Begin typing your search above and press return to search.
जानिए हमारा कानून

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 भाग:11 राष्ट्रीय आयोग को अपील संबंधित कानून

Shadab Salim
22 Dec 2021 5:32 AM GMT
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 भाग:11 राष्ट्रीय आयोग को अपील संबंधित कानून
x

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 (The Consumer Protection Act, 2019) की धारा 51 इस अधिनियम के महत्वपूर्ण धाराओं में से एक धारा है। इस धारा के अंतर्गत राष्ट्रीय आयोग को अपील के संबंध में प्रावधान किए गए। जैसा की विधित है इस अधिनियम के अंतर्गत तीन स्तरों पर आयोग बनाए गए हैं तथा तीनों ही आयोगों को अपनी अपनी अधिकारिता दी गई है।

एक आयोग से किसी मुकदमे में निर्णय के बाद उसके ऊपर के आयोग में अपील की व्यवस्था दी गई है। राज्य आयोग के निर्णय किए गए मामले में राष्ट्रीय आयोग द्वारा अपील को सुना जाता है। इस आलेख के अंतर्गत धारा 51 से संबंधित समस्त प्रावधानों पर चर्चा की जा रही है और महत्वपूर्ण न्याय निर्णय प्रस्तुत किए जा रहे है।

यह अधिनियम में प्रस्तुत की गई धारा का मूल स्वरूप:-

धारा-51

राष्ट्रीय आयोग को अपील-

(1) राज्य आयोग द्वारा किए गए किसी आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति धारा 47 की उपधारा (1) के खंड (क) के उपखंड (3) या (14) द्वारा प्रदत्त अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए, आदेश की तारीख से तीस दिन की अवधि के भीतर ऐसे प्ररूप और रीति में, जो विहित की जाए, अपील कर सकेगा : परंतु यह कि राष्ट्रीय आयोग तीस दिन की उक्त अवधि के अवसान के पश्चात तब तक कोई अपील स्वीकार नहीं करेगा जब तक कि यह समाधान नहीं हो जाता है कि उस अवधि के भीतर अपील न करने के पर्याप्त कारण थे:

परंतु यह भी कि किसी व्यक्ति की, जिससे राज्य आयोग के आदेश के निबंधनों में किसी रकम का संदाय करने की अपेक्षा है, कोई अपील राष्ट्रीय आयोग द्वारा तब तक स्वीकार नहीं की जाएगी, जब तक अपीलार्थी ने विहित रीति में उस रकम का पचास प्रतिशत जमा नहीं कर दिया है।

(2) इस अधिनियम या तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में या अन्यथा उपबंधित के सिवाय राज्य आयोग द्वारा अपील में पारित किसी आदेश से राष्ट्रीय आयोग में अपील की जाएगी यदि राष्ट्रीय आयोग का यह समाधान हो जाता है कि मामले में विधि का सारवान प्रश्न अंतर्वलित है।

(3) किसी ऐसे अपील में जिसमें विधि का प्रश्न अंतर्वलित है, अपील के ज्ञापन में अपील में अंतर्वलित विधि के सारवान प्रश्न का ठीक-ठीक कथन होगा।

(4) जहां राष्ट्रीय आयोग का यह समाधान हो जाता है कि किसी मामले में विधि का सारवान प्रश्न अंतर्वलित है वहां यह उस प्रश्न को तैयार करेगा और उस प्रश्न पर अपील की सुनवाई करेगा:

परंतु इस उपधारा में किसी बात के बारे में यह नहीं समझा जाएगा वह विधि के किसी अन्य सारवान प्रश्न पर अपील, उन कारणों के लिए, जो लेखबद्ध किए जाएं, की सुनवाई करने के लिए राष्ट्रीय आयोग की शक्ति को नहीं छीनती है या न्यूनीकृत नहीं करती है, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि मामले में विधि का ऐसा प्रश्न अंतर्वलित है।

(5) राज्य आयोग द्वारा एक पक्षीय पारित आदेश से इस धारा के अधीन राष्ट्रीय आयोग को अपील की जा सकेगी।

यह धारा अपील से संबंधित समस्त प्रावधानों को उल्लेखित करती है। एक मामले में पहली बार आपत्ति प्रस्तुत की गई कि परिवाद का मूल्यांकन एक लाख से कम का था इसलिये राज्य आयोग को परिवाद की सुनवाई की शक्ति नहीं थी। क्या गय आयोग द्वारा निर्णत आदेश हस्तक्षेप किया जा सकता है? नहीं। विनिर्णीत किया गया।

