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उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 भाग:12 राष्ट्रीय आयोग की अधिकारिकता संबंधित कानून

Shadab Salim
23 Dec 2021 4:30 AM GMT
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 भाग:12 राष्ट्रीय आयोग की अधिकारिकता संबंधित कानून
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उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 (The Consumer Protection Act, 2019) की धारा 58 राष्ट्रीय आयोग की अधिकारिता के संबंध में प्रावधान करती है। इस अधिनियम के अंतर्गत त्रिस्तरीय आयोग बनाए गए हैं जिला आयोग, राज्य आयोग और राष्ट्रीय आयोग।

इससे पूर्व के आलेख में जिला आयोग और राज्य आयोग के संबंध में विस्तार पूर्वक चर्चा की जा चुकी है। इस आलेख के अंतर्गत राष्ट्र आयोग की अधिकारिता के संबंध में चर्चा की जा रही है और उससे संबंधित न्याय निर्णय प्रस्तुत किए जा रहे है।

यह अधिनियम में प्रस्तुत की गई धारा का मूल रूप है-

धारा-58

राष्ट्रीय आयोग की अधिकारिता-

(1) इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, राष्ट्रीय आयोग को निम्नलिखित की अधिकारिता होगी

(क) (i) उन परिवादों को ग्रहण करना जिनमें प्रतिफल के रूप में संदत्त माल या सेवाओं का मूल्य दस करोड़ रु० से अधिक है : परंतु जहां केन्द्रीय सरकार ऐसा करना आवश्यक समझती है वहां वह ऐसा अन्य मूल्य विहित कर सकेगी जो वह ठीक समझे।

(ii) अनुचित संविदाओं के विरुद्ध परिवाद जहां प्रतिफल के रूप में संदत्त माल या सेवाओं का मूल्य दस करोड़ रु० से अधिक है:

(iii) किसी राज्य आयोग के आदेशों के विरुद्ध अपीलें;

(iv) केन्द्रीय प्राधिकारी के आदेशों के विरुद्ध अपीलें; और

(ख) जहां राष्ट्रीय आयोग को यह प्रतीत होता है कि ऐसे राज्य आयोग ने ऐसी किसी अधिकारिता का प्रयोग किया है जो विधि द्वारा निहित नहीं है या जो इस प्रकार निहित अधिकारिता का प्रयोग करने में असफल रहा है या वह कार्य अपनी अधिकारिता का अवैध रूप से प्रयोग करते हुए किया है या तात्विक अनियमितता से किया है तो वहां किसी उपभोक्ता विवाद में, जो राज्य के भीतर किसी राज्य आयोग के समक्ष लंबित है या जिसका विनिश्चय उसके द्वारा किया गया है, अभिलेखों को मंगाना और समुचित आदेश पारित करना ।

(2) राष्ट्रीय आयोग की अधिकारिता, शक्तियों और प्राधिकार का प्रयोग उसकी न्यायपीठों द्वारा किया जा सकेगा और न्यायपीठ का गठन अध्यक्ष द्वारा या एक अधिक सदस्यों से किया जा सकेगा जैसा अध्यक्ष ठीक समझे: पंरतु न्यायपीठ का ज्येष्ठतम सदस्य न्यायपीठ की अध्यक्षता करेगा।

(3) जहां न्यायपीठ के सदस्यों में किसी मुद्दे पर मतभेद है, वहां मुद्दे बहुमत राय के अनुसार विनिश्चय किए जाएंगे, यदि बहुमत है, किन्तु यदि सदस्य बराबर बराबर बंट जाते हैं तो वे उस मुद्दे या उन मुद्दों का उल्लेख करेंगे जिन पर उनका मतभेद है और अध्यक्ष को निर्देश करेंगे जो या तो मुद्दों को स्वयं सुनेगा या मामले को अन्य सदस्यों में से एक या अधिक सदस्यों द्वारा ऐसे मुद्दे या मुद्दों पर सुनवाई के लिए निर्दिष्ट करेगा और ऐसा मुद्दा या मुद्दों को उन सदस्यों की राय के अनुसार विनिश्चय किए जाएंगे जो पहले मामले को सुन चुके हैं जिनमें वे सदस्य भी हैं, जिन्होंने इसे पहली बार सुना था :

परंतु यथास्थिति, अध्यक्ष या अन्य सदस्य ऐसे निर्देश की तारीख से दो मास की अवधि के भीतर इस प्रकार निर्दिष्ट विषय या विषयों पर राय देगा।

राष्ट्रीय आयोग के क्षेत्राधिकार: -

जहाँ पर कि राष्ट्रीय आयोग के समक्ष विपक्षी के विरुद्ध उसके द्वारा दी गयी सेवा में कमी के कारण परिवाद प्रस्तुत हुआ था तथा 10 लाख तक के क्षतिपूर्ति में एवार्ड का मामला था। जब तक कि उपचार जो चाही गयी है 10 लाख से ऊपर न हो राष्ट्रीय आयोग के क्षेत्राधिकार को नहीं प्राप्त किया जा सकता है। परिवादी की कीमत के आधार पर यह मामला राज्य आयोग के समक्ष ही जाना चाहिए।

