कर्नाटक SIT: वोटर लिस्ट से नाम हटाने की कोशिश के आरोप में BJP बूथ एजेंटों पर दर्ज दो FIR पर हाईकोर्ट की रोक

  • कर्नाटक SIT: वोटर लिस्ट से नाम हटाने की कोशिश के आरोप में BJP बूथ एजेंटों पर दर्ज दो FIR पर हाईकोर्ट की रोक

    कर्नाटक हाईकोर्ट ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान कथित तौर पर बड़ी संख्या में फॉर्म-7 आपत्तियां दाखिल कर मतदाताओं के नाम हटाने की कोशिश करने के आरोप में बीजेपी के दो बूथ लेवल एजेंटों के खिलाफ दर्ज दो FIR पर रोक लगाई। यह मामला बेंगलुरु के मल्लेश्वरम विधानसभा क्षेत्र से जुड़ा है।

    जस्टिस अनंत रमनाथ हेगड़े ने दोनों एजेंटों की ओर से दायर अलग-अलग रिट याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए अंतरिम राहत दी। याचिकाकर्ता जी.एस. वसंतलक्ष्मी और दीपक सिंह आर. ने FIR रद्द करने की मांग की थी। ये FIR बेंगलुरु के व्यालिकावल और यशवंतपुर पुलिस थानों में दर्ज की गई थीं।

    शिकायत भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक नेता ने दर्ज कराई, जिन्होंने 2023 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव में मल्लेश्वरम सीट से चुनाव लड़ा था। आरोप है कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान याचिकाकर्ताओं ने फॉर्म-7 के जरिए मतदाताओं के नाम हटाने की आपत्तियां दाखिल कीं, जबकि संबंधित मतदाता कथित तौर पर अब भी उसी विधानसभा क्षेत्र में रह रहे थे।

    SIR के अनुसार, वसंतलक्ष्मी ने आठ मतदान केंद्रों के 778 मतदाताओं के संबंध में फॉर्म-7 के जरिए आपत्तियां दर्ज कराई थीं। वहीं, दीपक सिंह आर. ने मतदान केंद्र संख्या 68 के 136 मतदाताओं के नामों पर आपत्तियां दाखिल की थीं। शिकायत में आरोप लगाया गया कि इन मतदाताओं को गलत तरीके से अनुपस्थित या स्थायी रूप से स्थानांतरित बताया गया, ताकि उनके नाम मतदाता सूची से हटाए जा सकें।

    शिकायत में यह भी कहा गया कि कई फॉर्म पर किए गए हस्ताक्षरों में अंतर था। इससे आशंका जताई गई कि याचिकाकर्ताओं या किसी अन्य व्यक्ति ने गलत जानकारी देने के उद्देश्य से हस्ताक्षर जाली बनाए हो सकते हैं।

    हाईकोर्ट में याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि फॉर्म-7 से संबंधित कथित अपराध गैर-संज्ञेय और जमानती हैं। इसलिए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 174(2) के तहत मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना पुलिस इनकी जांच नहीं कर सकती।

    याचिकाकर्ताओं ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 217(बी) लागू किए जाने पर भी सवाल उठाया। यह प्रावधान किसी लोक सेवक को नुकसान पहुंचाने के इरादे से गलत जानकारी देने से संबंधित है। उनकी दलील थी कि इस अपराध का संज्ञान संबंधित लोक सेवक या उसके अधिकृत वरिष्ठ अधिकारी की लिखित शिकायत के बिना नहीं लिया जा सकता।

    याचिकाकर्ताओं के अनुसार, इस मामले में निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी या सहायक निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी, जिन्हें कथित तौर पर गलत जानकारी दी गई, ने कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई। इसके बजाय शिकायत एक राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी की ओर से दर्ज कराई गई।

    याचिकाकर्ताओं ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 22 और संबंधित नियमों के नियम 13(2) का हवाला देते हुए कहा कि मतदाता सूची में पहले से दर्ज कोई भी व्यक्ति फॉर्म-7 के माध्यम से किसी अन्य नाम को शामिल किए जाने पर आपत्ति दर्ज करा सकता है। उनका तर्क था कि अधिनियम, नियमों या SIR संबंधी पुस्तिका में किसी व्यक्ति अथवा बूथ लेवल एजेंट द्वारा दाखिल की जा सकने वाली आपत्तियों की संख्या की कोई अधिकतम सीमा तय नहीं की गई है।

    उन्होंने आगे कहा कि यदि प्रक्रिया में कोई अनियमितता पाई जाती है, तो उसके खिलाफ जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 31 के तहत संबंधित निर्वाचन आयोग के अधिकारी के माध्यम से कार्रवाई की जानी चाहिए, न कि सीधे पुलिस कार्रवाई के जरिए।

    याचिकाकर्ताओं की ओर से सीनियर एडवोकेट अरुणा श्याम ने अधिवक्ता वसंत कुमार, अयप्पा के.जी., अभिलाष सी. और टी. चन्वी मदप्पा के साथ पैरवी की। हाईकोर्ट ने दोनों FIR पर अंतरिम रोक लगाते हुए मामले में याचिकाकर्ताओं को फिलहाल राहत प्रदान की।

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