वकील बनकर विधवा से ऐंठे 21 लाख रुपये, हाईकोर्ट ने FIR रद्द करने से किया इनकार
Amir Ahmad
29 Sept 2026 11:56 AM IST

कर्नाटक हाईकोर्ट ने खुद को वकील बताकर विधवा से उसकी संपत्ति से जुड़े मुकदमों को सुलझाने के नाम पर 21 लाख रुपये से अधिक लेने के आरोपी के खिलाफ दर्ज FIR रद्द करने से इनकार किया। हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपों में आपराधिक तत्व दिखाई देता है और मामले को केवल दीवानी विवाद मानकर जांच से बचाया नहीं जा सकता।
जस्टिस सूरज गोविंदराज ने आरोपियों की याचिका खारिज करते हुए पुलिस को मामले की उचित और गहन जांच करने का निर्देश दिया।
मामला एक विधवा की निजी शिकायत से जुड़ा है। उसके पति की किडनी की बीमारी के बाद मृत्यु हो गई थी। इसके बाद पति की अचल संपत्तियों को लेकर कई मुकदमे चल रहे थे। आरोप है कि पहले आरोपी टी. जी. बालन ने खुद को वकील बताया और दूसरे आरोपी मुरुगेश विक्रम के साथ मिलकर सभी लंबित मुकदमों को सुलझाने का भरोसा दिलाया।
महिला ने आरोपियों को बैंक के जरिए और नकद मिलाकर 21 लाख रुपये से अधिक दिए। हालांकि, इसके बाद संबंधित दीवानी मुकदमों में कोई प्रगति नहीं हुई। बाद में महिला को पता चला कि पहला आरोपी वकील नहीं है। उसने रकम वापस मांगी और पुलिस में शिकायत करने का प्रयास किया, लेकिन शिकायत दर्ज नहीं की गई।
इसके बाद महिला ने बेंगलुरु के अतिरिक्त मुख्य महानगर दंडाधिकारी के समक्ष निजी शिकायत दाखिल की, जिसके आधार पर FIR दर्ज की गई।
आरोपियों ने हाईकोर्ट में FIR रद्द करने की मांग करते हुए दलील दी कि मामला मूल रूप से दीवानी प्रकृति का है। हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।
अदालत ने कहा कि इस बात की जांच जरूरी है कि पहले आरोपी ने खुद को वकील बताया या नहीं और वास्तव में वह वकील है या नहीं। हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसा आचरण केवल इस मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि न्याय व्यवस्था पर भी इसका असर पड़ सकता है, क्योंकि मुकदमे लड़ने वाले लोग अपने मामलों के कानूनी निपटारे के लिए न्यायिक व्यवस्था पर भरोसा करते हैं।
अदालत ने कहा कि यदि अदालत में लंबित विवादों को अदालत के बाहर सुलझाने का झांसा देकर लोगों से इस तरह रकम लेने की गतिविधियों को प्रोत्साहित किया गया, तो इससे न्याय व्यवस्था की प्रतिष्ठा प्रभावित होगी। इसलिए आरोप गंभीर हैं और पुलिस द्वारा पूरी जांच जरूरी है।
आरोपियों ने सुप्रीम कोर्ट के प्रियंका श्रीवास्तव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किए जाने का भी तर्क दिया। हाईकोर्ट ने इस दलील को भी खारिज किया।
अदालत ने पाया कि शिकायतकर्ता ने सत्यापन शपथपत्र में स्पष्ट रूप से बताया कि उसने आरोपियों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने के लिए संबंधित पुलिस से संपर्क किया था, लेकिन पुलिस ने शिकायत लेने से इनकार कर दिया। इसके बाद उसने निजी शिकायत दाखिल की थी।
हाईकोर्ट ने माना कि शिकायत के साथ दिया गया सत्यापन शपथपत्र सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित आवश्यकताओं को पूरा करता है।
इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने FIR रद्द करने की याचिका खारिज की और पुलिस को मामले की गंभीरता से तथा पूरी तरह जांच करने का निर्देश दिया।