उपभोक्ता फोरम उपभोक्ताओं द्वारा सही गई परेशानी एवं चिन्ताओं के लिए भी क्षतिपूर्ति प्रदान कर सकती है।

हरियाणा नगर विकास प्राधिकरण बनाम विपिन कुमार कोहली (1995) के मामले में जब याचिकाकर्ता को आवासीय भूखण्डों का प्रस्ताव दिया गया; तब उसने दिल्ली बैंक में अग्रिम धनराशि जमा कर दिया। लेकिन प्रश्नगत् भूखण्ड का धारणाधिकार न प्रदान किये जाने की वजह से उसे बैंक में जमा की गयी अग्रिम धनराशि वापस कर दी गयी।

ऐसी दशा में, परिवादी ने ब्याज का दावा किया और जिला फोरम ने यह अवधारित किया कि चूंकि अग्रिम धनराशि दिल्ली बैंक में जमा की गयी, इसलिए याद हेतुक भी दिल्ली में आंशिक रूप से उद्भूत हुआ और इसी वजह से निक्षेप की गयी धनराशि पर ब्याज का संदाय किये जाने का निर्देश दे दिया गया।

जिला फोरम के विरुद्ध अपील दायर की गयी और उसे राज्य आयोग द्वारा इस आधार पर खारिज कर दिया गया कि जिला फोरम के आदेश की सत्यापित की गयी प्रतिलिपियाँ फाइल नहीं की गयी थी।

लेकिन पुनरीक्षण में यह अवधारित किया गया कि मात्र यह तथ्य कि बैंक द्वारा प्राप्त की गयी अग्रिम धनराशि के ही मात्र कारण से इस निष्कर्ष पर नहीं पहुँचा सकता कि वाद-हेतुक दिल्ली में पैदा हुआ और इसलिए जिला फोरम एवम् राज्य आयोग के आदेश को अपास्त कर दिया गया।

चीफ इक्जक्युटिव ऑफिसर बनाम हाजी हारून के मामले में कहा गया है कि परिवादों का निश्चित रूप से विचारणार्थ ग्रहण करने हेतु एवम् अवधारित करने के लिए आयोग की अधिकारिता का अर्थ यह होता है कि जहाँ पर अनेक व्यक्तियों द्वारा एक ही अनुतोष का दावा किया जाता है और उसी समय कथित अनुतोष का दावा करने के बाबत एक दूसरे के अधिकारों को विवादग्रस्त बना दिया जाता है; वहाँ आयोग के पास परस्पर विरोधी दावे का न्याय निर्णयन करने एवं कथित विवाद का अवधारण करने की निश्चित रूप से शक्ति होती है।

यह धारा 21 (क) (झ) सपठित धारा 22 द्वारा प्रदत्त की गयी उस सारभूत शक्ति की आनुषंगिक एवम् सहायक होती है जो राष्ट्रीय आयोग के साथ ही धारा 13 की उपधाराएं (4), (5) एवम् (6) के प्रति लागू होती है।

यह सुस्थापित है कि जहाँ एक सारभूत शक्ति एक न्यायालय या अधिकरण को प्रदान किया जाता है; वहाँ सारभूत आवश्यक शक्ति के प्रभावकारी अनुप्रयोग के लिए सभी आनुषंगिक एवम् सहायक शक्तियों का अनुमान किया जाना होता है।

अमित कारपोरेशन बनाम मनोहर लाल नारंग, (1995) के मामले के अभिलेख पर विद्यमान साक्ष्यों के अवलोकन से यह स्पष्ट हो जाता है कि इसमे गम्भीर प्रकृति के दुर्विनियोग के अभिकथन है और इस वाद के पक्षकारो के बीच सिविल वाद चल रहा है। ऐसी दशा में, यह अभिनिर्धारित किया गया कि प्रस्तुत विवाद का निपटारा एक मात्र सिविल वाद संस्थित करके ही किया जा सकता है और इस प्रकृति के मामलो के निस्तारण के लिए उपभोक्ता फोरम को एक उपयुक्त न्यायालय नहीं माना जा सकता है।

राम ऐजेंसी बनाम अशोक चन्दमाल बोराजिला फोरम के मामलेे में जिला फोरम को प्रस्तुतीकरण के लिए परिवाद को वापस कर दिया तब राज्य आयोग ने यह अभिनिर्धारित किया कि डिमांड-ड्रस्ट के रूप में कार के लिए आशिक नृत्य अहमद नगर बैंक से प्राप्त किया गया।

यद्यपि वादहतूक का एक श नगर में पैदा हुआ था। लेकिन जहाँ राज्य आयोग द्वारा यह निष्कर्ष अभिलिखित किया गया। अहमद नगर में जिला फोरम के पास परिवाद को अपास्त करने की अधिकारिता पोि फोरम के आदेश को प्रत्यावर्तित कर दिया गया।

एक अन्य मामले में अपीलीय न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि राज्य आयोग का यह अभिन सही है कि विरोधी पक्षकार की ओर से तथा इसके अभिकर्ता को नियंत्रित करने में बड़ी ही कम पायी गयी है।

