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सिविल प्रक्रिया संहिता,1908 भाग 6: संहिता में रेस ज्युडिकेटा का सिद्धांत

Shadab Salim
21 March 2022 4:49 AM GMT
सिविल प्रक्रिया संहिता,1908 भाग 6: संहिता में रेस ज्युडिकेटा का सिद्धांत
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सिविल प्रक्रिया संहिता,1908 (Civil Procedure Code,1908) की धारा 11 रेस ज्युडिकेटा (प्राङ् न्याय) से संबंधित है। यह एक अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत है जिसे विश्व के लोकतांत्रिक देशों के सिविल और आपराधिक कानूनों में शामिल किया गया है। इस आलेख के अंतर्गत इस सिद्धांत पर प्रकाश डाला जा रहा है, साथ ही कुछ उदाहरण भी प्रस्तुत किये जा रहे हैं।

रेस ज्युडिकेटा को संहिता की धारा 11 में परिभाषित किया गया है। धारा 11 के अनुसार-"कोई न्यायालय किसी ऐसे वाद अथवा वाद-बिन्दु का विचारण नहीं करेगा जिसके वाद-पद में वह विषय, उन्हीं पक्षकारों के मध्य अथवा उन पक्षकारों के मध्य जिनके अधीन वे अथवा उनमें से कोई उसी हक के अन्तर्गत मुकदमेबाजी करने का दावा करता है, एक ऐसे न्यायालय में जो कि ऐसे परवर्ती वाद अथवा ऐसे वाद जिसमें ऐसा वाद-बिन्दु बाद में उठाया गया है, के विचारण में सक्षम है, किसी पूर्ववर्ती वाद में प्रत्यक्ष एवं सारवान् रूप से रहा हो और सुना जा चुका है तथा अन्तिम रूप से ऐसे न्यायालय द्वारा निर्णीत हो चुका है।"

स्पष्टीकरण 1-" पूर्ववर्ती वाद" पद ऐसे वाद का द्योतक है जो प्रश्नगत वाद के पूर्व ही विनिश्चित किया जा चुका है चाहे वह उससे वाद संस्थित किया गया हो या नहीं।

स्पष्टीकरण 2. -इस धारा के प्रयोजनों के लिये न्यायालय की सक्षमता का अवधारण ऐसे न्यायालय के विनिश्चय से अपील करने के अधिकार विषयक किन्हीं उपबन्धों का विचार किये बिना किया जायेगा।

स्पष्टीकरण 3-ऊपर निर्देशित विषय का पूर्ववर्ती वाद में एक पक्षकार द्वारा अभिकथन और दूसरे अभिव्यक्त या विवक्षित रूप से प्राख्यात या स्वीकृति आवश्यक है।

स्पष्टीकरण 4- ऐसे किसी भी विषय के बारे में, जो ऐसे पूर्ववर्ती वाद में प्रतिरक्षा या आक्रमण का प्रधार बनाया जा सकता था और बनाया जाना चाहिये था, यह समझा जायेगा कि यह ऐसे वाद में प्रत्यक्षतः सारतः विवाद्य रहा है।

स्पष्टीकरण 5- वाद पत्र में दावा किया गया कोई अनुतोष, जो डिक्री द्वारा अभिव्यक्त रूप से नहीं गया है, इस धारा के प्रयोजनों के लिये नामंजूर कर लिया गया समझा जायेगा।

स्पष्टीकरण 6- जहां कोई व्यक्ति किसी लोक अधिकार के या किसी ऐसे प्राइवेट अधिकार के लिये भावनापूर्ण मुकदमा करते हैं जिसका वे अपने लिये और अन्य व्यक्तियों के लिये सामान्यतः दावा करते हैं

वहां ऐसे अधिकार से हितबद्ध सभी व्यक्तियों के बारे में इस धारा के प्रयोजनों के लिये यह समझा जायेगा कि वे ऐसे मुकदमा करने वाले व्यक्तियों से व्युत्पन्न अधिकार के अधीन दावा करते हैं।

स्पष्टीकरण 7- इस धारा के उपबन्ध किसी डिक्री के निष्पादन के लिये कार्यवाही को लागू होंगे और इस धारा में किसी वाद विवाद्यक या पूर्ववर्ती वाद के प्रति निर्देशों का अर्थ क्रमशः उस डिक्री के निष्पादन के लिये कार्यवाही, ऐसी कार्यवाही में उठने वाले प्रश्न और उस डिक्री के निष्पादन के लिये पूर्ववर्ती कार्यवाही के प्रति निर्देशों के रूप में लगाया जायेगा।

