कर्नाटक सरकार ने हाईकोर्ट में कहा- वंदे मातरम् गाना अनिवार्य नहीं, 2 अंतरों के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार

  • कर्नाटक सरकार ने हाईकोर्ट में कहा- वंदे मातरम् गाना अनिवार्य नहीं, 2 अंतरों के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार

    कर्नाटक सरकार ने मंगलवार को हाईकोर्ट में कहा कि राष्ट्रगान की तरह राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम्' का गायन अनिवार्य नहीं है। सरकार ने राज्य के सरकारी समारोहों में राष्ट्रीय गीत के केवल पहले दो अंतरे गाने के निर्देश वाले अपने आदेश का बचाव करते हुए यह दलील दी।

    हालांकि, हाईकोर्ट ने याचिका में उठाए गए मुद्दों पर फिलहाल कोई फैसला नहीं दिया और राष्ट्रीय गीत से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही के परिणाम का इंतजार करने का निर्देश दिया।

    जस्टिस अनु शिवरामन और जस्टिस टीपी विवेकानंद की खंडपीठ राज्य सरकार के उस आदेश को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या राज्यपाल की मौजूदगी वाले समारोहों को छोड़कर अन्य राज्य सरकारी कार्यक्रमों में 'वंदे मातरम्' के केवल पहले दो अंतरे गाने का निर्देश दिया गया।

    राज्य की ओर से पेश एडवोकेट जनरल ने अदालत को बताया कि राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम, 1971 में वर्ष 2026 में किए गए संशोधनों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में लंबित कार्यवाही का मौजूदा जनहित याचिका में उठाए गए मुद्दों पर सीधा असर पड़ेगा।

    इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि मामले में आगे की कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट के अगले आदेश तक रोकी जानी चाहिए और मामले को तीन सप्ताह बाद सूचीबद्ध किया जाए।

    कर्नाटक सरकार ने जनहित याचिका का विरोध करते हुए कहा कि राष्ट्रगान के विपरीत राष्ट्रीय गीत गाना किसी कानून के तहत अनिवार्य नहीं है। एडवोकेट जनरल ने कहा कि राज्य सरकार का आदेश यह तय नहीं करता कि सरकारी समारोह में राष्ट्रीय गीत कब, कैसे या किसके द्वारा गाया जाए। यह राज्य के सामान्य कार्यकारी अधिकार के तहत लिया गया निर्णय है।

    राज्य सरकार ने यह भी कहा कि गृह मंत्रालय का परिपत्र मार्गदर्शन और जानकारी के लिए है, अनिवार्य नहीं। सरकार के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के समक्ष केंद्र का रुख भी यही रहा है कि राष्ट्रीय गीत का गायन अनिवार्य नहीं है।

    याचिकाकर्ता की ओर से वकील अंगद कामथ ने इसका विरोध किया। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय गीत के छह अंतरे निर्धारित किए, जबकि राज्य सरकार ने केवल दो अंतरे गाने का निर्देश दिया। उनके अनुसार, यह राष्ट्रीय गीत के स्वरूप को बदलने का प्रयास है।

    कामथ ने दलील दी कि राष्ट्रीय प्रतीक से संबंधित विषय पर कानून बनाने का अधिकार केवल केंद्र के पास है। उन्होंने कहा कि संविधान की राज्य सूची या समवर्ती सूची में ऐसा कोई विषय नहीं है और यह केंद्र के अधिकार क्षेत्र में आता है। उन्होंने तर्क दिया कि यदि हर राज्य सरकार राष्ट्रीय प्रतीक की सामग्री तय करने लगेगी तो देश में राष्ट्रीय गीत के अलग-अलग राज्यवार रूप हो जाएंगे।

    याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि राज्य का आदेश राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम में 2026 में किए गए संशोधन के विपरीत है, जिसे 6 अगस्त 2026 को राष्ट्रपति की मंजूरी मिली थी। उनके अनुसार, संशोधन के जरिए 1971 के कानून की धारा 3 में महत्वपूर्ण बदलाव किया गया और राष्ट्रीय गीत को भी राष्ट्रगान के समान वैधानिक संरक्षण दिया गया। इसके तहत जानबूझकर राष्ट्रीय गीत के गायन को रोकना या उसे गा रहे लोगों की सभा में व्यवधान डालना अपराध बनाया गया।