अतएव, परिवादी को, समनुदेशन के पूर्ण मूल्य की हानि के लिए प्रतिकार को बरामद करने का हकदार माना गया और ब्याज को 195% वार्षिक दर से घटाकर 18% वारि दर में परिवर्तित कर दिया गया। इस प्रकार से राज्य आयोग के आदेश की संपुष्टि, अपन न्यायालय के निर्णय द्वारा प्रत्येक पहलुओं पर कर दी गयी।

ए मोहते रेड्डी बनाम वेंकटरमन रेड्डी, 1996 के मामले में जहाँ जिला फोरम एवं राज्य आयोग दोनों ने यह समवर्ती निष्कर्ष अभितिचित कि पक्षकारों के बीच ऐसा कोई अनुबंध नहीं हुआ कि परिवादी ने उस भूखण्ड का विज्ञापन रविवार को प्रकाशित किया जाय; जिसके बाबत उसने चार्ज का भुगतान किया था। वहाँ इस आधार पर परिवाद को खारिज कर दिया गया कि भूमि का विक्रय न होने के कारण परिवादी को कोई हानि नहीं हुई थी।

इस निष्कर्ष की संपुष्टि अपील में राज्य आयोग द्वारा भी कर दी गयी जाये जब इस अपीलय में निर्णयादेश के विरुद्ध पुनरीक्षण न्यायालय के समक्ष चुनौती दी गयी, तब यह अभिनिर्धारित किया गया कि अभिलेख पर ऐसा कोई साक्ष्य विद्यमान नहीं पाया गया जो वह प्रदर्शित करता कि निचली फोरमो के निष्कर्ष को अवैधानिक ढंग से अधिकारिता के प्रयोग किये कारण या किसी त्रुटि की वजह से निषभावी निर्णीत कर दिया जाना चाहिए।

ओरिएंटल बीमा कम्पनी लिमिटेड बनाम मेसर्स वीडियो बाइकास्टिंग के मामले में जहां बीमा दावा को अनुज्ञात कर देने वाले राज्य आयोग के आदेश के विरुद्ध अपील दायर की गयी जबकि बीमा कम्पनी ने इस आधार पर दावे का निराकरण किया था कि अपराधकर्ताओं द्वारा आग लगायी जाने की वहां दावे के निराकरण घटना साबित नहीं किया जा सकता था, को न्यायोचित ठहराया गया और अपील अनुज्ञात कर दी गयी।

चेयरमैन चिरूवल्लूर ट्रांसपोर्ट कारपोरेशन बनाम कंज्यूमर प्रोटेक्शन काउंसिल के मामले में जहां किसी मोटर दुर्घटना के सन्दर्भ में राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग ने 5.10 लाख रुपया क्षतिपूर्ति के रूप में सुनिश्चित किया और उक्त धनराशि को विधवा (मृतक की पत्नी) को संदाय किया गया था वहां यह अभिनिर्धारित किया गया कि इस प्रकार के मामले को हल करने का क्षेत्राधिकार उपरोक्त आयोग को नहीं है, क्योंकि यह मामला मोटर वाहन दुर्घटना अधिनियम, 1988 के अन्तर्गत आने वाले सामान्य विधि से संबंधित था।

एक अन्य मामले में यह मुख्यापित है कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 की धारा 21 (ख) के अधीन राष्ट्रीय आयोग वहां राज्य आयोग के आदेश में हस्तक्षेप कर सकता है जहां राज्य आयोग ने कानून द्वारा इसको निहित नहीं अधिकारिता का प्रयोग किया हो या तो इस प्रकार निहित की गयी अधिकारिता का प्रयोग करने में असफल हो गया है या अवैधानिक तौर पर तात्विक अनियमितता के साथ अपनी अधिकारिता के प्रयोग में कार्य किया है।

जब परिवादी को कौटुम्बिक लाभ स्कीम का लाभ नहीं प्रदान किया गया और तदर्थ उसने जिला फोरम के समक्ष परिवाद दाखिल किया तब उसको अनुज्ञात कर दिया गय जिसकी पुष्टि राज्य आयोग एवं राष्ट्रीय आयोग दोनों द्वारा कर दी गयी।

चूंकि न आवासीय भू-खण्ड का कब्जा दिया गया और न ही विक्रय विलेख का आवंटन किया गया इसलिए जिला फोरम द्वारा परिवाद अनुज्ञात कर दिया जिसकी संपुष्टि अपीली राज्य आयोग तथा पुनरीक्षण राष्ट्रीय आयोग दोनों द्वारा कर दी गयी।

यह अभिनिर्धारित किया गया कि धारा 21 (ब) के प्रावधानों के अधीन राष्ट्रीय आयोग उस किसी भी उपभोक्ता परिवाद में कोई भी आदेश पारित कर सकता है जो किसी राज्य आयोग के समक्ष लम्बित है जिसे राज्य आयोग द्वारा निर्णीत किया जा चुका है।

राष्ट्रीय आयोग अपनी पुनरीक्षण अधिकारिता के अधीन अत्यधिक सीमित शक्तियां धारण करता है। यह निचती फोरमों के आदेशों में हस्तक्षेप कर सकता है यदि उन्होंने अपनी अधिकारिता का कानूनी तौर पर अतिक्रमण किया हो या अपनी अधिकारिताओं का प्रयोग करने में असफल हो गया है या अपनी अधिकारिता के प्रयोग में अवैधानिक ढंग से या महत्वपूर्ण अनियमितता के साथ कार्य किया है।