स्पष्टीकरण 8- कोई विवाद्यक जो सीमित अधिकारिता वाले किसी न्यायालय द्वारा, जो ऐसा विवाद्यक विनिश्चित करने के लिये सक्षम है, सुना गया है और अन्तिम रूप से विनिश्चित किया जा चुका है, किसी पश्चात्वर्ती बाद में पूर्व न्याय के रूप में इस बात के होते हुये भी प्रवृत्त होगा कि सीमित अधिकारिता वाला ऐसा न्यायालय ऐसे पश्चात्वतों बाद का या उस बाद का जिसमें ऐसा विवाधक बाद में उठाया गया है, विचारण करने के लिये सक्षम नहीं था।

इस प्रकार प्राङ् न्याय का सिद्धान्त (किसी न्यायालय द्वारा विनिश्चित की गई कोई बात) से या उन्हीं पक्षकारों के बीच पश्चात्वर्ती वादों में निर्णयों के जहाँ तक कि विनिश्चित बातों का सम्बन्ध है, निश्चय होने के नियम से संव्यवहार करता है।

यह एक सुविधा का नियम है न कि पूर्ण न्याय (absolute Justice) का यह एक प्रक्रिया का नियम (rule of procedure) है।

रेस ज्युडिकेटा के सिद्धान्त का मुख्य उद्देश्य व्यर्थ के वादों को रोकना है। दूसरे शब्दों में यह वादों की बहुलता (Multiplicity of suits) को प्रतिबन्धित करता है। यह उन्हीं पक्षकारों के बीच उसी अनुतोष के लिए कोई निष्पादन योग्य निर्णय हो जाने के बाद, उनके बीच किसी नये वाद को रोकता है।

यह वर्जन केवल निर्णयों के सम्बन्ध में ही नहीं है अपितु उसका विस्तार उन सब तथ्यों तक है जो कि विनिश्चय के लिए आवश्यक तथ्य के रूप में उनमें अन्तर्ग्रस्त हैं, अर्थात् कोई निर्णय उन सब निष्कर्षों के सम्बन्ध में वर्जन के रूप में प्रवर्तनशील होता है जो कि निर्णय को बनाये रखने के लिए आवश्यक है।

इस प्रकार यदि स्वीकार किये गये तथ्यों के आधार पर कोई आज्ञप्ति पारित कर दी जाती है तो प्राङ् न्याय का विस्तार केवल मामले में किये गये वास्तविक विनिश्चय तक ही नहीं होता अपितु दोनों पक्षकारों द्वारा स्वीकार किये गये तथा आज्ञप्ति की नींव बनाने वाले सामान्य तथ्यों तक भी होता है।

इसके अन्तर्गत केवल वाद का निर्णय हो अन्तिम नहीं होता अपितु उस निर्णय के आधार स्वरूप विनिर्देश एवं मौलिक वाद-विन्दु का निर्णय भी अन्तिम होता है।

यह धारा सम्पत्ति में किसी अधिकार अथवा स्वत्व का सृजन नहीं करती अपितु व्यक्तिगत वर्जन के रूप में प्रवर्तनीय होती है। यह पक्षकारों को यह सिद्ध करने से रोकती है कि निर्णय सही नहीं है।

इस प्रकार प्राङ् न्याय के सिद्धान्त का महत्वपूर्ण उद्देश्य है

(1) वाद की बहुलता (multiplicity of suits) अथवा व्यर्थ के वादों एवं मुकदमेबाजी को रोकना,

(2) किसी व्यक्ति पर एक ही वाद-कारण (Cause of action) के लिए दोबारा वाद लाने में प्रतियारित करना एवं

(3) न्यायालय के विनिश्चयों को सही एवं अन्तिम रूप प्रदान करना है।

यदि रेस ज्युडिकेटा का यह नियम नहीं होता तो व्यक्तियों के अधिकार अनन्त भ्रान्तियों में पड़ जाते और विधि की आड़ में बहुत बड़ा अन्याय हुआ होता और विधि के न्यायालयों से निर्णय बार-बार निष्प्रभावों किये गए होते।

