पूर्व राजाओं की निजी संपत्ति के उत्तराधिकार पर 26वें संविधान संशोधन का असर नहीं: कर्नाटक हाईकोर्ट

Amir Ahmad

12 Aug 2026 3:03 PM IST

  • पूर्व राजाओं की निजी संपत्ति के उत्तराधिकार पर 26वें संविधान संशोधन का असर नहीं: कर्नाटक हाईकोर्ट

    कर्नाटक हाईकोर्ट ने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 5(ii) की संवैधानिक वैधता बरकरार रखते हुए कहा कि पूर्व रियासतों के शासकों की निजी संपत्तियों और अविभाज्य संपदाओं के उत्तराधिकार के संबंध में इस प्रावधान की प्रासंगिकता केवल इसलिए समाप्त नहीं हो जाती, क्योंकि 26वें संविधान संशोधन के जरिए पूर्व शासकों को मिलने वाली प्रिवी पर्स तथा उनके कुछ विशेषाधिकार समाप्त कर दिए गए।

    जस्टिस एमजीएस कमल ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 291 और 362 का संबंध पूर्व शासकों को प्रिवी पर्स, व्यक्तिगत अधिकारों, विशेषाधिकारों, गरिमा और उपाधियों से जुड़ी गारंटी और आश्वासनों से था। इन प्रावधानों का पूर्व शासकों की निजी संपत्तियों और 'गद्दी' से संबंधित अविभाज्य संपदा के उत्तराधिकार से सीधा संबंध नहीं था।

    कोर्ट ने कहा कि धारा 5(ii) आज भी उन अविभाज्य संपदाओं के उत्तराधिकार के नियम निर्धारित करने में प्रासंगिक है, जहां विलय संबंधी समझौतों में कानून और प्रचलित परंपरा के अनुसार उत्तराधिकार का प्रावधान किया गया।

    हाईकोर्ट ने कहा कि 26वें संविधान संशोधन का हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 5(ii) की वैधता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इस संशोधन ने पूर्व शासकों से जुड़ी 'गद्दी' या 'सिंहासन' की संप्रभु सत्ता को पूरी तरह समाप्त कर दिया। अब इसका अर्थ केवल भौतिक सिंहासन या आसन तक सीमित है, जिसका वर्तमान में ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व ही रह गया।

    कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के टिक्का शत्रुजीत सिंह बनाम सुखजीत सिंह मामले में दिए गए फैसले का भी उल्लेख किया। उस फैसले के अनुसार, विलय समझौते के बाद महाराजा की कुछ संपत्तियों को उनकी निजी संपत्ति घोषित किए जाने की स्थिति में केवल कथित सिंहासन ही ज्येष्ठाधिकार के नियम के अनुसार आगे बढ़ता था, न कि शासक की निजी संपत्तियां।

    इसी आधार पर हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं की यह आशंका दूर हो जाती है कि धारा 5(ii) के कारण शासक की निजी संपत्तियों पर हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 लागू नहीं होगा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पूर्व शासक की निजी संपत्ति का उत्तराधिकार संबंधित पक्षों के व्यक्तिगत कानून के अनुसार होगा, जबकि अविभाज्य संपदा का उत्तराधिकार, जहां लागू हो, ज्येष्ठाधिकार की परंपरा के अनुसार निर्धारित किया जा सकता है।

    हाईकोर्ट ने धारा 5(ii) को समय बीतने के साथ मनमाना और भेदभावपूर्ण हो जाने की याचिकाकर्ताओं की दलील भी खारिज की। कोर्ट ने कहा कि इस प्रावधान में एक विशेष प्रकार की संपदा, व्यक्तियों के एक विशेष वर्ग और विशेष परिस्थितियों का उल्लेख है। यह वर्गीकरण समझने योग्य अलगाव पर आधारित है।

    कोर्ट ने कहा कि निजी संपत्तियों और अविभाज्य संपदाओं के उत्तराधिकार का निर्धारण आज भी प्रासंगिक विषय है। भले ही 'गद्दी' की पुरानी राजनीतिक या संप्रभु भूमिका समाप्त हो गई हो, लेकिन प्रचलित परंपरा और व्यावहारिक दृष्टिकोण से इसका उत्तराधिकार के संदर्भ में कुछ महत्व बना हुआ है।

    हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाले पक्ष को यह दिखाना होता है कि कानून बनाने की विधायी क्षमता का अभाव है या उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है। मौजूदा मामले में याचिकाकर्ता न तो विधायी क्षमता के मुद्दे को स्थापित कर सके और न ही संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों के उल्लंघन को साबित कर सके।

    इन आधारों पर कोर्ट ने कहा कि धारा 5(ii) को निरस्त करने का कोई आधार नहीं बनता और सभी याचिकाएं खारिज कीं।

    क्या था विवाद

    मामले की एक याचिका मैसूर के अंतिम शासक जयचामराजेंद्र वाडियार की बेटी गायत्री देवी के बेटे होने का दावा करने वाले चदुरंगा कांतराज उर्स ने दायर की थी। अपने मामा श्रीकांतदत्त नरसिंहराजा वाडियार की मृत्यु के बाद उन्होंने संयुक्त पारिवारिक संपत्तियों में हिस्से के लिए बंटवारे का मुकदमा दायर किया। बाद में प्रतिवादियों ने दीवानी प्रक्रिया संहिता के आदेश 7 नियम 11 के तहत आवेदन देकर तर्क दिया कि धारा 5(ii) के कारण हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम इस संपत्ति पर लागू नहीं होता।

    दूसरा विवाद संदूर के पूर्व महाराजा यशवंतराव घोरपड़े के बच्चों वेंकटराव वाई. घोरपड़े और गायत्री घोरपड़े द्वारा दायर बंटवारे के मुकदमे से जुड़ा था। इसमें भी प्रतिवादी ट्रस्ट ने दावा किया कि धारा 5(ii) के कारण हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम इस संपदा पर लागू नहीं होता।

    याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि धारा 5(ii) पूर्व शासकों को संविधान के अनुच्छेद 291 और 362 के तहत दी गई गारंटी को प्रभावी बनाने के उद्देश्य से लाई गई। जब इन दोनों अनुच्छेदों को 26वें संविधान संशोधन से समाप्त कर दिया गया, तो धारा 5(ii) का कोई उद्देश्य नहीं रह गया और समय बीतने के साथ यह प्रावधान मनमाना तथा अनुचित हो गया।

    प्रतिवादियों ने इसका विरोध करते हुए कहा कि अनुच्छेद 291 और 362 केवल प्रिवी पर्स तथा कुछ विशेष गारंटियों से संबंधित थे निजी संपत्तियों के अधिकार से नहीं। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के टिक्का शत्रुजीत सिंह मामले के फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें धारा 5(ii) की व्याख्या स्पष्ट की जा चुकी है।

    कर्नाटक हाईकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया और धारा 5(ii) को अप्रासंगिक या निरर्थक घोषित करने से इनकार करते हुए याचिकाएं खारिज कीं।

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