घर बनाने का कार्य घर बनाने का कार्य भी उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा 2 (1) (ण) में परिभाषित "सेवा की श्रेणी में आता है

कैलाश मालपानी बनाम किशोर कुमार खत्री, 1997 के मामले में जहाँ फ्लैट के कब्जे के परिदान में विलम्ब होने के तथ्य के बारे में तथा आटे के निमार कारीगरी के गुण में कमी तथा दरवाजे एवम् खिड़कियों के निर्माण में निम्न कोटि को एवम् प्रयोग में लायी गयी वस्तुओं में दोष पाये जाने के बारे में समवर्ती निष्कर्ष दिये गये; वहाँ उत्तर पक्ष की ओर से व्याज का 48,000 रुपये की रकम पर ब्याज का संदाय करने का निर्देश दिया गया था।

इसके अलावा, जिला फोरम के साथ-साथ राज्य आयोग के द्वारा अधिकारिता के प्रयोग में कोई अन्य अवैधानिकता या अनियमितता नहीं पायी जाती जैसा कि अभिलेख को देखने से स्पष्ट हो जाता है वहाँ जिला फोरम का वह आदेश जिसकी संपुष्टि, राज्य आयोग के विनिश्चय द्वारा कर दी गयी, को उपांतरित कर दिया गया और 24% वार्षिक ब्याज की दर के ब्याज 18% वार्षिक ब्याज की दर को 23,158 रुपये की सीमा तक के दावे पर लागू होने की स्वीकृति प्रदान की गयी।

श्री शिखा गुप्ता बनाम (मे०) स्कीपर कन्ट्रक्शन कम्पनी प्राइवेट लिमिटेड के प्रकरण में इस तथ्य का अभिनिर्धारण करने के लिए मामले को राज्य आयोग को प्रतिप्रेषित कर दिया गया। क्या परिवादी को वास्तव में आवंटित किये गये फ्लैट या इसके समान कोई दूसरा फ्लैट उपलब्ध है।

इसके अतिरिक्त क्या परिवादी को कोई अनुतोष चेक के माध्यम से पहले ही किये गये भुगतानों का लेखा जोखा करने के पश्चात् बकाया रकम के भुगतान पर परिवादियों को प्रदान किया जा सकता था।

जहाँ परिवादी को हाउसिंग स्कीम में भूखण्डों का आवंटन किया गया; वहाँ प्राधिकारी भुगतान में विलम्ब हो जाने पर शास्तिक व्याज का अधिरोपण किया। इसके अलावा जब पक्षकारों के बीच किस्तों में भुगतान के ढंग पर मनोनुकूलता पायी गयी; तब व्याज के भुगतान के बाबत विवाद पैदा करने के लिए परिवादी को अनुज्ञा नहीं प्रदान की जा सकती थी और -इसलिए राष्ट्रीय आयोग के इस निष्कर्ष को दोषपूर्ण माना गया कि कोई भी व्याज देय नहीं होगा।

अपील:-

एक मामले में राज्य आयोग द्वारा विनिर्णीत क्षतिपूर्ति आदेश के विरुद्ध अपील के इस मामले में नद अदायगी के आधार पर एम आई जी मकान प्रत्यर्थी ने अपीलार्थी को देना निश्चित किया या निर्माण कार्य अधूरा होने के कारण प्रत्यर्थी अपीलार्थी को मकान का कब्जा नहीं दे सका। प्रत्यर्थी के प्रबंध में समस्याओं के कारण मकान का निर्माण नहीं हो सका।

अपीलार्थी का कोई दोष नहीं था। परिवादी 12% वार्षिक ब्याज पाने का हकदार था। किन्तु किस्त जमा करने की चूक पर 16% वार्षिक व्याज देना था। इस प्रकार 16% वार्षिक व्याज की दर प्रदान करने हेतु आदेश किया गया।

जहाँ स्टाक में आग लगी और इससे 50,000 रुपये की हानि हुई क्योंकि आम लगने के परिणामस्वरूप इसमें रखी गयी बीमाकृत सूखी मछलिया जल गयी थी जहाँ राज्य आयोग ने परिवादी को बुलाये बिना ही और वास्तविक हानि की जानकारी प्राप्त किये बिना ही अवधारण कर दिया और इसलिए उसके निर्णय को अपास्त कर मामले को पुनः नये सिरे से विचारणार्थ राज्य आयोग को वापस कर दिया गया।

नेशनल इंश्योरेंस कम्पनी लिमिटेड बनाम (मै०) सफारी इण्डस्ट्रीज 1996 के वाद में घोषणात्मक पालिसी बीमा कम्पनी द्वारा जारी की गयी। आगजनी में परिवादी के स्टाक जलकर राख हो गये। बीमा कम्पनी द्वारा मामले का अस्वीकृत कर दिया गया। जब परिवादी द्वारा प्रतिकर का दावा करने वाली परिवाद दायर करायी गयी तब इसे एकपक्षीय घोषित कर दिया गया।

