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भारत का संविधान (Constitution of India) भाग 18: भारत के संविधान के अंतर्गत पंचायतें और नगरपालिकाएं

Shadab Salim
22 Feb 2021 3:21 PM GMT
भारत का संविधान (Constitution of India) भाग 18: भारत के संविधान के अंतर्गत पंचायतें और नगरपालिकाएं
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भारत के संविधान से संबंधित पिछले आलेख में संविधान में उल्लेखित राज्य न्यायपालिका के संबंध में राज्यों के उच्च न्यायालय पर कुछ विशेष जानकारियों को लेकर चर्चा की गई थी, इस आलेख में भारत के संविधान के भाग 9 से संबंधित ग्राम पंचायतें और नगरपालिका पर विमर्श किया जा रहा है।

पंचायतें

भारत के संविधान ने समाज की अंतिम पंक्ति तक लोकतंत्र को भेजने के प्रयास किए हैं। संविधान के भाग 9 संविधान के 73वें संशोधन और भाग 9(ए) संविधान के 74 वें संशोधन अधिनियम 1992 द्वारा संविधान में जोड़े गए हैं।

संविधान के 73वें संशोधन के द्वारा पंचायती राज संस्थाओं और 74 वें संविधान संशोधन द्वारा नगर पालिका लोकतांत्रिक प्रणाली की स्थापना को संवैधानिक मान्यता प्रदान की गई है। संविधान में अनुच्छेद 40 के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद इस दिशा में समुचित कदम नहीं उठाए गए थे, स्वायत्त शासन की इकाइयों के रूप में ग्राम पंचायतों की स्थापना के लिए महात्मा गांधी भी प्रयासरत रहे हैं और उन्होंने भी इस पर बल दिया था।

अंत में लंबे विलंब के बाद 73 व 74 वें संविधान संशोधन द्वारा इन ग्राम पंचायतों और नगर पालिकाओं की स्थापना और उन्हें संविधानिक मान्यता प्रदान कर 1 साल में कार्य किया गया संविधान के 73 74 वें संशोधन अधिनियम द्वारा पंचायतों और नगर पालिकाओं के स्तर पर लोकतंत्र को संवैधानिक मान्यता प्रदान की गई है।

प्रत्येक राज्य में ग्राम पंचायतों में नगर पालिका की स्थापना की गई थी किंतु इसकी स्थापना और चुनाव राज्य विधान मंडल द्वारा निर्मित अधिनियम के अधीन की जाती है।

संविधान के भाग 9 अनुच्छेद 243 (ए) से लेकर अनुच्छेद 243(ओ) तक पंचायतों से संबंधित प्रावधानों का उल्लेख किया गया है। सन 1992 में संविधान संशोधन करके भाग 9 जोड़ा गया है। इस भाग में 16 नए अनुच्छेद और एक नई अनुसूची जोड़ी गई है। इस भाग में ग्रामों में पंचायतों के गठन उनके निर्वाचन शक्तियों और उत्तरदायित्व के लिए पर्याप्त उपबंध किए गए हैं।

अनुच्छेद 243 यह कहता है कि गांव सभा के स्तर पर ऐसी शक्तियों का प्रयोग किया जाएगा और ऐसे कार्यों को किया जाएगा जो राज्य विधानमंडल विधि बनाकर उपबंध करें। अनुच्छेद 243(ए) कहता है कि प्रत्येक राज्य में ग्राम स्तर मध्यवर्ती उच्च स्तर पर पंचायतों का गठन किया जाएगा किंतु उस राज्य में जिस की जनसंख्या 2000000 से अधिक नहीं है वहां मध्यवर्ती स्तर पर पंचायतों का गठन करना आवश्यक नहीं होगा।

अनुच्छेद 243 के अधीन राज्य विधानमंडल को विधि द्वारा पंचायतों की संरचना के लिए उपबंध करने की शक्ति प्रदान की गई है परंतु किसी भी स्तर पर पंचायत के प्रादेशिक क्षेत्र की जनसंख्या और इसी पंचायत में निर्वाचन द्वारा भरे जाने वाले स्थानों की संख्या के बीच अनुपात समस्त राज्य में एक ही होगा।

