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भारत का संविधान (Constitution of India) भाग 2: भारत और भारत की नागरिकता

Shadab Salim
11 Jan 2021 7:15 AM GMT
भारत का संविधान (Constitution of India) भाग 2: भारत और भारत की नागरिकता
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भारत के संविधान से संबंधित पिछले आलेख में भारत के संविधान की आधारभूत बातों के संबंध में चर्चा की गई थी। इस आलेख में भारत के संविधान के अध्याय-1 और अध्याय-2 के संबंध में चर्चा की जा रही है। पहला अध्याय भारत क्या है! इसके संबंध में उल्लेख करता है और दूसरा अध्याय भारत की नागरिकता के संबंध में उल्लेख करता है।

भारत संघ और उसका राज्य क्षेत्र

संविधान में भारत को संघ नाम से संबोधित किया गया है। केंद्र के संबंध में संघ कहा जाता है और राज्यों के संबंध में राज्य कहा जाता है। एक राज्य शब्द संपूर्ण भारत के लिए भी उपयोग किया जाता है।

भारत के संविधान के पहले भाग के अनुच्छेद 1 से लेकर 4 तक संघ और उसके के राज्य क्षेत्र के संबंध में उल्लेख किया गया है। भारत के संविधान का सबसे पहला अनुच्छेद भारत का उल्लेख कर रहा है। संविधान में भारत के प्रभुत्वसंपन्न लोकतांत्रिक गणराज्य के राज्यों का संघ घोषित किया गया है।

विभाजन के पश्चात केंद्र युक्त परिसंघ की स्थापना का उद्देश्य राजनीतिक प्रशासनिक दोनों ही रहा है फिर भी संविधान को पूरी तरह परिसंघात्मक नहीं बनाया जा सका। संविधान सभा के अनुसार संघ को परिसंघ कहना आवश्यक नहीं था।

संविधान का प्रारूप प्रस्तुत करते हुए संविधान प्रारूप समिति के अध्यक्ष श्री डॉक्टर भीमराव अंबेडकर द्वारा कहा गया- भारतीय संविधान संरचना की दृष्टि से परिसंघ हो सकता है किंतु कुछ निश्चित उद्देश्य से समिति ने इसे संघ कहा है इसलिए भारत को संघ नाम से संबोधित किया जाता है।

संविधान सभा में कहे गए शब्दों के उद्देश्य अमेरिकी संघवाद की भांति भारत का संघवाद राज्य की इकाइयों के बीच परस्पर करार का परिणाम नहीं है। राज्यों को स्वेच्छानुसार परिसंघ से प्रथक होने का अधिकार नहीं दिया गया है। डॉक्टर अंबेडकर ने संघ शब्द का आशय कुछ इस प्रकार व्यक्त किया है- यद्यपि भारत को एक फेडरेशन होना था लेकिन यह फेडरेशन राज्यों के बीच हुए करार का परिणाम न था और न किसी राज्य को फेडरेशन से अलग होने का अधिकार ही दिया गया है, फेडरेशन एक संघ है क्योंकि यह कभी समाप्त नहीं होगा।

प्रशासन की सुविधा के लिए संपूर्ण देश और इसके निवासी एक ही स्त्रोत से अद्भुत सर्वोच्च शक्ति के अधीन रहने वाले व्यक्ति हैं। राज्यों को इस संघ से पृथक होने का कोई अधिकार नहीं है। भारत को बनाते समय संविधान निर्माताओं ने भारत के अनुच्छेद 1 के अंतर्गत स्पष्ट कर दिया है कि राज्य है तो सही पर संघ प्रमुख होगा।

भारत का राज्य क्षेत्र

भारत के संविधान का अनुच्छेद-2 भारत राज्य क्षेत्र का उल्लेख कर रहा है। जिसके अनुसार राज्यों के राज क्षेत्र, संघ राज्य क्षेत्र और सरकार द्वारा अर्जित राज्य क्षेत्र का उल्लेख है। संविधान के सातवें संशोधन अधिनियम 1956 के पूर्व संघ से संबंध राज्यों की चार श्रेणियां थी। प्रथम अनुसूची में भाग 1 और भी संघ राज्य आते थे और अर्जित किए गए राज्य क्षेत्रों को भाग द में रखा गया था।