आगे जब यह मामला राष्ट्रीय आयोग के समक्ष विचारणार्थ प्रस्तुत किया गया; तब इस मामले को दोनों पक्षकारो की सुनवाई करने के पश्चात् नये सिरे से विचारण करते हुए निस्तारण हेतु राज्य आयोग को प्रतिप्रेषित कर दिया गया।

जहाँ राज्य आयोग के समक्ष यह स्थापित कर दिया गया कि परिवादी की हानि हुई; वहाँ एक ओर की संसूचना के आधार पर विरोधी पक्षकार द्वारा दावे का अस्वीकृत किया जाना, अवास्तविक और उन सभी कारणों को प्रकट नहीं कर रहा था जिसके आधार पर परिवादी के दावे की स्वीकृत किया गया।

यद्यपि परिवादी को अनेक स्थानो पर स्टाक की घोषणा करना एवम् बीमा कम्पनी को एकमात्र सूचना देना था; फिर भी घोषणा करने पर आबद्धकारी संविदा; परिवादी एवं बीमा कम्पनी के बीच हुई थी। यदि बीमा कम्पनी ने यह स्वीकार किया कि वेयर हाउसिंग कम्पनी घोषणा पालिसी के खतरे की स्थिति पैदा हो सकती थी, तो क्षतिपूर्ति की मात्रा के सन्दर्भ में कोई प्रश्न ही नहीं पैदा होता।

इसके अलावा जहाँ; सर्वेक्षक की रिपोर्ट के अनुसार, 8,92,824 रुपये की हानि का जो निर्धारण किया गया, उसको राज्य सरकार द्वारा भी मंजूरी प्रदान कर दी गयी. वहाँ राष्ट्रीय आयोग द्वारा राज्य आयोग के प्रलगत् आदेश की संपुष्टि कर दी गयी।

महेन्द्र कुमार हीरालाल शाह बनाम न्यु इण्डिया इंश्योरेंस कम्पनी लिमिटेड, 1997 के मामले में जब अपील के दायर किये जाने में विलम्ब हुई और इस विलम्ब के दोषमार्जन के लिए अपीलकर्ता की एक और एक आवेदन पत्र प्रस्तुत किया गया; तब विलम्ब का दोषमार्जन जुमान की रकम के भुगतान कर दिये जाने पर, कर दिये जाने का आदेश पारित किया गया।

जहां अधिनियम के अधीन प्राप्त किये गये अनुतोष को पूर्णतया गलत समझा गया; क्योंकि इस मामले में तथ्य के जटिल प्रश्न अन्तर्विष्ट थे; वहाँ यह अभिनिर्धारित किया गया कि चूंकि कपित प्रमो का अवधारण, एक मात्र सिविल न्यायालय द्वारा उचित न्याय निर्णयन के अन्तर्गत ही किया जा सकता है, इसलिए अपीलकर्ता को सिविल न्यायालय की शरण लेनी चाहिए और जिसके परिणामस्वरूप, अंततः अपील खारिज कर दी गयी।

यदि राज्य आयोग द्वारा किसी भी परिवाद का निस्तारण कर दिया गया हो और ऐसे मामले में विरोधी पक्षकार को दोषपूर्ण लिखत की आपूर्ति करने के निष्कर्ष पर पहुंचा जा चुका हो; तो अपीलार्थी यदि अपीलीय न्यायालय के समक्ष ऐसे नये अभिवचन को प्रस्तुत करना चाहता हो जिसे कि राज्य आयोग के समक्ष प्रस्तुत न किया गया हो, तो उसको विचारणार्य ग्रहण नहीं किया जा सकता है।

राष्ट्रीय आयोग के समक्ष आए एक प्रकरण में परिवादी ने इस विशिष्ट सूझबूझ के साथ फ्लैट को खरीदा कि वह ईमारत के फर्श में कार खड़ी करने की जगह आवंटित करेगा। किन्तु जगह का आवंटन नहीं किया गया। जहाँ परिवाद को इस आधार पर अस्वीकृत कर दिया गया कि यह अचल संपत्ति को विक्रय करने से सम्बन्धित एक मामला है और इस प्रकार के मामले का उपचार एक सिविल न्यायालय के समक्ष बाद संस्थित करके प्राप्त किया जा सकता है।

इस निष्कर्ष के विरुद्ध अपील दायर अभिनिर्धारित किया गया कि कार को खड़ी करने के लिए स्थान का क्रय, कतिपय अचल संपत्ति के क्रय के लिए एक पृथक संविदा के रूप में नहीं माना जाना होता है और इसलिए परिवादी को विरोधी पक्षकार के माध्यम से सेवा का उपभोक्ता माना गया।

यूनाइटेड इण्डिया इंश्योरेंस कम्पनी लिमिटेड बनाम उपभोक्ता संरक्षण संगठन के वाद में जहाँ आग लगने के परिणामस्वरूप बीमाकर्ता द्वारा उठाई गयी हानि की मात्रा के बारे में इस जटिल प्रश्न पर बिल्कुल विचार नहीं किया गया, वहाँ प्रतिकर के अधिनिर्णय के लिए अपरिहार्य हानि की मात्रा का अभिनिश्चय किया जाना हानि के अभिनिश्चय के आधार पर किसी भी मात्रा पर पहुंचना आवश्यक था।

