खड़गे परिवार के ट्रस्ट को जमीन आवंटन मामले में जांच का रास्ता साफ, कर्नाटक हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का आदेश किया रद्द

Amir Ahmad

8 Sept 2026 3:41 PM IST

  • खड़गे परिवार के ट्रस्ट को जमीन आवंटन मामले में जांच का रास्ता साफ, कर्नाटक हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का आदेश किया रद्द

    कर्नाटक हाईकोर्ट ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मल्लिकार्जुन खड़गे और उनके परिवार से जुड़े ट्रस्ट को बेंगलुरु विकास प्राधिकरण की जमीन आवंटित किए जाने में कथित अनियमितताओं की जांच से जुड़े मामले में अहम फैसला सुनाया। हाईकोर्ट ने कहा कि निजी शिकायत के साथ लगाए गए हलफनामे में कमी एक ऐसी प्रक्रिया संबंधी त्रुटि है, जिसे दूर किया जा सकता है। केवल इस आधार पर जांच की वैधानिक प्रक्रिया को रोककर मामले को अदालत की जांच के लिए भेजना उचित नहीं है।

    जस्टिस एम नागप्रसन्ना ने निचली अदालत के उस आदेश को रद्द किया, जिसमें हलफनामे में आवश्यक सत्यापन नहीं होने के आधार पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 175(3) के तहत जांच का आदेश देने से इनकार किया गया। हाईकोर्ट ने मामले को निचली अदालत में वापस भेजते हुए शिकायतकर्ता को हलफनामे की कमी दूर करने का अवसर देने और उसके बाद धारा 175 के तहत आगे की कार्रवाई करने का निर्देश दिया।

    यह मामला लांचमुक्त कर्नाटक वेदिके के अध्यक्ष की ओर से दायर निजी शिकायत से जुड़ा है। शिकायत में सिद्धार्थ विहार ट्रस्ट को बेंगलुरु विकास प्राधिकरण की ओर से नागरिक सुविधा स्थल के कथित अनियमित आवंटन का आरोप लगाया गया। मल्लिकार्जुन खड़गे और उनके परिवार के सदस्य इस ट्रस्ट के न्यासी हैं।

    शिकायतकर्ता का आरोप था कि ट्रस्ट ने खुद को अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति द्वारा संचालित संस्था के रूप में पेश किया और इसी आधार पर बनशंकरी छठे चरण में अनुसूचित जाति कोटे के तहत नागरिक सुविधा स्थल हासिल किया। आरोप है कि इसके चलते ट्रस्ट को पट्टे की रकम में 50 प्रतिशत की छूट भी मिली।

    शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया कि ट्रस्ट को बाद में बीटीएम चौथे चरण में करीब 130 करोड़ रुपये मूल्य का वैकल्पिक भूखंड मिला, जिसकी कीमत कथित तौर पर मूल भूखंड से काफी अधिक थी। शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि तीन साल तक निर्माण नहीं होने के बावजूद ट्रस्ट ने जमीन अपने पास बनाए रखी।

    इन आरोपों के संबंध में शिकायतकर्ता ने संबंधित पुलिस, लोकायुक्त के पुलिस अधीक्षक और राज्यपाल से संपर्क किया था। भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए के तहत मंजूरी की मांग भी की गई। अधिकारियों की ओर से कोई कार्रवाई नहीं होने पर शिकायतकर्ता ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 175(3) के तहत जांच का निर्देश देने की मांग करते हुए निजी शिकायत दाखिल की।

    निचली अदालत ने शिकायत के साथ दाखिल हलफनामे में BNSS की धारा 333(2) के तहत आवश्यक सत्यापन नहीं होने को आधार बनाया। अदालत ने माना कि इस कमी के कारण धारा 175(3) के तहत जांच का आदेश नहीं दिया जा सकता। इसके बजाय शिकायतकर्ता के बयान और अदालत की ओर से धारा 223 के तहत जांच की जरूरत बताई गई।

    हाईकोर्ट ने इस दृष्टिकोण को खारिज करते हुए कहा कि धारा 175(3) और धारा 223 के तहत होने वाली कार्यवाही की प्रकृति अलग-अलग है और एक को दूसरे के स्थान पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

    अदालत ने कहा कि धारा 223 के तहत अदालत शिकायत पर संज्ञान लेने और शिकायतकर्ता तथा गवाहों की जांच के क्षेत्र में काम करती है। दूसरी ओर, धारा 175(3) अदालत को ऐसे मामलों में जांच शुरू कराने की शक्ति देती है, जहां आरोपों की प्रकृति ऐसी हो कि शिकायतकर्ता के लिए जरूरी सामग्री खुद जुटाना संभव नहीं है।

    हाईकोर्ट ने कहा कि मौजूदा मामला कोई निजी विवाद नहीं है, जिसे आपराधिक रंग दिया गया हो। आरोप भ्रष्टाचार, सरकारी पद के कथित दुरुपयोग, अनुचित लाभ पहुंचाने और मूल्यवान सार्वजनिक संपत्ति के आवंटन की प्रक्रिया में हेरफेर से जुड़े हैं।

    अदालत ने सवाल उठाया कि आवेदन पर किसने कार्रवाई की, ट्रस्ट को अनुसूचित जाति श्रेणी में किस आधार पर माना गया, सरकारी फाइल में क्या टिप्पणियां दर्ज की गईं, छूट की सिफारिश किसने की और क्या ट्रस्ट के न्यासियों तथा सरकारी अधिकारियों के बीच कोई मिलीभगत थी। हाईकोर्ट के अनुसार इन सवालों के जवाब केवल शिकायतकर्ता की ओर से जुटाए जा सकते हैं, ऐसा संभव नहीं है और इनके लिए विस्तृत जांच जरूरी है।

    अदालत ने कहा,

    “जो शिकायतकर्ता जांच की सहायता के बिना जान ही नहीं सकता, उसे केवल अदालत की जांच के जरिए सामने नहीं लाया जा सकता। ऐसी जानकारी जुटाना जांच का विषय है, महज अदालत की जांच का नहीं।”

    हलफनामे की कमी पर हाईकोर्ट ने कहा कि प्रक्रिया का उद्देश्य न्याय सुनिश्चित करना है, न कि तकनीकी खामी के कारण न्यायिक प्रक्रिया को ही समाप्त कर देना। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों और मद्रास हाईकोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि हलफनामे में कमी को दूर किया जा सकता है।

    हाईकोर्ट ने टिप्पणी की,

    “प्रक्रिया न्याय की सहायक है, उसे न्याय का गला घोंटने वाला साधन नहीं बनाया जा सकता।”

    अदालत ने निचली अदालत के धारा 223 के तहत जांच कराने वाले आदेश को रद्द कर दिया और मामला वापस भेजते हुए निर्देश दिया कि शिकायतकर्ता को हलफनामे की कमी दूर करने का अवसर दिया जाए। इसके बाद मामले में BNSS की धारा 175 के तहत वैधानिक प्रक्रिया के अनुसार आगे बढ़ा जाए।

    इस तरह हाईकोर्ट के आदेश के बाद खड़गे परिवार के ट्रस्ट से जुड़े जमीन आवंटन के आरोपों की जांच की मांग पर आगे की कानूनी कार्रवाई का रास्ता खुल गया। अदालत ने हालांकि आरोपों की सत्यता पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया।

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