रकम का दावा किया, वहीं इसके बाबत एक मामला पहले से ही सक्षम सिविल न्यायालय के समय लंबित या विचाराधीन था, तो ऐसे मामले पर उसके द्वारा विचारण नहीं किया जा सकता था; कारण कि, उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम को किसी अन्य विधि के अत्यीकरण में नहीं मान्यता प्रदान किया जा सकता है। अतएव, प्रस्तगत आदेश में राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग को प्रतिवादी को कार को सुपुर्द करने का निर्देश देने को न्यायोचित्य नहीं माना गया।

सेवा में कमी:-

एक अन्य मामले में अपीलकर्ता ने प्रतिवादी द्वारा सीमेण्ट की आपूर्ति करने में सेवा में अर्यात का अभियन किया गया जिसके लिए अपीलकर्ता द्वारा प्रस्तुत किये गये आदेश की संपुष्टि कर दी गयी। यद्यपि राज्य आयोग ने परिवाद को स्वीकृत कर दिया लेकिन अपील में राष्ट्रीय आयोग ने यह अभिनिर्धारित करते हुए परिवाद को खारिज कर दिया कि पक्षकारों के बीच सेवा को किराये पर प्राप्त करने की कोई व्यवस्था नहीं हुई थी किन्तु जब राष्ट्रीय आयोग के विरुद्ध अपील दायर की गयी, तब इसके आदेश को खारिज कर दिया गया और मामले को पुनः विचारणार्थ प्रतिप्रेषित कर दिया गया क्योंकि राष्ट्रीय आयोग का आदेश तकनीकी या जबकि इसको अधिनियम के अधीन प्रावधानों को दृष्टिगत रखते हुए पक्षकारों के अभिवचनों का उचित रूप से मूल्यांकन करने को पश्चात् पारित किया जाना चाहिए था।

सेवा में कमी के आधार पर बीमा कम्पनी के विरुद्ध परिवाद प्रस्तुत किया गया। बीमा कम्पनी अपील के स्टेज पर उन दस्तावेजों को प्रस्तुत करने का हकदार नहीं माना गया जो कि मूल विचारण के स्टेज पर प्रस्तुत नहीं किया गया था।

प्रतिकर की राशि में कमी:-

एक प्रकरण में उच्चतम न्यायालय ने यह पाया कि राष्ट्रीय आयोग ने स्वीकृत प्रतिकर की राशि में कमी करने का जो आदेश दिया था उसके बारे में कारणों को नहीं दिखाया था ऐसी स्थिति में मामले को नये सिरे से विचार किए जाने के लिए प्रतिप्रेषित कर दिया गया।

दायित्व का उन्मोचन:-

एक प्रकरण में राष्ट्रीय आयोग द्वारा 18 प्रतिशत व्याज सहित राशि का भुगतान करने हेतु निर्देशित किया गया जिसमें राशि का भुगतान 12 प्रतिशत वार्षिक की दर से किया गया यह स्वीकार किया गया कि 18 प्रतिशत वार्षिक की दर से राशि वा भुगतान करने का दायित्व उन्मोचित नहीं किया जा सकता।

चिकित्सीय साक्ष्य-

चिकित्सीय साक्ष्य उपेक्षा के बारे में परिवाद प्रस्तुत किया गया जिसमें यह लांछन लगाया गया कि चिकित्सक के द्वारा चिकित्सा में उपेक्षा के कारण मरीज पक्षपात में पीड़ित हो गया परिवाद राष्ट्रीय आयोग द्वारा इस आधार पर नहीं स्वीकार किया गया कि परिवाद में दावाकृत प्रतिकर अधिक था।

निरस्त किए गये परिवाद से व्यथित होकर उनम न्यायालय में पहुंचा गया। उच्चतम न्यायालय ने व्यक्त किया कि राष्ट्रीय आयोग ने निष्पक्षता मे परिवाद का निराकरण नहीं किया। फल रूप आक्षेपित आदेश निरस्त कर दिया गया तथा नये सिरे से निराकरण के लिए मामले को प्रतिप्रेषित कर दिया गया।