गन्द आयोग के समक्ष ऐसी आपत्ति प्रस्तुत नहीं की गई। अपीलार्थी ने मात्र राज्य आयोग के क्षेत्राधिकार को चुनौती दी है। आयोग द्वारा निर्णीत मामले में न्याय दोष नहीं है। निर्णित आदेश में साम्य एवं न्याय निहित है।

जब एक मामले में राज्य आयोग द्वारा आदेश पारित किया गया तो आदेश के विरुद्ध याचिका दायर करके पीड़ित पक्षकार द्वारा उसे चुनौती दी गयी। जबकि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम इस प्रकार के आदेश के विरुद्ध जाने हेतु निवारण न्यायालय का प्रावधान करती है।

जिसके परिणामस्वरूप प्रश्नगत आदेश के विरुद्ध रिट याचिका संस्थित करने की प्रक्रियाको समुचित उपचार प्राप्त करने के रूप में मान्यता नहीं प्रदान की गयी। याचिका कर्ता ऐसे आदेश के विरुद्ध राष्ट्रीय उपभोक्ता न्यायालय में जा सकता है तथा राष्ट्रीय उपभोक्ता न्यायालय, अपील के प्रस्तुत करने में हुई विलम्ब का भी दोष मार्जन कर सकती है।

जहां अपीलों को निर्णीत करते समय, अपीली फोरम को विशिष्ट कारणों को उल्लेखित करना चाहिए जबकि अपील का विनिश्चित करते समय राज्य आयोग द्वारा कोई कारण नहीं दिया गया वहां अपीली / आक्षेपित आदेश को अपास्त कर दिया गया और कथित प्रयोजनार्थ मामले को राज्य आयोग को प्रतिप्रेषित कर दिया गया।

अपील के दायर किये जाने की परिसीमा:-

मोदी इण्डस्ट्रीज बनाम एन शायरा, (1996) के मामले में कहा गया है कि इस आयोग के दृष्टिकोण के संगत माना गया है कि अधिनियम की धारा 15 के अधीन एक अपील दायर करने के लिए 30 की परिसीमा की गणना उसी तिथि से केवल अपीलकर्ता के विरुद्ध की जानी चाहिए जिस तिथि पर आदेश की एक प्रतिलिपि की संसूचना अपीलार्थी को दी जाती है और ऐसा तब तक माना जायेगा जब तक यह एक ऐसा मामला नहीं होता; जिसमें आदेश की घोषणा खुली न्यायालय में उसकी उपस्थिति में की गयी है।

अतएव राज्य आयोग के समक्ष दायर की गयी अपील स्पष्टरूपेण परिसीमा के भीतर थी और ऐसी परिस्थितियों में राज्य आयोग के समक्ष अपील दायर करने में विलम्ब के दोषमार्जन के लिए एक आवेदन पत्र प्रस्तुत करने की याचिकावर्ता के लिए कोई आवश्यकता नहीं थी। चूंकि प्रश्नगत् आदेश, उपर्युक्त सिद्धान्त के विरुद्ध पाया गया, इसलिए उसे अपास्त कर दिया।

सेवा में अपर्याप्तता:-

स्टेट बैंक आफ इण्डिया बनाम जैन इरीगेशन सिस्टम लिमिटेड के मामले में जहाँ अभिकथित कूटरचित चेक में किया गया परिवर्तन मान्य नहीं था और भुगतान सद्भावनापूर्वक एवम् उपेक्षा किये बिना ही व्यापार के सामान्य अनुक्रम में किया गया था वहाँ राज्य आयोग ने यह अभिनिर्धारित किया कि परिवाद, अधिकारिता की कमी या आवश्यक पक्षकारों को सम्मिलित करने सदृश्य दुर्बलताओं से परे था लेकिन जहाँ विशेषज्ञ की राय द्वारा इस तथ्य की संपुष्टि कर दी गयी कि प्रश्नगत चेक के साथ छेड़छाड़ की गयी थी या उसमें कुछ परिवर्तन किया गया था, वहाँ अपीलीय न्यायालय ने इस सन्दर्भ बैंक को दोषी माना कि उसने चेक को पारित करने में उपेक्षापूर्वक कृत्य किया और उचित माधानी एवम् दक्षता का प्रयोग नहीं किया।

जहाँ परिवादी ने कारखाने के भीतर महत्वपूर्ण स्टाकों को बीमाकृत कराया; वहाँ उसमें आग लग जाने से वे जलकर विनष्ट हो गये। ऐसी दशा में जब प्रतिकर का दावा किया गया, तब उसका संदाय नहीं किया गया। परिवाद के विचारण के दौरान विरोधी पक्षकार ने यह माध्य प्रस्तुत किये कि कथित आगजनी से जो क्षति या हानि हुई, उसे बीमा पालिसी द्वारा आच्छादित किया गया।

