सोशल मीडिया पर फोटो डालने का मतलब अश्लील सामग्री में इस्तेमाल की सहमति नहीं: कर्नाटक हाईकोर्ट

  • सोशल मीडिया पर फोटो डालने का मतलब अश्लील सामग्री में इस्तेमाल की सहमति नहीं: कर्नाटक हाईकोर्ट

    कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा कि सोशल मीडिया पर सामान्य और वैध उद्देश्य से अपनी तस्वीर साझा करने का मतलब यह नहीं है कि कोई अन्य व्यक्ति उस तस्वीर का अश्लील सामग्री बनाने या प्रसारित करने के लिए इस्तेमाल कर सकता है।

    जस्टिस सूरज गोविंदराज ने इस टिप्पणी के साथ पांच आरोपियों के खिलाफ सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act) की धारा 66सी (पहचान की चोरी) और धारा 67 (इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से अश्लील सामग्री प्रकाशित या प्रसारित करना) के तहत शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही रद्द करने से इनकार किया।

    कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक रूप से उपलब्ध तस्वीर होने मात्र से किसी दूसरे व्यक्ति को उसका दुरुपयोग करने, तस्वीर के साथ जोड़कर अश्लील या अभद्र वीडियो बनाने अथवा महिला की पहचान और संपर्क विवरण के साथ उसे प्रसारित करने की अनुमति नहीं मिल जाती।

    पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि कोई व्यक्ति अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर सामान्य और वैध उद्देश्य से तस्वीर साझा करता है तो इसे अश्लील सामग्री में उस तस्वीर के इस्तेमाल या दूसरों के बीच ऐसी सामग्री प्रसारित करने की सहमति नहीं माना जा सकता।

    क्या था मामला?

    मामले में शिकायतकर्ता महिला ने आरोप लगाया कि अज्ञात लोगों ने उसके इंस्टाग्राम अकाउंट और वहां उपलब्ध तस्वीरों का इस्तेमाल करके अश्लील वीडियो बनाया और उसे 'बैड बॉयज' नाम के व्हाट्सएप ग्रुप में प्रसारित किया।

    इसके बाद महिला का इंस्टाग्राम आईडी, तस्वीर, वीडियो और संपर्क विवरण कई अन्य व्हाट्सएप ग्रुपों में भी साझा किए गए। इसके परिणामस्वरूप महिला को सोशल मीडिया अकाउंट पर अनचाहे संदेश मिलने लगे।

    जांच के बाद आरोपियों के खिलाफ IT Act के तहत आरोपपत्र दाखिल किया गया। इसके बाद आरोपियों ने हाईकोर्ट का रुख कर आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की मांग की।

    आरोपियों ने दलील दी कि इंस्टाग्राम अकाउंट पर उपलब्ध तस्वीरों में दिखाई देने वाली महिला और वीडियो में मौजूद व्यक्ति अलग-अलग हैं। उनका कहना था कि शिकायतकर्ता ही वीडियो में दिखाई देने वाली महिला है, इसे साबित करने वाली सामग्री के अभाव में IT Act के तहत अपराध कायम नहीं रह सकते।

    हाईकोर्ट ने आरोपियों की दलील खारिज करते हुए फॉरेंसिक साइंस लैबोरेटरी (FSL) की रिपोर्ट पर ध्यान दिया। रिपोर्ट में शिकायतकर्ता के इंस्टाग्राम अकाउंट पर उपलब्ध तस्वीरों और प्रसारित वीडियो में चेहरे की विशेषताओं के बीच समानता पाई गई थी।

    कोर्ट ने कहा कि FSL रिपोर्ट के अनुसार प्रसारित वीडियो अश्लील और अभद्र है तथा उसमें शिकायतकर्ता के चेहरे से समानता दिखाई देती है। हालांकि, यह वास्तव में ऐसा है या नहीं, इसका निर्णय मुकदमे की सुनवाई के दौरान किया जाना होगा।

    जस्टिस गोविंदराज ने कहा कि शिकायतकर्ता की तस्वीर का इस्तेमाल करके कथित तौर पर फर्जी अश्लील वीडियो बनाना या प्रसारित करना और फिर उसका इंस्टाग्राम आईडी तथा संपर्क विवरण व्हाट्सएप ग्रुपों के सदस्यों के साथ साझा करना गंभीर आरोप है।

    यदि आरोप साबित होते हैं तो इस तरह के कृत्य से महिला को अनचाहे संपर्क, अपमान, उत्पीड़न और प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचने का सामना करना पड़ सकता है। इससे एक महिला के रूप में उसकी गरिमा और निजता भी प्रभावित होगी।

    कोर्ट ने कहा कि सामग्री को सार्वजनिक रूप से प्रसारित करने के लिए ग्रुपों में साझा किए जाने से आरोपों की गंभीरता और बढ़ जाती है, क्योंकि महिला की पहचान और संपर्क विवरण ऐसे लोगों तक पहुंच जाते हैं, जो उससे संपर्क कर सकते हैं या उसे परेशान कर सकते हैं।

    इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की और आरोपपत्र तथा आरोपियों के खिलाफ शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही रद्द करने से इनकार किया।


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