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सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 भाग 34: संहिता की धारा 91 एवं 92

Shadab Salim
30 April 2022 4:17 AM GMT
सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 भाग 34: संहिता की धारा 91 एवं 92
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सिविल प्रक्रिया संहिता,1908 (Civil Procedure Code,1908) की धारा 91 एवं 92 का संबंध पब्लिक न्यूसेंस (Public nuisance) या सार्वजनिक उपद्रव से है। ऐसा न्यूसेंस जिससे आम जनता को नुकसान होता है। दंड प्रक्रिया संहिता के साथ ही इस संहिता में भी पब्लिक न्यूसेंस से संबंधित प्रावधान है। इस आलेख के अंतर्गत इन दोनों ही धाराओं पर टिप्पणी प्रस्तुत की जा रही है।

धारा 91

पब्लिक न्यूसेंस की परिभाषा संहिता की धाराओं के अधीन नहीं किया गया है। इसकी परिभाषा साधारण खण्ड अधिनियम (General Clauses Act 1897) की धारा 3 की उपधारा 48) में इस प्रकार किया गया है कि पब्लिक न्यूसेंस की वहीं परिभाषा होगी जो भारतीय दण्ड संहिता, 1860 में है। भारतीय दण्ड संहिता की धारा 268 पब्लिक न्यूसेंस को परिभाषित करती है।

इस धारा के अनुसार,

"पब्लिक न्यूसेंस ऐसा कार्य या अवैध कार्यलोप है जिससे जनता को या उन लोगों को जो आस-पास रहते हैं या सम्पत्ति के अधिभोगी (occupier) है, सामान्य क्षति, खतरा एवं क्षोभ होता है या जिससे उन व्यक्तियों को जिनको किसी सार्वजनिक अधिकार के उपयोग का अवसर प्राप्त होता है, क्षति पहुंचती है, या बाधा खतरा एवं क्षोभ उत्पन्न होता है।"

धारा 91 के अधीन न केवल पब्लिक न्यूसेंस के लिये वाद संस्थित किया जा सकता है अपितु पब्लिक न्यूसेंस से भिन्न दोषपूर्ण कार्य (wrongful act) के लिये भी बाद संस्थित किया जा सकता है। संशोधन अधिनियम, 1976 के माध्यम से ऐसा सम्भव हुआ है।

जहाँ एक कंपनी के सिगरेट के व्यापार चिन्ह का प्रयोग दूसरी कम्पनी करती है और उससे सिगरेट का विक्रय बढ़ जाता है, वहाँ सिक्किम हाईकोर्ट ने आई टी सी बनाम श्रीकृष्ण मोक्तान नामक वाद में यह अभिनिर्धारित किया कि इससे पब्लिक न्यूसेंस के अन्तर्गत वाद हेतु नहीं उत्पन्न जहाँ आवासीय के साथ वाणिज्यिक क्षेत्र में तेल मिल (oil expeller) लगाया गया है, तेल मिल के क्रियाकलाप को रोकने के लिये बाद इस आधार पर संस्थित किया गया है कि यह अपदूषण का निर्माण करेगा।

वहा इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुनील कुमार वर्मा बनाम रघुवीर सिंह नामक बाद में यह अभिनिर्धारित किया कि मिल के क्रिया-कलाप को मात्र इस अभिकथन पर कि यह अपदूषण फैलायेगा, अन्तरिम आदेश के माध्यम से नहीं रोका जा सकता। इसके लिये पूर्ण साक्ष्य पर विचार करने को आवश्यकता पड़ेगी।

विशेष क्षति या हानि-इस धारा के अधीन उन व्यक्तियों के द्वारा भी वाद संस्थित किया जा सकता है जिन्हें पब्लिक न्यूसेंस या दोषपूर्ण कार्य से विशेष क्षति भले ही न पहुँची हो। विशेष क्षति से तात्पर्य उस क्षति से है जो किसी व्यक्ति को उससे अधिक पहुँचेगी, जो उस अपदूषण से प्रभावित दूसरे व्यक्ति द्वारा सामान्य रूप से सहन की जाती है।

पब्लिक न्यूसेंस के लिये उपाय-लोक-अपदूषण के दोषी व्यक्ति के विरुद्ध निम्न प्रकार की कार्यवाही की जा सकती है-

(अ) आपराधिक विधि के अधीन

(1) दोषी व्यक्ति के विरुद्ध भारतीय दण्ड संहिता के अधीन आपराधिक कार्यवाही की जा सकती है, (2) दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 133 से 143 द्वारा मजिस्ट्रेट को संक्षिप्त अधिकार उस पब्लिक न्यूसेंस को हटाने के लिये प्राप्त है।