इस प्रकार संविधान के सातवें संशोधन अधिनियम 1956 के प्रवर्तन के समय भाग्य 1 राज्य भाग 2 संघ राज्य और भाग द में 1 राज्य सम्मिलित थे। संविधान संशोधन अधिनियम 1956 ने उक्त तीनों वर्गों को समाप्त कर दिया। संघ के अधीन सभी राज्यों को राज्यपाल द्वारा एक ही कर दिया। इस अधिनियम के बाद भारत के राज्य अलग हो गए तथा संघ राज्य क्षेत्र अलग हो गए। अब तक भारत के राज्यों की संख्या 29 तथा संघ राज्य क्षेत्र की संख्या 7 है।

भारत के संविधान के अंतर्गत नए राज्यों की स्थापना

भारत के संविधान के अनुच्छेद 2 के अंतर्गत संसद ऐसे निर्बंधन और शर्तों के साथ जिन्हें उचित समझे संघ में नए राज्यों का प्रवेश या स्थापना कर सकती है। इस प्रकार अनुच्छेद 2 के अधीन संसद को दो प्रकार की शक्ति प्राप्त है।

एक नए राज्यों को संघ में शामिल करने की शक्ति और दूसरी नए राज्यों को स्थापित करने की शक्ति। संसद की इस शक्ति से भारत में परिसंघ कमजोर होता है परंतु भारत की अखंडता मजबूत होती है।

राज्यों का प्रवेश या उसकी स्थापना ऐसे निर्बंधन और शर्तों के अनुसार किया जाता है जिन्हें संसद उचित समझे। भारत का संविधान अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के संविधान में अंतर रखता है। उन दोनों संविधान में राज्यों की समानता का सिद्धांत अपनाया गया है। अमेरिका के प्रत्येक राज्य सीनेट के लिए समान संख्या में अपने प्रतिनिधि भेजता है प्रत्येक राज्य सीनेट में दो प्रतिनिधि भेजता है।

संघ में कांग्रेस द्वारा शामिल किए गए राज्यों के विषय में भी समानता का सिद्धांत लागू होता है। राज्यों के विधान मंडल और साथ ही साथ कांग्रेश की समाप्ति के बिना संघ के अधीन राज्य की सीमा में कोई परिवर्तन नहीं किया जा सकता है। अमेरिकी फेडरेशन विभिन्न स्वतंत्र राज्यों के बीच हुए करार का परिणाम है इसलिए राज्यों के विधान मंडलों की सहमति के बिना करार में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं किया जा सकता लेकिन भारतीय फेडरेशन स्वतंत्र राज्यों के बीच हुए करार का परिणाम नहीं है।

भारतीय संघ में शामिल होने वाली इकाइयां उस अर्थ में प्रभुत्व संपन्न और स्वतंत्र नहीं थी जिस अर्थ में अमेरिकी फेडरेशन के पहले उसके उपनिवेश थे। संविधान के लागू होने के समय और उसके बाद संविधान के अनुच्छेद 3 के अंतर्गत स्थापित किसी वर्तमान राज्य और किसी नए राज्य को भारत संघ में संविधान के अनुच्छेद 3 के अंतर्गत स्थापित किसी राज्य वर्तमान राज्य वह किसी ने राज्य को भारतीय संघ में शामिल किए जाने पर संविधान द्वारा उन्हें स्थल नहीं प्रदान किया गया है।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद के अंतर्गत संसद की शर्तों पर दशाओं के अधीन नए राज्यों को भारतीय संघ में शामिल करने स्थापित करने की पूरी छूट है। किसी नए राज्य को स्वीकृत करने वर्तमान राज्यों की सीमा में परिवर्तन करने के पश्चात उसे प्रभावी बनाने के लिए संसद सामान्य बहुमत द्वारा संविधान में आवश्यक परिवर्तन कर सकती है।

उपर्युक्त की पूर्ति के लिए संसद द्वारा पारित कोई भी विधि अनुच्छेद 368 के प्रयोजन के लिए संविधान का संशोधन नहीं समझी जाएगी।

भारत का संविधान अनुच्छेद 3 के अंतर्गत भारत की संसद को नए राज्यों की स्थापना वर्तमान राज्यों क्षेत्र सीमा के नामों में परिवर्तन करने की शक्ति देता है। अनुच्छेद 3 के अधीन राज्यों की स्थापना की जा सकती है किसी भी वर्तमान राज्य में उसका देश अलग करके जब दो या दो से अधिक राज्यों को मिलाकर एक राज्य किया जा सकता है।

किसी राज्यों के भागों को मिलाकर कोई नया राज्य बनाया जा सकता है, किसी प्रदेश को किसी राज्य के साथ मिलाकर कोई राज्य बनाया जा सकता है।