यद्यपि राज्य आयोग ने यह अभिनिर्धारित किया कि विरोधी पक्षकार द्वारा प्रस्तुत की गयी टिप्पणी के आवरण के अधीन उठायी गयी हानि को आच्छादित किया जा रहा था लेकिन जब राज्य आयोग के निर्णय के विरूद्ध अपील दायर की गयी; तब यह अभिनिर्धारित किया गया कि जिस कच्चे माल को कारखाने के परिसर में रखा गया था उसे खुली जगह में पड़ा रहना नहीं माना जा सकता था और इसलिए अपील को बलहीन मानकर खारिज कर दिया गया।

न्यू इण्डिया एश्योरेंस कम्पनी लिमिटेड बनाम सेंट फ्रांसिय जेवियर फिशरीज के मामले में कहा गया है कि राज्य आयोग को यही अभिनिर्धारित करना चाहिए था कि अनुग्रहपूर्वक संदाय किया जाने में विलम्ब हुआ और इस आधार पर परिवादी के पक्ष में प्रतिकर का यह अधिनिर्णय किया जाना चाहिए था कि इस प्रकार का विलम्ब कारित किया गया था।

यहाँ यह राय व्यक्त की गयी कि विशुद्ध रूप से अनुग्रहपूर्वक किसी भी समय की परिसीमा के भीतर प्रश्नगत रकम का संदाय किया जाने का कोई प्रश्न ही नहीं पैदा होता और इसका संदाय, एक मात्र अनुग्रह के आधार पर ही किया जा सकता था। इस प्रकार का भुगतान, एक अधिकार के रूप में प्राप्त करने योग्य नहीं माना जा सकता है।

इन्ही सभी कारणों की वजह से बीमा कम्पनी को इस आधार पर इस प्रकार का भुगतान करने के मामले में, किसी भी प्रकार से विलम्ब करने का दोषी नहीं माना जा सकता है कि इस प्रकार का अनुग्रहपूर्वक अनुतोष को मंजूरी प्रदान करने का निर्णय कुछ समय के तीत हो जाने के पश्चात् लिया गया था।

तमिलनाडु इण्डस्ट्रीज इनवेस्टमेण्ट कारपोरेशन बनाम कृष्ण फैब्रिक्स (1996) परिवादी को सात लाख रुपये का ऋण विरोधी पक्षकार द्वारा मंजूर किया गया। लेकिन कुछ शेष रकम का भुगतान नहीं किया जा सकता था। परिणामतः परिवादी कुछ उत्तरवर्ती मद एवम् कच्चे माल का क्रय कर पाने में असमर्थ रहा। राज्य आयोग ने विरोधी पक्षकार को परिवादी के पक्ष में बकाया ऋण का संवितरण करने का निर्देश दिया।

आगे जब राज्य आयोग के निर्णयादेश के विरुद्ध अपील दायर की गयी, तब यह अभिनिर्धारित किया गया कि राज्य आयोग ने स्वयं के इस दोषपूर्ण निष्कर्ष पर कथित निर्देश को आधार प्रदान करने वाले ऋण के संवितरण के लिए निर्देश जारी करने में त्रुटि कारित किया कि अपीलार्थी की ओर से सेवा में कमी की गयी; कारण कि परिवादी द्वारा पेश किये गये सभी बिल एवम् बाउचरों को अवलोकित करने से इसी निष्कर्ष पर पहुँचना न्यायोचित माना जायेगा कि परिवादी को अपीलार्थी द्वारा संवितरित की जाने वाली ऋण के शोष भाग का संदाय करना चाहिए।

राजगोपाल बनाम नेशनल इंश्योरेंस कम्पनी लिमिटेड के मामले में परिवादी का ही वाहन पर स्वामित्व था और उसने विशाल बीमा पालिसी प्राप्त किया और इस वाहन को बेच दिया गया था उसका आर्थिक तौर पर भुगतान भी प्राप्त किया गया। तदोपरान्त वाहन पर विक्रेता को कब्जा प्रदान कर दिया गया। किन्तु इस वाहन की चोरी हो गयी थी। आगे दावे का खंडन किया गया क्योंकि बीमा करने योग्य ब्याज में भिन्नताएं पायी गयी और जब इस सन्दर्भ में, परिवाद दायर किया गया; तब राज्य आयोग ने यह अभिनिर्धारित किया कि यहाँ न तो सव्यवहार ही पूर्ण किया गया और न ही विवादित सम्पत्ति पर किसी का स्वामित्व ही था।