(ब) दीवानी विधि के अधीन

(1) बिना विशेष क्षति दर्शाये संहिता की धारा 91 के अधीन वाद संस्थित किया जा सकता

(2) प्राइवेट व्यक्ति के द्वारा भी जिसे पब्लिक न्यूसेंस से विशेष क्षति पहुँची है, वाद संस्थित किया जा सकता है।

वाद का संस्थित किया जाना-

धारा के अधीन निम्न वाद संस्थित किया जा सकता है-

(अ) राज्य के एडवोकेट जनरल द्वारा, या

(ब) दो या अधिक व्यक्तियों द्वारा जिन्होंने न्यायालय की अनुमति प्राप्त कर ली है।

धारा 92

इस धारा का उद्देश्य लोक-न्यासों में जनता या सर्वजन के अधिकारों की रक्षा करना है तथा राज्य के एडवोकेट जनरल को एवं न्यायालयों को समर्थ बनाना है ताकि वे ऐसे खैराती या धार्मिक संस्थाओं की आय के दुरुपयोग को रोक सकें। इस धारा के प्रावधान लोक-न्यासों पर लागू होते हैं न कि निज न्यास पर ।

धारा का लागू होना-

इस धारा के लागू होने के लिये निम्नलिखित शर्तों का पूरा होना आवश्यक है-

(1) वाद का सम्बन्ध सार्वजनिक, खैरातो या धार्मिक न्यास से है,

(2) वाद में अभिकथन यह है कि न्यास-भंग हुआ है या न्यास के प्रशासन के लिये न्यायालय के निर्देश की आवश्यकता है, और

(3) जिस अनुतोष का दावा किया गया है वह धारा 92 में उल्लिखित अनुतोषों में से कोई है; और

(4) वाद प्रतिनिधि वाद होना चाहिये, लोकहित में न कि व्यक्तियों द्वारा अपने हित में यदि इन शर्तों में से किसी एक का भी समाधान नहीं हुआ है तो प्रश्नगत वाद धारा 92 को सीमा क्षेत्र से बाहर हो जाता है।

वाद ग्रहण की अधिकारिता-

जहां तक धारा 92 के अन्तर्गत वादों का सम्बन्ध है वहां जिला न्यायालय और अधीनस्थ न्यायालयों को समवर्ती अधिकारिता होगी, धन सम्बन्धी सीमा (धन सम्बन्धी क्षेत्राधिकार) पर ध्यान दिये बिना अर्थात् इस सम्बन्ध में धन सम्बन्धी अधिकारिता का कोई महत्व नहीं है।

यहाँ यह भी ध्यान देना आवश्यक है कि इस धारा के अधीन वाद प्रतिनिधि वाद होना चाहिये जो लोकहित में हो न कि व्यक्तियों के अपने हित के लिये। इस धारा के लागू होने के लिये वास्तविक परख यह है कि क्या वाद मूल रूप से जनता के लिये लोक अधिकार की रक्षा के लिये है और इस परख को लागू करने के लिये न्यायालय के लिये यह आवश्यक है कि वह वाद सार (substance) को देखे न कि प्रारूप (form) को।

निजी और लोक-न्यास में अन्तर

धारा 92 के अधीन वाद तभी संस्थित किया जायेगा जब लोकहित निहित हो। निजी और लोक-न्यास में अन्तर है कि जहाँ निजी न्यास में हिताधिकारी (beneficiaries) विशिष्ट व्यक्ति होते हैं लोक-न्यास में हिताधिकारी सामान्य जनता या उसका एक वर्ग होता है। निजी न्यास में हिताधिकरी विनिश्चित है या विनिश्चित किये जा सकते हैं किन्तु लोक न्यास में हिताधिकारी एक निकाय का रूप धारण करते हैं और उनको विनिश्चित नहीं किया जा सकता।

जहाँ वाद मन्दिर के प्रबन्ध से सम्बन्धित है, सार्वजनिक न्यास का निर्माण किया गया है, सोसाइटीज़ रजिस्ट्रेशन अधिनियम के अन्तर्गत पंजीकृत है, यहाँ केरल उच्च न्यायालय ने सुकुमारन बनाम ए एस धर्मा संस्था आइडल' नामक वाद में यह अभिनिर्धारित किया कि न्यास के पंजोरकण के नाते सम्पत्ति को प्रकृति और चरित्र नहीं बदला जायेगा, धारा 92 के प्रावधान यहाँ लागू होंगे। उपरोक्त वाद प्रतिमा के लिये वाद मित्र द्वारा संस्थित किया गया था। न्यायालय ने अभिनिर्धारित कि वाद चलाने योग्य है।

