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उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 भाग: 7 परिवाद को ग्रहण होने पर प्रक्रिया संबंधित कानून

Shadab Salim
16 Dec 2021 4:15 AM GMT
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 भाग: 7 परिवाद को ग्रहण होने पर प्रक्रिया संबंधित कानून
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उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 (The Consumer Protection Act, 2019) की धारा 38 परिवाद के ग्रहण हो जाने पर प्रक्रिया से संबंधित प्रावधानों को उल्लेखित करती है। यह अधिनियम की महत्वपूर्ण धारा इसलिए बन जाती है क्योंकि इस धारा के अंतर्गत प्रक्रिया स्थापित की गई है इस प्रक्रिया के माध्यम से किसी प्रकरण के ग्रहण हो जाने के बाद मुकदमे को चलाया जाता है। इस आलेख के अंतर्गत इस ही धारा 38 पर संक्षिप्त टिप्पणी प्रस्तुत की जा रही है तथा साथ ही इससे संबंधित न्याय निर्णय का उल्लेख किया जा रहा है।

अधिनियम के अंतर्गत धारा को इन शब्दों में परिभाषित किया गया है:-

धारा-38

परिवाद के ग्रहण होने पर प्रक्रिया -

(1) जिला आयोग किसी परिवाद को ग्रहण करने पर या मध्यक्ता द्वारा परिनिर्धारण के लिए असफल होने की दशा में मध्यक्ता के लिए निर्दिष्ट मामलों के संबंध में ऐसे परिवाद पर आगे कार्रवाई करेगा।

(2) जहां परिवाद किन्हीं मालों से संबंधित है तो जिला आयोग,

(क) ग्रहण किए गए परिवाद की एक प्रति उसके ग्रहण करने की तारीक से तीस दिन के भीतर परिवाद में वर्णित विरोधी पक्षकार को यह निर्देश देते हुए निर्देशित करेगा कि वह तीस दिन की अवधि या पन्द्रह दिन अनधिक ऐसी बढ़ाई गई अवधि के भीतर, जो मंजूर की जाए, मामले के बारे में अपना पक्ष कथन प्रस्तुत करे,

(ख) विरोधी पक्षकार खंड (क) के अधीन उसको निर्दिष्ट किसी परिवाद की प्राप्ति पर, परिवाद में अंतर्विष्ट अभिकथनों से इंकार करता है या उन प्रतिवाद करता है, या जिला आयोग द्वारा दिए गए समय के भीतर अपना प्रश्न प्रस्तुत करने के लिए कोई कार्रवाई करने का लोप करता है या न करने में असफल रहता है वहां उपभोक्ता विवाद को खंड (म) के खंड (छ) में निर्दिष्ट रीति में निपटारे के लिए कार्यवाही करेगा;

(ग) परिवादी ने माल में किसी ऐसी त्रुटि का अभिकथन किया है, जिसका अवधारण माल के उचित विश्लेषण या परीक्षण के बिना नहीं किया जा सकता है वहां परिवादी से माल का नमूना अभिप्राप्त करेगा, उसे सीलबंद करेगा और ऐसी रीति में, जो विहित की जाए, अधिप्रमाणित करेगा और इस प्रकार सीलबंद नमूने को इस निदेश के साथ समुचित प्रयोगशाला को निर्देशित करेगा कि ऐसी प्रयोगशाला यह पता लगाने की दृष्टि से ऐसे विश्लेषण या परीक्षण, जो भी आवश्यक हो, करे कि ऐसे माल में परिवाद में अभिकथित कोई त्रुटि है या नहीं अथवा माल में कोई अन्य त्रुटि है या नहीं और उस पर अपनी रिपोर्ट निर्देश की प्राप्ति के पैंतालीस दिन की अवधि के भीतर या ऐसी अवधि के भीतर जो जिला आयोग द्वारा मंजूर की गई हो, को भेजेगा,

(घ) खंड (ग) के अधीन किसी समुचित प्रयोगशाला को माल के किसी नमुने को निर्दिष्ट किए जाने से पूर्व, परिवादी से यह अपेक्षा कर सकेगा कि वह प्रश्नगत मालों के संबंध में आवश्यक विश्लेषण या परीक्षण करने के लिए समुचित प्रयोगशाला को संदाय के लिए ऐसी फीस, विनिर्दिश की जाए. आयोग के जमा खाते में जमा करे;

