कोर्ट के आदेश के बिना सुनवाई की पुरानी रिकॉर्डिंग पाने का अधिकार नहीं: कर्नाटक हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की

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    कर्नाटक हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अदालत की कार्यवाही की पुरानी श्रव्य-दृश्य रिकॉर्डिंग की प्रतियां प्राप्त करना किसी भी पक्षकार का असीमित अधिकार नहीं है। इसके लिए अदालत का विशेष आदेश आवश्यक है।

    जस्टिस सी. एम. पूनाचा की एकल पीठ ने इस संबंध में दायर याचिका खारिज करते हुए कहा कि कर्नाटक में अदालत की कार्यवाही के सीधे प्रसारण और रिकॉर्डिंग से जुड़े वर्ष 2021 के नियम किसी याचिकाकर्ता को रिकॉर्डिंग की प्रतियां मांगने का स्वतः अधिकार नहीं देते।

    मामले में 72 वर्षीय याचिकाकर्ता ने एक रिट अपील में हुई सुनवाई की श्रव्य-दृश्य रिकॉर्डिंग की प्रतियां प्राप्त करने के लिए निर्धारित प्रपत्र तीन में आवेदन दिया था। हालांकि, हाईकोर्ट के सहायक रजिस्ट्रार (सूचना प्रौद्योगिकी) ने 23 जुलाई 2026 को यह आवेदन खारिज कर दिया।

    इसके बाद याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए इस निर्णय को रद्द करने और संबंधित रिकॉर्डिंग उपलब्ध कराने का निर्देश देने की मांग की।

    याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि वर्ष 2021 के नियमों के नियम 8(3) के तहत निर्धारित प्रपत्र में आवेदन किया गया। इसलिए ऐसी रिकॉर्डिंग जो अदालत की वेबसाइट पर उपलब्ध नहीं है उसकी प्रतियां देने के अनुरोध पर नामित अधिकारी को विचार करना चाहिए था। याचिकाकर्ता ने रिकॉर्डिंग तक पहुंच देने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश और मानक प्रक्रिया तैयार करने की मांग भी की।

    वहीं हाईकोर्ट की रजिस्ट्री ने आवेदन खारिज करने के फैसले का बचाव करते हुए नियम 10(1)(ii) का हवाला दिया। इसके अनुसार, जब तक संबंधित पीठ विशेष रूप से निर्देश न दे, तब तक पुरानी रिकॉर्डिंग को अदालत की कार्यवाही का आधिकारिक अभिलेख नहीं माना जा सकता।

    नियम 8 और नियम 10 का हवाला देकर याचिका खारिज

    जस्टिस सी. एम. पूनाचा ने कर्नाटक में अदालत की कार्यवाही के सीधे प्रसारण और रिकॉर्डिंग से जुड़े नियम, 2021 के नियम 8 और नियम 10 का संयुक्त रूप से उल्लेख करते हुए कहा कि इन प्रावधानों में याचिकाकर्ता को रिकॉर्डिंग की प्रतियां प्राप्त करने का कोई अधिकार नहीं दिया गया है, जब तक कि अदालत इसके लिए विशेष आदेश जारी न करे।

    अदालत ने कहा,

    “नियमों के संयुक्त अध्ययन से स्पष्ट है कि याचिकाकर्ता को उक्त रिकॉर्डिंग की प्रतियां मांगने का कोई अधिकार प्राप्त नहीं है, जब तक कि अदालत द्वारा विशेष रूप से ऐसा आदेश न दिया जाए।”

    पीठ ने यह भी रेखांकित किया कि नियम 10(2) के तहत अधिकृत व्यक्ति या संस्था के अलावा किसी अन्य व्यक्ति अथवा संस्था द्वारा सुनवाई के सीधे प्रसारण या उसके संग्रहित आंकड़ों की रिकॉर्डिंग करना, उन्हें साझा करना अथवा प्रसारित करना प्रतिबंधित है। नियमों के अनुसार, इन रिकॉर्डिंग और संग्रहित आंकड़ों पर अदालत का विशेष कॉपीराइट भी है।

    इन प्रावधानों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने रजिस्ट्री द्वारा आवेदन खारिज किए जाने के फैसले को बरकरार रखा।

    अदालत ने दोहराया कि सुनवाई की संग्रहित रिकॉर्डिंग तब तक आधिकारिक न्यायिक अभिलेख नहीं बनती, जब तक संबंधित पीठ स्पष्ट रूप से ऐसा निर्देश न दे।


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