शादी की अवधि कम होना स्थायी गुजारा भत्ता तय करने का अकेला आधार नहीं: कर्नाटक हाईकोर्ट ने 50 लाख गुजारा-भत्ते का आदेश बरकरार रखा
Amir Ahmad
24 Sept 2026 3:52 PM IST

कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा कि स्थायी गुजारा भत्ता तय करते समय केवल शादी की अवधि को आधार नहीं बनाया जा सकता और न ही रकम तय करने के लिए कोई गणितीय फार्मूला लागू किया जा सकता। हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का वह आदेश बरकरार रखा, जिसमें तलाक मंजूर करते हुए पत्नी को 50 लाख रुपये स्थायी गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया गया था।
जस्टिस डी.के. सिंह और जस्टिस एच. शांति भूषण की डिवीजन बेंच ने पति और पत्नी की ओर से दाखिल दोनों अपीलों को खारिज किया। पत्नी ने तलाक के आदेश को चुनौती देते हुए गुजारा भत्ता बढ़ाकर तीन करोड़ रुपये करने की मांग की थी, जबकि पति ने रकम घटाकर 10 लाख रुपये करने की मांग की थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि केवल शादी कम अवधि तक चलने या पति के वर्तमान में बेरोजगार होने के दावे के आधार पर स्थायी गुजारा भत्ता कम नहीं किया जा सकता।
अदालत ने कहा,
“स्थायी गुजारा भत्ता केवल शादी की अवधि के आधार पर या किसी गणितीय फार्मूले से तय नहीं किया जा सकता।”
अदालत ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने पत्नी की ओर से मांगे गए तीन करोड़ रुपये की पूरी रकम मंजूर नहीं की। रकम तय करते समय अदालत ने दोनों पक्षों की परिस्थितियों पर विचार किया। इनमें पति की ओर से पूरी वित्तीय जानकारी नहीं दिया जाना उसकी नौकरी का समाप्त होना, पति के कहने पर पत्नी द्वारा नौकरी छोड़ना पत्नी की कम उम्र, उसकी शैक्षणिक योग्यता और भविष्य में नौकरी की संभावनाएं शामिल थीं।
हाईकोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने दोनों पक्षों की परिस्थितियों के बीच उचित संतुलन बनाया। अदालत ने न तो पति की यह दलील स्वीकार की कि शादी कम अवधि की होने के कारण पत्नी को बड़ी रकम नहीं मिलनी चाहिए और न ही पत्नी की तीन करोड़ रुपये की मांग को बिना पर्याप्त साक्ष्य के स्वीकार किया।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के राजनेश बनाम नेहा के फैसले का भी हवाला दिया। इस फैसले में कहा गया कि सक्षम और स्वस्थ पति को अपनी पत्नी और बच्चों के भरण-पोषण के लिए पर्याप्त कमाई करने में सक्षम माना जाता है। यदि पति अपनी आय की सही जानकारी नहीं देता है तो अदालत उसके खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष निकाल सकती है।
हाईकोर्ट ने कहा कि पति यह साबित करने में विफल रहा कि 50 लाख रुपये का गुजारा भत्ता अत्यधिक है और इसे घटाकर 10 लाख रुपये किया जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि फैमिली कोर्ट के आदेश में कोई गंभीर गलती, महत्वपूर्ण तथ्य की अनदेखी या अनुचित दृष्टिकोण नहीं पाया गया, जिसके आधार पर 50 लाख रुपये की रकम में हस्तक्षेप किया जाए।
अदालत ने वैवाहिक संबंधों की स्थिति पर भी विचार किया। हाईकोर्ट ने कहा कि पति-पत्नी के बीच रिश्ते शुरुआत से ही तनावपूर्ण थे और बाद में स्थिति इतनी बिगड़ गई कि उसमें सुधार की कोई गुंजाइश नहीं बची।
अदालत के अनुसार, पत्नी और पति के माता-पिता के बीच मतभेद, घरेलू मामलों को लेकर विवाद, पत्नी की नौकरी को लेकर मतभेद, मुंबई और कतर में साथ रहने के दौरान विवाद तथा बाद में बातचीत और साथ रहने का पूरी तरह खत्म हो जाना जैसे कई कारण सामने आए।
हाईकोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने प्रत्येक आरोप को अलग-अलग देखने के बजाय दोनों पक्षों के आचरण के सामूहिक प्रभाव पर विचार किया था और इस दृष्टिकोण को गलत या रिकॉर्ड में मौजूद साक्ष्यों के विपरीत नहीं कहा जा सकता।
अदालत ने कहा,
“पूरे तथ्यों से स्पष्ट है कि वैवाहिक संबंध इस हद तक टूट चुका है कि उसके दोबारा बहाल होने की कोई गुंजाइश नहीं बची है और दोनों पक्षों को वैवाहिक बंधन में बनाए रखने से कोई उपयोगी उद्देश्य पूरा नहीं होगा।”
दोनों की शादी 6 जनवरी 2021 को हुई थी। शादी से पहले पत्नी सहायक प्रोफेसर के तौर पर काम करती थीं। बाद में पति के कहने पर उन्होंने नौकरी छोड़ दी। पति कतर के दोहा में जनरल मैनेजर के पद पर कार्यरत था।
2023 में पत्नी ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 के तहत वैवाहिक अधिकारों की बहाली की मांग करते हुए फैमिली कोर्ट में याचिका दायर की। उन्होंने पति और उसके परिवार पर दुर्व्यवहार का आरोप लगाया। पत्नी का कहना था कि 2022 में वीजा की अवधि समाप्त होने के करीब होने पर उन्हें कतर से वापस भेज दिया गया।
पत्नी ने अदालत को बताया कि बाद में सुलह के प्रयासों के बावजूद पति ने उन्हें न तो कतर वापस ले जाने और न ही मुंबई स्थित वैवाहिक घर में वापस रखने की इच्छा जताई।
इसके बाद पति ने क्रूरता के आधार पर तलाक की मांग करते हुए जवाबी याचिका दाखिल की। उसने पत्नी पर झगड़ालू होने, परिवार के सदस्यों के प्रति असम्मानजनक व्यवहार करने और पुलिस तथा रिश्तेदारों के साथ वैवाहिक घर आने के आरोप लगाए।
जवाबी याचिका के दौरान पत्नी ने तीन करोड़ रुपये स्थायी गुजारा भत्ता देने की मांग की।
फैमिली कोर्ट ने पत्नी की वैवाहिक अधिकारों की बहाली की याचिका खारिज की और तलाक मंजूर करते हुए उसे 50 लाख रुपये स्थायी गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया।
इसके खिलाफ दोनों पक्षों ने हाईकोर्ट में अपील की। पत्नी ने तलाक का आदेश रद्द करने और गुजारा भत्ता बढ़ाकर तीन करोड़ रुपये करने की मांग की। पति ने 50 लाख रुपये की रकम घटाकर 10 लाख रुपये करने की मांग की।
पति ने दलील दी कि शादी करीब दो साल ही चली और दोनों कुछ ही महीने साथ रहे। उसने यह भी कहा कि फैमिली कोर्ट ने उसकी नौकरी खत्म होने, देनदारियों और कर्ज तथा पत्नी की उच्च शिक्षा और स्वतंत्र रूप से कमाने की क्षमता पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया।
डिवीजन बेंच ने दोनों अपीलें खारिज करते हुए कहा कि फैमिली कोर्ट का निष्कर्ष साक्ष्यों पर आधारित है और उसमें कोई ऐसी गंभीर खामी नहीं है, जिसके कारण हाईकोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़े।