(ङ) समुचित प्रयोगशाला को खंड (घ) के अधीन अपने जमा खाते में जमा की गई रकम को प्रेषित करेगा जिससे कि वह खंड (ग) में वर्णित विश्लेषण या परीक्षण करने के लिए उसे समर्थ बनाया जा सके और समुचित प्रयोगशाला से रिपोर्ट के प्राप्त हो जाने पर विरोधी पक्षकार को ऐसी टिप्पणी जो वह समुचित समझे, के साथ रिपोर्ट की एक प्रति अग्रेषित करेगा;

(च) यदि पक्षकारों में से कोई पक्षकार समुचित प्रयोगशाला के निष्कर्षों की शुद्धता पर विवाद करते हैं या समुचित प्रयोगशाला द्वारा अपनाई गई विश्लेषण या जांच की पद्धतियों की शुद्धता पर विवाद करते हैं तो विरोधी पक्षकार या परिवादी से यह अपेक्षा करेगा कि वह समुचित प्रयोगशाला द्वारा की गई रिपोर्ट के संबंध में अपने आक्षेप लिखित में प्रस्तुत करे;

(छ) समुचित प्रयोगशाला द्वारा बनाई गई रिपोर्ट की शुद्धता या अन्यथा के संबंध में परिवादी के साथ विरोधी पक्षकार को सुने जाने का और खंड (च) के अधीन उसके संबंध में किए गए आक्षेप तथा धारा 39 के अधीन समुचित आदेश जारी करने के बारे में भी युक्तियुक्त अवसर देगा।

(3) यदि धारा 36 के अधीन उसके द्वारा स्वीकार किया गया परिवाद उन मालों के संबंध में है जिनकी बाबत उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट प्रक्रिया का अनुसरण नहीं किया जा सकता या परिवाद किन्हीं सेवाओं से संबंधित है, तो जिला आयोग

(क) विरोधी पक्षकार को ऐसे परिवाद की एक प्रति निर्दिष्ट करते हुए निदेश देगा कि वह मामले के अपने पक्ष को तीस दिन की अवधि के भीतर या पन्द्रह दिन से अनधिक ऐसी विस्तारित अवधि, जो जिला आयोग द्वारा अनुदत्त की जाए, के भीतर प्रस्तुत करे;

(ख) जहां विरोधी पक्षकार, खंड (क) के अधीन उसे निर्दिष्ट की गई परिवाद की प्रति के प्राप्त हो जाने पर, परिवाद में अंतर्विष्ट अभिकथनों का प्रत्याख्यान करता है या उन पर विवाद करता है या जिला आयोग द्वारा प्रदान किए गए समय के भीतर अपने मामले को व्यपदिष्ट करने के लिए कोई कार्रवाई नहीं करता है या कार्रवाई करने में असफल रहता है, तो उपभोक्ता विवाद का निपटान-

(i) उसकी सूचना परिवादी और विरोधी पक्षकार द्वारा लाए गए साक्ष्य के आधार पर यदि विरोधी पक्षकार परिवाद में अंतर्विष्ट अभिकथनों से इंकार करता है या उन पर विवाद करता है; या

(i) जहां विरोधी पक्षकार आयोग द्वारा प्रदान किए गए समय के भीतर अपना व्यपदिष्ट नहीं करता है या करने में असफल रहता है वहां परिवादी द्वारा उसके ध्यान में लाए गए साक्ष्य के आधार पर एकपक्षीय कार्यवाही करेगा।

(ग) परिवाद का गुणावगुण के आधार पर विनिश्चय करेगा यदि परिवादी सुनवाई की तारीख को उपस्थित होने में असफल रहता है। (4) उपधारा (2) और उपधारा (3) के प्रयोजनों के लिए जिला आयोग आदेश द्वारा किसी इलेक्ट्रानिक सेवा प्रदाता से ऐसी सूचना दस्तावेज या अभिलेग नहीं किया जाएगा कि नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत का अनुपालन नहीं किया गया है।