पंचायतों के सभी स्थान पंचायत राज क्षेत्र के प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्र से प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा चुने गए व्यक्तियों से भरे जाएंगे। इस प्रयोजन के लिए प्रत्येक पंचायत क्षेत्र को ऐसे रीति से निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजित किया जाएगा कि निर्वाचन क्षेत्र की जनसंख्या और उसको आवंटित करने की संख्या के बीच अनुपात समस्त पंचायत क्षेत्र में एक ही होगा।

अनुच्छेद 243 के अनुसार प्रत्येक पंचायत में अनुसूचित जातियों अनुसूचित जनजातियों के लिए स्थान आरक्षित रहेंगे। इसे आरक्षित स्थानों की संख्या उसी अनुपात में होगी जो उस पंचायत में प्रत्यक्ष निर्वाचन से भरे गए स्थानों का अनुपात है और उसका निर्धारण उस क्षेत्र की उनकी जनसंख्या के आधार पर किया जाएगा। ऐसे स्थानों को प्रत्येक पंचायतों के चक्र अनुक्रम से आवंटित किया जाएगा।

पंचायतों का कार्यकाल 5 वर्ष का होगा, इसके पूर्व भी उनका विघटन किया जा सकता है। किसी पंचायत के गठन के लिए निर्वाचन 5 वर्ष की अवधि के पूर्व और विघटन की तिथि से 6 माह की अवधि के अवसान से पूरा करा लिया जाएगा परंतु ऐसी अवधि 6 मार्च से कम है जिसकी अवधि का विघटित पंचायत रहती है तो इसी पंचायत का गठन करने के लिए निर्वाचन कराना आवश्यक होगा।

जहां अवधि की समाप्ति से पूर्व पंचायत के गठन के लिए निर्वाचन किया जाता है तो वह केवल शेष अवधि के लिए बनी रहे जिस अवधि के लिए पंचायत खंड 4 से विघटित नहीं की जाती है बनी रहती है।

पंचायतों की शक्तियां, अधिकार और उत्तरदायित्व

भारत के संविधान के अनुच्छेद 243 (जी) उपबंधित करता है कि संविधान के उपबंधों के अधीन रहते हुए राज्य का विधान मंडल विधि द्वारा पंचायतों को ऐसी शक्तियां और प्राधिकार प्रदान कर सकता है जो उन्हें स्वायत्त शासन की संस्थाओं के रूप में कार्य करने योग्य बनाने के लिए आवश्यक समझे और ऐसी निजी पंचायत को उपयुक्त स्तर पर ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए जैसी उसमें विनिर्दिष्ट की जाए-

आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय के लिए योजनाएं तैयार करना और आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय की स्कीमों को जो उन्हें सौंपी जाए जिनके अंतर्गत वे स्कीम भी हैं जो 11वीं अनुसूची में सूचीबद्ध विषयों से संबंधित हैं क्रियान्वित करना मुख्य कार्य है।

ग्यारहवीं अनुसूची के अंतर्गत इस उद्देश्य से संविधान में कुछ शक्तियां ग्राम पंचायतों को दी गई और ग्राम पंचायतों को यह शक्तियां देने के उद्देश्य से ही 11वीं अनुसूची संविधान में जोड़ी गई। इस अनुसूची के अंतर्गत ऐसे विषयों का वर्णन किया गया है जिन पर पंचायतों को विधि बनाने की शक्ति प्रदान की गई है।