भारत की संसद भारत के संविधान के अनुच्छेद 3 के अंतर्गत किसी भी राज्य का राज्य क्षेत्र बड़ा भी सकती है तथा किसी भी राज्य का क्षेत्र घटा भी सकती है। किसी राज्य की सीमाओं को बदल भी सकती है किसी राज्य के नाम को बदल सकती है। अनुच्छेद 3 के अंतर्गत नए राज्यों की स्थापना वर्तमान राज्यों के भागों को मिलाकर की जा सकती है।

अनुच्छेद के अंतर्गत नए राज्यों की स्थापना नए राज्य क्षेत्र को अर्जित करके की जा सकती है, अनुच्छेद 3 में प्रयुक्त शब्द राज्य के अंतर्गत संघ राज्य क्षेत्र भी सम्मिलित है।

भारत का संविधान राज्य और क्षेत्र सीमाओं को बिना उनकी सहमति के परिवर्तित करने का अधिकार संसद को देता है। संसद सामान्य बहुमत से विधि बनाकर नए राज्यों को बना सकती है वह वर्तमान राज्यों के क्षेत्र सीमा और नामों में परिवर्तन कर सकती है।

ऐसी विधि बनाने की प्रक्रिया किसी नए राज्य के निर्माण में वर्तमान राज्य की सीमाओं में परिवर्तन के लिए कोई विधेयक बिना राष्ट्रपति की सिफारिश के संसद के किस सदन में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता और यदि विधायक किसी राज्य के क्षेत्र सीमा और नाम में परिवर्तन प्रस्तावित है तो राष्ट्रपति उक्त राज्य के विधान मंडल को विधायक विचार के लिए भेज सकता है। विधानमंडल को राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित समय के अंदर अपने विचारों को व्यक्त करते हुए विधायक को वापस कर देना चाहिए।

जम्मू और कश्मीर राज्य को घटाने बढ़ाने या उसके नाम है सीमा में परिवर्तन करने वाला विधायक उस राज्य के विधान मंडल की सहमति के बिना संसद में पेश नहीं किया जा सकता। राष्ट्रपति उक्त अवधि को बढ़ा भी सकता है यदि राज्य विधान मंडल जिसको की विधायक भेजा गया है इस प्रकार निर्धारित यह बड़ी हुई अवधि के भीतर विधायक पर अपने विचार व्यक्त नहीं करता।

राष्ट्रपति विधेयक को संसद में प्रस्तुत कर सकता है यदि निर्धारित बढ़ी हुई अवधि के अंदर राज्य विधानमंडल अपना विचार उसमें विधायक व्यक्त कर देता है संसद राज्य विधान मंडल के विचारों को स्वीकार करती है उसके अनुसार कार्य करने के लिए नहीं है।

भारत के संविधान के अनुच्छेद तीन का अध्ययन करने से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि भारत के संविधान को भले ही परिसंघ कहा जाए बाकी भारत के राज्य संघ के सामने अधिक शक्तिशाली नहीं क्योंकि भारत की संसद को स्पष्ट रूप से शक्ति दे दी गई है कि वह किसी भी राज्य को बना दे तथा किसी भी राज्य को समाप्त कर दें।

मगन भाई बनाम भारत संघ एआईआर 1969 उच्चतम न्यायालय 678 के मामले में भारत और पाकिस्तान के बीच कच्छ क्षेत्र की सीमाओं के समायोजन के प्रश्न को एक अंतरराष्ट्रीय अधिकरण को सौंपने के लिए करार किया गया था।

सरकार बिना विधि बनाएं इस करार को कार्यान्वित करना चाहती थी यह अभिनिर्धारित किया गया कि सीमा विवाद के अभिकरण को सौंपने के लिए किए गए करार से भारत के किसी भूभाग का किसी विदेशी राज्य को अभ्यर्पण नहीं था अर्थात इसके लिए संविधान संशोधन की कोई आवश्यकता नहीं थी।

भारत की नागरिकता

भारत के संविधान के भाग 2 के अंतर्गत भारत की नागरिकता के संबंध में उल्लेख किया गया है। इस भाग में अनुच्छेद 5 से लेकर अनुच्छेद 11 तक नागरिकता से संबंधित उल्लेख किया गया है। अध्ययन की दृष्टि से यह अत्यंत विशद विषय है परंतु इस आलेख में नागरिकता को सारगर्भित प्रस्तुत करने का प्रयास किया जा रहा है।