(5) उपधारा (1) और उपधारा (2) में अधिकथित प्रक्रिया का अनुपान करने वाली कार्यवाहियों को इस आधार पर किसी न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किया जाएगा कि नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत का अनुपालन नहीं किया गया है।

(6) प्रत्येक परिवाद की सुनवाई जिला आयोग द्वारा शपथपत्र और अभिलेख पर रखे गए दस्तावेजी साक्ष्य के आधार पर की जाएगी :

परंतु जहां सुनवाई के लिए या वैयक्तिक रूप से या वीडियो संगोष्ठी के माध्यम से पक्षकारों की परीक्षा के लिए कोई आवेदन किया जाता है तो जिला आयोग पर्यापत्तत हेतुक उपदर्शित करने पर और कारणों को अभिलिखित करने के पश्चात् के वैसा करने को अनुज्ञात कर सकेगा।

(7) प्रत्येक परिवाद पर यथासंभव शीघ्र सुनवाई की जाएगी और विरोधी पक्षकार द्वारा सूचना की प्राप्ति की तारीख से तीन माह की अवधि के भीतर परिवाद को विनिश्चित करने का वहां प्रयास किया जाएगा जहां परिवाद में वस्तुओं के विश्लेषण या परीक्षण की अपेक्षा नहीं की जाती है और पांच मास के भीतर यदि इसके वस्तुओं के विश्लेषण या परीक्षण की अपेक्षा की जाती है।

परंतु जिला आयोग द्वारा स्थगन मामूली तौर पर तब तक मंजूर नहीं किया जाएगा जब तक पर्याप्त हेतुक नहीं दर्शाया जाता है और स्थगन की मंजूरी के कारणों को आयोग द्वारा लेखबद्ध न कर दिया गया हो :

परंतु यह और कि जिला आयोग स्थगन के कारण उपगत होने वाली लागतों के संबंध में ऐसे आदेश करेगा, जैसा कि विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाए:

परंतु यह भी कि इस प्रकार विनिर्दिष्ट अवधि के पश्चात् परिवाद का परिनिर्धारण किए जाने की दशा में, जिला आयोग उक्त परिवाद के परिनिर्धारण के समय, उसके कारणों को अभिलिखित करेगा।

(8) जहां जिला आयोग के समक्ष किसी कार्यवाही के संबित रहने के दौरान, आयोग को यह आवश्यक प्रतीत होता है तो वह ऐसा अंतरिम आदेश पारित कर सकेगा, जो मामले के तथ्यों तथा परिस्थितियों को ध्यान में रखते और उचित हो।

(9) इस धारा के प्रयोजनार्थ जिला आयोग को वही शक्तियां होंगी जो निम्नलिखित विषयों की बाबत वाद का विचारण करते समय सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन किसी सिविल न्यायालय है अर्थात् निहित होती

(क) किसी प्रतिवाद या साक्षी को समन करना तथा हाजिर कराना और शपथ पर साक्षी की परीक्षा करना;

(ख) साक्ष्य के रूप में किसी दस्तावेज या अन्य तात्विक वस्तु के प्रकटीकरण और पेश करने की अपेक्षा करना;

(ग) शपथ पत्रों पर साक्ष्य प्राप्त करना;

(घ) समुचित प्रयोगशाला से या किसी अन्य सुसंगत स्रोत से संबद्ध विश्लेषण या परीक्षण रिपोर्ट की अपेक्षा करना;

(ङ) किसी साक्षी या दस्तावेज की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना, और

(च) कोई अन्य विषय, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित किया जाए।

(10) जिला आयोग के समक्ष प्रत्येक कार्यवाही भारतीय दंड संहिता (1860) का 45) की धारा 193 और धारा 228 के अर्थ में न्यायिक कार्यवाही समझी जाएगी और जिला आयोग दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 195 और अध्याय 26 के प्रयोजनार्थ दांडिक न्यायालय समझा जाएगा।