वह विषय निम्नलिखित हैं, जैसे-

कृषि और कृषि विस्तार, भूमि सुधार, चकबंदी, भूमि अनुरक्षण, लघु सिंचाई ,जल प्रबंधन, पशुपालन, दूध उद्योग, मुर्गी पालन, मत्स्य उद्योग, सामाजिक वन उद्योग, लघु वन उद्योग, लघु उद्योग जिसमें खाद्य प्रसंस्करण उद्योग भी शामिल है, सड़क और पुल, पुलिया, घाट, जलमार्ग तथा अन्य साधन, ग्रामीण बिजली, गैर पारंपरिक ऊर्जा स्त्रोत, गरीबी उपशमन कार्यक्रम, शिक्षा जिसमें प्राइमरी और माध्यमिक विद्यालय भी हैं, तकनीकी प्रशिक्षण और व्यवसायिक शिक्षा, पूर्ण और अनौपचारिक शिक्षा, पुस्तकालय, सांस्कृतिक क्रियाकलाप, बाजार और मेले, स्वास्थ्य, स्वच्छता जिसमें अस्पताल प्रथमिक स्वास्थ्य केंद्र औषधालय भी हैं, परिवार कल्याण, स्त्री और बाल विकास, समाज कल्याण जिसमें विकलांग और मानसिक रूप से विकलांग भी शामिल हैं, जनता के कमजोर वर्गों का विशेष रूप से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों का कल्याण, लोक प्रणाली सामुदायिक कार्यो का अनुरक्षण।

इस प्रकार ग्राम पंचायतों को इतने सारे विषयों पर विधि बनाने की शक्तियां प्रदान की गई है। भारत के अलग-अलग राज्यों ने अपने अपने पंचायती राज अधिनियम बनाए हुए हैं।

अनुच्छेद 243 द्वारा पंचायतों पर बहुत बड़ा दायित्व सौंपा गया है। इस दायित्व की सफलता के लिए गांव में रहने वाले लोगों का शिक्षित होना अत्यंत आवश्यक है, अभी इसका बहुत अभाव है। पंचायती राज संस्थाओं की सफलता और असफलता बहुत कुछ इस पर ही निर्भर है यदि हम पंचायती राज संस्थाओं की स्थापना निर्वाचन की पूर्ति के लिए कर रहे हैं तो उसकी सफलता संदिग्ध है।

अनुच्छेद 243 भाग 9 के उपबंध संघ राज्य क्षेत्रों को लागू होंगे और संघ राज्य क्षेत्रों को उनके लागू होने में उनका यह प्रभाव होगा मानो वह राज्य के राज्यपाल के प्रति निर्देश अनुच्छेद 239 के अधीन नियुक्त किए गए है। संघ राज्य क्षेत्र के प्रशासक के प्रति निर्देश हैं और राज्य के विधान मंडल और विधानसभा के प्रतिनिधि उस संघ राज्य क्षेत्र के संबंध में जिसमे विधानसभा है उस विधानसभा के प्रति निर्देश है।

नगरपालिकायें

जिस प्रकार ग्रामों के लिए अंतिम लोकतंत्र की व्यवस्था पंचायतों के माध्यम से की गई है इसी प्रकार शहरों के लिए नगरपालिकाओं का उल्लेख है।संविधान 74वां संशोधन अधिनियम 1992 द्वारा नगरों में भी लोकतांत्रिक प्रणाली को सफल बनाने का प्रयास किया गया है।

नगरों में श्वेत संस्थाओं की स्थापना की गई है किंतु विभिन्न कारणों से कमजोर प्रभावहीन हो गई है इनके चुनाव समय पर नहीं कराए जाते हैं अधिकांश में निलंबित रहती हैं। वह प्रशासक द्वारा शासित होती है।

इन सब बातों को सुनिश्चित करने के लिए उन संस्थाओं के लिए जोड़ा गया है। इसमें एक नई अनुसूची जोड़ी गई जिससे बारहवीं अनुसूची कहा जाता है जिसमें उन विषयों का उल्लेख किया गया है जिन पर नगर पालिका ने कानून बनाकर अपने नागरिकों का जीवन बेहतर कर सकती है।

अनुच्छेद 243 यह कहता है कि इस भाग के उपबंधों के अनुसार प्रत्येक राज्य में नगर पालिकाओं का गठन किया जाएगा। किसी संक्रमणशील क्षेत्र के लिए अर्थात ग्रामीण क्षेत्र से नगरी क्षेत्र में संक्रमणशील क्षेत्र के लिए एक नगर पंचायत चाहे जो नाम हो किसी लघुता क्षेत्र के लिए नगर पालिका परिषद और किसी बड़े नगरी क्षेत्र के लिए नगर निगम नगर की स्थापना ऐसे नगरों के लिए की जाएगी जो ग्रामीण से नगर में परिवर्तित होने की दशा में है।