अतएव, राज्य आयोग द्वारा मामले के विस्तारण को कानूनी अपेक्षाओं को समाधान करने वाले एक कारक के रूप में नहीं माना जा सकता है और कारणों की वजह से राज्य आयोग के विनिश्चय को अपास्त कर दिया गया तथा मामले को गुण व दोष के आधार पर पुनः निस्तारित किया जाने के लिए प्रतिप्रेषित कर दिया गया।

जहाँ अपील को 18.1.1992 कि तिथि पर जो इसके याचिकाकर्ता द्वारा फाइल की गयी, वह उस तिथि के ठीक 30 के भीतर ही थी, जिस पर जिला फोरम के आदेश की तामील उसे हुई; यहाँ इसे पूर्णतया परिसीमा की कालावधि के भीतर ही माना गया और इस निष्कर्ष को अभितिधित किया गया कि राज्य आयोग को, समय के अन्दर न फाइल किये जाने के आधार पर खारिज कर दिये जाने के बजाय, गुण व दोष के आधार पर इसका निस्तारण करने के लिए कार्यवाही करना चाहिए था। राज्य आयोग के आदेश को अपास्त कर दिया जाने योग्य माना।

अतएव, अपील के समय के भीतर फाइल किये जाने के कारण इसका गुण व दोष के आधार पर निस्तारण करने एवम् इसके फाइल किये जाने के लिए अपील को प्रत्यावर्तित करने के लिए राज्य आयोग को निर्देश देना उचित समझा गया।

काइनेटिक इन्जीनियरिंग लिमिटेड बनाम सोमासी सौनन्द के वाद में जहाँ पर राज्य आयोग ने परिवादी के द्वारा रजिस्ट्रेशन फीस, बीमा शुल्क आदि के लिए देने को निर्देश दिया जो उसने मोपेड लूना के लिए कराया था तथा व्याज भी परिवादी को अदा करने को कहा गया। और भी निगरानी कर्त्ता पिटीशनर को यह निर्देश दिया कि लूना के बाराबर कीमत 7581/- रुपये परिवादी को जो प्रतिपक्षी नं 1 की है को या नई तूना मोपेड प्रदान करे।

यह अभिनिर्धारित किया गया राज्य आयोग इस प्रकार का आदेश पारित नहीं कर सकता है जबकि वह निगरानी कर्ता पिटीशनर पक्ष की नहीं है तथा जिनके विरुद्ध कोई प्रतिकूल अवलोकन नहीं है। अतः राज्य आयोग का आदेश स्पष्ट रूप से गलत था। और इसलिए खारिज होने योग्य है प्रतिपक्षी नं0 1 परिवादी जो पैसा निगरानीकर्ता पिटीशनर मार्फत प्रतिपक्षी नं0 2 से प्राप्त किया है उसे वापस कर दे और अपनी पुरानी मोपेड लूना प्राप्त कर ले।

एक वाद में पुनरीक्षण याचिकाकर्ता की ओर से यह अभिवाकू किया गया कि विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 की धारा 14 का निर्देश, इस मामले में सुसंगत नहीं माना जा सकता क्योंकि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा 14, उसके प्रावधानों का अनुपालन न किये जाने के बारे में उल्लेख करती है।

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा 14 (1), जिला फोरम को उसके उपखण्ड (क) से (स) में विनिर्दिष्ट एक या अधिक अनुतोषों के लिए विरोधी पक्षकार को आदेश देने की शक्ति प्रदान की है और इसलिए जिला फोरम द्वारा पारित किया गया संदिग्धार्थी आदेश, उपचण्ड (घ) एवम् (झ) के अधीन आता है तथा अभिनिर्धारण में, यह आदेश अभिलिखित किया गया कि चूंकि जिला फोरम के साथ-साथ राज्य आयोग के निर्णयादेश में कोई अधिकारिता या तात्विकता संबंधी त्रुटि नहीं पायी जाती है इसलिए पुनरीक्षण याचिका खारिज करने योग्य है।

जहाँ राज्य आयोग के आदेश का अनुपालन कर दिया गया, वहाँ श्री सुरेन्द्र सिंह को अधिनिर्णीत की गयी कारावास की सजा को अपास्त कर दिया गया और राज्य सरकार द्वारा अधिरोपित किया जुर्माना 2,000 रुपये से बढ़ाकर 3,000 रुपये कर दिया गया। अतएव, इस उपान्तरण के साथ पुनरीक्षण याचिका को खारिच कर दिया गया।

डाकघर अधीक्षक व अन्य बनाम उपोक्ता संरक्षण परिषद के परिवाद में ये अभिकथन किये गये कि विरोधी पक्षकार द्वारा स्वीकृत पत्रों को धारण करने वाले उपभोक्ता को पोस्टल कवर प्रदान करने में सेवा में कमी की गयी। जहाँ जिला फोरम ने यह अभिनिर्धारित किया कि समय से परिवादी को पत्र का परिदान किये जाने में जान-बूझकर विरोधी पक्षकार द्वारा गलती की गयी थी, वहाँ उसके द्वारा के पक्ष में 2,000 रुपये का बतौर प्रतिकर का अधिनिर्णय किया गया।