संविधान में नागरिकता की कोई परिभाषा उपलब्ध नहीं होती है प्राय किसी भी देश में रहने वाले निवासियों को दो वर्गों में बांटा जा सकता है नागरिक और विदेशी व्यक्ति। नागरिक जिसे कुछ सामाजिक और राजनीतिक अधिकार प्राप्त होते हैं अधिकार विदेशियों को प्रदान नहीं किए जाते हैं। नागरिकता संविधान द्वारा प्रदत्त वह अधिकार है जो केवल नागरिकों को ही प्रदान किया जाता है।

नागरिकता द्वारा प्राप्त अधिकारों का उपयोग विदेशी व्यक्ति नहीं कर सकते हैं। आज नेशन स्टेट के समय में नागरिकता का यही महत्व है। भारत का संविधान नागरिकों के मूल वंश, जाति, लिंग, जन्म स्थान के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करता है, राज्य के अधीन नौकरियों के विषय में नागरिकों में अवसर की समानता होती है अनुच्छेद 19 में उल्लेखित मूल स्वतंत्रता है जैसे भाषण में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता आवास स्वतंत्रता तथा धंधे की स्वतंत्रता नागरिकता के माध्यम से प्राप्त है।

भारत के संविधान में नागरिकता से संबंधित संपूर्ण विधान उपलब्ध नहीं है। भारत के संविधान के इस भाग के अंतर्गत भारत की संसद को नागरिकता से संबंधित कानून बनाने की शक्ति दी गई है। संविधान का भाग केवल उन वर्गों के लोगों के बारे में उल्लेख करता है जो संविधान के लागू होने के समय 26 जनवरी सन 1949 ईस्वी को भारतीय नागरिक माने गए थे और नागरिकता से संबंधित सभी बातों के लिए संसद को कानून बनाने की शक्ति दे दी गई है।

यदि भारत की नागरिकता से संबंधित संपूर्ण विधि का अध्ययन करना है तो इसके लिए नागरिकता अधिनियम 1955 का अध्ययन किया जाना आवश्यक है।

भारत संविधान के प्रारंभ होने पर कुछ व्यक्तियों को भारत का नागरिक माना गया था जिनका यहां पर उल्लेख कर दिया जाना आवश्यक है-

अधिवास द्वारा नागरिकता

पाकिस्तान से प्रब्रजन कर के आए हुए व्यक्तियों को नागरिकता

भारत से पाकिस्तान को प्रब्रजन करने वालों की नागरिकता

विदेशों में रहने वाले लोगों की नागरिकता

भारत के संविधान के अनुच्छेद 5 के अंतर्गत अधिवास द्वारा नागरिकता दी गई है। इस अनुच्छेद के अनुसार संविधान के शुरू होने पर प्रत्येक व्यक्ति जिसका भारत में अधिवास है भारत का नागरिक होगा यदि वह भारत में जन्मा हो अथवा उसके माता-पिता में से कोई भी भारत में जन्मा हो अथवा जो संविधान के प्रारंभ होने से ठीक पहले कम से कम 5 वर्षों तक भारत का साधारण तौर पर निवासी रहा हो इन सभी को भारत का नागरिक मान लिया गया था।

इस प्रकार अधिवास द्वारा नागरिकता प्राप्त करने की पहली शर्त यह थी कि व्यक्ति भारत में अधिवास होना चाहिए दूसरी शर्त यह थी कि वह व्यक्ति अनुच्छेद द्वारा निर्धारित 3 में से 1 शर्त पूरी कर रहा हो जैसे वह भारत में जन्मा हो, उसके माता पिता में से कोई भारत में जन्मा हो, वह संविधान के प्रारंभ होने के ठीक पहले कम से कम 5 वर्ष तक भारत में साधारण रूप से रहा हो।

प्रदीप जैन बनाम भारत संघ एआईआर 1984 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया है कि अनुच्छेद 5 के अधीन एक अधिवास को मान्यता है वह है भारत का निवास। भारत में राज्यों के अधिवास को मान्यता नहीं है।

भारत में राज्यों के अधिवास को मान्यता नहीं है। जब कोई व्यक्ति एक राज्य का स्थाई निवासी है दूसरे राज्यों में स्थाई या अस्थाई रूप से निवास के लिए ऐसे जाता है तो उसका अधिवास नहीं बदलता और वह नया अधिवास नहीं करता है। भारत एक परंपरागत परिसंघ ही राज्य है इसकी केवल एक नागरिकता है भारत की नागरिकता।