(11) जहां परिवादी धारा 2 के खंड (5) के उपखंड (v) में निर्दिष्ट उपभोक्ता है, तो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) की पहली अनुसूची के आदेश 1 के नियम 8 के उपबंध इस उपांतरण के अध्यधीन लागू होंगे कि किसी वाद या डिक्री के प्रति उसमें प्रत्येक निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह परिवाद या उस पर जिला आयोग के आदेश के प्रति निर्देश है।

(12) किसी परिवादी जो उपभोक्ता है या विरोधी पक्षकार जिसके विरुद्ध परिवाद फाइल किया गया है, कि मृत्यु की दशा में, सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के आदेश 22 के उपबंध इस उपांतरण के अध्यधीन लागू होंगे कि वादी और प्रतिवादी के प्रति उसमें किया गया प्रत्येक निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह, यथास्थिति, परिवादी या विरोधी पक्षकार के प्रति निर्देश है।

एक पक्षीय आदेश का निरस्तीकरण-

उच्चतम न्यायालय ने अवधारित किया है उद्योग विवाद अधिनियम की धारा 11 में वर्णित अधिकरण एवं प्राधिकरण न्यायालय नहीं है बल्कि न्यायालय कल्प है। जिन मामलों में अधिकरण एकपक्षीय आदेश पारित करते हैं प्रावधान का आदेश 9 नियम 13 प्रभावित होंगी। यह पुनः आगे अभिनिर्धारित किया गया कि अधिकरण एक पक्षीय आदेश को निरस्त करने हेतु प्रार्थना पत्र स्वीकार कर सकते हैं।

यह विचार सतनाम वर्मा बनाम यूनियन ऑफ इण्डिया, ए० आई० आर0 1985 (एस0 सी0) 194 में स्पष्ट किया गया है कि यदि अधिकरण ने एक पक्षीय आदेश पारित एवं प्रकाशित कर दिया है तो उसे क्षेत्राधिकार है कि वह उस आदेश को प्रतिपक्षी की प्रार्थना पत्र पर निरस्त कर सकता है। यह स्पष्ट करना पर्याप्त है कि आदेश के दिन विपक्षी न्यायालय में उपस्थित नहीं था। यह कहना गलत है कि अधिकरण एकपक्षीय आदेश प्रकाशित होने के बाद पुनः स्थापित नहीं कर सकता है।

अपना दृष्टिकोण स्पष्ट कर माननीय न्यायालय ने एकपक्षीय आदेश निरस्त कर दिया। न्यायालय उच्चतम न्यायालय के दृष्टिकोण से बाध्य है। निष्कर्षतया जिलाधिकरण को यह शक्ति नहीं है कि एक पक्षीय आदेश को निरस्त करने हेतु प्रार्थना पत्र स्वीकार करें। अतः प्रार्थना पत्र पोषणीय नहीं होगा।

कोणार्क टेलीविजन लिमिटेड बनाम राकेश गर्ग के मामले में जहाँ पर कि परिवादी ने इस आधार पर कि उसका टी वी सेट जो खरीदा था। किन्तु साथ कूपन देकर कि इसी निर्माता ने बनाया है परिवाद प्रस्तुत करता है। बाद योग्य नहीं है। क्योंकि धारा 13 के अनुसार सारे उपभोक्ता विवाद साक्ष्यों एक शपथ पत्रों के अनुसार तय किये जाने चाहिए जो कि परिवादी ने प्रस्तुत किये हैं और परिवादी के सूचना देने के बावजूद यदि विपक्षी समय सीमा के अन्दर अपना कथन तथा उस बात का खण्डन करने में चूक करता है तो मंच उसके विरुद्ध निर्णय दे सकता है। परन्तु इस बाद में निर्माण संबंधी दोष के बारे में कोई साक्ष्य न था इसलिए परिवाद निरस्त होने योग्य है।

शपथपत्र उनके द्वारा जिन्हें तथ्य का ज्ञान हो अथवा तथ्य से सूचित हो प्रस्तुत किया जायेगा। शपथकर्ता को मामले में कोई स्थिति न होगी वह सिर्फ अपने कहे गये तथ्यों के ही प्रति उत्तरदायी होगा।

वस्तु के नमूने का परीक्षण यदि उपभोक्ता फोरम के समक्ष लम्बित परिवाद में वस्तु की शुद्धता विवादित नहीं है तो उस वस्तु के नमूने को प्राप्त करने तथा उसे जांच हेतु प्रेषित करने की कोई आवश्यकता नहीं है।