जहां विरोधी पक्षकारों की चिकित्सीय उपेक्षा के कारण मृतका को विशाल दर्द, मानसिक पीड़ा एवं कष्ट उपचार के दौरान झेलना पड़ा वहां उसकी मृत्यु के लिए दावेदार को 10 लाख स की एक मुफ्त रकम बतौर प्रतिकर प्राप्त करने का हकदार माना गया।

यदि अस्पताल जानते हुए उन सुख-सुविधाओं को प्रदान करने में असफल हो जाता है, जो रोगियों के लिए मौलिक है तो यह निश्चित रूप से चिकित्सीय दुराचार की कोटि में आयेगा।

भजनलाल बनाम मूलचन्द स्त्री राम हास्पिटल, 2001 के मामले में चिकित्सीय उपेक्षा के मामले में केवल प्रत्यर्थी संख्या 1 जिसकी प्रास्थिति अस्पताल को मेडिकल सुपरिण्टेण्डेण्ट की थी को प्रतिकर भुगतान हेतु उत्तरदायी माना गया तथा चिकित्सक पर प्रतिकर भुगतान का व्यक्तिगत दायित्व नहीं नियत निश्चित किया गया।

चिकित्सीय सेवाएं चिकित्सीय उपेक्षा-

एक मामले में क्या दावा याचिका आवश्यक पक्षकारों को न संयोजित किये जाने के आधार पर खारिज किया जा सकता है? अभिनिर्धारित किया गया "नहीं"।

विजय सिन्हा राय (मृत) जरिये एल आर बनाम विश्वनाथ दास, 2018 के मामले में जहां न तो राज्य आयोग और न ही राष्ट्रीय आयोग ने अपीलार्थी के इस अभिवचन की परीक्षा की थी कि आपरेशन उस नर्सिंग होम में नहीं किया जाना चाहिए था जिस में आई सी यू नहीं था जब यह युक्तियुक्त रूप से कल्पना की जा सकती थी कि आई सी यू के बिना रोगी के जीवन की आगे की आपरेशन संबंधी जोखिम था, तब न्यायहित में विरोधी पक्षकार सं 1 को 5 लाख रु के रकम का संदाय ब्याज के बिना अपीलार्थी को वारिसों को देने का निर्देश दिया गया।

कनवल जीत सिंह बनाम नेशनल इंश्योरेंस कंपनी के मामले में चिकित्सीय दावा पालिसी का लागू होना चिकित्सीय दावा पालिसी के अन्तर्गत दावे का निराकरण बीमा कम्पनी द्वारा नहीं किया जा सकता था क्योंकि उस समय पहले से ही अस्तित्वशील कोई बीमारी बीमाकृत व्यक्ति को नहीं थी जब पालिसी उसके द्वारा ग्रहण की गयी। अतएव, दावेदार को जिला फोरम के आदेशों के अधीन बीमा कम्पनी द्वारा पहले से ही संदाय किये गये रकम सहित 2,50,000/- रु० का हकदार माना गया।

परिवाद का खारिज किया जाना:-

यदि कोई विवाद नहीं होता तो कोई परिवाद नहीं होगा। ऐसी दशा में राष्ट्रीय आयोग को प्रत्यर्थी को नोटिस जारी किये बगैर तथा इसके समक्ष अपनी प्रतिरक्षा करने की उसको अनुमति प्रदान करने के पूर्व प्रारम्भ से ही परिवाद को खारिज कर देने में न्यायसंगत नहीं माना गया।

परिसीमा के आधार पर परिवाद खारिज किया गया तथा परिव्यय अधिरोपित किया गया। भूखंड आवंटन के विवाद में उच्चतम न्यायालय द्वारा निकाले गये निष्कर्ष के परिप्रेक्ष्य में अपीलार्थी द्वारा राष्ट्रीय आयोग द्वारा अधिरोपित परिव्यय अपास्त करना उचित एवं समुचित विचारण करते हैं कि अपीलार्थी की राज्य आयोग द्वारा पारित आदेश के विरुद्ध राष्ट्रीय आयोग पहुंचने में पसंद तुच्छ के रूप में वर्णित नहीं की जा सकती।

उक्त आदेश केवल राष्ट्रीय आयोग के समक्ष आपत्ति किया जा सकता था या राज्य आयोग को कोई अधिकारिता इसका स्वयं का आदेश पुनः आहूत करने अथवा उपांतरित करने की नहीं थी। आक्षेपित आदेश में अपीलार्थी पर अधिरोपित परिव्यय अपास्त किया गया। राष्ट्रीय आयोग का आदेश कोई हस्तक्षेप हेतु नही कहता।