रेस ज्युडिकेटा का सिद्धान्त जिन आधारों पर अवलम्बित है, ये निम्नलिखित है

(1) मुकदमेबाजी का अन्त

जिस प्रथम आधार पर रेस ज्युडिकेटा का सिद्धान्त अवलम्बित है, वह है-मुकदमेबाजी का अन्त किया जाना। यह राज्य का कर्तव्य है कि वह यह देखे कि मुकदमेबाजों को बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए अपितु उसे समाप्त किया जाना चाहिए

(2) दोहरे वाद से सुरक्षा

रेस ज्युडिकेटा के सिद्धान्त का दूसरा मुख्य आधार दोहरे वाद से सुरक्षा है। किसी व्यक्ति पर एक ही वाद कारण के लिए दो बार वाद नहीं लाया जाना चाहिए।

हमारे संविधान में भी दोहरे खतरे से सुरक्षा' (Double jeopardy) के रूप में इस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया है।

(3) न्यायालय के विनिश्चय को सही एवं अन्तिम बनाना

इसका तीसरा मुख्य आधार न्यायालय के विनिश्चय को सही एवं अन्तिम रूप दिया जाना है। किसी न्यायिक विनिश्चय का सही होना स्वीकार किया जाना आवश्यक है।

विधि के उपर्युक्त अपराधों एवं युक्तियों (Maxims) से रेस ज्युडिकेटा के सिद्धान्त में

(1) राज्य के हित;

(2) व्यक्तियों (मुकदमेबाजों) के हित एवं

(3) न्यायालयों के हितों की सुरक्षा की गई है।

सर्वोच्च न्यायालय ने एक वाद में रेस ज्युडिकेटा के सिद्धान्त का सुन्दर विवेचन करते हुए कहा है,

"प्राङ् न्याय का सिद्धान्त न्यायिक निर्णयों को अन्तिमता देने की आवश्यकता पर आधारित है। यह कहता है कि किसी न्यायालय द्वारा एक बार निश्चित की गई बात पर पुनः निर्णय नहीं किया जाएगा। मुख्य रूप से यह पूर्ववर्ती एवं पश्चात्वर्ती मुकदमेबाजों के बीच लागू होता है। जब एक विषय, चाहे वह तथ्यगत प्रश्नों पर हो अथवा विधिगत प्रश्नों पर एक बाद या कार्यवाही में दो पक्षकारों के मध्य निर्णात हुआ है और वह निर्णय क्योंकि या तो उच्चतर न्यायालय में कोई अपील की गई थी या क्योंकि अपील रद्द कर दी गई थी या अपील नहीं हो सकती थी, अन्तिम है तो उन्हों पक्षकारों के मध्य भविष्य में वाद अथवा कार्यवाही में किसी भी पक्षकार को उस विषय को पुनः स्थापित करने की अनुजा नहीं होगी।

रेस ज्युडिकेटा का यही सिद्धान्त वादों के सम्बन्ध में व्यवहार प्रक्रिया संहिता की धारा 11 में समाविष्ट है। परन्तु जहाँ धारा 11 लागू नहीं होती, वहाँ भी मुकदमेबाजों में अन्तिमता प्राप्त करने के प्रयोजन के लिए न्यायालयों के द्वारा इस सिद्धान्त को लागू किया जाता है। इसका यह परिणाम है कि प्रारम्भिक और साथ-साथ उच्चतर न्यायालय किसी भविष्य की मुकदमेबाजी में इस आधार पर अग्रसर होंगे कि पूर्ववर्ती निर्णय सही था।"

गुलाम अब्बास और अन्य बनाम स्टेट ऑफ यू० पी० और अन्य का मामला इस मामले में उच्चतम न्यायालय ने प्राङ् न्याय के दो मुख्य उद्देश्य बताये हैं,

(1) मुकदमेबाज का अन्त एवं

(2) पक्षकारों की दोहरे वाद से सुरक्षा

सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 11 में उल्लेखित इस सिद्धांत को निम्न उदाहरणों के माध्यम से समझा जा सकता है।