ऐसी दशा में, जब जिला फोरम के आदेश के विरुद्ध अपील दायर की गयी। तब यह अभिनिर्धारित किया गया कि प्रश्नगत् आदेश की संपुष्टि की जाती है और अपीलीय राज्य आयोग के निष्कर्ष के विरुद्ध पुनरीक्षण दायर किये जाने पर यह अभिनिर्धारित किया गया अपील बलहीन थी और अधिनिर्णीत की गयी प्रतिकर की रकम अधिक है और इसलिए इसे 2,000 रुपये से घटाकर 1,000 रुपये कर दी जाती है।

एक वाद में मामले में वाहन चालक का वाहन चलाने का लाइसेंस 11 नवम्बर, सन् 1979 तक कालातीत हो गया और नवीनीकरण के लिए आवेदनपत्र लगभग 12 वर्ष की कालावधि को समाप्ति के पश्चात् फाइल किया गया। तथ्य सम्बन्धी इस प्रकार की स्थिति होने के कारण, नवीनीकृत वाहन चालन का लाइसेंस, 21 मई सन् 1991 की तिथि से ही केवल प्रभावकारी बनाया जा सकता था।

वह ऐसी तिथि होने के आधार पर जिस पर नवीकरण को वास्तव में, मंजूरी प्रदान की गयी। अतएव, उस तथि पर जब दुर्घटना हुई, वाहन का चालक के पास एक प्रभावकारी एवम् विधिमान्य चालन लाइसेंस नहीं था। अतएव, बीमा कम्पनी को परिवादी द्वारा आगे प्रस्तुत किये गये दावे के सन्दर्भ में इसके दायित्व का खण्डन करने में पूर्णतया न्यायोचित् ठहराया गया।

राज्य आयोग के इस बात का बार-बार उल्लेख किया कि यह उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अधीन कृत्यकारी अपीलीय प्राधिकारी के लिए खुला नहीं है कि वह इस आधार पर केवल मामले के गुण व दोष के ऊपर विचार किये बिना ही खारिच कर सके कि अपीलकर्ता उस समय मौजूद नहीं था जब अपील को इसके द्वारा सुनवाई किये जाने की स्वीकृत प्रदान की गयी।

प्रतगत् आदेश उपर्युक्त सिद्धान का स्पष्ट रूप से उल्लंघन करते हुए पारित किया गया। परिणामतः मंदिग्धार्थी आदेश को अपास्त कर दिया गया और अपील को हाजिर होने तथा अपने निवेदनों को प्रस्तुत करने के लिए दोनों पक्षों एक नया अवसर प्रदान करने के पश्चात् गुण एवं दोष के आधार पर पुनः निस्तारण करने के लिए प्रतिप्रेषित कर दिया गया।

यदि जिला फोरम ने परिवादी की क्षतिपूर्ति के साथ होने के आभूषणों को वापस करने का निर्देश दिया तो राज्य आयोग भी आदेश की संपुष्टि कर दिया लेकिन क्षतिपूर्ति को 500 रुपये से घटाकर 250 रुपये कर दिया।

जहाँ याचिकाकर्ता ने यह निवेदन किया कि आदेश का समुचित तौर पर अनुपालन किया गया लेकिन संविदात्मक शर्तों के साथ-साथ विधिक प्रावधानों के अधीन भी बैंक के सामान्य धारणाधिकार की घोषणा किये जाने की भी मांग किया; वहाँ यह अमिनिर्धारित किया गया कि बैंक, बैंक को धारणाधिकार के सामान्य विधि के अधीन प्रतिभूति के रूप में आभूषणों को प्रतिधारित करने के लिए हकदार था।

प्रादेशिक भविष्य निधि बनाम शिव कुमार जोशी के मामले में परिवादी प्रतिवादी भविष्य निधि का एक ग्राहक था। याचिकाकर्ताओं ने इस आधार पर परिवाद को विचारणार्थ ग्रहण करने के लिए जिला फोरम की अधिकारिता में कानूनी और पर आक्षेप किया कि परिवादी एक ग्राहक नहीं था क्योंकि प्रतिफल के लिए कोई सेवायें नही प्राप्त की गयी थी। परिवाद को जिला फोरम द्वारा स्वीकृत कर दिया गया और इसकी राज्य आयोग द्वारा भी कर दी गयी थी।

राज्य आयोग के निर्णय के विरुद्ध अपील दायर की गयी, तब यह अभिनिर्धारित किया गया कि आयुक्तों का गठन जो प्रतिफल के लिए ग्राहक अधिनियम की धारा 2 (1) (ण) के अर्थ के भीतर सेवा के परे रोजगार भविष्य निधि और का उपबंध अधिनियम तथा 1952 स्कीम के अधीन किया गया है, वे आयुक्त द्वारा वसूली करने योग्य तथा उद्गृहीत हुई प्रशासनिक प्रभारों को प्रतिफल के लिए की जा रही थी।