    केंद्र की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने राज्य सरकार की दलील का विरोध करते हुए कहा कि जनहित याचिका में पेश केंद्र का आदेश संविधान के अनुच्छेद 256 और 257(1) के तहत जारी किया गया है और राज्य सरकार उसका पालन करने के लिए बाध्य है।

    एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि एडवोकेट जनरल का यह कहना सही नहीं है कि केंद्र का आदेश केवल जानकारी के लिए है। उनके अनुसार, यह अनुपालन के लिए है और केंद्र सरकार यह स्पष्ट कर रही है कि राष्ट्रीय गीत का आधिकारिक रूप कौन-सा है।

    हाईकोर्ट ने पूछा कि क्या केंद्र के इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। इस पर एडवोकेट जनरल ने बताया कि मामला मंगलवार को ही सुप्रीम कोर्ट के समक्ष सुनवाई के लिए सूचीबद्ध था।

    इसी दौरान सुप्रीम कोर्ट में कर्नाटक संगीतकार टीएम कृष्णा की ओर से 2026 के संशोधन की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई का भी उल्लेख हुआ। यह संशोधन राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम्' को दंडात्मक कानूनी संरक्षण प्रदान करता है। सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक टिप्पणी में कहा कि यह तय करना अदालत के अधिकार क्षेत्र में नहीं है कि 'राष्ट्रीय गीत' क्या है।

    हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक रूप से यह भी कहा कि 'बिजो एमैनुएल' मामले में स्थापित सिद्धांत का पालन किए जाने की उम्मीद है और धार्मिक कारणों से राष्ट्रीय गीत नहीं गाने वाले व्यक्ति को दंडात्मक परिणामों का सामना नहीं करना चाहिए।

    कर्नाटक के एडवोकेट जनरल ने हाईकोर्ट में कहा कि राष्ट्रीय गीत के गायन को अनिवार्य नहीं बनाया गया। उन्होंने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 51 राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगान की बात करता है, राष्ट्रीय गीत की नहीं। उनके अनुसार, राष्ट्रीय गीत किसी कानून के तहत अनिवार्य नहीं है।

    वहीं एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि केंद्र की ओर से 9 जुलाई 2026 को जारी हालिया आदेश में राष्ट्रीय गीत के आधिकारिक रूप को बजाने का निर्देश दिया गया है और पांच निर्धारित अवसरों पर इसे बजाया जाना है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय गीत केवल उसके आधिकारिक रूप में ही गाया जा सकता है।

    उन्होंने सवाल उठाया कि यदि संविधान के अनुच्छेद 256 और 257(1) के तहत केंद्र ने बाध्यकारी आदेश जारी किया तो क्या राज्य सरकार उसकी अनदेखी कर सकती है। केंद्र का रुख है कि आधिकारिक रूप में छह अंतरे शामिल हैं और उसी रूप में राष्ट्रीय गीत गाया जाना चाहिए।

    इससे पहले एक अन्य मामले में कर्नाटक हाईकोर्ट ने गृह मंत्रालय द्वारा 28 जनवरी को जारी परिपत्र और 'भारत के राष्ट्रीय गीत से संबंधित आदेश' शीर्षक वाले प्रोटोकॉल को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर विचार करने से इनकार किया। उस मामले में स्कूलों में 'वंदे मातरम्' के सभी छह अंतरे गाने की सलाह दी गई। हाईकोर्ट ने तब कहा था कि गृह मंत्रालय के परिपत्र में 'किया जा सकता है' जैसी भाषा का इस्तेमाल किया गया, इसलिए उसे उस समय अनिवार्य नहीं बनाया गया।

    मौजूदा जनहित याचिका पर अब 15 अक्टूबर को सुनवाई होगी।

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