नगर परिषद छोटे नगरों के लिए बनाई जाएगी और नगर पालिका है बड़े नगरों के लिए गठित की जाएगी परंतु नगर क्षेत्रों या उसके किसी भाग के लिए नगर पालिका का गठन नहीं किया जाएगा जिसे राज्यपाल उस क्षेत्र के आकार को उचित रूप में स्थगित औद्योगिक संस्थान के द्वारा उत्पन्न की गई।

राज्यपाल प्रस्तावित नगर पालिका सेवाओं को या अन्य किसी बात को ध्यान में रखते हुए उचित समझता है लोक अधिसूचना द्वारा ऐसे क्षेत्र को एक औद्योगिक शहर के रूप में विनिर्दिष्ट कर सकता है।

इस अनुच्छेद के अंतर्गत संक्रमणशील लघुतर नगरी क्षेत्र और बड़े नगरी क्षेत्र से अर्थ ऐसे क्षेत्र से हैं जिसे किसी राज्य की सरकार उस क्षेत्र की जनसंख्या की सघनता स्थानीय प्रशासन के लिए प्राप्त राजस्व कृषि स्तर क्रियाकलापों के नियोजन की प्रतिशतता आर्थिक महत्व या ऐसी ही अन्य बातों को जिसे वह ठीक समझे ध्यान में रखते हुए लोक अधिसूचना द्वारा इस भाग के प्रयोजन के लिए विनिर्दिष्ट करें।

नगर पालिका क्षेत्र से अर्थ नगर पालिका के ऐसे क्षेत्र से हैं जिसे राज्यपाल द्वारा अधिसूचित किया जाए। नगर पालिका से अर्थ ऐसे स्वायत्त शासन की संस्था से है जिसका गठन अनुच्छेद 243 के अधीन किया जाता है।

नगर पालिकाओं की संरचना अनुच्छेद 243 यह कहता है कि खंड 2 में उपबंधित के सिवाय किसी नगर पालिका में सभी स्थान नगर पालिका क्षेत्र के पारदर्शी निर्वाचन क्षेत्रों से प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा चुने गए व्यक्तियों द्वारा भरे जाएंगे। इस प्रयोजन के लिए प्रत्येक नगर पालिका क्षेत्र को प्रदेश निर्वाचन क्षेत्र में विभाजित किया जाएगा जिसे वार्ड कहा जाएगा।

खंड 2 के अधीन राज्य का विधान मंडल विधि द्वारा एक नगर पालिका में निम्नलिखित व्यक्तियों के प्रतिनिधित्व का उपबंध कर सकता है-

ऐसे व्यक्तियों को जिसे नगर पालिका प्रशासन द्वारा विशेष ज्ञान या अनुभव है।

लोक सभा और राज्य की विधानसभा के ऐसे सदस्य जो निर्वाचन क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसमें वह नगर पालिका क्षेत्र पूर्णतः या भागतः आता है।

राज्य सभा और राज्य विधान परिषद के ऐसे सदस्य जो ऐसी नगर पालिका क्षेत्र के भीतर मतदाता के रूप में पंजीकृत हैं।

अनुच्छेद 243(घ) के खंड 5 के अधीन गठित समितियों के अध्यक्षों को खंड के अधीन निर्दिष्ट व्यक्तियों को नगर पालिका में मत देने का अधिकार नहीं होगा। राज्य का विधान मंडल विधि बनाकर नगरपालिका के निर्वाचन की रीति विहित करेगा ऐसी नगरपालिका जिसकी संख्या 300000 या उससे अधिक है पारदर्शिता क्षेत्र के भीतर एक या अधिक वार्ड को मिलाकर वार्ड समितियों का गठन किया जाएगा। राज्य का विधान मंडल विधि द्वारा निम्नलिखित की बाबत को उपबंध कर सकता है-