नोटिस:-

मध्यप्रदेश राज्य बनाम त्रिभुवन प्रसाद चतुर्वेदी, 1991 के मामले में कहा गया है किउपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अन्तर्गत लोक सेवक के विरुद्ध परिवाद प्रस्तुत करने हेतु यह आवश्यक नहीं है कि उसे सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 80 के अन्तर्गत नोटिस भेजी जाय क्योंकि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के प्रावधान संक्षिप्त एवं त्वरित उपचार की व्यवस्था करते हैं इसलिए इस अधिनियम के अन्तर्गत संस्थित परिवाद में धारा 80 मिलि प्रक्रिया संहिता की नोटिस आवश्यक नहीं है।

एक अन्य मामले में कहा गया है जहां पर कि जिला मंच द्वारा अपीलार्थी को दो नोटिसें भेजी गयी और अपीलार्थी द्वारा उसे उचित ढंग से प्राप्त अभिस्वीकृति एवं उत्तरित की गयी। इस सबके बावजूद अपीलार्थी ने हाजिर अदालत होना उचित नहीं समझा जिसकी वजह से एक तरफा सुनवाई का आदेश उसके विरूद्ध जिला मंच द्वारा पारित कर दिया गया। यह अभिनिर्धारित किया गया कि जिला मंच ने पर्याप्त सुनवाई का अवसर प्रदान किया था।

नोटिस की कालावधि का अवधारण:-

यह अभिनिर्धारित किया गया कि लिखित कथन को दाखिल करने के लिए 30 दिनों से कम की अवधि अर्थात् 27 दिनों की भी जारी की जा सकती है जिसकी कालावधि में एक बार 15 दिनों की वृद्धि की जा सकती है। अतएव याची को खर्च के भुगतान के अधीन रखते हुए लिखित कथन दाखिल करने की अनुज्ञा प्रदान कर दी गयी।

प्रतिपक्षी को आहूत किया जाना:-

यदि उपभोक्ता संरक्षण मंच में सेवा अथवा वस्तुओं के सन्दर्भ में कोई परिवाद प्रस्तुत किया जाता है तो परिवाद प्राप्त करने के पश्चात् फोरम को विपक्षी को आहूत करके परिवाद की प्रतिलिपि प्रदत्त करनी चाहिए तथा उसे निर्देश देना चाहिए कि वह 30 दिन के अन्दर लिखित उत्तर प्रस्तुत करे। इस तीस दिन की अवधि को नजर अन्दाज नहीं किया जा सकता है।

विधि एवं तथ्य के मिश्रित प्रश्न:- यह जिला मंच का कर्तव्य है कि यदि आवश्यक हो तो अधिनियम की धारा 13 (4)(पुराना अधिनियम) की प्रक्रिया का सहारा लेकर दिये गये तथ्यों एवं साक्ष्यों के आधार पर परिवाद का निपटारा करें। साक्ष्य द्वारा साबित हुआ का अर्थ गणितीय शुद्धता बिल्कुल नहीं है क्योंकि यह असंभव है। साध्य का अर्थ है ऐसे तथ्य जिसके आधार पर कोई तार्किक बुद्धि स व्यक्ति किसी नतीजे पर पहुंच सके।

यदि जिला मंच किसी बहाने यह तय करती है कि इसमें विधि एवं तथ्य का प्रश्न मिश्रित है और इसे व्यवहार न्यायालय द्वारा तय किये जाने चाहिए तो अधिनियम का पुनीत उद्देश्य निष्फल हुआ समझा जायेगा। अतः जिला मंच को उपभोक्ता विवाद को अवश्य निपटारा करना चाहिये। प्रस्तुत परिवाद जिला मंच को इस निर्देश के साथ कि इसमें पक्षों को सुनवाई का अवसर प्रदान करते हुए साक्ष्य ले, वापस कर दिया गया।

