सेशंस कोर्ट आजीवन कारावास को बिना रिमिशन नहीं दे सकता: कर्नाटक हाइकोर्ट ने हत्या के दोषी की सजा में संशोधन किया
Amir Ahmad
27 Jan 2026 4:18 PM IST

कर्नाटक हाइकोर्ट ने हाल ही में एक अहम फैसले में स्पष्ट किया कि सेशंस कोर्ट को किसी दोषी को बिना रिमिशन के आजीवन कारावास, यानी जीवनभर प्राकृतिक मृत्यु तक कारावास की सजा देने का अधिकार नहीं है।
हाइकोर्ट ने एक बालक की हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए आरोपी की सजा में संशोधन करते हुए प्राकृतिक मृत्यु तक आजीवन कारावास को साधारण आजीवन कारावास में परिवर्तित कर दिया।
यह मामला उस आरोपी द्वारा दायर अपील से जुड़ा था, जिसे ट्रायल कोर्ट ने हत्या के अपराध में दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा दी थी और आदेश दिया कि उसे जीवन के अंतिम क्षण तक जेल में रहना होगा। आरोपी ने इस सजा को कर्नाटक हाइकोर्ट में चुनौती दी।
जस्टिस एच.पी. संदेश और जस्टिस वेंकटेश नाइक टी. की खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले किरण बनाम कर्नाटक राज्य (2025) का हवाला देते हुए कहा कि बिना रिमिशन के आजीवन कारावास की सजा देने का अधिकार केवल संवैधानिक अदालतों, यानी सुप्रीम कोर्ट और हाइकोर्ट को ही है। सेशंस कोर्ट को ऐसा कोई अधिकार प्राप्त नहीं है।
हाइकोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से यह तय किया कि मृत्युदंड के विकल्प के रूप में बिना रिमिशन के आजीवन कारावास की सजा केवल संवैधानिक अदालतें ही दे सकती हैं। सेशंस कोर्ट द्वारा आरोपी को “प्राकृतिक मृत्यु तक आजीवन कारावास” की सजा देना कानून के अनुरूप नहीं है। ऐसे में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 428 के तहत सजा में सेट-ऑफ का लाभ भी आरोपी से छीना नहीं जा सकता।
-इन कारणों से हाइकोर्ट ने आरोपी की दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए सजा में हस्तक्षेप किया और उसे “प्राकृतिक मृत्यु तक आजीवन कारावास” के स्थान पर साधारण “आजीवन कारावास” की सजा दी। इस प्रकार अपील को आंशिक रूप से स्वीकार किया गया।
मामले के तथ्यों के अनुसार अभियोजन का आरोप था कि आरोपी जो एक मठ में काम करता था, ने शिकायतकर्ता के साढ़े तीन साल के बेटे की हत्या की।
अभियोजन के अनुसार आरोपी को बच्चे की मां, नानी और परनानी से व्यक्तिगत रंजिश थी, जिसके चलते उसने यह जघन्य अपराध किया।
बच्चे की मां ने अपने बयान में कहा कि आरोपी मठ में घूमता रहता था, मोबाइल छीन लेता था और मठ के स्वामीजी के पैसे भी चुरा चुका था। वह उसे अक्सर डांटती थी, जिससे आरोपी के मन में उसके प्रति गहरी नफरत पैदा हो गई। अन्य गवाहों ने भी बताया कि आरोपी की छवि अच्छी नहीं थी और वह श्रद्धालुओं तथा स्वामीजी की वस्तुएं छीनता रहता था।
हाइकोर्ट ने गवाहों के बयानों का विस्तृत विश्लेषण करते हुए कहा कि अभियोजन ने आरोपी के खिलाफ हत्या का स्पष्ट उद्देश्य साबित किया।
कोर्ट ने यह भी पाया कि आरोपी ने अपराध की पूर्व तैयारी की थी और उसने इसके लिए नींद की गोली खरीदी थी। मेडिकल, वैज्ञानिक और फॉरेंसिक साक्ष्य भी अभियोजन के पक्ष में पाए गए।
हाइकोर्ट ने कहा कि यह मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित है, लेकिन हत्या का उद्देश्य, तैयारी, शव की बरामदगी और अन्य भौतिक साक्ष्यों की कड़ियां पूरी तरह स्थापित होती हैं। इसलिए भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत दी गई दोषसिद्धि में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है।
हालांकि, सजा के प्रश्न पर हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सेशंस कोर्ट ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर बिना रिमिशन के आजीवन कारावास की सजा दी, जिसे संशोधित करना आवश्यक था। इसी आधार पर आरोपी की सजा में बदलाव किया गया।