इस आदेश के विरुद्ध अपील दायर किया जाने पर, अपीलीय न्यायालय ने इस धारणा की पुष्टि कर दिया कि राज्य आयोग ने बीमा पालिसी के छूट खण्ड के खण्ड का निर्वाचन पूर्णरूपेण उचित रूप से नहीं किया क्योंकि इन पालिसियों में न केवल भिन्नताएं पायी गयी बल्कि मोटर वाहन पर बीमाकृत ब्याज समाप्त भी हो गया था। अतएव, परिवादी के लिए कोई भी बीमा करने योग्य ब्याज या हिताधिकार उस समय शेष नहीं रह गया था जिस समय लगत वाहन की चोरी हुई थी।

जब अपीलकर्ता ने दोषपूर्ण ढंग से वित्तीय सुविधाओं का प्रत्याख्यान किया, तब राज्य आयोग ने यह अभिनिर्धारित किया कि अग्रिम ॠण को मंजूरी प्रदान करने में इंकार करने में बैंक की ओर से कोई सेवा में कमी नहीं हुई थी। लेकिन जहाँ अपीलार्थी शर्तों का अनुपालन करने में असमर्थ था, वहाँ राज्य आयोग के निष्कर्ष में कोई अवैधानिकता नहीं पायी गयी।

एक मामले में राज्य आयोग के इस निष्कर्ष की संपुष्टि कर दी गयी कि विद्युत बोर्ड सेवा में कमी करने के लिए दोपी है जिसको इसने भारतीय विद्युत अधिनियम के अधीन उपभोक्ता प्रदान करने के लिए वचनबंध हो गया था; कारण कि ये पूर्व नोटिस के बिना ही विद्युत आपूर्ति के कनेक्शन को काटकर इसके स्वयम् के श्रमिक नोटिस के ही समान थे।

राना वाटर अगरवाला बनाम इण्डिया इंश्योरेंस के मामले में परिवादी ने यह अभिकथन किया कि ट्रैक्टर की आपूर्ति बुक करने में वरिष्ठता के अनुपालन किया जाना चाहिए और इस परिवाद को राज्य आयोग ने खारिज कर दिया।

परन्तु अपील के चरण में जब परिवादी को पी० एल० डी० बी०" द्वारा ऋण को मंजूरी प्रदान करने की जानकारी रखता है और बैंक द्वारा स्पांसर्ड के रूप में व्यवहृत नहीं किया जा सकता है। परिणाम राज्य मूल्य राज्य आयोग के निष्कर्ष की सम्पुष्टि कर दी गयी।

प्रस्तुत मामले में जहां बीमा कम्पनी की सेवा में कमी के लिए परिवाद दाखिल किया गया। जहां भुगतान परिवादी द्वारा दबाव डाले बिना 16-3-2000 को कर दिया गया। परिवादी परिवाद को दाखिल करने के प्रभाव के साथ भुगतान की तारीख तक 12% वार्षिक दर ध्यान से प्राप्त करने का भी हकदार माना गया।

दोषपूर्ण वस्तुएं:-

एक मामले में परिवादी ने सन् 1979 में एक प्रेशर कुकर खरीदा और उसने परिवाद में यह अभिकथन किया कि अकस्मात् उसके फट जाने के कारण शरीर पर अनेक चोटें आयी। लेकिन इस परिवाद को राज्य आयोग द्वारा खारिज कर दिया गया। जब राज्य आयोग के निष्ठा के विरूद्ध अपील दायर की गयी; तब राज्य आयोग के इस निष्कर्ष की संपुष्टि कर दी गयी है। प्रेशर कुकर के निर्माण में जिन तत्वों का प्रयोग किया गया, ये दोषपूर्ण तथा निम्न कोटि के नहीं थे।

एक अन्य मामले में जहाँ राज्य आयोग ने यह निर्णीत कि परिवादी के विरोधी पक्षकार द्वारा आपूर्ति की गयी यूनिट दोषपूर्ण थी; वहाँ विरोधी पक्षकार को मशीन को वापस लेने के लिए तथा परिवादी को इसकी कीमत 3,85,000 रुपये प्रतिदाय करने के लिए उत्तरदायी माना गया।

