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मध्‍यस्‍थता एवं सुलह (संशोधन) अधिनियम [Arbitration and Conciliation (Amendment) Act], 2019 भाग 3: मध्‍यस्‍थता करार क्या होता है

Shadab Salim
17 Jun 2021 3:45 AM GMT
मध्‍यस्‍थता एवं सुलह (संशोधन) अधिनियम [Arbitration and Conciliation (Amendment) Act], 2019 भाग 3: मध्‍यस्‍थता करार क्या होता है
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पिछले आलेख में मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम से संबंधित विशेष शब्दों का अध्ययन किया गया था, इस आलेख में 'मध्यस्थता करार' के संबंध में विस्तार से अध्ययन किया जा रहा है

इस अधिनियम की धारा 7 मध्यस्थता करार को परिभाषित नहीं करती है। धारा 7 की उपधारा (1) उल्लेखित करती है कि मध्यस्थता करार एक ऐसा करार हैं जो विवाद के मामलों में यह प्रावधान करती है कि ऐसे विवाद को मध्यस्थ को सौंपा जाना चाहिये।

पक्षकारों के मध्य किसी विवाद किसी मध्यस्थता को सौंपने का करार मध्यस्थता करार वर्तमान के विवादों या भविष्य के विवादों के सन्दर्भ में हो सकता है।

धारा 7 उपबन्धित करती है कि 'इस भाग में मध्यस्थता करार' से अभिप्रेत है एक ऐसा करार जो पक्षकारों द्वारा उन सभी अथवा कुछ विवादों को, जो उनमें एक परिभाषित विधिक संबंध से जन्म लेेते है को प्रेषित किये जाने हेतु किया गया हो।

इस परिभाषा में यह स्पष्ट है कि जो विवाद मध्यस्थता के तहत मध्यस्थ को गया है वह पक्षकारों के मध्य किसी विधि सम्बन्ध के कारण उत्पन्न हुये होने चाहिये।

एक मामले में अभिनिर्धारित किया गया कि किसी माध्यस्थता करार की वैधता उसमें विनिर्दिष्ट मध्यस्थों की संख्या पर निर्भर नहीं करती। इसमें मध्यस्थों की संख्या का उल्लेख करना भी आवश्यक नहीं है क्योंकि इसे माध्यस्थता करार का आवश्यक तत्व नहीं माना जा सकता है।

इस परिभाषा के अध्ययन से मध्यस्थता करार के कुछ आवश्यक गुण निकल कर सामने आते हैं-

के एन मोदी के मामले में अभिनिर्धारित किया गया कि किसी करार को मध्यस्थता करार होने के लिये निम्नलिखित बातें आवश्यक हैं-

1. मध्यस्थता करार यह प्रकट करता हो कि अधिकरण का निर्णय पक्षकारों पर बाध्यकारी होगा।

2. अधिकरण का क्षेत्राधिकार पक्षकारों को सम्मति से न्यायालय के आदेश से या संविधि से प्रदान किया गया हो।

3. करार में यह प्रकट होता हो कि पक्षकारों के मुख्य अधिकार सक्षम अधिकरण द्वारा निर्धारित किये जायेंगे।

4. अधिकरण पक्षकारों के अधिकार निष्पक्ष एवं न्यायिक तरीके निर्धारित करेगा।

5. निर्णय हेतु विवाद को सन्दर्भित किया जाना पक्षकारों द्वारा आशयित हो।

6. करार से यह प्रकट होता हो कि पहले से सन्दर्भित विवाद का निपटारा अधिकरण द्वारा किया जायेगा।

7. पक्षकारों का आशय स्पष्ट होना चाहिए कि वह मध्यस्थता द्वारा अपने झगड़ों को निपटाने के लिए इच्छुक है चाहे वह वर्तमान का हो अथवा भविष्य का हो। यह आशय आवश्यक नहीं है कि कहीं एक जगह सुरुचिपूर्ण ढंग से व्यवस्थित हो।