(1) अ ने ब के विरुद्ध एक पट्टे के आधार पर भाटक (rent) के लिए वाद संस्थित किया। पट्टे में भाटक 50 रुपये प्रति बीघा की दर से नियत किया गया था और उसमें एक खण्ड यह भी था कि भाटक ब के वास्तविक कब्जे में होने वाले क्षेत्र के अनुसार बढ़ता या घटता रहेगा। भाटक का दावा 50 बीघा के लिए था जो क्षेत्र के पट्टे में उल्लिखित था। ब का प्रतिवाद यह था कि उसके कब्जे में होने वाला क्षेत्र 50 बीघा से कम था। न्यायालय ने यह वाद-पद निर्धारित किया कि-"क्या ब के वास्तविक कब्जे में होने वाला क्षेत्र 50 बीघा से कम था?" अन्त में न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि ब के वास्तविक कब्जे में का क्षेत्र 50 बीघा से अधिक था।

दूसरे वाद में अ ने पट्टे में उल्लिखित क्षेत्र तथा पूर्व के वाद में अधिक पाये गये क्षेत्र के भाटक के लिए दावा किया ब ने फिर यही प्रतिवाद किया कि उसके वास्तविक कब्जे में की भूमि 10 बीघा से कम थी और यह निश्चयपूर्वक कहा कि अधिक भूमि के सम्बन्ध में कोई आज्ञप्ति पारित नहीं की जा सकती थी, क्योंकि वह पूर्व के वाद में प्रदान नहीं की गई थी और इसलिये वह प्राङ् न्याय का विषय था।

न्यायालय द्वारा यह धारण किया गया कि पहला विनिश्चय इस कारण प्राङ् न्याय नहीं था कि अधिक भाटक का दावा नहीं किया गया था। दावा पट्टे में उल्लिखित भूमि के भाटक के लिए था, न तो उससे अधिक के लिए था और न उससे कम के लिए और उस दावे में प्रतिवादी द्वारा यह अभिवचन किया गया कि पट्टे में उल्लिखित क्षेत्र से कम क्षेत्र उसके वास्तविक कब्जे में था। कोई व्यक्ति न तो सम्बद्ध था और न किसी ने अधिक क्षेत्र का अभिवचन ही किया। अधिक भूमि या तो बिल्कुल हो वादपदग्रस्त नहीं थी या कम से कम सारतः वादपदग्रस्त नहीं थी।

यदि किसी प्रकार भी भूमि का अधिक क्षेत्र वादपदग्रस्त था तो वह आनुषंगिक या साम्पाविक रूप से (incidentally or collaterally) वादपदग्रस्त था और उसे कभी भी आक्रमण या प्रतिवाद का आधार नहीं बनाया गया है

(2) अ ब के विरुद्ध दो बन्धनामों (bonds) के आधार पर वाद संस्थित करता है ब यह कथन करता है कि उन दोनों बन्धनामों तथा अन्य दो बन्धनामों की रकमों का भुगतान हो गया था। न्यायालय ब के विरुद्ध निष्कर्ष पर पहुँचता है और अ के पक्ष में एक आज्ञप्ति पारित करता है। इसके पश्चात् ब अ के विरुद्ध चारों बन्धनामों की वापसी के लिए यह अभिकथन करते हुए वाद संस्थित करता है कि उनकी रकमों का भुगतान हो चुका है और पहले याद का विचारण करने वाले न्यायालय के बाद में चारों बन्धनामों के आधार पर लाये गये वाद के विचारण का आर्थिक क्षेत्राधिकार नहीं था।

क्या यह वाद, जहाँ तक अ के बाद के दो बन्धनामों का संबंध है, वर्जित है? हाँ, क्योंकि उस याद का प्रत्येक बन्धनामा के सम्बन्ध में एक पृथक वाद समझा जाना अवश्यम्भावी है, क्योंकि उनमें से प्रत्येक बन्धनामा एक पृथक वाद की विषय-वस्तु हो सकता था। इसलिए पश्चात्वत वाद धारा 11 के प्रयोजन के लिए वास्तव में दो वादों को समाहित करता हुआ समझा जा सकेगा, जिसमें से एक अर्थात् अ के बाद में के दो बन्धनामों से सम्बन्धित वाद का विचारण करने के लिए पहले वाद का न्यायालय सक्षम था और इसलिए यह वाद, जहाँ तक कि उन बन्धनामों का सम्बन्ध है, प्राद न्याय द्वारा स्पष्ट रूप से वर्जित है।