जगदेव शर्मा बनाम हवील वर्ड के मामले में परिवादी ने कार खरीदी और उसको विरोधी पक्षकार क्रमांक 3 से बीमाकृत कराया। इन कार को विरोधी पक्षकार क्रमांक 1 के परिसर में कार को मरम्मत के लिए भेजा गया था। लेकिन संयोगवश "शो रूम में आग लग गयी और यह वाहन पूर्णतया जल गया। दावे कर निपटारा नहीं हो सका और इसके बाबत परिवाद दायर किया गया।

राज्य आयोग ने विरोधी पक्षकार क्रमांक 1 एवम् 2 को कार के मूल्य का पृथक एवम् संयुक्त रूप से प्रतिदाय करने का निर्देश दिया। जब प्रतिकर एवम् क्षतिपूर्ति के दावे को अस्वीकृति कर दिया गया तब इसके विरुद्ध अपील दायर की गयी। अपीलीय न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि चूंकि बीमा कम्पनी उस कार के दोषपूर्ण होने के आधार पर स्वयं के दायित्वभार को दूसरे पर नहीं डाल सकता, वहाँ यह नाश रक्षण के रूप में इंजन को बदल सकता था। और इसलिए बीमा कम्पनी को कार के मूल्य का संदाय करने का निर्देश दिया गया।

हिंदुस्तान मोटर लिमिटेड बनाम नारायण पण्डलीक टामन्कर के मामले में जहाँ परिवादी ने एम्बेसडर कार खरीदा और उसे दोषपूर्ण पाया गया। इसके अलावा, अनेक बार इस वाहन को विरोधी पक्षकार के पास ले जाया गया। किन्तु यह अधिक समय तक ठीक नहीं रह पाया और इसलिए जब परिवादी ने विरोधी पक्षकार के परिवाद दायर किया; तब राज्य आयोग विरोधी पक्षकार को वाहन की मरम्मत करने का निर्देश दिया।

राज्य आयोग के निर्णय के विरुद्ध अपील दायर किये जाने के पश्चात् यह अभिनिर्धारित किया गया कि जहाँ परिवादी अपने खेत की जुताई नहीं कर सकता वहाँ 20,000 रुपये का प्रतिकर का अधिनिर्णय किया।

उपभोक्ता:-

जिस प्रकार से वाणिज्य सम्बन्धी प्रयोग एवम् वाणिज्य सम्बन्धी प्रयोजन के बीच अभिकर्ता द्वारा विभेद किया गया, वह ढंग इस अधिनियम के आशयित प्रयोजनों को विधिमान्य नहीं निर्णीत करता है।

यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि उपभोक्ता पद की परिभाषा से न्य सम्बन्धी प्रयोजनों के लिए माल का क्रय करने वाले व्यक्तियों को अपवर्जित करने में संसद के इस आशय को एक प्रतिबंध पर अधिरोपित करना है जो कि उपभोक्ता संरक्षण का अवलम्ब वाणिज्य सम्बन्धी प्रयोजनों के लिए माल का क्रय करने वाले व्यापार द्वारा नहीं बल्कि न उनके प्राइवेट एवम् व्यक्तिगत् उपयोग एवम् उपभोग के लिए साधारण उपभोक्ताओं द्वारा लिये जाने के पूर्व एक विशेष उपचार होता है।

कैटवीजन प्रोडक्ट्स लिमिटेड बनाम प्रगति कम्प्युटर्स (प्राइवेट) लिमिटेड के मामले में वर्तमान मामले में, इ पी ए बी एक्स प्रणाली का क्रय कम्पनी के कारोबार के बेहतर प्रबंध के लिए परिवादी कम्पनी द्वारा किया गया। यह नहीं कहा जा सकता है कि परिवादी ने स-रोजगार के माध्यम से जीविका उपार्जन के प्रयोजनार्थ अनन्य रूप से पी ए बी एक्स का कप किया।

अतः यह मामला उपर्युक्त निर्दिष्ट विवेचनाकारी खण्ड के अधीन नहीं आयेगा। अतः यह अभिनिर्धारित किया गया कि परिवादी द्वारा इ पी ए बी ए एक्स प्रणाली का क्रय वाणिज्य सम्बन्धी प्रयोजनों की आपूर्ति के लिए किया गया था।

परिवादी को अधिनियम के अधीन यथापरिभाषित एक उपभोक्ता माना गया। चूंकि अपीलकर्तागण समनुदेशों का पालन करने में तथा समनुदेशितियों को इसका परिदान करने में असमर्थ रहा; इसलिए हस्तांतरणकर्ताओं के द्वारा सेवा प्रदान करने में कमी हुई माना गया।