एक वैध मध्यस्थता करार में तीन बातों के विषय में निश्चितता होनी चाहिये-

1.विवादों की निश्चितता।

2. पक्षकारों के विषय में निश्चितता।

3 मध्यस्थता अधिकरण के गठन के बारे में निश्चितता।

1. विवादों सम्बन्धी निश्चितता -

मध्यस्थता करार में यह स्पष्ट रूप से उल्लेखित होना चाहिये कि कौन से तथा किस प्रकार के विवाद या विवादों का निपटारा मध्यस्थता अधिकरण को सौंपा जायेगा। टिपर चंद के मामले में पक्षकारों ने करार में यह उपखण्ड रखा कि जहाँ संविदा में अन्यथा विनिर्दिष्ट न हो, डिजायनरों, विनिर्देशनों के सम्बन्ध में अधीक्षक यन्त्रों का निर्णय सभी पक्षों पर बन्धनकारी होगा।

इस मामले में न्यायालय ने निर्णय दिया कि उक्त उपखण्ड मध्यस्थता करार नहीं कहा जा सकता है क्योंकि उक्त संविदा खण्ड के तहत अधीक्षक यन्त्री को निर्माण कार्य के निष्पादन तथा पर्यवेक्षण सम्बन्धी मामलों में स्वयं निर्णय लेने की शक्ति प्रदान की थी। किसी विवाद के निर्णय के बारे में विनिश्चय देने का उल्लेख नहीं किया गया था।

रुक्मिणी बाई बनाम जिलाधीश, जबलपुर, एआईआर 1998 उच्चतम न्यायालय 479 के वाद में उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि चूंकि मध्यस्थता और सुलह अधिनियम् 1996 में मध्यस्थता-करार का कोई विशिष्ट प्रारूप उल्लिखित नहीं है और न यह दर्शाया गया है कि ऐसे करार में 'मध्यस्थता', 'मध्यस्थ', 'मध्यस्थता-अधिकरण' आदि शब्द या शब्दों का प्रयोग किया जाना आवश्यक है, इसलिये यदि करार की शर्तों से पक्षकारों का यह आशय स्पष्ट परिलक्षित निपटाये जाने पर सहमत हुए हैं, तो ऐसे करार हो 'मध्यस्थता करार' (Arbitration Agreement) माना जाना चाहिये।

मध्यस्थता के लिये पक्षकारों के बीच विवाद विद्यमान हो अथवा भविष्य में उद्धृत होने की सम्भावना हो, परन्तु दोनों ही दशाओं में विवाद विधिमान्य होना आवश्यक है। जहाँ मुख्य संविदा स्वयमेव अवैध हो, तो उससे उत्पन्न होने वाले विवाद भी अविधिमान्य होंगे अतः उसे मध्यस्थता हेतु निर्देशित करने हेतु बाध्य नहीं किया जा सकता है।

विवाद मध्यस्थता द्वारा ज्ञातव्य है कि किसी 'विवाद' या 'मतभेद' का अस्तित्व में होना मध्यस्तता का अत्यावश्यक तत्व है। जहाँ विवाद को पक्षकारों ने आपस में अन्तिम रूप से सुलझा लिया हो, तो बाद में वे अपने आपसी परिनिर्धारण का खण्डन करते हुये मध्यस्थता का सहारा नहीं ले सकेंगे भले ही उनके करार में मध्यस्थता खण्ड समाविष्ट किया गया हो।

आई० डी० पी० लि० बनाम इंडो स्विस कम्पनी के मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि किसी क्रय और विक्रय की संविदा में माल की गुणवत्ता या मात्रा के बारे में मतभेद को 'विवाद' मानते हुये मध्यस्थता खण्ड के अनुसार मध्यस्थता को निर्देशित किया जा सकेगा।

