3 साल की प्रैक्टिस अनिवार्यता से छूट नहीं: कर्नाटक हाईकोर्ट ने न्यायिक कर्मचारियों को सिविल जज परीक्षा में बैठने की अनुमति पर रोक लगाई

Amir Ahmad

21 May 2026 4:46 PM IST

  • 3 साल की प्रैक्टिस अनिवार्यता से छूट नहीं: कर्नाटक हाईकोर्ट ने न्यायिक कर्मचारियों को सिविल जज परीक्षा में बैठने की अनुमति पर रोक लगाई

    कर्नाटक हाईकोर्ट ने उस अंतरिम आदेश पर रोक लगाई, जिसमें न्यायिक सेवा में कार्यरत कर्मचारियों को तीन वर्ष की अनिवार्य वकालत की शर्त पूरी किए बिना सिविल जज (जूनियर डिवीजन) भर्ती परीक्षा में शामिल होने की अनुमति दी गई थी।

    जस्टिस सचिन शंकर मगदुम और जस्टिस राजेश राय के की खंडपीठ ने 7 मई को यह अंतरिम रोक लगाई। बाद में जस्टिस एच. पी. संदेश और जस्टिस पी. श्री सुधा की अवकाशकालीन पीठ ने 12 मई को इस रोक को हटाने से इनकार किया।

    खंडपीठ ने कहा कि भर्ती नियमों में किया गया संशोधन सुप्रीम कोर्ट के उस निर्देश के अनुरूप प्रतीत होता है, जिसमें न्यायिक सेवा में सीधी भर्ती के लिए पूर्व प्रैक्टिस अनुभव को आवश्यक बताया गया है।

    अदालत ने कहा,

    “प्रथम दृष्टया यह स्पष्ट है कि संशोधित नियम न्यायिक सेवा में प्रवेश के लिए बार में पूर्व अनुभव की आवश्यकता संबंधी सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप लाए गए। संशोधित नियमों ने न्यायिक कर्मचारियों के लिए उपलब्ध पहले की भर्ती व्यवस्था को समाप्त कर दिया है और न्यूनतम तीन वर्ष की निरंतर प्रैक्टिस को अनिवार्य योग्यता बनाया।”

    12 मार्च 2026 को जारी कर्नाटक न्यायिक सेवा भर्ती संशोधन नियम, 2025 के तहत नियम 4 में बदलाव किया गया। इसके जरिए न्यायालयों में कार्यरत कर्मचारियों को सीधे सिविल जज भर्ती प्रक्रिया में भाग लेने की पूर्व व्यवस्था समाप्त कर दी गई। अब केवल ऐसे अभ्यर्थी पात्र होंगे जिन्होंने कम से कम तीन वर्ष तक लगातार प्रैक्टिस की हो। हालांकि विधि सहायक और शोध सहायक के लिए सीमित छूट दी गई।

    हाईकोर्ट ने कहा कि संशोधित नियमों में न्यायिक कर्मचारियों के लिए कोई विशेष अपवाद नहीं बनाया गया। इसके विपरीत केवल लॉ क्लर्क और रिसर्च असिस्टेंट को अलग श्रेणी के रूप में मान्यता दी गई।

    अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे उम्मीदवारों को परीक्षा में शामिल होने देना, जो संशोधित नियमों के तहत पात्र नहीं हैं, पूरी भर्ती प्रक्रिया को प्रभावित करेगा।

    दरअसल, न्यायिक कर्मचारियों ने संशोधित भर्ती नियमों की वैधता को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। 29 अप्रैल को जस्टिस एस. आर. कृष्ण कुमार की एकलपीठ ने अंतरिम व्यवस्था के तौर पर उन्हें प्रारंभिक परीक्षा, मुख्य परीक्षा और इंटरव्यू में शामिल होने की अनुमति दी थी।

    इस आदेश को हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल ने चुनौती दी। अपील में कहा गया कि न्यायालय द्वारा बनाया गया कोई अपवाद संशोधित वैधानिक भर्ती नियमों को निष्प्रभावी नहीं कर सकता।

    सुनवाई के दौरान यह भी बताया गया कि संशोधित नियम सुप्रीम कोर्ट के “ऑल इंडिया जजेस एसोसिएशन” मामले और 2013 की सिविल अपील में दिए गए निर्देशों के आधार पर बनाए गए।

    गौरतलब है कि न्यायिक सेवा में प्रवेश के लिए तीन वर्ष की अनिवार्य प्रैक्टिस की शर्त को लेकर सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका पर अभी सुनवाई जारी है। इसी दौरान सुप्रीम कोर्ट ने 13 मार्च को सभी हाइकोर्टों को सिविल जज भर्ती आवेदन की अंतिम तिथि 30 अप्रैल 2026 तक बढ़ाने का निर्देश दिया था।

    कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा कि जब तक सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे पर स्पष्टता नहीं देता, तब तक अंतरिम रोक हटाना उचित नहीं होगा।

    अदालत ने न्यायिक कर्मचारियों को यह स्वतंत्रता भी दी कि वे इस मुद्दे पर स्पष्ट निर्देश प्राप्त करने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख कर सकते हैं।

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