बीमा का दावा:-

जहां दुर्घटना में मृत्यु होने के कारण बीमा के दोष का निराकरण इस आधार पर किया गया है कि उसके पास विधिमान्य अनुज्ञति नहीं थी और बीमा संविदा के भंग होने को स्थापित कर दिया गया वहां आक्षेपित आदेश में कोई दुर्बलता नहीं पायी गयी और इसलिए प्रलगत आदेश के विरुद्ध अपील खारिज कर दी गयी।

हालांकि बीमा दावे को इस आधार पर निचली फोरमों द्वारा खारिज कर दिया गया कि दुर्घटना के समय कार भाड़े पर चलाई जा रही थी और वह बीमा पालिसी के बाहर थी, फिर भी बीमा कम्पनी पूर्णतया दावे का निराकरण नहीं कर सकती थी, अतएव उसको 2,50,000/ की समेकित रकम का संदाय करने का निर्देश दिया गया जबकि 5,00,000/- प्रतिकर का दावा किया गया।

एक मामले में यह अभिनिर्धारित किया गया कि अपीलार्थी बीमा कम्पनी उस समय स्वामी की क्षतिपूर्ति करने के लिए दायी है जब बीमाकर्ता ने बीमाकृत की कारित हुई हानि के लिए व्यापक पालिसी ग्रहण की है।

बीमा कंपनी एक दूसरे के पश्चात् एक सर्वेक्षक की नियुक्ति करने पर नहीं जा सकती है जिससे कि बीमा कंपनी का सम्बन्धित अधिकारी के समाधान की रिपोर्ट एक टेलर से प्रस्तुत करवा सके।

जहां बीमाकृत यान की चोरी से सम्बनत परिवाद दाखिल किया गया तब राज्य आयोग ने मात्र अवमानक आधार पर प्रत्यर्थी के दावे को अनुज्ञात कर दिया जिसकी पुष्टि राष्ट्रीय आयोग द्वारा कर दी गयी।

एक बस के स्वामी द्वारा व्युत्पन्न की गयी आय (कुल या नेट) उसके आश्रितों को संदेव प्रतिकर की रकम को अवधारित करने का विधितः आधार नहीं हो सकती यदि उसकी मोटर यान दुर्घटना में मृत्यु हो जाती है।

जहां मृतक ड्राइवर के पास दुर्घटना की तारीख पर विधिमान्य अनुज्ञप्ति नहीं था वहां अपीलार्थी बीमा कंपनी को बीमाकृत वाहन की दुर्घटना में उसके द्वारा झेली गयी हानि के लिए। दावेदार की क्षतिपूर्ति करने के लिए दायी नहीं माना गया।

किसी दुर्घटना में एक व्यक्ति की मृत्यु होने की दशा में, प्रतिकर को अवधारित करते समय उसके भावी संभावना पर अवश्य विचार कियाजाना चाहिए विशेषकर उस एक व्यक्ति की बाबत जो स्वतः नियोजित है और उसकी बाबत जो भावी वेतन वृद्धि के लिए प्रावधानों के बिना एक नियत वेतन पर नियोजित किया जाता है।

एक पक्षीय आदेश:-

अपीलार्थी प्राधिकरण ने विनिर्दिष्ट रूप से यह अभिवचन किया कि कोई सूचना पत्र राज्य आयोग द्वारा तामील नहीं किया गया बल्कि राष्ट्रीय आयोग निवेदन का मूल्यांकन करने में असफल रहा तथा यह ठहराने में गलती की कि सूचना पत्र 21-12-2006 को तामील हुआ था। हालांकि परिवाद राज्य आयोग के समक्ष 3-5-2007 को इसके बहुत बाद खारिज की गयी थी अपील खारिज कर दी गयी।

पारेषण को नुकसान दावे का निराकरण:-

प्रस्तुत मामले में जहां परिवाद को रेल दुर्घटना द्वारा कारित हुई हानि की रिपोर्ट करने में बीमाकृत की असफलता के कारण तथा प्रथम हानि का निर्धारण करने में सर्वेक्षक को अवसर प्रदान किये बगैर परेषण को हटाने के आधार पर राष्ट्रीय आयोग द्वारा खारिज कर दिया गया वहां इसको न्यायसंगत माना गया।

