कोविड में बीमार माता-पिता की देखभाल के लिए मायके गई पत्नी वापस नहीं लौटी थी: कर्नाटक हाईकोर्ट ने खारिज किया भरण-पोषण का दावा

Amir Ahmad

5 Sept 2026 3:12 PM IST

  • कोविड में बीमार माता-पिता की देखभाल के लिए मायके गई पत्नी वापस नहीं लौटी थी: कर्नाटक हाईकोर्ट ने खारिज किया भरण-पोषण का दावा

    कर्नाटक हाईकोर्ट ने भरण-पोषण की मांग करने वाली पत्नी की पुनर्विचार याचिका खारिज करते हुए कहा कि वैवाहिक घर छोड़ने का उचित और वाजिब कारण साबित नहीं होने पर पत्नी पति से भरण-पोषण की मांग नहीं कर सकती। अदालत ने पाया कि पत्नी कोविड के दौरान बीमार माता-पिता और बहन की देखभाल के लिए मायके गई थी और बाद में पति के वापस लौटने के आग्रह के बावजूद वैवाहिक घर नहीं लौटी।

    जस्टिस डॉ. चिलकुर सुमलता ने मैसूरु फैमिली कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए कहा कि भरण-पोषण का अधिकार अपने आप नहीं मिल जाता। इसके लिए पत्नी को यह साबित करना होता है कि पति ने उसका भरण-पोषण करने से इनकार किया या उसकी उपेक्षा की, वह स्वयं अपना भरण-पोषण करने में सक्षम नहीं है और पति के पास उसे बनाए रखने के पर्याप्त साधन हैं।

    अदालत ने कहा,

    “बिना उचित और वाजिब कारण के वैवाहिक घर छोड़ना निश्चित रूप से पति से भरण-पोषण मांगने में अयोग्यता है।”

    मामले में महिला ने अपनी दो बेटियों के साथ मैसूरु फैमिली कोर्ट में पति से भरण-पोषण की मांग की। फैमिली कोर्ट ने पत्नी और बड़ी बेटी का दावा खारिज किया, जबकि छोटी बेटी के लिए विवाह या लाभकारी रोजगार मिलने तक 8,000 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण मंजूर किया। नवंबर 2023 के आदेश में पति को छोटी बेटी की शिक्षा पूरी होने तक उसका पूरा शैक्षणिक खर्च उठाने का निर्देश भी दिया गया।

    पत्नी ने अपने दावे को खारिज किए जाने के खिलाफ हाईकोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की।

    दोनों का विवाह 1995 में हुआ था और उनके बीच 25 वर्ष से अधिक समय तक कोई बड़ी वैवाहिक परेशानी नहीं रही। पति के अनुसार वर्ष 2021 में कोविड महामारी के दौरान पत्नी अपने माता-पिता और बहन की देखभाल के लिए मायके चली गई थी। वे कोविड से संक्रमित थे और इसी दौरान उसके पिता को दिल का दौरा भी पड़ा था।

    पति का कहना था कि कुछ समय बाद उसने पत्नी से वापस वैवाहिक घर लौटने का अनुरोध किया लेकिन वह नहीं आई। पति जब उसे वापस लाने के लिए उसके माता-पिता के घर गया तो पत्नी ने पुलिस में शिकायत दर्ज करा दी।

    पति ने अदालत के समक्ष यह भी कहा कि पत्नी के नाम पर उसने कर्ज लेकर एक मकान का भूखंड खरीदा था और दोनों बेटियों की शिक्षा का खर्च भी उसने उठाया था।

    दूसरी ओर पत्नी ने आरोप लगाया कि उसे पति की ओर से प्रताड़ना और क्रूरता का सामना करना पड़ा और वैवाहिक घर की परिस्थितियों ने उसे वहां से जाने के लिए मजबूर किया।

    हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि क्रूरता और प्रताड़ना के आरोपों के समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य पेश नहीं किया गया। अदालत ने कहा कि केवल आरोप लगाए जाने से यह साबित नहीं होता कि पत्नी के पास वैवाहिक घर छोड़ने का उचित कारण था।

    अदालत ने रिकॉर्ड में मौजूद पत्नी की पुलिस को दी गई शिकायत और बयान का भी उल्लेख किया। शिकायत के अनुसार वह अपने माता-पिता और बहन के कोविड से प्रभावित होने तथा पिता को दिल का दौरा पड़ने के कारण उनकी देखभाल के लिए मायके गई थी। वहीं पुलिस को दिए उसके बयान से यह भी सामने आया कि उसका पति उसे वापस वैवाहिक घर ले जाने के लिए उसके माता-पिता के घर गया।

    हाईकोर्ट ने कहा कि इन परिस्थितियों में यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि पत्नी पति के व्यवहार के कारण वैवाहिक घर छोड़कर मायके गई। अदालत ने यह भी माना कि पति की ओर से पत्नी के भरण-पोषण से इनकार या उसकी उपेक्षा साबित नहीं हुई।

    पीठ ने कहा कि पत्नी यह भी साबित नहीं कर सकी कि वैवाहिक घर से अलग रहने के लिए उसके पास कोई उचित और वाजिब कारण मौजूद था। ऐसे में परिवार अदालत द्वारा पत्नी को भरण-पोषण से वंचित करने का फैसला सही है।

    हाईकोर्ट ने परिवार अदालत के निष्कर्षों में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए पत्नी की पुनरीक्षण याचिका खारिज की। छोटी बेटी के लिए परिवार अदालत द्वारा तय 8,000 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण और उसकी शिक्षा का खर्च वहन करने संबंधी निर्देश पर इस फैसले में कोई बदलाव नहीं किया गया।

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