जीवन बीमा योजना:-

धनराशि की अदायगी न करना- जहाँ पर परिवादी द्वारा परिवाद जीवन बीमा कम्पनी के विरुद्ध इस बात का दाखिल किया गया कि शर्तों एवं दशाओं के अनुपालन में धनराशि भुगतान नहीं की गयी। जिला मंच ने परिवाद निरस्त कर दिया था कम जिसे कि भुगतान किया गया उसे पक्षकार नहीं बनाया गया है।

यह अभिनिर्धारित किया गया कि जिला मंच का ऐसा आदेश उचित नहीं है। यदि जिला मंच ने यह पाया कि अ को पक्षकार नहीं बनाया गया जो कि आवश्यक था, तो अपने आप उन्हें एक नोटिस इस बाबत निर्गत करनी थी, क्योंकि अधिनियम के अन्तर्गत उपभोक्ता को अपना हक हासिल करने में तकनीकी तथा विधिक प्रक्रियाएं बाधा नहीं पहुंचा सकती हैं।

निषेधाज्ञा( स्टे ऑर्डर) - अन्तरिम आदेश- अपील में एक आधार विशेष रूप से यह लिया गया था कि जिला मंच को अधिनियम के अन्तर्गत निषेधाज्ञा के रूप में स्थगनादेश जारी करने का क्षेत्राधिकार नहीं था क्योंकि इस तरह का अधिनियम में कोई उपबंध नहीं है।

यह भी प्रस्तुत किया गया था उपचार मंच केवल धारा 14 (1) में वर्णित प्रकार के आदेश ही पारित कर सकता है, उसके ऊपर नहीं प्रस्तुत आदेश उन वर्णित क्षेत्र में नहीं आता है। कुछ वादों में आयोग ने अभिनिर्धारित किया है कि निषेधाज्ञा के रूप में अन्तरिम आदेश पारित नहीं किये जा सकते हैं। सिविल प्रक्रिया सहिता के आदेश 39 के उपबंध यहाँ प्रयोज्य नहीं हैं।

सीधी तरह से विपक्षी का हित धन अदायगी के रूप में सुरक्षित किया जाना चाहिए जिसे अन्तरिम आदेश जो इस तरह से जारी कर दिये गये हैं, निर्गत नहीं किये जा सकते हैं और कि जिला मंच करने में असफल रहा है। जैसा कि जिला मंच अपने निहित क्षेत्राधिकार के प्रयोग करने में असफल रहा है और विधिक एवं न्यायिक अनियमितताएं की है, विवादित चुनौती हुआ आदेश स्वीकार योग्य नहीं है, इसलिए यह निरस्त होने योग्य है।

जिला उपभोक्ता न्यायालय द्वारा परिवाद का निस्तारण:- परिवादी ने एक परिवाद को रीवा में जिला उपभोक्ता विवाद निवारण न्यायालय में संस्थित किया। इस बाद की सुनवाई में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 की धारा 13 एवं 14 (2) के प्राविधानों न्यायालय के अध्यक्ष द्वारा अनुपालन नहीं किया गया। मध्य प्रदेश उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम का नियम 4 (2) यह स्पष्ट करता है कि जब आवश्यकता पड़ती है तो अध्यक्ष के द्वारा निश्चित तौर पर जिला न्यायालय की बैठक आयोजित की जाती है। तत्पश्चात् जिला न्यायालय द्वारा परिवाद को निस्तारित किया जाता है न कि मात्र अध्यक्ष द्वारा परिवाद को निस्तारित किया जाता है।

आर0 पी0 कपूर बनाम टाटा आयरन एवम् स्टील कम्पनी लिमिटेड, 1997 के मामले में कहा गया है कि जब परिवादी ने सही शेयरो के आवंटित न किये जाने के बाबत प्रतिकर का दावा करने वाला एक परिवाद संस्थित किया; तब प्रतिवादी कम्पनी हालांकि स्वयमेव जिला फोरम के समय हाजिर नहीं बल्कि उसने अपनी ओर से लिखित टिप्पणियों प्रेषित कर दी।

इन सभी परिस्थितियों में जिला फोरम ने परिवादी के पक्ष में फैसला नहीं दिया और जिसके परिणामस्वरूप, परिवादी ने जिला फोरम के निर्णयादेश के विरुद्ध अपील दायर की अपीलीय राज्य आयोग ने भी अपील खारिज कर दी।