बीमा सेवाएं:-

एक मामले में बीमा पालिसी को अंगीकार किये जाने के पश्चात् लेकिन जहाँ वोट या नौका का मूल्यांकन करने के सन्दर्भ में कपटपूर्ण संव्यवहार किये जाने का एक महीने के भीतर ही दुर्घटना हुई थी। बोट का 2,70,000 रुपये का बीमा किया गया था।

कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया; वहाँ चूंकि समुद्री बीमा अधिनियम की धारा 29 के नियमों के अनुसार, बोट या नौका का मूल्य, बीमा कम्पनी द्वारा 2,70,000 रुपये नियत किया गया, इसलिए परिवादी को कथित रकम की वसूली करने का अधिकारी या हकदार माना गया।

भारतीय जीवन बीमा निगम बनाम सुजाया महाबल पुंज (1996) के मामले में जहाँ मृतक ने अपना जीवन बीमा कराया था और उसके द्वारा उस तृतीय अर्धवार्षिक प्रीमियम का भुगतान करने में व्यतिक्रम किया गया जो 28.3.1991 को किया जाना था। वह उसकी मृत्यु 11.7.1997 को हो गयी। ऐसी परिस्थिति में मृतक विधवा द्वारा दावा किया गया और इस दावे का जब बीमा कम्पनी द्वारा खण्डन किया गया तब राज्य आयोग ने परिवाद को इस आधार पर स्वीकृत कर दिया गया कि विरोधी पक्षकार की ओर से कोई भी अधिवा हाजिर नहीं हुआ था।

व्यक्ति पक्षकार ने इस आदेश के विरुद्ध अपील दयार किया और वहाँ यह स्थापित करने के लिए कोई दस्तावेज माध्य नहीं प्रस्तुत किये गये कि प्रश्नगत् पालिसी पर देय प्रीमियम की रकम का सम्यक रूप से भुगतान किया गया था और वहाँ संक्षिप्त प्रक्रिया को अपनाकर राज्य आयोग द्वारा मामले का निस्तारण, विधि के अनुसार नहीं किया गया और इसलिए अंततोगत्वा मामले को नये सिरे से विचारण के लिए राज्य आयोग को प्रतिप्रेषित कर दिया गया।

विनोद कुमार नागरथ बनाम जनरल इंश्योरेंस कम्पनी लिमिटेड के मामले में परिवादी ने अपने वाहन का बीमा कराया। जब उसका वाहन दुर्घटनाग्रस्त हो गया तब परिवादी ने प्रतिकर हेतु एक परिवाद दायर किया। इस मामले में दुर्घटना होने के फलस्वरूप जो वाहन को हानि पहुँची थी, उसी को दोनों पक्षकारो द्वारा विवादग्रस्त बनाया गया। राज्य आयोग के परिवाद को मंजूरी प्रदान कर दी।

आगे इस निर्णय विरुद्ध अपील के दायर किये जाने पर यह अभिनिर्धारित किया गया कि जहाँ वाहन की मरम्मत न कराये जाने के कारण, परिवादी द्वारा उपार्जन की हुई अभिकथित हानि को पालिसी के शर्तों द्वारा आच्छादित नहीं किया जा सकता था; वहाँ राज्य आयोग के आदेश को उपातंरित कर दिया गया था बीमा कम्पनी को परिवादी के पक्ष में ब्याज सहित 1,70,675 रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया गया।

न्यू इण्डिया इंश्योरेंस कम्पनी लिमिटेड बनाम मोहम्मद यासीन के मामले में परिवादी के वाहन का बीमा विरोधी पक्षकार द्वारा कराया गया था। वाहन दुर्घटनाग्रस्त हो गया और इस दुर्घटना के परिणामस्वरूप जो क्षति कारित हुई उसके बाबत उसने बीमा कम्पनी के विरुद्ध प्रतिकर का दावा किया। इस दावे को विरोधी पक्षकार द्वारा निम्नकोटि का होने की मान्यता प्रदान की गयी तथा परिवादी को हानि के 75% की क्षतिपूर्ति करने के लिए प्रस्ताव किया गया। परिवादी ने प्रश्नगत् को अस्वीकृत कर बीमा कम्पनी के विरुद्ध एक परिवाद संस्थित किया।

राज्य आयोग ने विरोधी पक्षकार के इस तर्क नहीं माना कि विवादग्रस्त वाहन को दुर्घटना के समय एक अनधिकृत व्यक्ति द्वारा चलाया जा रहा था, अतएव जब परिवादी के द्वारा किये गये प्रतिकर के दावे को स्वीकृत किया गया तब व्यथित पक्षकार ने ऐसे निर्णय के विरुद्ध अपील दायर कर दिया।