राज्य की कोई नागरिकता नहीं होती एक अन्य महत्वपूर्ण मामले में अधिवास शब्द की परिभाषा प्रस्तुत करते हुए कहा गया है कि वह स्थान किसी व्यक्ति का निवास स्थान कहलाता है जहां वह स्थाई रूप से निवास कर रहा हो। वह वर्तमान समय में उसे छोड़ने का कोई इरादा नहीं है, इस प्रकार अधिवास का अस्तित्व गठित करने के लिए दो बातों की आवश्यकता होती है। विशेष प्रकार का निवास विशेष प्रकार का आशय निवास के लिए आवश्यक नहीं है कि निरंतर हो परंतु इसे अवश्य ही निश्चित होना चाहिए न कि सर्वथा बदलने वाला। तात्पर्य यह है कि नागरिक उस स्थान का स्थाई रहने वाला हो जहां आवास से संबंधित आशय का प्रश्न है।

यह अवश्य ही वर्तमान समय में देश में हमेशा निवास का होना चाहिए। अधिवास और निवास दोनों भिन्न-भिन्न स्थितियां है केवल किसी स्थान पर किसी व्यक्ति के रहने के कारण उसका निवास स्थान नहीं हो जाता अधिवास के लिए निवास के साथ-साथ उस स्थान को अपना स्थाई घर बनाने का आशय होना चाहिए।

भारत के संविधान के अंतर्गत भारत के नागरिकों को केवल एकल नागरिकता प्राप्त है अर्थात सारे विश्व में केवल भारत की नागरिकता होना चाहिए। किसी भी व्यक्ति को दोहरी नागरिकता नहीं दी जाती है यदि कोई व्यक्ति नागरिक होना चाहता है तो वह केवल भारत का नागरिक रहेगा भारत के साथ किसी अन्य देश का नागरिक नहीं हो सकता।

मोहम्मद रजा बनाम स्टेट ऑफ़ मुंबई के मामले में अपीलार्थी भारत आया था। सन 1946 में वह हज करने इराक गया था। इराक से लौटने के बाद उसका नाम एक विदेशी के रूप में रजिस्टर कर दिया और अनेक बार सरकार उसके भारत में रहने की अवधि को बढ़ाती रही अंत में सन 1957 में अवधि वृद्धि की उसकी प्रार्थना को अस्वीकृत कर दिया गया। उसने दावा किया कि अनुच्छेद 5 के अंतर्गत उसे नागरिक माना जाए।

न्यायालय ने निर्णय दिया कि यदि वह साधारण रूप से भारत में रह रहा था लेकिन उसने भारत की नागरिकता अर्जित नहीं की थी क्योंकि भारत में उसका अधिवास नहीं था उसकी गतिविधियों से स्पष्ट था कि उसका आशय भारत में स्थाई रूप से रहने का नहीं था। बार-बार समय बढ़ाने का आवेदन करना इसका प्रत्यक्ष परिणाम था उसका एक तारीख के इराक से लौटने के बाद उसने भारत में नौकरी कर ली।

यह प्रमाणित नहीं करता कि उसके मस्तिष्क में भारत में स्थाई रूप से रहने का अंत हो गया था न्यायालय के अनुसार अधिवास तब तक व्यक्ति से संबंध रहता है जब तक कि मूल अधिवास को पुनः प्राप्त न कर लिया जाए या नया अधिवास न अर्जित कर लिया जाए।

संपूर्ण भारत के लिए केवल एक नागरिकता है। भारत में एक परिसंघीय व्यवस्था की स्थापना की गई है परंतु फिर भी नागरिकता एक ही है। राज्य की कोई अलग से नागरिकता नहीं होती है प्रत्येक नागरिक को नागरिकता से अद्भुत व सभी अधिकार विशेष अधिकार प्राप्त है चाहे वह देश के किसी भी प्रांत के निवासी हो। भारत में स्थिति अमेरिका से भिन्न है अमेरिकन संविधान में परिसंघीय सिद्धांत को कठोरता से लागू किया गया है।

अमेरिका में दोहरी नागरिकता है एक तो संघ की नागरिकता और दूसरी उस राज्य की नागरिकता जहां व्यक्ति पैदा हुआ हो और स्थाई रूप से निवास कर रहा है। दोनों प्रकार के अधिकार और कर्तव्य नागरिकों को प्राप्त होते हैं।

भारत में कुछ ऐसा प्रावधान नहीं है, इसका मुख्य कारण है कि हमने देश की अखंडता को बनाए रखने का प्रयास किया है, यह प्रयास संविधान में किया है। भारत में केवल मनुष्य को ही नागरिक माना गया है किसी प्रकार का निकाय नागरिक नहीं होता है।

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