परिणामतः राज्य आयोग के निर्णय के विरुद्ध राष्ट्रीय आयोग में पुनरीक्षण याचिका दायर किये जाने पर राष्ट्रीय आयोग ने निर्णीत किया कि राज्य आयोग द्वारा परिवादी की इस प्रतिपादन को खारिज किया जाना विधिसंगत है कि किसी प्रतिरक्षा के अभाव में फोरम परिवादी के पक्ष में परिवाद का निस्तारण करने के लिए आवद नहीं था।

बैंक सेवाएं:-

जिला फोरम या राज्य आयोग को अन्य बातों के साथ-साथ इस निष्कर्ष को अभिलिखित करना पड़ता है कि सेवा के बारे में परिवाद में अन्तर्विष्ट किये गये अभिकथनों में किसी को भी साबित किया जाता है। अतएव, विनिश्चय सेवा में कमी के बारे में परिवाद में अन्तर्विष्ट किये गये अभिकथनों विशिष्ट अभिकथनों, इसके समर्थन में साध्यिक तात्विकता एवम् क्या इसे स्थापित किया जाता या नहीं? आदि का उल्लेख किया जाना होता है।

निवारण फोरम सिविल न्यायालय नहीं हो सकती है बल्कि निश्चित रूप में अधिनियम के अधीन स्थापित की गयी अर्ध-न्यायिक अभिकरण है और अधिनियम के अधीन जिन कर्तव्यों का उन्मोचन किया जाना होता है; अर्ध न्यायिक प्रकृति के होते हैं। प्रत्येक अर्ध-न्यायिक आदेश को कारणों से युक्त होना चाहिए।

विवादों को निपटारे का उद्देश्य:- जिला फोरम और राज्य आयोग के समक्ष मामले का लम्बित होना उन पक्षकारों को अनुचित परेशानी पैदा कर देता है जो जिला फोरम के समक्ष सफलता प्राप्त करते हैं और अपीलों के लम्बित रहने के मात्र आधार पर आदेशों को निभादन की मांग करने में सफल होने वाले पक्षकार को असमर्थ बना देते हैं और इसलिए उच्च न्यायालय से ऐसी परेशानियों को दूर करने के लिए अधिनियम में समुचित संशोधन किये जाने की सलाह दी है।

लिखित कथन उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 32 लिखित कथन-परिसीमा-जहां की धारा 13 के अधीन यथाविहित 45 दिनों की कालावधि के अन्दर नहीं दाखिल किया गया, वह वर्ष के रूप में 50,000/- रू0 की प्रतिकर की रकम का प्रत्येक को संदाय करने वाले अपीलार्थी के अध्यधीन रहते हुए अभिलेख पर पहले से ही लायी गयी समझी जायेगी।

एकपक्षीय आदेश के विरुद्ध अपील की पोषणीयता- एक मामले में विरोधी पक्षकार को राज्य आयोग द्वारा नोटिस भेजी गयी और तीन दिनों के अन्दर जवाब दाखिल करने के लिए कहा गया। राज्य योग ने एकपक्षीय आदेश पारित कर दिया।

जब एकपक्षीय आदेश के विरुद्ध अपील दायर की स्त्री तब यह सुझाव देने के लिए कोई साक्ष्य नहीं था कि एक प्रति विरोधी पक्षकारों को प्रदत्त की गयी थी तब विरोधी पक्षकारों को कार्यवाही में हाजिर होने के लिए अनुज्ञात किया जाना चाहिए और इसलिए एकपक्षीय आदेश को अपास्त कर दिया और अपील अनुज्ञात कर दी गयी।

जहां उच्चतम न्यायालय को सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 के आदेश नियम 9 (1) के समरूप कोई नियम नहीं प्रदर्शित किया गया है, वहां वैसा होने के कारण तथा उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय को देखते हुए जिससे उच्चतम न्यायालय को असहमत होने का कारण नहीं है, यह अभिनिर्धारित किया गया कि अपीलार्थी द्वारा दाखिल किया गया दूसरा परिवाद इस के तथ्यों पर पोषणीय था।

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