आगे भी अभिनिर्धारित किया गया कि प्रश्नगत् प्रभारों की वसूली करने में आयुक्तगण उपभोक्ता अधिकारिता के भीतर नहीं आते थे जहाँ वे अधिनियम के अधीन कानूनी शक्ति का प्रयोग नहीं कर रहे थे और न ही कानूनी कर्तव्यों का निर्वहन की कर रहे थे। ऐसी दशा में इस निष्कर्ष पर भी पहुँचा गया कि प्रश्नगत् दावे का निस्तारण किया जाना, न केवल अधिनियम 1986 और 1452 की स्कीम के प्रावधानों के प्रतिकूल था, बल्कि इसी के समान यह स्वमेव आयुक्तों को दिये ये निर्देशों को अभिव्यक्त करने के भी प्रतिकूल था।

एक वाद में परिवादी, द्विपहिया वाहन खड़ी करता था और उसने वाहन खड़ी करने के लिए शुल्क का संदाय किया। स्कूटर वाहन को खड़ी करने वाली जगह से खो गयी थी। ऐसी दशा में परिवादी ने प्रतिकर के लिए, एक वाद दायर किया किन्तु जिला फोरम ने उसे खारिज कर दिया।

जब इस घिसि गारिजी के आदेश के विरुद्ध अपील दायर की गयी, तब अपील स्वीकृत कर दी गयी लेकिन तदुपरान्त भी जहाँ अपीलीय निर्णय आदेश के विरुद्ध भी पुनरीक्षण याचिका दायर की गयी, वहाँ यह अभिनिर्धारित किया गया कि वह व्यक्ति जो कथित सेवा के लिए गाड़ी खड़ी करने के लिए बगह प्रदान करने हेतु मामुली शुल्क संग्रहीत करने की सुविधा प्रदान करता है और चूँकि वाहन की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए कोई वचन बद्ध नहीं दिया गया था, इस लिए राज्य आयोग के आदेश को अपास्त कर दिया गया।

दौलत गैस ऐजेन्सी बनाम आनंद ओंकार पाटिल के वाद में परिवादी ने कूटरचित दस्तावेजों के आधार पर गैस कनेक्शन प्राप्त किया; लेकिन जब जिला फोरम ने परिवादी को उपभोक्ता होना नहीं पाया, तब परिवाद को खारिज कर दिया। परिवाद के खारिजी के आदेश के विरुद्ध अपील दायर की गयी और अपीलीय राज्य आयोग ने एक ही आधार पर परिवादी को उपभोक्ता होना अभिनिर्धारित किया कि उसने कूटरचित दस्तावेजों के होते हुए भी, उन्हीं के आधार पर गैस की आपूर्ति प्राप्त कर चुका था।

अतएव जब अपील के आदेश के विरुद्ध पुनरीक्षण याचिका दायर की गयी, तब यह अभिनिर्धारित किया गया कि दस्तावेजों को कूटरचित बनाने के लिए तथा जन सामान्य के साथ कपट करने के लिए। व्यक्तियों को प्रोत्साहित करने का कृत्य उपभोक्ता फोरमों का नहीं होता है और इसलिए राज्य आयोग द्वारा जारी किये गये निर्देश पूर्णतया अवैधानिक अनोचित्यपूर्ण एवम् अधिकारिता के बगैर हैैै।

एअर इण्डिया बनाम योगेंद्र हीरालाल पारिय के वाद में परिवादियों द्वारा एअर इण्डिया के अभिकर्ताओं से टिकटें खरीदी गयीं और इन सभी टिक्टों से एक बार आया-जाया जा सकता था। परिवादीगण को 10.5.1992 को भारत से मास्को जाना था।

वे 10.5.1992 को एअर इण्डिया उड़ान से मास्को गये और अनपा कारोबार पूरा कर लेने के पश्चात् मास्को 16.5.1992 को विरोधी पक्षकार के पास पहुंचे विरोधी पक्षकार ने इस आधार पर आवासन सुविधा प्रदान करने से इंकार कर दिया कि नियमानुसार उन्हें केवल मास्को में कम से कम 10 दिनों की एक कालावधि तक रुकता था और जबकि वे 19.5.1992 तक ही भारत वर्ष में वापस यात्रा नहीं कर सकते थे।

उनके बीजे (visas) केवल 16.5.1992 तक ही विधिमान्य थे। जब परिवादियों द्वारा मास्को में व्यय सहित प्रतिकर का दावा किया गया, तब जिला फोरम ने परिवाद को स्वीकृति प्रदान कर दिया, कारण कि बीजा केवल छः दिनों के लिए ही प्राप्त किया गया था।

जहाँ अपील में राज्य आयोग जिला फोरम के निर्णय की संपुष्टि कर दी वहाँ परिवादियों को पुनरीक्षण में भी यात्रा अभिकर्ताओं से क्षतिपूर्ति प्राप्त करने का हकदार माना गया क्योंकि प्रश्नगत् त्रुटि, कथित अभिकर्ताओं द्वारा ही कारित की गयी थी और इसलिए इसके लिए विरोधी पक्षकारों को उत्तरदायी नहीं ठहराया गया।

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