14. बीमा मेरीन बीमा पालिसी-

जहां खराब मौसम के कारण बीमाकृत जलयान का नुकसान हुआ और राष्ट्रीय आयोग ने परिवाद अनुज्ञात कर दिया तथा अपीलार्थी बीमा कंपनी को 9% वार्षिक दर से ब्याज के साथ 13.69 करोड़ रु० प्रतिकर का संदाय करने का निर्देश दिया गया वहां चूंकि राष्ट्रीय आयोग का आदेश उचित मूल्यांकन पर आधारित था इसलिए अपील यारिज कर दी गयी।

चूंकि बीमाकृत जलयान सम्पूर्ण जहाजी माल के साथ समुद्र में डूब गया था इसलिए राष्ट्रीय आयोग को 12% वार्षिक दर से ब्याज के साथ 21,500/-) संपूर्ण जलयान के मूल्य का संदाय करने की बीमा कंपनी को निर्देश देने पूर्णतया न्यायसंगत माना गया।

पुनरीक्षण की शक्ति का प्रयोग पुनरीक्षण की शक्ति का प्रयोग मात्र तभी किया जा सकता है यदि आक्षेपित आदेश में दृश्यमान कोई प्रथम दृष्ट्या अधिकारिता सम्बन्धी त्रुटि होती है।

वास्तविक सम्पदा भूखंड का आवंटन:-

जहां किसी सूचना के बिना भूखंड को स्थापित किया गया तथा राज्य आयोग ने प्रतिकर के रूप में 5,000/- रू0 तथा वैकल्पिक भूखंड के आवंटन का निर्देश दिया वहां अपीलार्थी ट्रस्ट के पास नोटिस, अर्जन या सहमति के बिना आवंटित किये गये भूखंड को संभालने की उच्चस्तरीय कार्यवाही के प्रस्ताव करने के लिए कोई स्पष्टीकरण नहीं था और इसलिए उच्च आयोग के आदेश में न हस्तक्षेप करने के राष्ट्रीय आयोग को न्यायसंगत माना गया।

17. स्वयं के आदेश को वापस लेने या उपांतरित करने की अधिकारिता का अवधारण-

यह अभिनिर्धारित किया गया कि राज्य आयोग के पास स्वयं के आदेश को वापस लेने तथा कि उपांतरित करने की अधिकारिता नहीं होती है।

बीमा कंपनी के दायित्व का अवधारण-

बीमा कंपनी को उन रकम का संदाय करने में हिचकिचाहट नहीं करना चाहिए जो विधिसम्मत ढंग से परिवादी को देय है।

19. बीमा पालिसी का लागू होना-

जहां पालिसी के अधीन बीमा कंपनी ने भी करार किया था कि बीमाकृत रकम उसी प्रकार एवं उसी सामर्थ्य की नयी सम्पत्ति द्वारा बीमाकृत सम्पत्ति के विस्थापन के खर्चे के समान होगी, वहां मात्र छः पोल वाले भवनों को पॉलिसी द्वारा आच्छादित किया गया और राष्ट्रीय आयोग के निष्कर्ष में कोई त्रुटि न होने के कारण उसकी अपीलीय न्यायालय द्वारा संपुष्टि कर दी गयी।

प्रतिकर पर ब्याज का संदाय जांच रिपोर्ट प्रदर्शित करता है कि अंतरिम आदेशों के प्रवर्तन के बावजूद भी, विकास सम्बन कियाकलाप/निर्माण कार्य जारी रहा और निकाय को कब्जे के परिदान से नहीं रोका गया वहां ब्याज ऐसी कालावधियों के दौरान अधिनिर्णीत किया गया।

विशेषज्ञों के शपथ पत्र का साक्ष्यिक मूल्य डाक्टरों को सम्मिलित कर विशेषज्ञों के शपथ-पत्रों को साक्ष्य के रूप में ग्रहण किया जा सकता है।

बीमा कंपनी की बाध्यता यह अभिनिर्धारित किया गया कि बीमा कंपनी को पालिसी का नवीनीकरण करते समय यान पर अंकित किये गये मूल्य द्वारा आबद्ध किया जाता है।