(3) अ ब के विरुद्ध नावों के प्रदाय के लिए एक संविदा के आधार पर किसी धनराशि के लिए वाद संस्थित करता है और उसमें विफल रहने पर फिर ब के विरुद्ध नावों के प्रदाय के सम्बन्ध में की गई सेवाओं के लिए प्रतिकर (compensation) के रूप में उसी रकम के लिए वाद संस्थित करता है। यह वाद वर्जित है, क्योंकि बाद वाले आधार को पूर्ववर्ती बाद में आक्रमण के आधार के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता था।

(4) अ ब के विरुद्ध मालिक की हैसियत से संविदा के आधार पर वाद संस्थित करता है। यह वाद खारिज कर दिया जाता है। तब अ ब के विरुद्ध उसी संविदा के आधार पर अभिकर्ता की हैसियत से बाद संस्थित करता है। यह धारण किया गया है कि यह याद प्राङ् न्याय के सिद्धान्त द्वारा वर्जित था।

(5) अ एक वादी अपना दावा सम्बन्धी को निकटता पर आधारित करता है, किन्तु उस पारिवारिक प्रथा का उल्लेख नहीं करता जिसके बिना निकटता सिद्ध नहीं की जा सकती थी। उसका वाद गुण-दोषों (on. merits) के आधार पर खारिज हो जाता है। तब वह एक वाद उसी अनुतोष के लिए पारिवारिक प्रथा के द्वारा सम्बन्धों की निकटता पर आधारित करते हुए संस्थित करता है। यह धारण किया गया कि यह वाद प्राङ्न्याय द्वारा वर्जित है।

प्राङ्न्याय के आवश्यक तत्व

जैसा कि हमने ऊपर देखा कि संहिता की धारा 11 में उल्लिखित परिभाषा के अनुसार प्राङ् न्याय का सिद्धान्त किसी न्यायालय को ऐसे याद के विचारण से प्रतिवारित करता है जिसमें का वादपद उन्हीं पक्षकारों के बीच एवं उसी के हक के अन्तर्गत किसी पूर्ववर्ती बाद में प्रत्यक्षतः एवं सारतः वादपदग्रस्त रहा है एवं ऐसे वादपदग्रस्त विषय को किसी सक्षम न्यायालय द्वारा सुना जाकर निर्णीत कर दिया गया है।

इस प्रकार प्राइ न्याय की उपर्युक्त परिभाषा से यह स्पष्ट है कि प्राङ् न्याय के लिए निम्नलिखित शर्तो का पूरा होना आवश्यक है और ये ही शर्तें प्राङ्न्याय के तत्व हैं

(1) परवर्ती वाद या वादपद में प्रत्यक्षतः और सारतः वादपदग्रस्त विषय, वही विषय होना चाहिये जो या तो वास्तविक रूप में या अन्वयात्रित रूप में (actually or constructively) पूर्ववर्ती बाद में वादग्रस्त था।

(2) पूर्ववत वाद का उन्हों पक्षकारों के बीच या ऐसे पक्षकारों के बीच, जिनके अधीन वे या उनमें से कोई दावा करते हैं, होना आवश्यक है।

(3) यथापूर्वोक्त पक्षकारों का पूर्ववर्ती बाद में उसी हक के अधीन मुकदमेबाजी करना आवश्यक है।

(4) पूर्ववर्ती वाद को विनिश्चित करने वाले न्यायालय का ऐसा न्यायालय होना आवश्यक है जो पश्चात्वत वाद का या उस बाद का, जिसमें ऐसा वादपद बाद में उठाया जाय, विचारण करने के लिए सक्षम हो।

(5) पश्चातूवर्ती याद में प्रत्यक्षतः और सारतः वादपदग्रस्त विषय का न्यायालय द्वारा पूर्ववर्ती बाद में अन्तिमरूपेण विनिश्चित किया गया होना आवश्यक है। वी० एथिराज बनाम ए० श्रीदेवी के मामले में कर्नाटक उच्च न्यायालय द्वारा यह अभिनिर्धारित किया गया है कि ऐसे मामलों में प्राध्याय का सिद्धान्त लागू होगा, जहां

(1) प्रतिवादी ने विचारण न्यायालय के निर्णय को स्वीकार कर लिया हो; तथा

(2) उसके द्वारा ऐसे निर्णय के विरुद्ध कोई अपील नहीं की गयी हो।

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