अपीलीय न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि परिवादी ने पालिसी की शर्तों के साथ-साथ परमिट की शर्तों का उल्लंघन किया और मानक स्तर पर न होने के आधार पर समझौता प्रस्ताव को दावे के तय न किये जाने या सेवा में कमी के लिए विरोधी पक्षकार ने विरुद्ध निर्देश नहीं दिया जा सकता था।

चूंकि अपीली फोरम ने बिल्कुल सूक्ष-बूझ का प्रयोग किये बगैर एवं बगैर किसी कारण आदेश पारित किया था इसलिए उसे आक्षेपित कर दिया गया और मामले को राज्य आयोग को चौरेवार आज्ञापक आदेश पारित करने के लिए प्रतिप्रेषित कर दिया गया।

अंतरिम अनुतोष- इसफार्ट लिमिटेड बनाम रावड़लात जी भाई राम भाई के मामलेे में जहाँ, प्रतिवादी परिवादी को न तो ट्रैक्टर प्राप्त हुआ और न ही व्यापारी को संदाय की गयी रकम का प्रतिदाय ही किया गया, वहाँ राज्य आयोग ने परिवाद के निपटाने के लम्बित रहने के दौरान कमीशन के साथ प्रस्तुत किये जाने के लिए निर्देशित किये जाने के कारण, निक्षेप के प्ररूप में अनुतोष को स्वीकृत प्रदान करने वाला अंतरिम आदेश पारित किया।

लेकिन जब राज्य आयोग के आदेश के विरुद्ध अपील संस्थित की गयी, तब यह अभिनिर्धारित किया गया कि उपभोक्ता फोरमों के पास मूल परिवाद याचिका में अंतरिम अनुतोष को मंजूरी करने की शक्ति नहीं होती है।

परिवाद का प्रतिवाद:-

जनरल मैनेजर टेलीकम्युनिकेशंस बनाम नीडित इण्डस्ट्रीज लिमिटेड के मामले में जहां राज्य आयोग द्वारा जो नोटिस विरोधी पक्षकारों को भेजी गयी, उसके अनुसार वे 90 दिनों के भीतर हाजिर हो सकते थे तथा परिवाद कर सकते थे जबकि कानूनी तौर पर इसके लिए स्वीकृति प्रदान करने का आदेशात्मक प्रावधान नोटिस की प्राप्ति की तिथि से 30 दिनों की कालावधि विहित की गयी है, वहां राज्य आयोग के निष्कर्ष को अपास्त कर दिया गया तथा माले को पुनः नये सिरे से विचारण किया जाने के लिए निस्तारित किये जाने हेतु प्रति प्रेषित कर दिया गया।

जहां परिवादी याची ने आक्षेपित बिल के विरुद्ध परिवाद दाखिल में नितान्त संदिग्धार्थी तथ्यों का उल्लेख किया वहां पुनरीक्षण राष्ट्रीय आयोग में भी अपीली राज्य आयोग के परिवाद खारिज करने वाले आदेश को उचित माना। अतएव, 5,000/- o खर्चे के आदेश के साथ पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी गयी।

सेक्रेटरी, केरल स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड बनाम मैनेजर, एम एस कातराकल महारानी गोल्ड, सुपर मार्केट केसरगाड केरल के मामले में चूंकि विरोधी पक्षकारों ने विद्युत कनेक्शन प्रदान करने की सेवा में कमी की थी इसलिए जिला फोरम को परिवादी/प्रत्यर्थी द्वारा दाखिल किये गये परिवाद को अनुज्ञात करने तथा याचियों को एक पुनरीक्षित बिल जारी करने में सही माना गया और इसके विरुद्ध दाखिल की गयी पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी गयी।

गुजरात इनसेक्टासाइट्स लिए बनाम राम निवास के मामले में केन्द्रीय प्रयोगशाला के निष्कर्ष को राज्य प्रयोगशाला के निष्कर्ष पर अधिमान्यता प्रदान जानी चाहिए क्योंकि केन्द्रीय प्रयोगशाला भारत सरकार को कृषि मंत्रालय का एक भाग है। केन्द्रीय प्रयोगशाला की रिपोर्ट के अनुसार कीटनाशक दवा की मात्र कमी की वजह से ही नहीं अपितु अन्य कारणों से फसल नुकसान हुआ और इसलिए विरोधी पक्षकार के विरुद्ध परिवाद खारिज कर दिया गया।