वास्तविक सम्पदा भूखंड का आवंटन-

जहां कब्जा पुराने दर पर दिया जाता है और आवंटिती मूल्य में वृद्धि का लाभ प्राप्त करता है वहां वह आवंटन में विक्रय के आधार पर संदाय किये गये रकमों पर ब्याज का हकदार नहीं होता है।

जहां अतिरिक्त रकम के निक्षेप के बावजूद भी भूखंड का आवंटन नहीं किया और इसके लिए परिसीमा की कालावधि की समाप्ति के ठीक बाद परिवाद दाखिल किया गया वहां यद्यपि राष्ट्रीय आयोग ने परिसीमा द्वारा कालवर्जित होने के कारण परिवाद खारिज कर दिया लेकिन अपीलार्थी पर खर्च अधिरोपित किया जिसे अपील में उच्चतम न्यायालय द्वारा खारिज कर दिया गया।

चूंकि इस मामले में न तो अनुचित व्यापार प्रणाली का मामला प्रकाश में आय और न ही सेवा में कोई कमी की गयी इसलिए केन्द्रीय सरकार को इस मामले में हस्तक्षेप करना चाहिए था।

एक मामले में इस निष्कर्ष की पुष्टि कर दी गयी कि आवंटितियों द्वारा संदाय की गयी रकमों का प्रतिदाय किया जाना चाहिए क्योंकि आवंटितियों को भूखंड का परिदान नहीं किया गया लेकिन कथित रकम पर 10% वार्षिक दर से ब्याज का संदाय किये जाने का निदेश सही माना गया।

बैंककारी सेवा में कमी:-

जहां विलम्ब के दोषमार्जन के लिए कोई आवेदन पत्र नहीं पेश किया और न ही पर्याप्त कारण प्रदर्शित किया गया और परिवाद को दाखिल करने में विलम्ब है प्रश्न को नहीं पेश किया गया वहां राष्ट्रीय आयोग ने अपीली राज्य आयोग के परिसीमा द्वारा वर्जित होने के आधार पर परिवाद को खारिज करने में न्यायसंगत माना गया।

जहां परिवाद को अनुज्ञात करने वाले निचली फोरमों द्वारा पारित किये गये आदेशों का अनुपालन अपीलार्थी द्वारा नहीं किया गया वहां उच्चतम न्यायालय ने आक्षेपित आदेशों के विरुद्ध दायर की गयी अपील को खारिज कर दिया।

निर्यात संदाय करने में क्रेता द्वारा व्यतिक्रम-जहां बीमाकृत ने दो मामलों के सिवाय अनुबंधित समय के अंदर विदेशी निर्यातकों द्वारा बकाया देने के न संदाय किये जाने के बारे में बीमाकर्ता को सूचना देने में करार के खंड की अपेक्षाओं का अनुपालन करने में असफल हो वहां मात्र दो दावे जो सिविल अपीलों को अनुज्ञात किया गया और शेष को खारिज कर दिया।

आवासीय ग्राम्य गृह की बुकिंग मूलधन का प्रतिदाय-

जहां आवासीय ग्राम्य गृह की बुकिंग की गई और सारभूत रकम का संदाय किये जाने के बावजूद भी, कब्जा देने का प्रत्याख्यान किया गया वहां राष्ट्रीय आयोग ने मुकदमे के खर्च के रूप में 25,000/- रुo की रकम के साथ साथ 10% साधारण ब्याज के रूप में प्रतिकर के साथ-साथ परिवादी को 8.14 करोड़ रू0 की संपूर्ण मूल रकम के प्रतिदाय का अधिनिर्णय किया उसकी अपील में उच्चतम न्यायालय द्वारा पुष्टि कर दी गयी तथा इसके विरुद्ध दाखिल की गयी अपील खारिज कर दी गयी।

बीमाकृत की चोरी विलंब का दोपमार्जन-

जहां बीमाकृत यान की चोरी सम्बन - दावा याचिका/परिवाद दाखिल करने में विलम्ब हुआ और विलम्ब को दोपमार्जित करने के लिए पर्याप्त स्पष्टीकरण दिया गया, वहां विलम्ब को दोषमार्जित कर दिया गया और इसलिए दावा याचिका को अनुज्ञात कर दिया गया।

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