2. पक्षकारों के विषय में विनिश्चितता-

मध्यस्थता करार का दूसरा आवश्यक तत्व यह है कि मध्यस्थता करार में उन पक्षकारों के सम्बन्ध में स्पष्ट उल्लेखित होना चाहिये जिन पर पंचाट (अवॉर्ड) बध्यकारी या बन्धनकारी होगा। मध्यस्थता को निर्देशित किये जाने के लिये पक्षकारों की पूर्व सहमति होना नितांत आवश्यक है।

तथापि जहाँ पक्षकारों ने अपने भावी मतभेद या विवाद माध्यस्थों द्वारा निपटाये जाने पर सहमति व्यक्त की है, वहाँ विवाद या मतभेद की स्थिति वास्तव में उत्पन्न हो जाने पर उनमें को सौंपने से कोई भी पक्षकार दूसरे से दोबारा सहमति लिये बिना या मतभेद को मध्यस्थता कर सकता है।

संविदा या करार में मध्यस्थता वाक्य को भाषा रचना इस प्रकार होनी चाहिये जिससे कि यह स्पष्ट हो कि दोनों ही पक्षकारों को विवाद को मध्यस्थता अधिकरण को निर्देशित करने का द्विपक्षीय अधिकार प्राप्त है।

रेड्डी बनाम आई ई कंपनी लिमिटेड एआईआर 1993 उच्चतम 2268 के मामले में अभिनिर्धारित किया गया है कि वैध मध्यस्थता करार के लिये यह आवश्यक है कि वह करार लिखित हो, स्पष्ट हो तथा उसमें उस बात का उल्लेख हो कि वह किन पक्षकारों पर बन्धनकारी होगा।

माध्यस्थम् करार लिखित होना चाहिये परन्तु इसके लिये यह आवश्यक नहीं है कि सभी पक्षकारों द्वारा हस्ताक्षरित हो।

3. माध्यस्थम् अधिकरण के गठन के बारे में निश्चितता-

किसी मध्यस्थता करार के लिये यह भी आवश्यक है कि उसमें मध्यस्थता पंच (Arbitration Forum) के गठन के बारे में निश्चितता हो। मध्यस्थता करार में मध्यस्थों के बारे ऐसा मध्यस्तता करार शून्य एवं निष्प्रभावी होगा।

उदाहरणार्थ, यदि किसी मध्यस्तता करार में यह प्रावधान किया गया है कि विवाद की दशा में मध्यस्थता हेतु 'A' अथवा 'B' को नियुक्त किया जायेगा, तो ऐसा करार मध्यस्थों की अनिश्चितता के कारण शून्य माना जायेगा।

इस अधिनियम की धारा 7 की उपधारा (2) से (5) तक में मध्यस्थ करार की विशेषताओं का उल्लेख किया गया है।

ये निम्नलिखित में कोई अनिश्चितता या संदिग्धता होने की दशा में हैं-

1. ऐसा करार संविदा में मध्यस्थ खण्ड के प्रारूप में होना चाहिये। (2) मध्यस्थता करार लिखित होना चाहिये। साथ ही इसे सुनिश्चित होना चाहिये। करार लिखित तब माना जायेगा जब- पक्षकारों द्वारा हस्ताक्षरित किया गया हो, करार पत्र, टेलैक्स, टेलीग्राम, संसूचना के या अन्य किसी में मान्य किया जाए

2. यदि मध्यस्थता माध्यम से किया गया है जो अभिलेख के अभाव के रूप ले सके तब इस करार को लिखित कथन माना जायेगा।

3. यदि दावा तथा शर्त प्रतिदावा के आदान-प्रदान के कथन में एक पक्षकार के करार के अस्तित्व पर आरोप लगाया है तथा दूसरे ने इन्कार किया है तब वह लिखित करार माना जायेगा।

उपरोक्त (2) एवं (3) के लिये यह आवश्यक नहीं है कि करार पक्षकारों द्वारा हस्ताक्षरित हो। यदि संविदा करार में मध्यस्थता खण्ड का सन्दर्भ दिया गया है यह खण्ड मध्यस्थता करार माना जायेगा।

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