वार्ड समिति के क्षेत्र के भीतर किसी वार्ड का प्रतिनिधित्व करने वाला किसी नगरपालिका का सदस्य उस समिति का सदस्य होगा।

जहां कोई वार्ड समिति एक वार्ड से मिलकर बनी है वहां नगरपालिका उस वार्ड का प्रतिनिधित्व करने वाला सदस्य जहां दो से अधिक वार्ड से मिलकर बनी है वहां नगर पालिका में वार्ड का प्रतिनिधित्व करने वाला सदस्य जो वार्ड समिति द्वारा निर्वाचित किया गया है उस समिति का अध्यक्ष होगा।

नगर पालिकाओं की शक्तियां प्राधिकार उत्तरदायित्व

अनुच्छेद 243(व) कहता है कि इस संविधान के उपबंधों के अधीन रहते हुए किसी राज्य का विधान मंडल विधि बनाकर नगर पालिकाओं को ऐसी शक्तियों और अधिकार प्रदान कर सकता है जो वह उन्हें स्वयं शासन की संस्थाओं के रूप में कार्य करने योग्य बनाने के लिए आवश्यक समझे और ऐसी विधि में नगरपालिका तो ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए जैसा उसमें निर्दिष्ट किया जाए कुछ विषयों पर उपबंधों किया जा सकता है। जैसे-

आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय के लिए योजनाएं तैयार करना और ऐसे कार्यों को करना और ऐसी स्कीमों को क्रियान्वित करना जो उन्हें सौंपी जाए जिनके अंतर्गत वह स्कीमें भी शामिल हैं जो बारहवीं अनुसूची में सूचीबद्ध विषय के संबंध में है।

ऐसी विधि द्वारा समितियों को ऐसी शक्तियों पर अधिकार दिए जा सकते हैं जो उनके प्रदत उत्तरदायित्व को कार्यान्वित करने के लिए योग्य बनाने के लिए आवश्यक समझे जिसके अंतर्गत बारहवीं अनुसूची में सूचीबद्ध बातें भी है।

संविधान की 12वीं अनुसूची में निम्नलिखित 18 विषय है जिन पर नगर पालिकाओं को विधि बनाने की शक्ति प्रदान की गई । 12वीं अनुसूची के अनुसार विषय निम्नलिखित हैं-

नगर योजना जिसके अंतर्गत शहरी योजना भी है, भूमि उपयोग का विनियमन और भवनों का निर्माण, आर्थिक और सामाजिक विकास की योजना, सड़कें और पुल, घरेलू उद्योग और वाणिज्य प्रयोजनों के लिए जल प्रदाय, लोक स्वास्थ्य स्वच्छता सफाई और कूड़ा करकट प्रबंध, अग्निशमन सेवाएं, नगरी वानिकी, पर्यावरण संरक्षण, समाज के दुर्बल वर्गों के लिए जिनके अंतर्गत विकलांग और मानसिक रूप से मंद व्यक्ति है हितों की संरक्षा, गंदी बस्ती सुधार और उन्नयन, नगरीय निर्धनता कम करना, नगरी सुख सुविधाओं जैसे पार्क उधान खेलों के मैदान की व्यवस्था, सांस्कृतिक शिक्षण और सौंदर्य पर पहलुओं की अभिवृद्धि, शव गाड़ना और कब्रिस्तान श्मशान और विद्युत शवदाहगृह, बूचड़खाना का बनाया जाना, पशु क्रूरता का निवारण करना, जन्म मरण की जिसके अंतर्गत जन्म मृत्यु का रजिस्ट्रीकरण है, लोक सुख सुविधाएं जिनके अंतर्गत पथ, प्रकाश, प्रकृतिक स्थल, बस स्टॉप जन सुविधाएं हैं। वधशाला और चर्मशोधन शालाओं का विनियमन करना।

अनुच्छेद 243 के अंतर्गत ही राज्य का विधान मंडल किसी विधि द्वारा निम्नलिखित शक्तियां प्रदान कर सकता है-

ऐसी प्रक्रिया के अनुसार और इसी शर्तों और सीमाओं के अधीन रहते हुए ऐसे कर नियोजित करने के लिए प्राधिकृत कर सकता है।