जहाँ एक निजी न्यास पारिवारिक सम्पत्ति से बना हुआ है। वादी एक वाद हिसाब देने और विभाजन के आधार पर सम्पत्ति का कब्जा प्राप्त करने के लिये संस्थित करता है, न्यास का प्रशासन एवं व्यवस्था प्रतिवादी को सौंपा हुआ है, वहाँ मद्रास उच्च न्यायालय ने टी जी बी चेट्टियार बनाम टी ए एस बेट्टियार नामक वाद में यह अभिनिर्धारित किया कि बाद धारा 92 के द्वारा बाधित नहीं है भले ही लाभार्थी सर्वजन या सर्वसाधारण हैं।

इस धारा के अधीन वाद संस्थित करना-

इस धारा के अधीन (1976 का संशोधन के पश्चात्) निम्न द्वारा वाद संस्थित किया जा सकेगा-

(अ) राज्य के महाधिवला द्वारा, और प्रेसीडेन्सी टाउन के बाहर कलेक्टर या किसी अन्य अधिकारी द्वारा जिसको राज्य सरकार इस प्रयोजन के लिये नियुक्त करे (धारा 93); या

(ब) दो या अधिक व्यक्तियों द्वारा जिनका कि न्यास में हित है और जिन्होंने इस उद्देश्य के लिये न्यायालय की अनुमति प्राप्त कर ली है। ध्यान रहे इस धारा के अन्तर्गत बाद संस्थित करने के लिये न्यायालय की अनुमति एक पूर्वशर्त है।

इस धारा के अधीन जिन व्यक्तियों को अनुमति प्रदान की गयी है उन्हें वाद संस्थित करना चाहिये। अगर अनुमति प्राप्त व्यक्तियों में कुछ ही याद संस्थित करते हैं तो वह मान्य नहीं होगा है

इस धारा के अधीन निम्नलिखित विषय-वस्तु के लिये वाद संस्थित किया जा सकेगा-

(क) किसी न्यासी को हटाने के लिये,

(ख) नये न्यासी को नियुक्ति के लिये।

जहाँ न्यासियों की नियुक्ति को चुनौतो दो गयो है, वहाँ पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने दत्तगीर महन्त बनाम रिसीराम' नामक वाद में यह अभिनिर्धारित किया कि न्यासियों की नियुक्ति विधिसम्मत है या नहीं इसकी छानबीन इस धारा की परिधि में नहीं किया जा सकता।

(ग) न्यासी में किसी सम्पत्ति को निहित करने के लिये,

(गग) ऐसे न्यासी को जो हटाया जा चुका है या ऐसे व्यक्ति को जो न्यासी नहीं रह गया है, अपने कब्जे में की किसी न्यास सम्पत्ति का कब्जा उस व्यक्ति को जो उस सम्पत्ति के कब्जे का हकदार है, परिदत करने का निर्देश देने के लिये,

(घ) लेखाओं और जाँचों को निर्दिष्ट करने के लिये,

(ङ) यह घोषणा करने के लिये कि न्यास सम्पत्ति का या उसमें के हित का कौन-सा अनुपात न्यास के किसी विशिष्ट उद्देश्य के लिये आवण्टित होगा,

(च) सम्पूर्ण न्यास सम्पत्ति या उसके किसी भाग का पट्टे पर उठाया जाना, विक्रय किया जाना, बन्धक किया जाना या विनिमय किया जाना प्राधिकृत करने के लिये,

(छ) स्कीम स्थिर करने को डिक्री, अथवा

(ज) ऐसा अतिरिक्त या अन्य अनुतोष अनुदत्त करने के लिये जो मामले में अपेक्षित हो। इस सम्बन्ध में धारा 92 की उपधारा (2) एवं (3) के उपबन्धों का भी अवलोकन करें।

जहाँ खैराती महाविद्यालय सार्वजनिक न्यास के द्वारा चलाया जा रहा है, वाद जनता के सदस्यों द्वारा व्यादेश की माँग करते हुये न्यासियों को न्यास-भंग से रोकने के लिये लाया गया है, वहाँ उच्च न्यायालय ने लखनऊ डायोसेसन ट्रस्ट एसोसिएशन बनाम सच्चिदानन्द बक्सी नामक वाद में यह अभिनिर्धारित किया कि मामला धारा 92 (1) (ज) के अन्तर्गत आता है, और प्रदेश के एडवोकेट जनरल की अनुमति के बिना संस्थित किया गया वाद चलाने योग्य नहीं है।

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