एकपक्षीय कार्यवाही:-

सुनील ब्लड बैंक एण्ड ट्रान्सफ्युजन सेंटर बनाम नरेश कुमार के मामले में जहां प्रतिकर हेतु दावा सम्बन्धी एक मामले में विरोधी पक्षकार को अपनी प्रतिरक्षा करने का उचित अवसर प्रदान किये बिना ही उसके विरुद्ध एकपक्षीय कार्यवाही में प्रतिकर का अधिनिर्णय किया गया। वहाँ जब व्यथित पक्षकार ने इस आदेश को सक्षम अधिकारिता वाली न्यायालय में चुनौती दिवा तब इसे अपास्त कर दिया गया और पुनर्विचारण के लिए मामले को प्रतिप्रेषित कर दिया गया।

भवन निर्माण:-

सी एन रामकृष्ण पिल्लई बनाम कोचुम्मेन के मामले में जहाँ विवादित मकान या ईमारत के दोनों पक्षकारगण इस बात पर सहमत हो गये थे कि ईमारत के निरीक्षण के लिए किसी विशेषज्ञ की नियुक्ति की जानी चाहिए थी, वहाँ प्रस्तावित मुलाकात किये जाने के सन्दर्भ में तिथि एवम् दिनांक के बारे में पहले से हो सम्बन्धित पक्षकारों को पर्याप्त रूप से सूचना उपलब्ध करायी जा चुकी थी।

ऐसी स्थिति में इस निष्कर्ष पर पहुँचा गया कि अभियन्ता की पारिश्रमिक को नियत करने वाले तथा इस प्रकार का व्यय, बैठक के लिए दायित्व को निर्धारित करने वाले, अन्तिम आदेशों को अपील के अन्तिम रूप से निस्तारित किये जाने के समय पारित किया जाना चाहिए था।

एक मामले में राज्य आयोग ने यह पाया कि कार में सृजनात्मक दोष था। यह तथ्य से स्पष्ट है कि कार को दो बार मरम्मत के लिए व्यापारी को ले जाना पड़ा। अंततोगत्वा इंजन को निकालना पड़ा और मरम्मत करने के लिए या बदलने के लिए निर्माता के पास भेजा गया।

राज्य आयोग के आदेश में कोई ऐसी दुर्बलता नहीं पायी गयी जिसने पूर्णतया सभी पक्षकारों के मामले पर विचार करने हेतु प्रेरित किया था। अतएव, मामले के अभिलेख पर विद्यमान सभी साक्ष्यों पर विचार करने के पश्चात् अपीलीय न्यायालय ने राज्य आयोग के निर्णय की संपुष्टि कर दिया।

बी एस बिन्द्रा बनाम सेक्रेटरी, भारत संघ के मामले में राज्य आयोग इस निष्कर्ष पर पहुॅचा कि परिवादी एक भी ऐसा दृष्टांत प्रस्तुत नहीं कर सकता था जिसमें कि प्रतीक्षा सूची में उससे नीचे रहने वाला कोई भी व्यक्ति, उससे गुजारकर टेलीफोन कनेक्शन प्रदान करता अतएव, परिवादी द्वारा संस्थित किया परिवाद न केवल उद्वेगकारी या काल्पनिक था बल्कि मिथ्या भी था और यह स्पष्ट रूप से अधिनियम की धारा 26 को भी आकर्षित करता था।

न्यू इण्डिया इंश्योरेंस कम्पनी लिमिटेड बनाम पुष्पादेवी जमाद प्रस्तुत मामले में वाहन को पूँजी लगाने वाले के कब्जे में रखा गया। लेकिन यह संयोगवश दुर्घटनाग्रस्त हो गयी और इस घटना की प्रथम सूचना रिपोर्ट भी नहीं लिखाई गयी थी। जब परिवादी द्वारा प्रतिकर का दावा किया गया, तब राज्य आयोग ने परिवाद को स्वीकृत कर दिया।

लेकिन जहाँ वाहन के कब्जे के सन्दर्भ में हुए परिवर्तन की सूचना दावा याचिका के फाइल किये जाने के पूर्व विरोधी पक्षकार को नहीं दी गयी थी और जहां इस दावे के खण्डन सम्बन्धी पत्र दावे को नामंजूर करने के विशिष्ट कारणों का उल्लेख करते थे; वहाँ अपीलीय राष्ट्रीय आयोग ने यह अभिनिर्धारित किया कि इन सभी परिस्थितियों में इसी निष्कर्ष का समर्थन करना न्यायसंगत होगा कि विरोधी पक्षकार की ओर से कोई सेवा में कमी नहीं की गयी थी।

Next Story