ऐसे प्रयोजन के लिए ऐसी शर्त और सीमाओं के अधीन रहते हुए राज्य सरकार द्वारा उद्ग्रहीत ऐसे कर शुल्क पथकर और उसी से कोई नगरपालिका समनुदेशित कर सकता है।

नगर पालिकाओं के लिए राज्य की संचित निधि में से ऐसी सहायता अनुदानों के लिए उपबंध।

नगर पालिका द्वारा या उनकी ओर से सभी धनो के जमा करने के लिए ऐसी नीतियों का गठन तथा ऐसी नीतियों में से धन का प्रत्ययहरण करने के लिए भी उपबंध जो उस विधि में विनिर्दिष्ट की जाए।

अनुच्छेद 243 यह भी कहता है कि इस भाग में किसी बात के होते हुए भी संविधान 74वां संशोधन अधिनियम 1992 के प्रारंभ से ठीक पूर्व नगर पालिकाओं से संबंधित किसी विधि का कोई उपबंध जो इस भाग के उपबंधों से असंगत तब तक सक्षम विधान मंडल द्वारा या अन्य सक्षम प्राधिकारी द्वारा उसे संशोधित नहीं कर दिया जाता तब तक ऐसे प्रारंभ से 1 वर्ष का अवसन नहीं हो जाता या इनमें से जो भी पर्याप्त समय बना रहेगा।

इसके प्रारंभ से ठीक पूर्व विधानसभा जो नगर पालिका है उनके कार्यकाल की समाप्ति तक उस दशा में बनी रहेंगी जब तक कि उससे पूर्व उन्हें राज्य की विधानसभा द्वारा या ऐसे राज्य की दशा में जिस में विधान परिषद है उस राज्य के विधान मंडल के प्रत्येक सदन द्वारा पारित इस आशय के संकल्प द्वारा विघटित नहीं कर दिया जाता।

इस प्रकार उक्त संशोधन के लागू होने से पूर्व गठित नगर पालिका अपने कार्यकाल तक बनी रहेगी जब तक कि उन्हें विधानसभा द्वारा विधान मंडल द्वारा वितरित नहीं कर दिया जाता।

संविधान के अनुच्छेद 243 के अंतर्गत किए गए सभी उपबंध एक औपचारिक और ऊपरी उपबंध हैं जिनके माध्यम से भारत की संसद में राज्यों को एक निर्देश प्रस्तुत किया है तथा एक निर्देश दिया है कि वह इन बातों को ध्यान में रखते हुए अपने राज्यों के भीतर नगरपालिका और पंचायतों से संबंधित सभी कानूनों को सहिंताबद्ध कर ले।

भारत भर के सभी प्रांतों के अलग-अलग सरकारों ने अपने राज्य के भीतर पंचायतें और नगर पालिकाओं के लिए विधियों को तैयार किया है परंतु वे सभी विधान अधिनियम संविधान के अनुच्छेद 243(ए से ओ तक) के अंतर्गत दिए गए निर्देशों के अनुसार बनाए गए हैं। कोई भी अधिनियम संविधान के अनुच्छेद 243 के अंतर्गत दिए गए निर्देशों के विरुद्ध नहीं है।

यदि कोई विधान संविधान के अनुच्छेद 243 के अंतर्गत दिए गए निर्देशों के विरुद्ध जाता है तो इस प्रकार का विधान गैर सांविधानिक घोषित कर दिया जाता है अर्थात नगर पालिका एवं पंचायती जैसी होंगी इसके संबंध में स्पष्ट उल्लेख भारत की संसद द्वारा ही दिया गया है।

संसद ने एक निदेश प्रस्तुत कर दिया है इस निदेश के बाद राज्यों ने अपनी सुविधाओं के अनुसार अपने अधिनियम का निर्माण किया है। जैसे कि मध्यप्रदेश के लिए मध्य प्रदेश नगर पालिका अधिनियम 1992 कार्य करता है जिसके अंतर्गत नगर पालिका से संबंधित कानूनों का समावेश कर दिया गया है।

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